वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 181–190

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 181–190

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१४८ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' आश्रमा विहिताः सर्वे वर्जयित्वा निराशिषम् । ' ( शान्तिपर्वणि ६३.१३ ) अत्र ' निराशिषं ' ' सन्यासं वर्जयित्वा अन्ये आश्रमा विहिताः ' इति स्पष्टार्थः ।

' वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्राणि चानघ ।

सन्तानादीनि कर्माणि कृत्वा सोमं निषेव्य च ॥

पालयित्वा प्रजाः सर्वा धर्मेण वदतांवर । राजसूयाश्वमेधादीन्मखानन्याँस्तथैव च

आनयित्वा यथा पाठं विप्रेभ्यो दत्तदक्षिणः ।

संग्रामे विजयं प्राप्य तथाऽल्पं यदि वा बहु ॥

स्थापयित्वा प्रजापालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव ।

अन्यगोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रियं क्षत्रियर्षभ ॥

अर्चयित्वा पितृन् सम्यक् पितृयज्ञैर्यथाविधि । देवान्यज्ञैऋषीन् वेदैरर्चयित्वा तु ॥ " यत्नतः

श्लोक में सन्यास को छोड़कर सर्व आश्रमों का स्पष्ट विधान है ।

" हे निष्पाप राजन्! राजा को चाहिये कि पहले धर्माचरण-पूर्वक वेदों तथा राजशास्त्रों का अध्ययन करे! फिर सन्तानोत्पादन आदि कर्म करके यज्ञ में सोमरस का सेवन करे । " " समस्त प्रजाओं का धर्म के अनुसार पालन करके राजसूय, अश्वमेध तथा दूसरे - दूसरे यज्ञों का अनुष्ठान करे । ” " शास्त्रों की आज्ञा के अनुसार सर्व सामग्री एकत्र करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दे । संग्राम में अल्प अथवा महान् विजय पाकर राज्य पर प्रजा की रक्षा के लिये अपने पुत्र को स्थापित करदे । पुत्र न हो तो दूसरे गोत्र के किसी श्रेष्ठ क्षत्रिय को राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त कर दे । ” " पितृयज्ञों द्वारा विधिपूर्वक पितरों का, देवयज्ञों द्वारा देवताओं का तथा वेदों के स्वाध्याय द्वारा ऋषियों का पूजन करके अन्त काल आने पर जो क्षत्रिय दूसरे आश्रमों को ग्रहण करने की इच्छा

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १४६

अन्तकाले च सम्प्राप्ते य इच्छेदाश्रमान्तरम् ।

सोऽनुपूर्व्याश्रमान् राजन् गत्वा सिद्धिमवाप्नुयात् ॥

राजर्षित्वेन राजेन्द्र भैक्ष्यचर्यां न सेवया । अपेतगृहधर्मोऽपि चरेज्जीवितकाम्यया 11 न चैतन्नैष्ठिकं कर्म त्रयाणां भूरिदक्षिण । चतुर्णां राजशार्दूल प्राहुराश्रमवासिनाम् ॥ ” ( शान्तिपर्व ० ६३. १६-२३ ) राजा ऋषित्वेन मन्त्रार्थद्रष्टुत्वेन वेदान्तश्रवणकर्तृत्वेन हेतुना भैक्षचर्यामिच्छेत् । न तु सेवया श्रवणमकुर्वन्नान्नमात्रार्थम् । तत्कुर्वंस्तु जीवितकांक्षा भैक्ष्यचर्यां चरेदेव । एतद् भैक्ष्यं त्रयाणां राजादीनां नैष्ठिकं नित्यं तेषामाश्रमसन्यासो नित्यो नास्ति, अपि तु विक्षेपक-कर्मत्यागरूपः काम्य एवास्तीत्यर्थः । स च चतुर्णामप्याश्रमाणा-मस्तीतिप्राहुः । " अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेदुद्विजः । लोकास्तेजोमयास्तस्य प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ” ( शान्ति ० २४४।२८ ) करता है, वह क्रमशः आश्रमों को अपना कर परमसिद्धि को प्राप्त होता है । " " गृहस्थधर्म का त्यागकर देनेपर भी क्षत्रिय को ऋषिभाव से वैदान्तश्रवणादि सन्यासधर्म का पालन करते हुए जीवनरक्षा के लिये भिक्षा का आश्रय लेना चाहिए, सेवा कराने के लिये नहीं । " “ पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले राजेन्द्र! यह भैक्ष्यचर्या क्षत्रिय आदि तीन वर्णों के लिये नित्यकर्म अथवा अनिवार्यकर्म नहीं है । चारों आश्रमवासियों के लिये उनका यह कर्म ऐच्छिक ही बताया गया है । " क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के अवश्य कर्तव्य नहीं है, अर्थात् उनके लिये भिक्षाचरण नित्य अथवा लिये आश्रम संन्यास नित्य नहीं है । विक्षेप देनेवाले कर्मों का त्यागरूप संन्यास भी काम्य ही है । ऐसा संन्यास तो चारों वर्णों को ही है, ऐसा विद्वान् कहते हैं ।

