वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 151–160

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 151–160

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११८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् इति शोकाद्यसम्भवश्रुतेः । अविद्याऽसम्भवात्तदुपादनस्य कर्मणोऽप्यनुप-पत्तेः । पूर्वसिद्धाया अविद्यायाः प्रध्वस्तत्वादन्यस्याश्चोत्पत्तौ कारणा-संभवान्मूलाभावेन भ्रमसंशयाऽग्रहणानामपि विदुष्यसम्भवाच्च । ननु विद्योत्पत्तावविद्याऽभावेऽपि कर्म तु भविष्यति, विदुषोऽपि व्याख्यानभिक्षाटनादिदर्शनादिति चेन्न, चोदना प्रयुक्तानुष्ठानस्यैव तव समुच्चिचीषितत्वात् ब्रहमेकत्वमनुभवतो न चोदना सम्भवति कामा-भावात्कामिनो हि सर्वाश्चोदनाः । " अकामिनः क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कस्यचित् । यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् || ” ( मनु ० २.४ ) इति स्मृतेः । उसके पश्चात् विद्या हो ' ऐसा क्रम है तो स्वीकार किया ही है । यदि ' विद्या पहिले हो, अविद्या पश्चात् हो ', ऐसा क्रम तो असंभव है; क्यों-कि विद्या की उत्पत्ति होने पर अस्वतन्त्र होने से विद्या के आश्रय में अविद्या की उत्पत्ति संभव नहीं । " अग्नि उष्ण है तथा प्रकाशरूप है " ऐसा ज्ञान जिस आश्रय ( आत्मा ) में उत्पन्न हो गया, उसी आश्रय सम्भव में ' अग्नि शीत है अथवा अप्रकाशरूप है ' ऐसी अविद्या की उत्पत्ति नहीं है । ' सर्वभूत आत्मा ही है ' ऐसे आत्मा के एकत्व के ज्ञाता पुरुष को शोक - मोह नहीं होता, ऐसा श्रुति कहती है । अर्थात् अविद्या के नष्ट होने पर शोकादिक असम्भव हैं । विद्या के उत्पन्न होने पर अविद्या असम्भव होने से, अविद्या ही जिसका कारण है, ऐसे कर्म की भी उत्पत्ति सम्भव नहीं । मूलभूत अविद्या के अभाव जाने से भ्रम, संशय तथा अग्रहण भी विद्वान् में असम्भव हैं । शङ्का - विद्या की उत्पत्ति होने पर अविद्या के न रहते भी कर्म संभव है, क्योंकि व्याख्यान तथा भिक्षाटनादिक कर्म विद्वान् के भी देखे जाते हैं । उत्तर - ऐसी बात नहीं; क्योंकि आपको विहितकर्म का अनुष्ठान ही समुच्चय करने को इष्ट है । ब्रह्म की एकता का अनुभव करनेवाले को तो विधि ही सम्भव नहीं । कामना से रहित पुरुष की कभी कोई क्रिया नहीं देखी जाती है । " प्राणिमात्र जो कुछ करता है, वह काम

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्-[ ११६ विद्वच्छरीरस्थितिहेत्वविद्यालेशाश्रय कर्मशेषनिमित्तं तु विदुषो भिक्षाटनादिकर्म, न तदर्थचोदना किन्तु यावत्प्राणशरीरसंयोगभावित-कर्माभासं विद्वान्न तत् स्वगतं मन्यते, ' नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' ( ५.८ ) इति गीतोक्तः । कर्माध्यासोपादानाविद्याया असंभवात् ॥१४ ॥

