वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 161–170

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 161–170

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१२८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् तदपि यत्किञ्चित् - हिरण्मयेन ज्योतिर्मयेन पात्रेण यथार्थ-कारणस्य पिहितत्वासम्भवात् ।

ब्राह्मणाख्यं यजुर्वेदभागं शतपथाभिधम् ।

सूतं कात्यायनं भाष्यं सायणोवटयोरपि ॥

महीधरकृतं भाष्यं मीमांसाद्वयमेव तु ।

भारतं रामचरितं पुराणान्यागमाँस्तथा ।

विविधानि च शास्त्राणि समालोच्य प्रयत्नतः ॥

वेदार्थ पारिजाताख्यं भाष्यं सङ्कलितम्मया ।

प्रीत्यै भूयाद्भगवतोः श्रीसीतारामयोः स्फुटम् ॥

हे मनुष्यो! जिस ज्योति: स्वरूप रक्षक मुझ से अविनाशी यथार्थकारण के आच्छादित मुख तुल्य उत्तम अङ्गका प्रकाश किया जाता, जो वह प्राण वा सूर्यमण्डल में पूर्ण परमात्मा है, वह परोक्षरूप से आकाश के तुल्य व्यापक सबके गुण, कर्म और स्वरूप से अधिक हूँ । सबका रक्षक जो मैं उसका ॐ ऐसा नाम जानो । ” यह कथन भी कोई महत्त्वपूर्ण नहीं; क्योंकि हिरण्मय - ज्योति -र्मय - पात्र के द्वारा यथार्थ कारण का आच्छादित होना संभव नहीं ॥४०.१७ ॥ " शतपथ ब्राह्मण, कात्यायन सूत्र, श्रीसायण - उव्वट - महीधर-कृत वेदभाष्य, पूर्वोत्तर मीमांसा, महाभारत - रामचरित -पुराण - आगम ( तन्त्रात्मक ) तथा विविधशास्त्रों ( धर्म - भक्ति - नीति- सांख्य- न्याय-वेदान्त और बौद्धादि दर्शनों से सम्बन्धित ग्रन्थों ) का प्रयत्नपूर्वक अनुशीलन ( सत्सम्प्रदाय परम्परा से अध्ययन और चिन्तन ) कर ' वेदार्थपारिजात ' नामक यह वेदभाष्य मेरे द्वारा सङ्कलित किया गया है । इससे भगवान् श्रीसीताराम परम मुदित हों! ” I

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सभाष्यशुक्लयजुर्वेदपरिशिष्टानि संन्यासाश्रमः " मोक्षमिच्छन्सदा कर्म त्यजेदेव ससाधनम् । त्यजतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक्परं पदम् || ” साम्प्रतं तु ' तेन त्यक्तेन ' ( ईशा ० १ ) इति मन्त्रं समवलम्ब्य केषां तावत् संन्यासाधिकारः श्रुतिसम्मत इति विविच्यते । ' शोध्यस्य मृच्च तोयञ्च ६५ संन्यासोऽथ द्विजन्मनाम् ' इति याज्ञवल्क्यस्मृतेः ( ३.३२ ), ' त्रयाणां वर्णानां वेदमधीत्य चत्वार आश्रमा: ' इति च्छन्दोगसूत्रकारवचनाच्च केषाञ्चिदयमभिप्रायः यत् संन्यासाश्रमे ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामप्यधिकारः प्रतीयते । अब ' तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ' ( ईशा ०१ ) इस वचन से प्राप्त संन्यास में किसका अधिकार है? इस विषय पर विचार किया जाता है । जो लोग वेदाधिकार सम्पन्न द्विजाति का ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का ) संन्यास में अधिकार मानते हैं, वे इस सम्बन्ध में इस प्रकार प्रमाण प्रस्तुत करते हैं-' शोध्यस्य ' इस याज्ञवल्क्यस्मृति में संन्यासोऽथ द्विजनाम् ' कह-कर स्पष्ट ही ब्राह्मणादि तीनों वर्णों का संन्यास में अधिकार सूचित किया गया है । याज्ञवल्क्यस्मृति यतिधर्मप्रकरण ३.५६, ५७ में मिताक्षरा टीकाकार के द्वारा उद्धृत ' त्रयाणां वर्णाना ' इस सूत्रकारवचन के अनुसार भी वेदाध्ययनसम्पन्नब्राह्मणादि तीनों वर्णों का ही संन्यास में अधिकार सिद्ध होता है । ६५. ' संन्यासेन द्विजोत्तम: ' ( मनु ० ५.१०८ )