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१५० ] कर ले । " ७७. ( महा ० शान्ति ० २४५.३ ) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ पकाकर - उन्हें संन्यास को ग्रहण महाभारत में इससे पूर्व परिव्राजकों के आचार का वर्णन करके विप्र अर्थात् ब्राह्मण के लिये ही संन्यास का वर्णन किया गया है - परिव्राजकानां पुनराचारः - तद् यथा विमुच्याग्नि धनकल-त्रपरिबर्हणं संगेष्वात्मनः स्नेहपाशा नवधूय परिव्रजन्ति । भवति चात्र श्लोकः

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।

न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥

कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।

विप्रस्तु भैक्ष्योपगतैर्हविर्भिश्चिताग्निनां स व्रजते हि लोकम् ॥

वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् " कषायं पाचयित्वाऽऽशु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु । प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् ॥ ” इत्यत्र तु द्विजः ७७ ब्राह्मण एव ' ब्राह्मणः प्रव्रजेदित्यादि श्रुतिभ्यः । यतः क्षत्रिय वैश्यादीनां संन्यासबोधिका श्रुतिः काचिनोप-लभ्यते । सिद्धान्तलेश सङग्रहेऽपि स्मृतिरेव त्रैवर्णिकानां संन्यासबोधि-atar | तस्या अपि श्रुत्यनुसारेणैव नयनमुक्तम् । राजधर्मोक्त सर्वाश्रम-" जो ब्राह्मण सम्पूर्ण प्राणियों को अभयदान देकर संन्यासी हो जाता है, वह मरने के पश्चात् तेजोमय लोकों में जाता है और अन्त में मोक्ष प्राप्त कर लेता है । " " पङक्तिक्रम से स्थित पूर्वोक्त तोन आश्रम और वानप्रस्थ में चित्त के राग - द्व ेष आदि दोषों को करके शीघ्र ही सर्वोत्तम चतुर्थ आश्रम सिद्धान्तलेशग्रंथ में भी तैर्वाणकसंन्यास की बोधिका स्मृति ही कही है, श्रुति नहीं कही । उस स्मृति की भी श्रुति के अनुसार ही गति