वा॒युरनिलम॒मृत॒मये॒दं भस्मा॑न्त॒ ँ शरी॑रम् ।

ॐ क्रतों स्मर क्लिवे स्मर कृत । स्मर ॥१५ ॥

उपासना के योग से अन्तकाल में उपास्यस्मृतिलब्धयोगी प्रार्थना करता है । देवतोपासना और कर्मानुष्ठान से संस्कृतवायु अर्थात् प्राणवायु उपलक्षित कर्तृ -करणात्मक सूक्ष्मशरीररूप अध्यात्म अब सूत्र और हिरण्यगर्भरूप अधिदेव - सायुज्य को प्राप्त हो! प्राण-विरहित स्थूलशरीर अन्त्येष्टि संस्कार से सम्पन्न होकर भस्मरूपता को प्राप्त हो! ' ॐ ' यह ब्रह्म - नाम है । योगिवृन्द ब्रह्मबुद्धि से इसकी भावना करते हैं । हे ओम्! हे संकल्पात्मक देव! हमने ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में आप ब्रह्मात्मक अग्नि को उपसना की है । आदरपूर्वक ( इच्छा ) को ही चेष्टा है " यह स्मृति भी निष्कामपुरुष में क्रिया का अभाव वर्णन करती है । विद्वान् के शरीर की स्थिति का हेतु जो अविद्या का श ( लेशाविद्या ) वह अविद्या जिसका आश्रय है, ऐसा प्रारब्धकर्म शेष है । उसके निमित्त से ही भिक्षादनादिक व्यवहार होते हैं । उसके लिये विधि नहीं है; किन्तु प्राण और शरीर के संयोगसे होनेवाले जितने भी कर्माभास हैं; उन्हें विद्वान् अपने आप में नहीं मानता । गीता का कथन भी यही है कि - " तत्त्ववेत्तापुरुष ऐसा मानता है कि मैं कुछ. भी नहीं करता । " आत्मा में कर्म के अध्यास का उपादान कारण जो अविद्या, वह विद्वान् में सर्वथा असम्भव होने से विद्वान् आत्मा में कर्म नहीं मानता ॥ १४ ॥

I

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१२० ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् आप से प्रार्थना करते हैं कि आप हमारी उपासना का स्मरण कर अपना सायुज्य प्रदान करें - हिरण्यगर्भ और वैश्वानररूप कार्यब्रह्म की प्राप्ति का बानक बना दें! ॥ १५ ॥

अथ कृतोपासनो योगी अन्तकाले प्रार्थयते । द्वे यजुषी । अथे-दानों शरीरपातानन्तरं मम वायुः प्राणः । अत्र वायुपदं सप्तदशक-लिङ्गशरीरोपलक्षणार्थं, सप्तदशकलिङ्गरूपो वायुः प्राणोऽध्यात्मपरि-च्छेदं हित्वाधिदेवतरूपं सर्वात्मकममृतं मरण - धर्मरहितम्, सूत्रात्मा-नमनिलं वायुं प्रतिपद्यतान्, ' वायुर्वाव गौतम तत्सूत्रं वायुना गौतम सूत्रेणेद सर्व ७ संदृब्धम् ' ( बृहदारण्यकोपनिषत् माध्य ० ३।५२६ ) इति श्रुतेः ज्ञानकर्म संस्कृतं लिङ्गमुत्क्रामत्वित्यर्थः । अथेदं स्थूलं शरीरमग्नौ हुतं सत् भस्मान्तं भस्मैव भूयात् । भस्मान्तः स्वरूपं यस्य तत्कृत प्रयोजनकत्वात् । अथ योगिनोऽवलम्बनभूतमक्षरमुच्यते । ओमिति ब्रह्मणः प्रतिमा नाम वा । अस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीच्छन्दः, परमात्मा देवता, वेदारम्भे होमे शान्तिपुष्टि कर्मसु काम्येषु नैमित्तिकेष्वपि कर्मसु ( विनियोगः । ओम्प्रतीकात्मकत्वात् जिसने उपासना करली है, ऐसा योगी अन्त समय में प्रार्थना करता है । वायुः अर्थात् प्राण । मन्त्र में वायुपद कर्मेन्द्रियपञ्चक, ज्ञानेन्द्रियपञ्चक, मन - बुद्धि और प्राणपञ्चक रूप सत्रह तत्त्वात्मक सूक्ष्मदेह के उपलक्षण के लिये है । अतः यहाँ १७ तत्त्वोंवाला सूक्ष्म शरीर ही वायु - प्राण है । वह मेरा प्राण अध्यात्म ( जीव के स्थूलशरीरकृत ) परिच्छेद ( परिच्छिन्नता ) को त्याग कर सर्वस्थूल जगत् के आत्मारूप मरणधर्म से रहित अधिदैवत सूत्रात्मारूपी अनिल ( वायु ) को प्राप्त हो जावे । उपासना तथा कर्म से संस्कृत ( शुद्ध ) लिंगशरीर स्थूलशरीर से निकल जावे और यह स्थूलशरीर अग्नि में डाला हुआ भस्म हो जावे । क्योंकि इसका प्रयोजन समाप्त हो गया है । योगी का अवल-म्बभूत जो प्रणव अक्षर वह कहा जाता है । ओम् यह ब्रह्म का प्रतीकात्मक नाम है । इस प्रणव अक्षर का ब्रह्मा ऋषि है, गायत्री छन्द है, परमात्मा देवता है । वेद के आरम्भ, होम, शान्ति तथा पुष्टि के हेतु कर्मों में, काम्य तथा नित्य नैमित्तिक कर्मों में भी इसका विनियोग है ।