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१३० ] वेदार्थ पारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तय: ' ( अभि-ज्ञान शाकुन्तलम् १.२० ), युधिष्ठिरस्यापि ६ ६ ' अथवै कोऽहमेका हमे कै-कस्मिन् वनस्पतौ । चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डः क्षपयिष्ये कलेवरम् ॥ पांसुभिः समभिच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रयः । वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्त-सर्व प्रियाप्रियः ॥ ' ( महा ० शान्ति ० ६. १२,१३ ) इत्यादिना संन्यासा-भिरुचिर्जाता । अनेन वचनेन इदं लभ्यते यत् क्षत्रियस्यापि प्रव्रज्याया-मधिकारः शास्त्रसम्मत एव । ' प्रव्रज्या वसिता यत्र त्रयो वर्णा द्विजातय: । ' इति कात्यायनवचनेन इदं लभ्यते यद्वैश्यस्यापि प्रव्रज्या-यामधिकारः शास्त्रसम्मत एव ।

" प्रवृत्तिलक्षणं कर्म ज्ञानं संन्यासलक्षणम् ।

तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥

यदा तु विदितं तत्त्वं परं ब्रह्म सनातनम् ।

तदैकदण्डं संगृह्य सोपवीतां शिखां त्यजेत् ॥

' सतां हि सन्देहपदेषु ' इस दुष्यन्तवचन के अनुसार दीर्घकाल तक धर्मानुष्ठान से संस्कृत अन्तःकरणवाले सज्जनों की मनोवृत्ति-अभिरुचि कभी भी निषिद्धाचरण में प्रवृत्त न होने के कारण संदिग्ध -स्थल में प्रमाण होती है । धर्मराज युधिष्ठिर की ' अथवे को हमेवात्र ' आदि वचनों द्वारा संन्यास के प्रति व्यक्त अभिरुचि के अनुसार भी केवल ब्राह्मण का ही संन्यास में अधिकार सिद्ध नहीं होता, अपितु क्षत्रिय का भी सिद्ध होता है । ' प्रव्रज्या वसिता यत्र ' इस कात्यायन-वाक्य से भी ब्राह्मणादि तीनों वर्णों का ही संन्यास सूचित होता है । ' यदा तु ' इन वचनों में विहित के भी त्याग का विधान ब्राह्म-णादि तीनों वर्णों के लिये प्राप्त है । ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' ब्राह्मण ( ६६. " अथवा मैं मननशील मुण्डी संन्यासी हो जाऊँगा और एक-एक दिन एक - एक वृक्ष से भिक्षा मांगकर अपने शरीर को सुखाता रहूँगा । शरीर पर धूल पड़ी होगी और सूने घरों में मेरा निवास होगा अथवा किसी वृक्ष के नीचे उसकी जड़ में ही पड़ा रहूँगा । प्रिय और अप्रिय का सारा विचार छोड़ दूँगा । "