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १५१ विधानन्तु नीलकण्ठीयव्याख्यानुसारेण भैक्ष्यं विक्षेपककर्मत्यागरूपमेव न तु संन्यासरूपम् । भिक्षुकीतिपदेन जीवनयात्रार्थं भिक्षाचर्या ध्यानधारणादिकमेव सिद्ध्यति न तु दण्डग्रहणादिकम्, श्रुतिविरुद्धत्वात् । सुलभाया दण्डस्मरणमप्यलीकमेव । गो - सर्प निवारणार्थं नील-कण्ठचतुर्धरेण भिक्षुकीतिस्मरणादेव ७८ तत्कल्पितम् ( महा ० शान्ति ० ३२०.१५,१६ ) । कह दी है । राजधर्म में सर्वाश्रम का विधान है, परन्तु वहाँ भैक्ष्यशब्द का अर्थ नीलकण्ठ जी की, की हुई व्याख्या के अनुसार विक्षेप देनेवाले कर्मों का त्यागरूप ही है; संन्यासरूप नहीं । ' सुलभा ' के लिये जो भिक्षुकी पद का प्रयोग हुआ है, उस भिक्षु-की पद से जीवनयात्रा के लिये भिक्षा का आचरण तथा ध्यान-धारणादिक ही सिद्ध होता है, दण्डग्रहणादिपूर्वक सन्यास सिद्ध नहीं होता; क्योंकि दण्डधारणादि श्रुति से विरुद्ध अर्थ को महाभारत का ' भिक्षुकी ' पद नहीं कह सकता । ७८. महाभारत के इस प्रसंग से ' सुलभा ' प्रधान नामक राजर्षि के कुल में यह विदित होता है कि व्यक्त हुई थी । सुकुमारता, सौन्दर्य, मनोहरशरीर और उत्तम वय होने पर भी स्वानुरूप वर न मिलने के कारण उसने मोक्षधर्म की शिक्षा ग्रहण की । वह मुनिव्रत धारण करके अकेली विचरण करती थी । एक तो वह धर्मयुग था और दूसरा तथ्य यह था कि वह योगसिद्धि से सम्पन्न थी और अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाली थी । भिक्षावृत्ति से जीवननिर्वाह करती थी । ‘ त्रिदण्डके ' ( श्लोक १ ९ ) कहने से ऐसा ध्वनित - सा होता है कि वह त्रिदण्डी थी । यदा - कदा त्रिदण्डी स्वामियों से मोक्षधर्म की चर्चा भी करती थी । उन्हीं स्वामियों के श्रीमुख से राजर्षि जनक की मोक्षधर्म में आस्था को सुनकर उनके पास आयी । उनसे सत्कृत होकर उनके शरीर में सूने घर में संन्यासी के तुल्य एक रात रुककर अभीष्टस्थान की ओर चली गयी ।

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१५२ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् राजा जनक के शरीर में जब वह नेत्रमार्ग से योगबल का आलम्बन लेकर प्रविष्ट हुई तब उन्होंने उसके उस कृत्यपर कई प्रकार की आपत्ति की । यथा – ( १ ) यदि आप वर्णों में श्रेष्ठ ब्राह्मणकुल की कन्या हैं तो मेरे शरीर में प्रवेशकर - मेरे साथ संयुक्त होकर, ' वर्ण संकर - दोष ' को चरि-तार्थ कर रही हैं । ( २ ) मोक्षधर्म के अनुसार बर्ताव करनेवाली होने से आप आश्रमश्रेष्ठ हैं । मुझ गृहस्थ से संयुक्त होकर कष्टकर ' आश्रम - संकर-दोष ' को मत चरितार्थ करें । ( ३ ) कदाचित् आप सगोत्रा हैं, तब तो आपने स्पष्ट ही ' गोत्र-संकर - दोष ' को जन्म दिया है । ( ४ - ५ ) कहीं आप विधवा तो नहीं हैं? कहीं पति - सानिध्य-प्राप्त अथवा प्रोषितभर्तृका ( पति के परदेश चले जाने की स्थिति में ) विवाहिता होती हुई भी आपने मेरा स्पर्श किया है, तब तो स्पष्ट ही ' धर्म - संकर - दोष ' से आप दूषित हो रही हैं । ( ६-७ ) आपने योगतुल्य अमृत के साथ भोगतुल्य विषसेवन कर ' योग - भोग - सांकर्य -दोष ' को जन्म दिया है । माना कि आप मेरी इच्छा करती हैं, पर मैं तो आपको इस दृष्टि से नहीं चाहता, फिर संयोगसुख के रहस्य को न जानकर उतावली होकर जो मेरा स्पर्श किया है, वह अमृत और विष सम्मिश्रण तुल्य ' सुरति सांकर्य -दोष ' है । विज्ञ विचारकों को विचार करना चाहिये कि यदि जनक की दृष्टि में ' सुलभा ' सर्वथा संन्यासी ( संन्यासिनी ) ही होती - उसका वेषादि सर्वथा संन्यासाश्रमोचित ही होता, तो विज्ञ धर्मज्ञ जनक का यह प्रश्न कदापि नहीं बनता कि ' कहीं आप प्रोषितभर्तृका या पति सानिध्य प्राप्त होने पर भी पतिविमुख होकर मेरे शरीर में प्रवेश तो नहीं कर गयी हैं ( ६१ )? ' तब इतर दोषों का उल्लेख ही उचित होता । इससे स्पष्ट सिद्ध है कि वैधव्य प्राप्त या प्रोषितभर्तृका अथवा अविवाहिता के तुल्य गार्हस्थ्य जीवन से विलक्षणजीवन के द्योतक काषाय ( मलिन ) वस्त्रादि बाह्य चिह्नों से ही वह युक्त थी । जब