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १२१ सत्यात्मक मग्न्याख्यकं ब्रह्माभेदेनोच्यते । हे ओम्, हे क्रतो संक-ल्पात्मक, स्मर यन्मम स्मर्तव्यं तस्यायं कालः प्रत्युपस्थितोऽतः स्मर । ब्रह्म मया नैरन्तर्येण ध्यातं अथ प्रयाणकाले तत्स्मर । यस्त्वं ब्रह्मचर्ये गार्हपत्ये च मया परिचारितस्तत्स्मर । क्लिबे स्मर कल्प्यते भोगायेति क्लृप्लोकस्तस्मं स्मर । जसादेश आर्ष: ' छन्दस्युभयथे ' ति पदान्तत्वात् । या अयं लोको दातव्यस्तस्मै क्लृप्ताय लोकाय स्मर । कृतं स्मर, बाल्यप्रभृति यन्मयाऽनुष्ठितं कर्म तच्च स्मर, देवताज्ञानफलभूतं कार्य-ब्रह्मप्रापणमनुचिन्तय । स्मरेत्यस्यावृत्तिरादरार्था । ' क्रतो इत्यादि त्रिभिर्यजुभिरन्ते यज्ञान् योगी स्मारयति ' ( अनु ० ४.६ ) इति कात्या-यनोक्तः । दयानन्दः-- है क्रतो? त्वं शरीरत्याग समये ओम् स्मर, क्लिबे परमात्मानं स्वस्वरूपं च स्मर कृतं स्मर । अत्रस्थो वायुरनिलमनि-मृतं धरति । अथेदं शरीरं भस्मान्तं भवतीति विजानीतेति । सत्यात्मक अग्नि नामवाला ब्रह्म अभेदरूप से कहा जाता है । " हे ओम्, हे संकल्पात्मक! जो मेरा स्मरण के योग्य ध्यानादिक है, उसका स्मरण करो, यह उस मेरे किये ध्यानादिक के स्मरण का समय है । इसलिये जो मैंने निरन्तर ब्रह्म का ध्यान किया है, उसको इस मेरे मरणकाल में स्मरण करो | आप ब्रह्मचर्य तथा गार्हपत्य अग्नि के रूप में मैंने जो आपकी सेवा की है, उसे स्मरण करो । मेरे द्वारा इस उपा-सक के लिये जो लोक देने योग्य है, उस लोक का स्मरण कीजिये । जो मैंने बाल्यावस्था से लेकर कर्म किया है, उसे स्मरण कीजिये । देवता की उपासना का फलरूप जो कार्यब्रह्म उसकी प्राप्ति का चिन्तन कीजिये । " यहाँ पर स्मरण करने को जो दो बार कहा गया है, वह देवता के आदर के लिये है । स्वामी दयानन्द - " हे क्रतो? तुम शरीर के त्यागने के समय ओम् स्मरण कर परमात्मा के स्वरूप तथा अपने स्वरूप का स्मरण कर तथा अपने किये कर्म का स्मरण कर । यहाँ स्थित धनञ्जयादि-रूप वायु कारणरूप वायु को, कारणरूप वायु अमृत को धारण करता है । शरीर भस्म हो जाता है, ऐसा जानो । ” यह भाष्य ठीक नहीं । क्योंकि विशेषणादि का कोई मूल नहीं

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१२२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् तदपि यत्किञ्चित् सम्बोधनादनिर्मूलत्वात् । क्रतुशब्दे क्रतुकर्ता tata इत्यस्यापि निर्मूलत्वात् । न च लक्षणाया बीजमस्ति, अनुपपत्त्य-भावात् । धनञ्जयादिरूपो वायुः कथं कारणरूपं वायुं गच्छती -त्यनुक्त ेः ॥१५ ॥