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वेदार्थ पारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् परमात्मनि यो रक्तो विरक्तोऽपरमात्मनि । सर्वेषणाविनिर्मुक्तः स भैक्षं भोक्तुमर्हति ॥ ' " 1 [ १३१ ( नारद ) परिव्राजको ० ३.१६ - १८ ) इत्यादौ विहितस्याप्यननुष्ठानमेव । ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' ( बृह-दारण्यक ४.४.२२ ), ‘ ब्राह्मणो निर्वेदमायात् ' ( मुण्डक १.२.१२ ), ' अथ पुनरव्रती वाव्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( नारद परिव्राजकोपनिषत् ३.७७ ), ' जायमानो ब्राह्मणास्त्रिभिर्ऋ णै णवाञ्च जायते ' ( बोधायनस्मृतिः २. ६. ४१ ) इत्यत्र ब्राह्मणपदं त्रैर्वाणिकपरमेव । ऋणापाकरणे त्रयाणामप्य-धिकारदर्शनात् । " ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यो वा प्रव्रजेद्गृहात् " ( कूर्म पुराण ) " कषायं पाचयित्वाऽऽशु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु । प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् || ” ( शान्तिपर्व २४५. ३. ) संन्यास लेते हैं ), ' ब्राह्मणो निर्वेदमायात् ' ( ब्राह्मण को उपरा-मता प्राप्त करनी चाहिये - निवृत्तिपरायण होना चाहिये ), ' अथ पुनः ' ( व्रती - अव्रती, स्नातक - अस्नातक, साग्नि निरग्नि - कोई भी क्यों न हो, जब उत्कट वैराग्य हो जाय, तभी उसे संन्यास लेना चाहिये ), ' जायमानो ब्राह्मणाः ' इस बोधायनस्मृति में जैसे त्रिवर्ण के लिये उपलक्षण रूप में प्रयुक्त ब्राह्मणपद का अर्थ केवल ' ब्राह्मण ' नहीं किया जा सकता, वैसे ही ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' आदि वचनों में सन्निहित ' ब्राह्मण ' पद केवल ब्राह्मणवर्ण का द्योतक नहीं माना जा सकता । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ऋणत्रय के अपाकरण में तीनों ही वर्णों का अधिकार है, केवल ब्राह्मण का नहीं; उसी प्रकार मोक्ष के लिये अनिवार्य संन्यास में तीनों वर्णों का अधिकार है; केवल ब्राह्मण का नहीं । " पंक्तिक्रम से स्थित पूर्वोक्त तीन आश्रम - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ में चित्त के राग - द्वेष आदि दोषों को पकाकर उन्हें नष्ट

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१३२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

" येन केन चिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः ।

यत्र क्वचनशायी च तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

न क्र ुद्धये न प्रहृस्येच्च मानितोऽमानितश्च यः ।

सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

विमुक्तं सर्वसङ्गे

भ्यो मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् । निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ " ( महा ० शा ० २४५.१२, १४, २२, २४ ) ' न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः ' ( तै ० आ ० १०.१०, नारायणो ० १२.३, कैवल्यो ० ३ ) इति तैत्तिरीयश्रुत्या, ' त्याग एव हि सर्वेषां मोक्षसाधनमुत्तमम् | त्यजतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक् परं पदम् ॥ ' इति भाल्लवीय श्रुत्या, ' अथ परिव्राड् विवर्णवासा मुण्डो-परिग्रह शुचिरद्रोहो भैक्ष्यमाणो ब्रह्मभूयाय कल्पते ', ' यदि वेतरथा करके शीघ्र ही सर्वोत्तम चतुर्थाश्रम - संन्यास को ग्रहण कर ले । ” " जो किसी भी ( वस्त्र, वल्कल आदि ) से अपना शरीर ढक लेता है, समय पर जो भी रूखा सूखा मिल जाय, उसी से भूख मिटा लेता है और जहाँ - कहीं भी सो रहता है, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं । जो सम्मान प्राप्त होने पर हर्षित, अपमानित होने पर कुपित नहीं होता तथा जिसने सम्पूर्ण प्राणियों को अभयदान कर दिया है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण मानते हैं । जो सब प्रकार की आसक्तियों से छूटकर निवृत्ति से रहता है, आकाश की भाँति निर्लेप और स्थिर है, किसी भी वस्तु को अपनी नहीं मानता, एकाकी विचरता और शान्तभाव से रहता है, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं । जो कामनाओं से रहित तथा सब प्रकार के आरंभों से रहित है और स्तुतिसे दूर रहता है तथा सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त होता है, उसे ही देवता ब्राह्मण मानते हैं । ” ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि ' इस कूर्मपुराण के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों ही वर्णों का संन्यास में अधिकार है । ' कषायं पाचयित्वा ' इन श्लोकों के अनुसार तो सत्त्व के उत्कर्ष से होने वाले शमादि ब्राह्मणोचित गुण ही ब्राह्मणवर्ण के परिचायक हैं, ऐसे