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १५३ स्त्रियोंका गुरुकुल वास ही नहीं है, तब विवाह से पूर्व ब्रह्मचर्याश्रमो-चित दण्डादिका परिग्रह भी सम्भव नहीं । जब यज्ञोपवीत ही नहीं, तब उसके अत्याग या त्याग से सम्पन्न कुटीचक, बहूदक और हंस - परमहंस कोटिका सन्यास भी स्त्रियों के लिये सम्भव नहीं । रही बात त्रिदण्ड की । वह तो तिल से निष्पन्न तेल के लिये ही प्रयुक्त होने योग्य ' तेल ' शब्द जैसे सरसों आदि से निर्मित तेल के लिये भी प्रशस्त है; तद्वत् ' त्रिदण्ड ' पथकी दुर्गमता के वारण के लिये और गृहस्थोचित जीवन से विलक्षण जीवन के सूचन के लिये ही गृहीत मान्य है । संस्कृतत्रिदण्ड के अर्थ में वह प्रयुक्त नहीं है । अभिनय के लिये गृहीत दण्ड भी अभिनय काल में सन्यास का ही सूचक होता है । फिर विधिविरुद्ध या अपवाद कोटि के ऐतिह्य तथ्य को प्रमाण मानकर प्रशस्त और प्रामा-fue तथ्य का अपलाप सर्वथा अनुपयुक्त है । ऐसी स्थिति में श्रीचतुर्धर जी का निम्नलिखित वचन फलबलकल्प्य होने पर भी स्पष्टवचन के अनुरूप है और पूर्वनिर्णीत तथ्य के विरूप भी - ' भिक्षुकी ' इति अनेन स्त्रीणामपि प्राग् विवाहादुद्वैधव्यादूर्ध्वं वा, संन्यासेऽधिकारोऽस्ति इति दर्शितम् । तेन भिक्षाचर्यं मोक्षशास्तश्रवणं, एकान्ते आत्मध्यानं च ताभिरपि कर्तव्यम्, त्रिदण्डादिकं च धार्यम् ( महा ० शान्ति ० ३२०.७ नीलकण्ठी ) । ' ननु क्षत्रियस्य संन्यासेऽधिकारो नास्ति इति चेत्, लिङ्गधार-णाऽभावेऽपि भरतऋषभादिवद् विक्षेपकर्मत्यागमात्रेऽधिकारात् ( नील-कण्ठी, गीता ३.२० ) । इसी रीति से ' जीवन्मुक्तिविवेक ' कारके निम्नलिखित वचन की सङ्गति भी साधनी चाहिये -. " भिक्षुकीत्यनेन स्त्रीणामपि प्राग्विवाहाद्वावैधव्यादूर्ध्वं संन्यासे-ऽधिकारोऽस्तीति दर्शितम् । तेन भिक्षाचर्यं, मोक्षशास्त्रश्रवणम्, एकान्त आत्मध्यानं च ताभिः कर्तव्यं, त्रिदण्डादिकं च धार्यम् । इति मोक्षधमें चतुर्धरी टीकायां सुलभाजनकसंवादः । शारीरकभाष्ये वाचक्नवीत्यादि श्रूयते । देवताधिकरणन्यायेन विधुरस्याधिकारप्रसङ्गत्वेन तृतीया-ध्याये चतुर्थपादे ( जीवन्मुक्तिप्रमाण प्रकरणम् ) । "

