वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 171–180

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 171–180

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१३८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ब्राह्मणाधिकारं सिद्धवत्कृत्वा संन्यासविधानान्न ब्राह्मणग्रहणं श्रवण-कोपलक्षणपरम् । यत्तु यौगिकाश्रयेण ब्राह्मणस्य ब्रह्मवित्परत्वमिति वाच्यम्, तदपि तुच्छन् । ' ब्राह्मोऽजातो ' ( पा ० सू ० ६.४.१७१ ) इति जातावेव ब्राह्मणपदसिद्ध ेः । ' रूढिर्योगाद् बलीयसी ' इति न्यायेन ' रथकार -न्यायेन ' च योगासिद्ध ेः । ब्राह्मणा एव संन्यासिनो न त्वितर: ' इति श्री-' ब्राह्मणस्याश्रमाश्चत्त्वारः, क्षत्रियस्याद्यास्त्रयः, वैस्श्ययाद्यौ । ' ( वैखा ० ध ० सू ० १.१.१० - १२ ) | प्रामाणिक आचार्यों ने भी इसी तथ्य को प्रकट किया है-( १ ) अत्र च श्लोके ब्राह्मणस्य चतुराश्रम्योपदेशाद् ब्राह्मणः प्रव्रजेदिति पूर्वमभिधानाद् ब्राह्मणस्यैव प्रव्रज्याधिकारः । ( श्री कुल्लूकभट्ट, मनु ० ६.७ ) ( २ ) इति क्षत्रियवैश्ययोः संन्यासाभाव उक्तः भगवता भाष्यकृता ब्राह्मणस्यैव संन्यासो नान्यस्येति निर्णीतम् । ( भगवद्गीता ३.२० मधुसूदनी टीका ) ( ३ ) ( क्षत्रियस्य ) भैक्ष्यचर्यायामनधिकारात् । ( भगवद्गीता ३.८ नीलकण्ठी ) शास्त्रों में पूर्वकर्मानुसार जन्म, जन्मनियन्त्रित वर्ण और वर्ण-नियन्त्रित आश्रम की व्यवस्था का प्रतिपादन है । स्व - वर्ण और आश्रमानुसार व्यवहार से व्यक्तिका परमकल्याण सुनिश्चित है । प्रज्ञा और प्राणशक्ति के आवेश या आवेग में शास्त्रीयपथ का परित्याग अशोभनीय है । अनात्मपदार्थों में स्वाभाविक अहंता - ममता को शास्त्रीय अभिमान की स्वीकृति के विना दूर कर पाना दुर्लभ है । सब तरह से सबके कल्याणकारक शास्त्रीयतथ्यों को राग - द्वेष और अज्ञानमूलक बताकर स्वयं के और सबके पतन का पथप्रशस्त करना अनुचित है । " यौगिकरीति का आश्रय लेने पर ' ब्राह्मण ' शब्द का अर्थ ' ब्रह्मवित् ' परक सिद्ध होता है । " ऐसा कहना भी उपयुक्त नहीं; क्योंकि ' ब्राह्मी जातो ' ( पा ० सू ० ६.४.१७१ ) इस के अनुसार जाति में ही ब्राह्मण