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १३३ ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा ' इति जावालश्रुत्या ( ५.४ ) ( एवमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ' इति बृहदारण्यक श्रुत्या ( ४.४.२२ ), ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' इति छान्दोग्यश्रुत्या ( २.२३.१ ) त्रैर्वाण च क्षत्रियवैश्य कोपलक्ष- -योरपि संन्याससिद्धिः । विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणं णार्थम् । ब्राह्मणग्रहणञ्चात्र द्विजानामुपलक्षणम्, अविशिष्टाधिकारि- । त्वात् । ' सर्वेषामात्मबोधने ' इति वार्तिकवचनाच्च गुण क्षत्रियादि में भी प्रसक्त होने के कारण उनका भी संन्यास से में अधिकार सिद्ध है | ' न ' कर्मणा ' ( ' कर्म, प्रजा या धन से नहीं; त्याग ही अमृतत्व की उपलब्धि संभव है ' ), ' त्याग एव हि ' ( ' निःसन्देह त्याग है, ही मोक्ष का उत्तम साधन है । ऐसा त्याग जिस क्षण सध पाता उसी क्षण त्यागनेवाले का मृग्य परमपद साक्षात् प्रत्यगात्मा होकर ही स्फुरित होता है । ' ), ' अथ परिव्राड् ' ( ' शुद्ध, द्रोहरहित, परिग्रहरहित, सौन्दर्यप्रसाधनों से सुदूर संन्यासी भिक्षान्न का सेवन करता हुआ ब्रह्म-होने में समर्थ होता है । ) ', ' यदिवेतरथा ' ( ' सबके लिये क्रमसंन्यास ही अपेक्षित हो, ऐसा नहीं; उत्कट वैराग्य होने पर आश्रमों की अवधि पूर्ण किये बिना भी संन्यास ग्रहण करे ' ), ' एवमेव ' ( संन्यासियों को प्राप्त होने योग्य लोक की इच्छा करते हुए संन्यास ग्रहण करते हैं ' ), ' ब्रह्म-संस्थः ' ( ‘ ब्रह्मसाक्षात्कारसम्पन्न मोक्षलाभ करता है ) इन श्रुतियों के अनुसार क्षत्रिय - वैश्य का भी संन्यास में अधिकार सिद्ध होता है । यद्यपि ' ब्राह्मण ' पद के प्रयोग से संन्यास में केवल ब्राह्मण का अधिकार माना जा सकता है; परन्तु इन स्थलों में विविदिषावाक्य है, अर्थात् में पठित ' ब्राह्मण ' पद वस्तुतः तीनों वर्णों के उपलक्षण के लिये का द्योत ब्राह्मणपद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों ( ग्राहक ) है । ' ब्राह्मणाः - ब्राह्मणग्रहणमुपलक्षणार्थम्; अविशिष्टो हि अधिकारः त्रयाणां वर्णानाम् ' ( शाङ्करभाष्य ४.४.२२ बृहदारण्यकोप-निषत् ) । उक्त कथन ' पूर्वाचार्यों से समर्थित न होने के कारण अमान्य है ', ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वार्तिककार श्रीसुरेश्वर ने ' सर्वेषामात्मबोधने ' आदि वचनों द्वारा तीनों वर्णों का संन्यास में अधिकार सिद्ध किया है । ' वार्तिककार का वचन युक्तिहीन होने से