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१५४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कात्यायनवचनं न कात्यायन श्रौतसूत्रादावुपलभ्यते । कोशादा-वुपलम्भेऽपि श्रुतिविरोधात् सिद्धान्तलेशोक्त स्मृत्यनुसारिण्येव तस्यापि गतिः । यत्तु कूमें वंशकीर्तनप्रस्तावे द्वादशाध्याये श्वेताश्वतरमुनिना सुशीलो राजा शिष्यत्वेन गृहीत इत्युक्तम्, यथा

सोऽनुगृह्याथ राजानं सुशीलं शीलसंयुतम् ।

शिष्यत्वे परिजग्राह तपसा क्षीणकल्मषम् ॥

संन्यासिकं विधिं कृत्स्नं कारयित्वा विचक्षण ।

ददौ तदैश्वरं ज्ञानं स्वशाखाविहितं व्रतम् ॥

वणिक संन्यास का बोधक कात्यायनऋषि का वचन भी कात्यायनश्रौतसूत्रादिस्थल में नहीं मिलता है । कोशादिकों में संन्यास का बोधकवचन मिलने पर भी श्रुति से विरोध होने से सिद्धान्तलेश में कथन की गई स्मृति के अनुसार ही उस वचन की भी गति समझलेनी चाहिये । अर्थात् श्रुतिसे विरुद्ध होने से अग्राह्य है । ध्यान रहे, आनन्दाश्रमसंस्कृतग्रन्थावलिः ग्रंथांक: २० पृ ० ३ के अनुसार ये पक्तियाँ प्रक्षिप्त मानी गई हैं । प्रामाणिक चार प्रतियों में ये नहीं हैं । क. ख. ग. घ. पुस्तकेषु भिक्षुकीत्यारभ्यात एव चतुर्थपाद इत्यन्त ग्रन्थो नहि । अयं चाधिकोऽसंगतश्च । वस्तुतः यह आख्यायिका पञ्चशिख - जनकसंवाद के प्रसंग में ' स्थूलदेह से ही नहीं, अपितु सूक्ष्मदेह से भी आत्मा अतीत- अतिरिक्त ही है । ' इस तथ्य के प्रतिपादन में प्रयुक्त है । इसी संदर्भ में राजा के शरीर में सुलभा का प्रवेश और निवास भी चरितार्थ है । अभिप्राय यह है कि एक घर में जैसे दो व्यक्ति का निवास संभव है, वैसे ही सूक्ष्मदेह में भी दो जीव का अवस्थान संभव है । आत्मा देहद्वय से भिन्न ही है । एतदाख्यानतात्पर्यं तु एकस्मिन्गेहे इव लिङ्गदेहेऽपि द्वयोर्जीव-योरवस्थानं भवति तेन स्थूलसूक्ष्मदेहौ गृहवज्जीवस्यानात्मानावित्यु-क्तम् । " ( नीलकण्ठी शान्ति ० ३२०.२० )

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ७६ “ अशेषवेदसारं तत् पशुपाशविमोचनम् । अत्याश्रम इति ख्यातं ब्रह्मादिभिरनुष्ठितम् ॥ ' [ १५५ इत्यादि पृथुपुत्रे सुशीले क्षत्रियप्रवरे विधिना सन्यासोपन्यास-श्रवणं मोक्षधर्मे सुलभायाः क्षत्रियायाः दण्डधारणश्रवणं चेति तदपि यत्किञ्चित् । तत्र संन्यासपदेन पाशुपतव्रतस्यैवोक्तत्वात् । सन्यास-दीक्षा संन्यासिनैव दीयते । प्रकृते तु संन्यासदाता श्वेताश्वतरो न संन्यासी तस्य यज्ञोपवीतित्वस्मरणात् -" श्वेताश्वतरनामानं भस्मसन्दिग्धसर्वाङ्ग