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १३८ शङ्कराचार्यवचनगत ' ब्राह्मण ' पदस्य त्रैवर्णिकोपलक्षणपरत्ववर्णनं त्वतीव मन्दम् । ' नेतरः ' इति विरोधात् । यदपि भाष्यनिर्माणतः पूर्वं ब्राह्मणादित्रैर्वाणकचतुर्थाश्रमस्य सत्त्वासत्त्वाभ्यां व्याघातकथनम्, तदप्यसङ्गतम् । शूद्रकर्तृकवेदाध्ययननिषेधसमानयोगक्षेमत्वात् । तत्रापि निषेधवचनात्प्राग्वेदाध्ययनस्य सत्त्वासत्त्वाभ्यां व्याघातस्य वक्तुं शक्यत्वात् । यदपि विशेष्यवाचकपदाव्यवहितोत्तरवर्तन एवकारस्यान्ययोग-व्यवच्छेदार्थकत्वात् ' पार्थ एव धनुर्धरः ' इत्यत्र भीष्मादीनामपि धनुर्ध-पद की सिद्धि होती है । ' रूढि योग से बलवती है ' इस न्याय से और hi उपलक ( पोषक ) ' रथकारन्याय ' से योग का ऐसे स्थलों में आलम्बन अनुपयुक्त है । ' ब्राह्मणा एव संन्यासिनो न त्वितरः ' ( ब्राह्मण ही संन्यासी हैं, न कि कोई अन्य ) इस श्रीशङ्कराचार्य के वचन में प्रयुक्त ' ब्राह्मण ' पद तीनों वर्णों का उपलक्षण है, यह कथन तो अति ही मन्द है । भाष्यगत ' एव ' पद के प्रयोग से सिद्ध ' नेतरः ' से उक्त कथन का खण्डन सुस्पष्ट हो जाता है । " भाष्यनिर्माण से पूर्व ब्राह्मणादि त्रैर्वाणिक चतुर्थाश्रम ( संन्यास ) के सत्त्वासत्त्व को लेकर विनिगमकाभावबलात् व्याघात-दोष " कथन तो स्पष्ट ही असंगत है । शूद्रकर्तृक वेदाध्ययननिषेध तुल्यबल है । उक्त रीति से तो " शूद्रकर्तृ ' के वेदाध्ययन के सत्त्वासत्त्व को लेकर व्याघातदोष की प्राप्ति है " । यह कथन भी सङ्गत होने लगेगा, परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि ' शूद्रकर्तृक वेदाध्ययननिषेध-परकवचन से पूर्व ' यह कथन ही असङ्गत है; क्योंकि वेदानुकूल ही वादिस्मृतियों की प्रवृत्ति होने से विधि - निषेध अनादि अपौरुषेय वेद-वेद्य हैं । ऐसी स्थिति में ' अनादि वचन से पूर्व ' यह कथन ही व्याघातयुक्त है 1 | अभिप्राय यह कि भाष्य में जो कुछ कहा गया है, वह तो पूर्वोक्त रीति से श्रुतिसम्मत ही है, क्योंकि श्रुति अनादि अपौरुषेय है; अतः संन्यास सम्बन्धी अधिकारप्रशस्ति भी अनादि ही है । अनादि प्राप्त वस्तुस्थिति के सम्बन्ध में ' उससे पूर्व ' कथन ही व्याघातदोषयुक्त होने से असङ्गत है । " ब्राह्मणा एव संन्यासिनः " विशेष्यवाचकपद से व्यवधानशून्य

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१४० 1 वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् राणामुपलम्भादुत्कृष्ट धनुर्धरे लक्षणा स्वीक्रियते, तथापि ( तद्वदत्रापि ) एवकारस्य विशेष्यान्वितत्वेन संन्यासस्योत्कृष्टसंन्यासे लक्षणा, तथा च ब्राह्मणकृत तुर्याश्रम उत्कृष्ट इत्यर्थः इत्यपि यत्किञ्चित् । ' नेतरः ' इति भाष्यांशस्य तद्द्बाधकत्वात् । किञ्च तत्रान्ययोगव्यवच्छेदे प्रत्यक्ष विरोधः । प्रकृते तु अधिका-रानधिकार विवेचनम् । तत्र न प्रत्यक्षं क्रमते, शास्त्रीयविधिनिषेधयोः प्रत्यक्षानुमानाविषयत्वात्तदुक्तम् -" प्रत्यक्षेणानुमित्यावा यस्तूपायो न विद्यते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्व ेदस्य वेदता || " इति वचनम् । सिद्धान्तलेशसंग्रहे ' ब्राह्मणो निर्वेदमायात् ' ( मुण्डक १.२.१२ ) ' ब्राह्मणा व्युत्थाय ' ( बृह ० ३.५.१ ) ' ब्राह्मणः प्रव्रजेत् ' ( मनु-स्मृति: ६.३८ ) इत्यादि संन्यासविधिषु ब्राह्मणग्रहणात् क्षत्रियवैश्ययोः कथं वेदान्तश्रवणाद्यनुष्ठानम् । उत्तरवर्ती एवकार अन्ययोगव्यवच्छेदार्थक होने से ' पार्थ ( अर्जुन ) ही ( एव ) धनुर्धर है ' यहाँ भीष्मादि भी धनुर्धरों में मान्य हैं, अतः ' उत्कृष्ट धनुर्धर ' में ' धनुर्धर ' पद की लक्षणा स्वीकृत है, तद्वत् विशेष्यान्वित एवकार होने से ' उत्कृष्ट संन्यास ' में ' संन्यास ' पद की लक्षणा है " यह कथन भी कोई महत्त्वपूर्ण नहीं, क्योंकि ' नेतरः ' यह पद अन्यों में संन्यास की प्रसक्ति का वारक है । फिर यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पार्थातिरिक्तों में धनुर्धरता सिद्ध होने से केवल पार्थ को ही धनुर्धर कहने में प्रत्यक्ष विरोध है; अतः लक्षणा स्वीकृत है । प्राप्त-प्रसङ्ग में तो अधिकारानधिकार विवेचन है । इसमें प्रत्यक्ष की गति नहीं; क्योंकि शास्त्रीय विधि - निषेध प्रत्यक्ष और अनुमान के विषय ही नहीं । कहा भी है ' प्रत्यक्ष अथवा अनुमानप्रमाण से जो उपाय नहीं जाना जाता है, वेदवेत्ता उसे वेद से जानते हैं । प्रत्यक्ष तथा अनुमान से अज्ञात अर्थ का बोधक होने से ही वेद की वेदता ( वेदत्व ) है । ' यह आचार्यों का वचन है । भाव यह कि प्रत्यक्ष तथा अनुमान से अज्ञात अर्थ का निर्णय