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१३४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् इति चेन्न । श्रुतिषु क्षत्रियवैश्यपदाभावात् । सामान्यवचनानां ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' ( बृह ० ४.४.२२ ) इत्यादि विविदिषावचनैरेक-वाक्यतया शाब्दबोधे हि ब्राह्मणानामेव संन्यासाधिकारः सिद्धयति, क्षत्रियवैश्ययोस्तदसिद्धेः । ' यद्व किञ्च मनुरवदत्तद्भषजमि ति ( तै ० सं ० २.२.१.२ ) ६७ श्रुतिसमादृतमनुस्मृतिविरोधाच्च । ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वैश्यो वा प्रव्रजेद्गृहात् ' इति प्रव्रजतेगृहत्याग एवार्थः । अमान्य है ' ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ' अविशिष्टाधिका-रित्वात् ' यह प्रबल युक्ति है । जब तीनों ही वर्णों को यज्ञोपवीत, वेद और अग्निहोत्रादि में अधिकार प्राप्त है, तब केवल एक ( ब्राह्मण ) का ही इनके त्याग में अधिकार है, शेष दो का नहीं, यह कथन भला कैसे सङ्गत हो सकता है? परन्तु उक्त वचनों के अनुसार ब्राह्मणेतर - क्षत्रियादि का संन्यास में अधिकार सिद्ध नहीं होता । कारण यह है कि श्रुति के अनुकूल स्मृत्यादि का प्रामाण्य मान्य है । श्रुतियों में क्षत्रिय और वैश्य पद का अभाव हैं । शाब्दबोध में ' भैक्षाणो ब्रह्मभूयाय कल्पते ' ( जाबालो ० ५ ) आदि सामान्यवचनों का ' ब्राह्मणो निर्वेदमायात् ' ( मुण्डक उप ० १.२.१२ ), ' ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचयं चरन्ति ' ( बृह ० उप ० ३.५.१ ), ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' ( बृह ० ४.४.२२ ) आदि विशेष - वचनों से एकवा-क्यता होने के कारण ब्राह्मणों का ही संन्यास में अधिकार सिद्ध होता है । साथ ही स्मृतियों में मनुस्मृति की प्रधानता है । मनुस्मृति के अनु-कूल ही अन्य स्मृतियों का प्रामाण्य मान्य है । कहा भी है ' मन्वर्थ विप-रीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ( संवर्त ) ', ' तैत्तिरीय संहिता ' स्वयं ही मनु है । मनु ने स्पष्ट के समस्त वचनों को भेषजतुल्य हितकर बताती

६७. श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेव तत्संशयो नात्न ततः समस्तम् ।

श्रुत्याविरोधे न भवेत्प्रमाणं भवेदनार्थाय विना प्रमाणम् ॥

( ब्रह्मविद्योपनिषत् ३२ )

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १३५ न च श्रुत्यन्तरेषु ब्राह्मणपदोपलक्षणत्वाभावसिद्धौ तद्बलेन केवल ब्राह्मणस्याधिकार सिद्धिर्ब्राह्मणस्याधिकारसिद्धौ चोपलक्षणत्वा-भावसिद्ध रन्योन्याश्रयत्वमिति वाच्यम् । ब्राह्मणपदेनैव ब्राह्मणाधिकार-सिद्ध्या प्रमाणाभावादेवोपलक्षणत्वाभावसिद्ध रन्योन्याश्रयत्वायोगात् । न च पुराणादिवचनैस्तत्सिद्धिरिति वाच्यम्, पुराणादीनां श्रुत्यर्थानु-नैव तव्यत्वात् । न च वार्तिकवचनानुसारेण ६ ब्राह्मणपदस्यैवो-पलक्षणत्वमेवेति वाच्यम् । भाष्यविरोधेन वार्तिकस्यैव भाष्यानुगुण्येन नेयत्वात् । ब्राह्मण का संन्यास में अधिकार माना है - ' आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद्गृहात् ' ( ६.३८ ) । इस रीति से ' संन्यासेन द्विजोत्तमः ' ( मनु ५.१०८ ) इस शुद्धि- सन्दर्भ में भी ' द्विजोत्तम ' का अभिप्राय ' ब्राह्मण ' ही सिद्ध होता है । श्रुतिसमादृत मनुस्मृति से विरुद्ध होने के कारण क्षत्रियादि का संन्यास में अधिकार असिद्ध है ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि इन स्मृतियों में ( स्मृति - पुराणादि में ) ' प्रव्रजेत् ' का अर्थ गृहत्यागरूप संन्यास ही अपेक्षित है, न कि सूत्रत्याग पूर्वक लिङ्ग ( दण्ड, काषाय वस्त्रादि ) ग्रहण रूप संन्यास । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' अन्य श्रुतियों में ब्राह्मणपद उपलक्षणत्वाभाव वाला है, यह सिद्ध होने पर उसके बल से ब्राह्मण का संन्यास में अधिकार सिद्ध होता है और ब्राह्मण का संन्यास में अधिकार सिद्ध होने पर ब्राह्मण पद में उपलक्षणत्वाभाव सिद्ध होता है, अर्थात् ( ब्रह्मण पद में ) उपलक्षणत्वाभाव और ( संन्यास में ) ब्राह्मण-त्वाधिकार में अन्योन्याश्रय है । '; क्योंकि प्रमाणाभाव के कारण ही उपलक्षणत्वाभाव सिद्ध होने से अन्योन्याश्रयत्वाभाव है । ' उपनिषदों से न सही, पुराणादि वचनों से उपलक्षणत्व की सिद्धि हो जाने पर अन्यो-न्यायदोष की प्राप्ति पुनः हो जाती है ' यह कहना भी उपयुक्त नहीं; ६८. ' ब्राह्मण एव संन्यासिनो न त्वितरः ', ' ब्राह्मणानामेवाधिकारो व्युत्थाने तो ब्राह्मणग्रहणम् ' ( शाङ्करभाष्य बृह ० ३.५.१ ), ' न हि क्षत्रियवैश्ययोः पारिव्राज्यप्रतिपत्तिरस्ति ' ( शा ० भा ० बृह ० ४.५.१५ )