-महापाशुपतोत्तमम् ।

कौपीनाच्छादनान्वितम् ॥

और जो कूर्मपुराण में वंश के कथन के प्रसंग में बारहवें अध्याय में यह कहा है कि श्वेताश्वतरमुनि ने सुशील नामक राजा को अपना शिष्य बनाया है, जैसा कि ' सोऽनुगृह्य ' इत्यादि श्लोक से सिद्ध है । " हे विचक्षण! श्वेताश्वतरमुनि ने अनुग्रह करके तप से नष्ट पापवाले शीलयुक्त सुशील नामवाले राजा को अपने शिष्यरूप में ग्रहण किया । सम्पूर्ण संन्यास की विधि को कराकर शिव सम्बन्धिज्ञान तथा अपनी शाखा में विधान किया हुआ व्रत प्रदान किया । " पृथुमहाराज के पुत्र, क्षत्रिय श्रेष्ठ, सुशील राजा विषयक संन्यास का श्रवण तथा मोक्षधर्म में क्षत्रियजाति वाली सुलभा का दण्डधारण करने का श्रवण है, वह भी ब्राह्मण से अतिरिक्त के संन्यासग्रहण करने में साधक नहीं । क्योंकि राजा सुशील के प्रकरण में संन्यासशब्द से पाशुपतव्रत ही कहा गया है, न कि वैदिक संन्यास | संन्यास की दीक्षा तो संन्यासी के ही द्वारा दी जाती है । राजा के प्रकरण में तो सन्यास देनेवाले श्वेताश्वतरमुनि सन्यासी नहीं थे, क्योंकि ' तपसा दशितात्मानं शुक्ल यज्ञोपवीतिनम् ' इस श्लोक में उनको यज्ञोपवीत ७ ९. राजा सुशील को व्रतादि के सहित पाशुपत दीक्षापूर्वक जो शिव सम्बन्धि ज्ञान दिया था, वह सर्व वेदों का सार तथा जीवों को बन्धन से मुक्त करनेवाला था । उसका हो अत्याश्रम नाम था, वह ब्रह्मादि के द्वारा भी पालन किया गया है ।