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वेदार्थपारिजात ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १४१ कैश्चिदुक्तम्, ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा ' ( जाबालोप ० ४ ) इतिश्रुत्या, " ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि वैश्यो वा प्रव्रजेद्गृहात् । त्रयाणामपि वर्णानाममी चत्वार आश्रमाः ॥ " स्मृत्यनुग्रहीततया क्षत्रियवैश्ययोरपि संन्यासाधिकार सिद्ध ेः श्रुत्यन्तरेषु ब्राह्मणग्रहणं त्रयाणामुपलक्षणम् । अत एव ६६ अधिकारि-विशेषस्य ' इति श्लोकेन वार्तिकेऽपि भाष्याभिप्रायमुक्त्वा " त्रयाणामविशेषेण संन्यासः श्रूयते श्रुतौ । यदोपलक्षणार्थं स्याद्ब्राह्मणग्रहणं तदा ॥ ” ८६ इत्यनन्तरश्लोकेन स्वमते क्षत्रियवैश्ययोरपि संन्यासाधिकारो दर्शितः । तेनैव तयोरपि श्रवणाद्यधिकारसिद्धिरुक्ता । वेद तथा उससे अविरुद्धस्मृति से करना चाहिये । ' सिद्धान्तलेश-संग्रहग्रन्थ ' में ' ब्राह्मणो निर्वेदमायात् ' इत्यादिक वेद के मूर्धन्य भाग-उपनिषदोंकी श्रुतियों तथा उपनिषदों के अनुकूल मनुस्मृति में विद्यमान संन्यास के विधानों में ' ब्राह्मण ' शब्द का ही ग्रहण होने से क्षत्रिय और वैश्य के लिये संन्यास का विधान नहीं है । अन्यथा वेदान्त के श्रवण-मननादि के अनुष्ठान में अधिकारी विशेष के ज्ञान के लिये संन्यास के विधायक वाक्यों में ब्राह्मणशब्द का ग्रहण कैसे संभव था? अतः संन्यास ब्राह्मण का ही अधिकार है । किसी ने यह कहा कि - ' तीनों वर्णों के लिए चारों आश्रम हैं ' इस स्मृति से अनुगृहीत, ' यदि वेतरथा ' इस जाबालश्रुति से क्षत्रिय - वैश्य का भी संन्यास सिद्ध है । अत: जाबाल से अन्यश्रुतियों में ब्राह्मण शब्द का ग्रहण, तीनों वर्णों का उपलक्षण है । अर्थात् ब्राह्मण शब्द तीनों वर्णों के संन्यास का बोधक है । इसलिये ही ' अधिकारविशेष: ' इस ६६. ' अधिकारिविशेषस्य ज्ञानाय ब्राह्मणग्रहः । न संन्यासविधिर्यस्माच्छ्र तौ क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ' 3 ( वार्तिक ३.५.८८ बृह ० )