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१३६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ननु ' जायमानो वं ब्राह्मणस्त्रिभिऋ णै णवान् जायते ' ( बोधा-न स्मृतिः २. E. E ) इत्यत्रेव संन्यासविधायकेषु वाक्येषु ब्राह्मणग्रहण-मुपलक्षणार्थमिति चेन्न, ' राजा राजसूयेन यजेत ' ( आप ० श्र ० १०.८. क्योंकि पुराणादि वचनों की सङ्गति श्रुतिसिद्ध अर्थ के अनुगुण ही साधनी चाहिये, श्रुत्यर्थ के विरुद्ध नहीं । यह कहना उपयुक्त नहीं कि ' उत्तरोत्तर ऋषियों का अधिक प्रामाण्य होने के कारण वार्तिकवचना-नुसार ब्राह्मण पद ही उपलक्षणत्व का द्योतक है, क्योंकि श्रुत्यनुरूप भाष्य के विरुद्ध वार्तिकवचन ही भाष्यानुगुण साधने योग्य हैं । अभि-प्राय यह कि भाष्य श्रुति के सर्वथा अनुकूल है; अतः वार्तिक की संगति भाष्य के अनुरूप ही साधनी चाहिये । यह कहना कि " जायमानो वै ब्राह्मण: ' इस बोधायन - स्मृति में जिस प्रकार ब्राह्मण ग्रहण उपलक्षणार्थ है, उसी प्रकार ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' इत्यादि संन्यासविधायकवाक्यों में ब्राह्मणग्रहण उपलक्ष-र्थ है " अनुपयुक्त है; क्योकि ' राजा राजसूयेन यजेत ' यहाँ जिस प्रकार ' राज ' पद ' क्षत्रिय होते हुए राजा ' के लिये रूढ़ होने से ' क्षत्रिय राजा काही ग्राहक है, उसी प्रकार ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ', ' ब्राह्मणः प्रव्रजेद्-गृहात् ' आदि स्थलों में ' ब्राह्मण पद लोक वेद प्रसिद्ध ब्राह्मण का ही द्योतक होने से स्वार्थ पर्यवसायी है, अतः उपलक्षण ( लक्षणा के द्वारा क्षत्रिय, वैश्य का उद्बोधक - प्रापक ) नहीं हो सकता । ' न विधौ परः शब्द: ' इस रीति से विधि में लक्षणा मान्य नहीं । बृहदारण्यक आदि श्रुतिसिद्ध ब्राह्मणाधिकार को प्रशस्त मानकर ' अथ परिव्राड् ', ' यदि वेतरथा ' आदि जाबालादि श्रुतियों में संन्यास विधान है; अत: ' ब्राह्मण ' पद तीनों वर्णों का उपलक्षण नहीं हो सकता । विशेष- इस प्रकार श्रुति में प्रयुक्त ' ब्राह्मण ' पद के प्रयोग से, मनुस्मृति आदि में भी ब्राह्मण पद का ही उल्लेख होने से, भाष्यकार शङ्कराचार्य के द्वारा भी एवकार घटित ब्राह्मण पद का प्रयोग होने से और जन्मना ब्राह्मणों में ही सलिंग संन्यास की परम्परा का अन्यत्र उल्लेख होने से ब्राह्मणों का ही संन्यास में अधिकार सिद्ध है । वेदा-ध्ययन कराने तथा यज्ञ कराने का अधिकार ब्राह्मण को ही प्राप्त होने