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१५६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् " तपसा दर्शितात्मानं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् । समाप्यसंस्तवं शम्भोरानन्दाश्रुविचक्षणः ॥ ' " इत्यादि सन्दर्भ ' शुक्लयज्ञोपवीतिनमिति पाठदर्शनात् । न हि संन्यासी यज्ञोपवीती भवति तत्र पाशुप्तदीक्षाविधानमेव संन्यासविधि-त्वमितिमन्तव्यम् । अत्याश्रमपदमपि तत्रैव प्रयुक्तमिति मन्तव्यम् । धारण करनेवाला कहा गया है । सन्यासी यज्ञोपवीत धारण करने वाला होता नहीं । राजा के प्रकरण में पाशुपतदीक्षा का विधान ही सन्यासविधि माननी चाहिये । अत्याश्रमपद भी पाशुपत दीक्षा के विधान के लिये ही प्रयोग किया गया है, ऐसा मानना चाहिये । रघु आदि राजाओं के सन्यास का श्रवण पुराणादिकों में मिलता नहीं है । इसलिये ही कालिदास जो ने शरीरान्त के समय रघु आदि परम धर्मात्मा राजाओं को योग से ही शरीर त्यागनेवाला कहा है, सन्यास लेकर शरीर त्यागनेवाला नहीं कहा । अतः सिद्ध होता है कि क्षत्रियों को सन्यास का विधान नहीं । सुलभा का दण्डग्रहण भी निष्प्रमाण है । ८०. ' संन्यासावस्थायामयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मणः ' ( नारद परिव्रा ० ३.७७ ) इस श्रुति के अनुसार संन्यासी यज्ञोपवीती नहीं होता । कदाचित् ' कुटीचको शिखा यज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः ' ( नारद परि ० ५.१ ), शिखी यज्ञोपवीती स्यात्त्रिदण्डी सकमण्डलुः ' ( सूत संहिता २.६. ३-५ ) इन वचनों के अनुसार यज्ञोपवीती कुटीचका-दिको और अयज्ञोपवीती हंसादिको मानें तो भी ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार सिद्ध होता है । ' कथं ब्राह्मण: ' से यह स्पष्ट है कि यदि प्रकृत में क्षत्रिय और वैश्य का भी संन्यास में अधि-कार होता तो अयग्योपवीती ब्राह्मण के लिये ' कथं ब्राह्मणः ' के समान ' कथं क्षत्रियः ', ' कथं वैश्यः ' ऐसा भी सुना जाता । क्योंकि ऐसा नहीं सुना जाता है, अतः उनका संन्यास में अधि-कार नहीं है । ऐसी स्थिति में श्वेत यज्ञोपवीत धारण करने के कारण श्वेताश्वतर गृहस्थ ही मान्य हैं । कदाचित् वे कुटीचक कोटि के संन्यासी मान लिये जाँय तो भी ब्राह्मणेतर का संन्यास में अधिकार न होने से शिष्य पाशुपतदीक्षा नामक

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १५७ ध्वादीनामपि राज्ञां न सन्यासश्रवणम् । अत एव कालिदासेनापि ८१‘योगेनान्ते तनुत्यजाम् ' ( रघु ० १.८ ) इत्युक्तम् । यदुक्तम् किञ्च महाभारते निर्वेदाद्य धिष्ठिरेण राज्यनिचिकीर्षता

-द " अथर्व कोहमेवात्र वनेष्वस्मिन् वनस्पतौ ।

चरन्भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डः क्षपयिष्ये कलेवरम् ॥

उनके जिस दण्ड का वर्णन है वह तो गो- सर्प के निवारण के लिये नीलकण्ठ चतुर्धर ने भिक्षुकी शब्द के आधार पर कल्पना किया है । वस्तुतः सुलभा ने दण्ड नहीं लिया । ८१. संन्यासदीक्षा से ही सम्पन्न मान्य है । ' यज्ञोपवीती ब्राह्मण भी संन्यास की दीक्षा दे सकता है ' यह कथन अप्रशस्त होने से अश्लाघ्य है । शास्त्रों में अवरवर्ण और आश्रम के व्यक्ति को गुरु बनाना उत्कृष्ट नहीं माना गया है ( दृष्टव्य महा ० शान्ति ० ३२०,५६.६०, सूतसंहिता ३.५ ) । ' कुटीचक और बहूदक ब्राह्म-तर भी हो सकता है । ' यह कथन भी उचित नहीं । ' न्यसेद्विप्रः कुटीच ' ( सूत ० २.४.३० ) = ' मुमुक्षा हीन और अशक्त ब्राह्मण कुटीचक संन्यास ग्रहण करे । ' इस वचन के अनुसार कुटीचक और बहू यद्यपि शिखासूत्रधारी होते हैं; परन्तु वर्ण से ब्राह्मणी । " शैशवेऽभ्यस्त विद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥ ” ( रघुवंश १.८ ) “ ( रघुवंशी राजा लोग ) बालकपन में विद्याभ्यास करनेवाले, युवावस्था में भोग की इच्छावाले, वृद्धावस्था में मुनिवृत्तिवाले और अन्त में योग से शरीर त्याग करनेवाले होते थे । " ८२. अथवा मूड़ मुड़ाकर मननशील संन्यासी हो जाऊँगा एक - एक दिन एक - एक वृक्ष से भिक्षा माँगकर अपने शरीर को सुखा दूँगा ।