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१४२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् भाष्यानुयायिनां रीत्या तु अनेकेषु संन्यासविधिवाक्येषु ब्राह्मण-ग्रहणात्, उदाहृतजाबालश्रुतौ संन्यासविधिवाक्ये ब्राह्मणग्रहणाभावेऽपि श्रुत्यन्तरसिद्ध ब्राह्मणाधिकारमेव सिद्ध कृत्वा ' संन्यासावस्थायामय-ज्ञोपवीती कथं ब्राह्मण: ' ( नारदपरि ० ३.७७ ) इति ब्राह्मणपरामर्शाच्च ब्राह्मणस्यैव संन्यासाधिकारः । ७० विरोधे त्वनपेक्ष्यं स्यादसति हयनु-मानम् ' ( पूर्व ० अ ० १, पा ० ३, अधि ० २ ) इति विरोधाधिकरणन्यायेन श्रुत्यविरुद्धस्यैव स्मृत्यर्थस्य सङ्ग्राह्यत्वात् ।

श्लोक से भाष्य का अभिप्राय कहकर ' त्रयाणामप्यविशेषेण ' इस बाद

के श्लोक से अपने मत में क्षत्रिय, वैश्य का भी सन्यास में अधिकार दिखा दिया है । सन्यास में अधिकार होने से ही क्षत्रिय और वैश्य की भी श्रवणादि के अधिकार की सिद्धि कही गई है । श्रीशंकराचार्य भाष्य का अनुसरण करनेवाले विद्वानों की रीति से तो, अनेक सन्यास के विधायक वाक्यों में ब्राह्मण शब्द का ही ग्रहण है तथा जाबालश्रुति में सन्यास के विधायक ' यदि वेतरथा ' इस वाक्य ब्राह्मणपद के ग्रहण न होने पर भी अन्य श्रुतियों से सिद्ध ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार को सिद्ध मानकर सन्यासावस्था में " यज्ञो-पवीत से रहित ब्राह्मण कैसे? " इस प्रश्नार्थक वाक्य में सन्यासी के लिये ब्राह्मण शब्द का परामर्श किया है । भाव यह है कि यज्ञो-पवीत से रहित सन्यासी के लिये ब्राह्मण शब्द का प्रयोग उपनिषद् में किया, तो वहाँ प्रश्न किया गया है कि यज्ञोपवीत से रहित सन्यासी के लिये ब्राह्मण शब्द का प्रयोग क्यों किया? इस प्रश्नवाक्य में यज्ञो-पवीतधारी जातितः ब्राह्मण के लिये ही ब्राह्मणशब्द का प्रयोग किया है, जो ' ब्रह्म को जानता है, सो ब्राह्मण है ' इस ब्रह्मवेत्तारूप ब्राह्मण के अभिप्राय से नहीं किया है । क्योंकि पुराणादिवाक्यों के श्रवण से तो शूद्र भी ब्रह्मवेत्ता हो सकता है । ऐसे ब्रह्मवेत्ता को तो ७०. सूत्र का अर्थ - स्मृति का श्रुति से विरोध होने पर स्मृति का अर्थ अग्राह्य होता है | श्रुति से स्मृति का विरोध न होने पर, स्मृति श्रुति का अनुमान कर लिया जाता है । प्रसंग में त्रैवर्णिक संन्यास की प्रतिपादिका स्मृति का ब्राह्मण के ही संन्यास के