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १३७ १,४ ) इत्यत्र राजपदस्येव ब्राह्मणपदस्यापि स्वार्थपर्यवसायित्वेनोप-लक्षणत्वायोगात् । ' न विधौ परः शब्दार्थः ' ( शाबरभाष्य पृ ० १४१ ) इति रीत्या विधौ लक्षणायोगात् । जाबालादिश्रुतिषु च श्रुत्यन्तरसिद्धं से मुख्य श्रोत्रियत्व और आचार्यत्व चरमवर्ण ब्राह्मण में ही प्रतिष्ठित है । इसी दृष्टि से ब्राह्मण का ही संन्यास में प्रशस्त अधिकार है । संन्यासाधिकार के प्रसङ्ग में श्रुतियों में जहाँ ' एष पन्या ब्राह्मणाः ' ( जावालो ० ५ ), ' तमेतं ब्राह्मणाः ' ( सुबालो ० ६ ), ' ) संन्यसेद- , ' तदेत-• कृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ' ( नारद परिव्राजको ० ३.१४ में ' ब्राह्मण ' द्विज्ञाय ब्राह्मणः परिव्रज्य ' ( नारद परि ० ३.८६ ) इन स्थलों पद का प्रयोग है, वहाँ ' बहिःसूत्रं त्यजेद्विप्रः ' ( परब्रह्मोपनिषत् ५ ), ' बहिरन्तश्चोपवीती विप्रः संन्यस्तुमर्हति ' ( परब्रह्मो ० १४ ) ' त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्ग विप्राणां मुक्तिसाधनम् ' ( शाट्यायनी ० १० ) इन स्थलों में ' विप्र ' पद का प्रयोग है । ' ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ' ( मनु ० ६.३८ ) इस मनुस्मृति के अनुसार और ' विप्रस्य वै संन्यसतः ' ( भागवत ११.१५.१४ ) इस भागवत होता पुराण है । के अनुसार भी ब्राह्मण का ही संन्यास में अधिकार सिद्ध ब्रह्मकर्म की सत्त्वगुण के उत्कर्ष से अभिव्यक्त गीतोक्त शमादिरूप स्वाभाविक प्रतिष्ठा होने से भी ब्राह्मणवर्ण के उपयुक्त संन्यासाश्रम है | क्षत्रिय - वैश्य के संन्यासाश्रम का निषेध भी ब्राह्मणवर्ण के संन्यासा-श्रम का प्रबल पोषक है । यथा " मुखजानामयं धर्मो यद् विष्णोर्लिङ्गधारणम् । राजन्यवैश्ययोर्नेति दत्तात्रेयमुनेर्वचः " 1 " " ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो । वर्णास्तान् नानुवर्तन्ते त्रयो भारतसत्तम ॥ ' " चत्वारो ब्राह्मणस्योक्ता आश्रमाः क्षत्रियस्य त्रयः प्रोक्ता द्वावेको ( महा ० शान्ति ० ६२. २ ) श्रुतिचोदिताः । वैश्यशूद्रयोः ॥ ” ( यो ० या ० सं ० १. २८ )