1 अग्ने॒ नय सुपथा राये अ॒स्मान् विश्वानि देव वनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां 1 ते नम उक्तिं विधेम ॥४०.१६ ॥ अग्ने! आप सम्पूर्ण कार्यात्मक जगत् को व्याप्त करनेवाले दिव्यदर्शी अभयप्रद हिरण्यगर्भ - स्वरूप देव हैं । देवयानमार्ग सुपथ है । हम मुक्तिरूप धन के इच्छुक हैं । हमें सुपथ - देवयानमार्ग से ले चलकर समुच्चयानुष्ठान से प्राप्य अभीष्टमुक्तिरूप फल को आप प्राप्त करा दें! दक्षिण पितृयानमार्ग से हम उपराम हो चुके हैं । हमें नहीं चाहिये पुनर्जन्म पर्यवसायी वह धूममार्ग । आप सम्पूर्ण ज्ञान ( उपासना ) और है । क्रतु शब्द में क्रतु ( यागकर्ता ) जीव अर्थ किया जाय तो उसमें भी कोई मूल नहीं । क्योंकि क्रतुशब्द का वाच्य अर्थ जीव नहीं है । यदि कहा जाय कि यद्यपि क्रतु शब्द का वाच्य तो जीव नहीं है; किन्तु लक्ष्य तो संभव है? यह भी उचित नहीं; क्योंकि लक्षणा का बीज, सम्बन्ध की अनुपपत्ति है । धनञ्जयरूप वायु, अथवा तात्पर्य की अनुपत्ति है, वह यहाँ नहीं कारणरूप वायु को कैसे प्राप्त होता है; इस का भी कथन न होने से दयानन्द स्वामी का भाष्य उचित नहीं ॥१५ ॥

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वेदार्थपारिजात: ( वा. स.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १२३ कर्मों को जाननेवाले हैं । कल्याणमार्ग के प्रतिबन्धक दुरितों को दूरकर दें । जिसके फलस्वरूप हम अभीष्ट लोक को प्राप्त कर सकें । हम इस समय आपकी किसी अन्य रीति से सेवा नहीं कर सकते, केवल बार-बार नमस्कार ही निवेदित करते हैं || १६ || हे अग्ने, सुपथा देवयानेन मार्गेण राये मुक्तिलक्षणाय धनायास्मान् नय प्रापयाभीष्टलोकम् इत्युक्टाचार्य: । पुनरन्येन मन्त्रेणाग्न्याख्यं ब्रह्मप्रति योगी मार्ग याचते । अगस्त्यहृष्टाग्नेयी त्रिष्टुप् ( अ ० ५. क ०३६ ) । हे देव? दानादि गुणक, हे अग्ने? अस्मान् सुपथा शोभनेन देवयानाख्य-मार्गेण नय । सुपथेति विशेषणं दक्षिणधूममार्गनिवृत्त्यर्थम् । गतागत-लक्षणेन दक्षिणमार्गेण निर्विण्णोहमतस्त्वां याचे पुनर्गमनागमनवजतेन शोभनेन पथाऽस्मान्नय । किमर्थम्? राये क्रममुक्तिलक्षणाय धनाय समुच्चयानुष्ठानफलभोगाय । कीदृशस्त्वम् - विश्वानि सर्वाणि वयुनानि कर्माणि प्रज्ञानानि च विद्वान् जानन् । किञ्च - जुहुराणं कुटिलं प्रति-बन्धकं वञ्चनात्मकमेनः पापमस्मत् अस्मत्तः सकाशात् युयोधि पृथक् अग्निदेव! मुक्तिरूप धन के प्रति मुझ को देवयानमार्ग से प्राप्तकरा दो । अर्थात् अभीष्ट लोक को प्राप्तकरा दो । ऐसा उव्वटा-चार्य का भाष्य है । अग्निनामक ब्रह्म से योगी मार्ग की याचना करता है । हे दानादि गुणवाले अग्निदेव? हमको शोभन देवयान मार्ग से ले चलो । मन्त्र में सुपथा इस मार्ग के विशेषण से दक्षिण ( धूम ) मार्ग की निवृत्ति ( व्यावृत्ति ) है । जिस मार्ग से चन्द्रलोक में जाना होता है । पुनः आना भी होता है, ऐसे गमनागमनरूप दक्षिणमार्ग से यात्रा करके मैं दुःखी हो गया हूँ; अतः पुनः गमनागमन से रहित मार्ग से हमको ले चलो, ऐसी आप से प्रार्थना करता हूँ, मार्गविशेष की प्रार्थना किस लिये है? क्रममुक्तिरूप धन की प्राप्ति के लिये अर्थात् समुच्चय के अनुष्ठान के फल भोगरूप प्रयोजन के लिये । जिस आपसे मैं प्रार्थना कर रहा हूँ, वे आप कैसे हैं? इसे मैं जानता हूँ, अत एव आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ । आप मेरे सर्व कर्म तथा उपासनाओं को जाननेवाले हैं । आप हमारे कल्याणमार्ग के प्रतिबन्धक पाप को हमसे अलग करिये! पाप के पृथक् कर देने से शुद्ध हुए हम अभीष्ट लोक को प्राप्त हो