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १४३ यत्तु संन्यासस्य सर्वाधिकारित्वेन वार्तिकवचनं तत्तु विद्वत्संन्या-सविषयन्, न त्वातुरविविदिषादिसंन्यासे भाष्याभिप्रायविरुद्ध सर्वाधि कारप्रतिपादनपरम् । ७१ “ सर्वाधिकारविचेदि विज्ञानं चेदुपेयते । कुतोऽधिकार नियमो व्युत्थाने क्रियते बलात् ॥ " ० यज्ञोपवीत की प्राप्ति ही संभव नहीं, तब यज्ञोपवीत से रहित को ब्राह्मण कैसे कहा? यह प्रश्न ही संभव नहीं । यह प्रश्न तो उसी सन्यासी के लिये संभव है, जिसके सन्यास से पूर्व ब्राह्मणत्व का उप-लक्षण यज्ञपवीत है | श्रुतियों में सन्यास के विधायकवाक्यों में ब्राह्मण शब्द का प्रयोग है तथा प्रश्नवाक्य में संन्यासी के लिये ब्राह्मणशब्द का परामर्श है; अतः सन्यास में ब्राह्मण का अधिकार है । तीनों वर्णों के सन्यास का बोधन करनेवाली स्मृति को जाबाल-श्रुति का अनुग्राहक कहना भी संभव नहीं, क्योंकि ' विरोधे तु ' इस विरोधाधिकरण के सूत्र के अनुसार श्रुति से अविरुद्ध ही स्मृति का अर्थ ही ग्राह्य होता है । सर्व के अधिकार को कहनेवाला जो वार्तिक का वाक्य है, वह तो विद्वत्सन्यास का बोधक है । आतुर तथा विविदिषा आदिक संन्यास में सर्व के अधिकार प्रतिपादन का बोधक नहीं है । प्रतिपादक श्रुतिवाक्य से विरोध है । क्योंकि श्रुति, ब्राह्मण के ही सन्यास में अधिकार की प्रतिपादक है, स्मृति तीनों वर्णों के सन्यास के अधिकार की प्रतिपादिका है, अतः परस्पर विरोध है | श्रुति से विरुद्धस्मृति का अर्थ ही जब ग्राह्य नहीं तो स्मृति ति की अनुग्राहक कैसे हो सकती है? स्मृति के अनुग्रह बिना जाबाल उपनिषद् की सामान्यश्रुति त्रैवर्णिक सन्यास की प्रतिपादिकां कैसे भी हो सकती नहीं । अतः सन्यास में ब्राह्मण काही अधिकार है । ७१. यदि ज्ञान सम्पूर्णाधिकारों का समाप्त करनेवाला माना जाता है, तब ज्ञान हो जाने पर संन्यास के ग्रहण का नियम क्यों थोपा जाता है?

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१४४ ] वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् इत्यनन्तरश्लोकेन ब्रह्मज्ञानोदयानन्तरं जीवन्मुक्तिकाले विद्वत्सं-न्यास एवाधिकारनियमनिराकरणात् । तेन ब्राह्मणानामेव श्रवणाद्यनु-ठाने संन्यासोऽङ्गम; क्षत्रियवैश्ययोः संन्यासनिरपेक्ष एव श्रवणाद्यधि-कारः । क्रममुक्तिफलक सगुणोपासनया देवभावं प्राप्तस्य श्रवणादौ संन्यासनैरपेक्ष्यस्यावश्यं वक्तव्यत्वाद् देवानां कर्मानुष्ठानाप्रसक्त्या तत्यागरूपस्य संन्यासस्य तेष्वसम्भवादित्याहुः । विद्वत्संन्यासोऽपि क्षत्रियवैश्ययोरलिङ्ग एव ७२ " मुखजानामयं धर्मो यद्विष्णोर्लिङ्गधारणम् । बाहुजातोरुजातानां नायं धर्मः प्रशस्यते इतिस्मरणात् ( देवलदत्तात्रेय वचनम् ) । क्योंकि ऐसा प्रतिपादन भाष्य के अभिप्राय से विरुद्ध है । भाष्य के अभिप्राय से विरुद्ध वार्तिककार का प्रतिपादन संभव नहीं है । ' सर्वाधिकार विच्छेदि ' इस आगे के श्लोक से वार्तिककार ने ब्रह्म-ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात् जीवन्मुक्तिकाल में विद्वत्सन्यास के अधि-कार के नियम का निराकरण किया है । अत: विद्वत्सन्यास में ही सर्व का अधिकार है । विविदिषा सन्यास में अधिकार न होने से सन्यास की अपेक्षा के बिना ही क्षत्रिय तथा वैश्य का वेदान्तश्रवण में अधिकार है । ब्राह्मण के समान वेदान्तश्रवण के लिये क्षत्रिय तथा वैश्य को सन्यास की अपेक्षा नहीं । क्रममुक्ति ही जिसका फल है, देवोपासना से देवभाव को प्राप्त अधिकारी को जिज्ञासा होने पर श्रवण के लिये संन्यास की अपेक्षा नहीं है, ऐसा अवश्य कहना होगा । क्योंकि देवताओं को कर्मानुष्ठान की अप्राप्ति होने से, उस कर्मानुष्ठान का विधिपूर्वक त्यागरूप सन्यास भी असंभव है । अतः देवताओं का सन्यास के बिना ही श्रवण में अधिकार है । अतः वेदान्त के श्रवण के नियम न होने से क्षत्रिय तथा वैश्य का सन्यास के श्रवण संभव है । लिये सन्यास का बिना भी वेदान्त-७२. मुख से उत्पन्न ब्राह्मण का ही यह धर्म है कि वह विष्णु ( नारायण ) भगवान् का चिह्न दण्डादिक धारण करे । बाहु से उत्पन्न क्षत्रिय तथा ऊरु से उत्पन्न वैश्य का यह धर्म नहीं है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १४५ ७३ " न त्यागो न पुनर्यज्ञो न तपो मनुजेश्वर । क्षत्रियस्य विधीयन्ते न परस्वोपजीवनम् ॥ " ( शान्तिपर्वणि २२७ ) ७४ " न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते । " वस्तुतस्तु --( शान्तिपर्वणि २३ | ३ ) “ संन्यसेदुब्राह्मणः सम्यग्वानप्रस्थो भवेन्नृपः । गृहस्थश्च भवेद्वेश्य एवं वर्णक्रमः स्मृतः ॥ ” " चत्वारो ब्राह्मणस्योक्ता आश्रमाः श्रुतिचोदिताः । क्षत्रियस्य त्रयो द्वावेको वैश्यशूद्रयोः || ” ( वृद्धयाज्ञवल्क्यः ) क्षत्रिय तथा वैश्य का विद्वत्सन्यास भी दण्डादि से रहित ही होता है । क्योंकि ' मुखजानामयं ' इस स्मृतिवचन से क्षत्रिय तथा वैश्य के लिए दण्डादिलिङ्गपूर्वक सन्यास का निषेध किया गया है । शान्तिपर्व में भी ' न त्यागो ' इत्यादि दो श्लोकों से क्षत्रिय के संन्यास Sair षेध किया है । वस्तुतः ‘ सन्यसेद्ब्राह्मणः ' इत्यादिक अन्य स्मृतियों में भी श्रुति विहित चार आश्रम ब्राह्मण के तीन क्षत्रिय के, दो वैश्य के कहे हैं तथा एक आश्रम ही शूद्र का कहा है । इन स्मृतियों के कथन के अनुसार ही अन्य स्मृतियों का अर्थ जानना चाहिये । ७३. हे राजन्! क्षत्रिय के लिये त्याग, यज्ञ, तप और दूसरे के धन से ( भिक्षा से ) जीवन व्यतीत करना यह सर्व विहित नहीं है । ७४. हे राजन्! गृहस्थ आश्रम का त्यागकर आपके लिये अरण्य ( संन्यास ) विहित नहीं है ।

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१४६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् " ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो । वर्णास्तान्नानुवर्तन्ते त्रयो भारतसत्तम ॥ " ( शान्ति ० ६२. २ ) इत्यादि स्मृत्यन्तरे ब्राह्मणस्य चत्वार आश्रमाः, राजन्यस्य त्रयः, वैश्यस्य द्वौ शूद्रस्यैक इत्युक्तत्वात् तदविरोधेनैवार्थो वेदितव्यः । यत्तु ७५ " वानप्रस्थं द्विजातीनां त्रयाणामुपदिश्यते । सर्वेषामेव वर्णानां गार्हस्थ्यं तदुविधीयते ॥ ” ७६ ॥ ( महा ० आश्व ० ३५.४३ )