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१२४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कुरु वियोजय नाशयेत्यर्थः ' हुच्छ कौटिल्ये ' इत्यस्माच्छानचि जुहोत्या-दित्वेन रूपम् । ' यु मिश्रणामिश्रणयोः ' ह्वादित्वाश्छब्लोपद्वित्वे छान्दसं हेधित्वम् । इदानीं वयं ते न शक्नुमः परिचर्यां कर्तुं ततो वयं विशुद्धाः सन्तः इष्टं प्राप्स्यामः । वयं ते तुभ्यं भूयिष्ठां बहुतरां नम उक्ति नम-स्कारवचनं विधेम कुर्याम । यद्वा - अंगति गच्छति व्याप्नोति सवं कार्यंजातमित्यग्निः हिरण्यगर्भः । हे अग्ने सर्वव्यापिन ईश्वर सुपथा शोभनेन पुन-वृत्तिरहितेन मार्गेणामानुपासकानू राये धनाय ज्ञानकर्मफलोपभोगाय नय गमय, अन्यत् पूर्ववत् । दयानन्दः - हे देवाग्ने परमेश्वर यतो वयं ते भूयिष्ठां नम उक्त विधेम तस्माद् विद्वान् त्वमस्मज्जुहुराणमेनो युयोध्यस्मान् । राये सुपथा विश्वानि वयुनानि नय प्रापय । तदपि यत्किञ्चित् ज्ञानाय नयनप्रार्थनानुपयोगात् । सुपथा धर्म्येण मार्गेण नयनमपि वेदप्रदानेनैव सिद्धम् । न च परमेश्वर एव सन्मार्गेण गमयति तथात्वे केषाञ्चिदपि दुर्मार्गप्रवृत्यनुपपत्तेः ॥१६ ॥

जायेंगे । हम इस समय आपकी सेवा करने में समर्थ नहीं हैं, अतः आपके लिए बहुत से नमस्कार का वचन कहते हैं कि आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है । • अथवा जो सर्व जगत् को व्याप्त करता है, वह कहा जाता है, अग्नि अर्थात् हिरण्यगर्भ । हे अग्ने? सर्वव्यापक ईश्वर! शोभन पुनः आगमन से रहित मार्ग के द्वारा हम उापसकों को ज्ञान ( उपासना ) तथा कर्म के फल के उपभोग के लिये ले चलो । अन्य अर्थ पहिले के ही समान है । स्वामिदयानन्द --- हे देव परमेश्वर? क्योंकि हमने आपके प्रति करो बहुत नमस्कार वचन कहे हैं, इसलिये आप हमारे पाप को दूर । हमको धन की प्राप्ति के लिये श्रेष्ठमार्ग से सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करो । यह भाष्य भी कुछ नहीं । ज्ञान की प्राप्ति के लिये परमेश्वर प्रार्थना का कोई उपयोग नहीं है I । धर्मयुक्त मार्ग से ज्ञान की प्राप्ति

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वेदार्थ पारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १२५

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।

योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसाव॒द्दम् ॥१७ ॥

ॐ खं ब्रह्म ॥

इति माध्यन्दिनीयायां वाजसनेयसंहितायां चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

ज्योतिर्मयमण्डलरूपपात्र से आदित्यान्तर्गत अविनाशी पुरुष -रूप सत्य का मुख - शरीर - स्वरूप आच्छादित है । वह प्राण और प्रज्ञाशक्ति से जगत् को व्याप्त कर शरीर में प्रतिष्ठित रहनेवाला और पुरुषाकार होने से ' पुरुष ' कहा जाता है । अन्त में पूर्ववत् ध्यान करे

कि ' ऐसा पुरुष मैं हूँ ' । आकाशवत् व्यापक ब्रह्म ' ॐ ' है ॥१७ ॥

पुनरादित्योपासनमाह । उष्णिग्यजुद्वे ' यान्ता ' उष्णिक् त्रिपादान्त्यो द्वादशक ' इति वचनात् । हिरण्मयमिव हिरण्मयं ज्योतिर्मयं यत् पात्रम् पिबन्ति यत्र स्थिता रश्मयो रसानिति पात्रं मण्डलम् तेन तेजोरूपेण मण्डलेन सत्यस्यादित्यमण्डलस्थस्याविनाशिनः पुरुषस्य मुखं शरीरमपि -हितमाच्छादितं वर्तते । तथापि योऽसौ प्रत्यक्षः आदित्ये रविमण्डले पुरुषः पुरुषाकारत्वात् पूर्णमनेन प्राणबुद्धघात्मना जगत्समस्तमिति पुरुष: पुरिशयनाद्वा स मण्डलस्थः पुरुषः असौ प्रत्यक्षः कार्यकारण-तो वेदप्रदान करने से ही सिद्ध है । परमेश्वर ही किसी साधन के बिना सन्मार्ग से कहीं किसी को नहीं प्राप्त कराता है । ऐसा करने पर तो किसी की दुष्ट ( खोटे ) मार्ग में प्रवृत्ति ही नहीं बनेगी ॥ १६ ॥

मन्त्र पुनः सूर्य की उपासना को कहता है । हिरण्यमय अर्थात् ज्योतिर्मय पात्र से सत्य का मुख ( शरीर ) आच्छादित है । भाव यह है कि जिसमें स्थित होकर किरणें पृथिवी के सर्वरसों का पान करती हैं; उसे यहाँ पात्र कहा गया है । ऐसा पात्र सूर्यमण्डल है; क्योंकि सूर्य -

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१२६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् संघातप्रविष्टोऽहमस्मि । एतां चोपासनां कुर्यादित्यर्थः । ओम् खं ब्रह्म-ति यजुषी । ओमितिनामनिर्देशो ब्रह्मणः । खं ब्रह्म ेत्याकाशरूपमन्ते ब्रह्म ध्यायेत् ( अनु ० ४ - ९ ) । यद्यपि ब्रह्म चेतनमा काशस्त्वचेतनस्तथा-प्येकदेशे सादृश्यम् | नभोवद् व्यापकं ब्रह्म ओमिति जपन्ध्यायेदित्यर्थः । सूर्यमण्डलस्थः पुरुषोऽहमेवेत्यभेदेन चिन्तयेत् । मानुषदैववित्तसाध्यं फलं शास्त्रलक्षणं प्रकृतिलयान्तम् । एता-वती संसारगतिः । अतः परं पूर्वोक्तमात्मैवाभूद् विजानत इति सर्वात्म-भाव एव सर्वेषणा संन्यासज्ञाननिष्ठाफलम् । एवं द्विप्रकारः प्रवृत्ति-निवृत्तिलक्षणो वेदार्थः प्रकाशितः । तत्र प्रवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य विधि-प्रतिषेधलक्षणस्य कृत्स्नस्य प्रकाशने प्रवर्ग्यान्तं ब्राह्मणमुपयुक्तम् । निवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य प्रकाशनेऽत ऊर्ध्वं बृहदारण्यकमुपयुक्तम् । तत्र मार्ग याचनं नापेक्षितम् ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इहैव समबनी-यन्ते ' ( बृह ० ४.४.६ ) इति श्रुतेः । अपरब्रह्मविद एव मार्गयाचनोपपत्तेः । मण्डल में ही स्थित होकर रश्मियाँ रसों का पान करती हैं । इस ज्योतिर्मय मण्डलरूप पात्र से सत्य = आदित्यमण्डल में स्थित अविनाशी पुरुष का शरीर आच्छादित है । तथापि जो आदित्यमण्डल में प्रत्यक्ष पुरुष है, वह पुरुष के आकारवाला है अथवा इससे प्राण तथा बुद्धिरूप से समस्त जगत् पूर्ण है, इसलिये उसे पुरुष कहा गया है । ओम् यह ब्रह्मके नाम का निर्देश है । ' आकाश के समान, स्वरूप वाले ब्रह्म का ध्यान करें ( अनु ० ४.६ ) ' ब्रह्म चेतन है, आकाश जड़ है, तब ब्रह्म को आकाश के समान कैसे कहा? ' एक देश में सादृश्य है । ' किस देश ( अंश ) में? ' व्यापकता अंश में सादृश्य है । अतः अर्थ हुआ कि व्यापक ब्रह्म ओम् है । अन्त में उस ब्रह्म का ध्यान करे कि सूर्य-मण्डल में स्थित पुरुष मैं ही हूँ । मनुष्य के तथा देवसम्बन्धी धन से प्रकृतिलयपर्यन्त फलप्राप्त होता है । शास्त्र उसमें प्रमाण है । प्रकृतिलयपर्यन्त जो फल है, यहाँ तक संसार की गति है । इससे परे पूर्व मन्त्रों में कहा सर्वात्मभाव ही है । इस प्रकार प्रवृत्ति तथा निवृत्तिरूप दो प्रकार का वेद का अर्थ प्रकाशित किया है । इस उपनिषद् के विशद अर्थ के ज्ञान के लिये बृहदारण्यक उपनिषद् उपयुक्त है । वह सर्वात्मभाव सर्व एषणाओं के