६ " शुश्रूषोः कृतकार्यस्य कृतसन्तानकर्मणः ।

अभ्यनुज्ञातराजस्य शूद्रस्य जगतीपते ॥

' वानप्रस्थं द्विजातीनां ', ' शुश्रूषोः कृतकार्यस्य ' इस स्मृति में जो शूद्र के लिये एक ब्रह्मचर्य आश्रम कहा है, वह मैथुन का त्यागरूप ही है न कि वेदाध्ययनादिक । क्योंकि वेद का अध्ययन आदिक शूद्र लिये निषिद्ध है । वैश्य के लिये वानप्रस्थ का उल्लेख भी वन में वास तथा ग्राम के भोजन के त्याग के अभिप्राय से है, न कि वानप्रस्थ आश्रम के । उसी प्रकारक्षत्रिय, वैश्य के लिये कहीं संन्यास का कथन हो तो वहाँ भी संन्यास शब्द का अर्थ विक्षेप देनेवाले कर्मों का परित्याग ही समझना चाहिये न कि लिङ्गसन्यास । ब्राह्मण से ( अतिरिक्त के लिये श्रुति तथा स्मृतियों में सलिंग - सन्यास का निषेध है । ७५. ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उपदेश है । गृहस्थाश्रम का वर्णों के लिये है । तीनों वर्णों के लिये वानप्रस्थ का विधान तो शूद्र - पर्यन्त चारों ही ७६. “ पृथ्वीनाथ! जो शूद्र तीनों वर्णों की गया है, जिसने पुत्र उत्पन्न कर लिया है, की दृष्टि से जिसमें अन्य त्रैर्वाणकों की सेवा करके कृतार्थ हो शौच और सदाचार अपेक्षा बहुत ही कम मनोनिग्रह, अन्तर रह गया है अथवा जो मनुप्रोक्त धृति, क्षमा,

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वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अल्पान्तरगतस्यापि

दशधर्मगतस्य वा ।

आश्रमाविहिताः सर्वे वर्जयित्वा निराशिषम् ॥

भैक्ष्यचर्यां ततः प्राहुस्तस्य तद्धर्मचारिणः ।

तथा वैश्यस्य राजेन्द्र राजपुत्रस्य चैव हि ॥

कृतकृत्यो वयोऽतीतो राज्ञः कृतपरिश्रमः । वैश्यो गच्छेदनुज्ञातो नृपेणाश्रमसंश्रयम् || ” [ १४७ ( महा ० शान्ति ० ६३.१२ - १५ ) तत्तु, मैथुनत्याग एव ब्रह्मचर्यं न वेदाध्ययनादिकं, तस्य निषिद्ध -त्वात् । वानप्रस्थपदेनापि ग्राम्यभोजनत्यागरूप एव, तथैव सकलकर्म-त्यागरूप विक्षेपनिवारण एव संन्यासः संन्यासपदेन ग्राह्यो न तु चतुर्था-श्रमरूपः, श्रुतिस्मृतिनिषिद्धत्वात् । ' अत्र निराशिषं शान्तिदान्त्यादि-कल्याणगुणरहितम् ' इति नीलकण्ठः । शूद्रोऽपि नैष्ठिकं ब्रह्मचर्यं वानप्रस्थं वा सकलविक्षेपककर्मत्याग-रूपं सन्यासं वाऽनुतिष्ठेदेव -शूद्र भी नैष्ठिकब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ अथवा विक्षेपदायक सर्वकर्मों का त्यागरूप सन्यास को करे; क्योंकि ' आश्रमा विहिताः सर्वे ' इस चोरी का त्याग, बाहर - भीतर की पवित्रता, इन्द्रियों का निग्रह, सात्त्विक बुद्धि, सात्त्विकज्ञान, सत्यभाषण और क्रोध का अभाव दशधर्मों के पालन में तत्पर रहा है, वह शूद्र यदि राजा की आज्ञा - अनुमति प्राप्त कर ले तो उसके लिये संन्यास को छोड़ कर शेष सभी आश्रम विहित हैं । राजेन्द्र! पूर्वोक्त धर्मों का आचरण करनेवाले शूद्र के लिये तथा वैश्य और क्षत्रिय के लिये भी भिक्षा माँगकर निर्वाह करने का विधान है । अपने वर्ण-धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करके कृतकृत्य हुआ वैश्य अधिक अवस्था व्यतीत हो जाने पर राजा की आज्ञा लेकर क्षत्रि-योचित वानप्रस्थ आश्रम का ग्रहण करे । विशेष-- उक्त अनुज्ञा से भी यही तथ्य ध्वनित होता है कि जैसे अध्यापनादि क्षत्रियादि के लिये प्रशस्त नहीं, वैसे ही संन्यासादि उच्चवर्णों के लिये विहित आश्रम का ग्रहण भी प्रशस्त नहीं ।