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वेदार्थपारिजात: ( वा.स. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १२७ सायणाचार्यः काण्वभाष्ये ' यत्तत्सत्यमसौ आदित्य एव एतन्मण्डले पुरुषश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः ( शतपथ ब्राह्मणम् १४.५.६.३ ) इति तदे-तदध्यात्मं अधिदेवतञ्च यत्सत्यब्रह्मोपासनया उक्तकर्मानुष्ठानेन सह कुर्वन् आत्मनः उपास्य सत्यब्रह्मप्राप्ति द्वारं पवते हिरण्मयेन इति-हिरण्मयेन ज्योतिर्मयेन पात्रेण मण्डलरूपेण सत्यस्यादित्यमण्डलस्थस्य ब्रह्मणः मुखं द्वारमपिहितमाच्छादितम् । ' तत्त्वं पूषनपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ' ( ईशा ० १५ ) इति काण्वशाखीयः पाठः । सत्यस्योपासनात् सत्यं धर्मो यस्यासौ सत्यधर्मः मण्डलान्तर्गतस्य ब्रह्मणो दर्शनाय । यद्वा-सत्यधर्मस्योपास्यस्य, दर्शनायेत्यर्थः । दयानन्दः - " हे मनुष्याः । येन हिरण्मयेन पात्रेण मया सत्यस्या-पिहितम् मुखं बिकाश्यते, योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहमस्मीति खं ब्रह्मास्मीति विजानीतेति । " संन्यास ( त्याग ) पूर्वक ज्ञाननिष्ठा का फल है । सर्वात्मभाव में मार्ग के लिये प्रार्थना अपेक्षित नहीं है, क्योंकि सर्वात्मभाव को प्राप्त पुरुष के प्राणों के परलोक गमन का " न तस्य " यह श्रुति निषेध करती है; अतः अपर ब्रह्म के उपासक के लिये ही मार्ग की प्रार्थना सम्भव है | निर्गुण उपासक के लिये नहीं । सायणाचार्य तो काण्वशाखा के इस मन्त्रभाष्य में कहते हैं कि इस मन्त्र में ' सत्य ' शब्द से कहा गया आदित्य ही है । इस प्रकार इस सूर्यमण्डल में स्थित अधिदेवपुरुष है तथा दक्षिण नेत्र में स्थित अध्यात्मपुरुष है तथा ये दोनों एक हैं । शास्त्रविहित कर्मों के अनुष्ठान के सहित के द्वारा पूर्वोक्त अध्यात्म और अधिदैवत जो सत्यब्रह्म की उपासना सत्यब्रह्म उसका अभेद सत्यब्रह्म की प्राप्ति का सम्पादन करता हुआ साधक अपने उपास्य द्वार शुद्ध करता है । ज्योतिर्मय मण्डल से आदित्यमण्डल में स्थित ब्रह्म का द्वार आच्छादित है । हे जगत् के पोषकदेव! मुझ सत्यधर्मा अधिकारी को मण्डल में स्थित ब्रह्म के दर्शन के लिये उस आवरण को आप निवृत्त कर दो । श्री दयानन्द - " सब मनुष्यों के प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि