वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 191–200

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 191–200

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१५८ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

८ पांसुभिः समभिच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रयः ।

वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ॥

= ४ न शोचन्न प्रहृष्यँश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥

८ " आत्मारामः प्रसन्नात्मा जडान्धबधिराकृतिः ।

अकुर्वाणः परैः काञ्चित्संविदं जातुकैरपि ॥

८६ जङ्गमाजङ्गमान्सर्वानविहिसँश्चतुर्विधान् । ( शान्तिपर्व ६.१२ - १५३ ) तत्तु अर्जुनस्येव तस्यापि दुःखान्मोहाद्वा तथोक्तिः । अत एव त्रयोविंशेऽध्याये व्यासवचनम् -महाभारत में वैराग्य के कारण राज्य न चाहनेवाले युधिष्ठिर ने ' अथ कोहं ' इत्यादि श्लोक से जो कुछ कहा है, वह अर्जुन की तरह दुःख तथा मोह के कारण है न कि यथार्थ । इसलिये ही २३ वें अध्याय में व्यास का वचन है कि - ' हे युधिष्ठिर गृहस्थ का परित्याग करके आपके लिए संन्यास का विधान है नहीं । ' तथा ' हे राजेन्द्र! क्षत्रिय का धर्म दण्ड देना है । मुण्डन ( संन्यास ) क्षत्रिय का धर्म नहीं है । ' ८३. धूल से ' आच्छन्न किसी शून्य स्थान अथवा वृक्ष की जड़ को ही अपने रहने का स्थान बनाऊँगा । सर्व प्रिय तथा अप्रिय का त्यागी होकर रहूँगा । ८४. शोक - मोह को त्यागकर स्तुति तथा निन्दा को समान मानता हुआ, आशा और ममता को त्यागकर निर्द्वन्द्व हो जाऊँगा तथा कभी किसी वस्तु का संग्रह नहीं करूँगा । ८५. आत्मा के चिन्तन में ही सुख का अनुभव करूँगा । मनको सदा प्रसन्न रखूँगा । कभी किसी दूसरे के साथ कोई बातचीत नहीं करूँगा । गूँगे, अन्धों और बहिरों के समान न किसी से कुछ कहूँगा, न किसी को देख गा और न किसी की सुनूँगा । ८६. चार प्रकार के समस्त चराचर प्राणियों में से किसी की हिंसा नहीं करूँगा ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १५६ ( शान्तिपर्व २३ | ३ ) " न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीयते । " तथा " दण्ड एव हि राजेन्द्र क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् । " यदुक्तम् -II ( शान्तिपर्व २३ | ४७ ) " आतुराणाञ्च सन्यासेन विधिनैव च क्रिया । प्रेषमात्रं समुच्चार्य सन्यासं तच्च पूरयेत् ॥ ” इति भारतवाक्यम्, तदसत् । भारते तदर्शनात् । श्रुतिष्वा-तुरेऽपि विधिर्दर्शनाच्च -- ' आतुरो जीवति चेत्क्रमसंन्यासः कर्तव्यः । ' ( नारद परि ० ५, संन्यासोप ० ५६ ) । ' यद्यातुरः स्यान्मनसा वाचा संन्यसेत् ' ( जाबालोप ० ५ ), " कर्म -संन्यासोऽपि द्विविधः निमित्तसंन्यासोऽनिमित्तसंन्यासश्चेति । निमित्त-स्त्वातुरः, अनिमित्तः क्रमसन्यासः । आतुरः सर्वकर्मलोपः प्राणस्यो-त्क्रमणकालसंन्यासः सनिमित्त संन्यासः । ” ( नारदपरिव्राजकोपनिषत् ५ ) जो यह कहा कि - ' आतुराणां ' इत्यादि महाभारतवचन, आतुरसन्यास में विधि और क्रियाका निषेध करनेवाला है, यह कहना भी असत्य है, क्योंकि महाभारत में यह वचन नहीं देखा गया है । तथा ' आतुरे s पि ' इत्यादि श्रुतियों में आतुरसंन्यास में भी विधि देखी गई है | ८७. कदाचित् महाभारत के किसी संस्करण में या अन्य किसी ग्रंथ में इस प्रकार का वचन उपलब्ध भी हो तो भी आतुर - संन्यास में विधि और क्रिया का प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियों को मुख्य प्रमाण मानकर ही इस प्रकार के कथन की संगति साधनी चाहिये ।

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१६० ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् आतुरकालः कथमार्य समतः

-‘ ‘ प्राणस्योत्क्रमणास्रन्नकालस्त्वातुरसंज्ञकः ।

तरस्त्वातुरः कालो मुक्तिमार्गप्रवर्तकः ॥ ६

आतुरेऽपि च सन्यासे तत्तन्मन्त्रपुरःसरम् ।

मन्त्रावृत्ति च कृत्वैव सन्यसेद्विधिवद्बुधः ॥ १६

आतुरेऽपि क्रमे वाऽपि प्रैषभेदो न कुत्रचित् ।

न मन्त्रं कर्मरहितं कर्म मन्त्रमपेक्षते ॥ ६०

अकर्म मन्त्ररहितं नातो मन्त्रं परित्यजेत् ।

मन्त्रं विना कर्म कुर्याद् भस्मन्याहुतिवद्भवेत् ॥ ६१

विध्युक्तकर्मसंक्षेपात्सन्यासस्त्वातुरः स्मृतः ।

तस्मादातुरसन्यासे मन्त्रावृत्तिविधिमुने ॥ १२

( नारदपरिव्राजकोपनिषत् ३.४-८ ) ' यद्यातुरोवाग्नि न विन्देदप्सु जुहुयात् । आपो वै सर्वा देवताः । ६३ ( परमहंस परिव्राजकोपनिषत् ) । ८८. प्राणों के निकलने के समीप काल को आतुरकाल नाम दिया है । इससे अतिरिक्त और कोई काल, मुक्तिमार्ग प्रवर्तक आतुर -काल नहीं है । ८. आतुरसन्यास में भी उस उस मन्त्रपूर्वक तथा मन्त्रों की आवृत्ति करके विद्वान् विधिसहित सन्यास करे । ६०. आतुरसन्यास अथवा क्रमसंन्यास में कहीं भी प्रैष का भेद नहीं है । कोई मन्त्र कर्मरहित नहीं है तथा कर्म भी मन्त्र की अपेक्षा करता है । १. मन्त्र से रहित कर्म अकर्म ( निष्फल ) होता है । इसलिये कर्म में मन्त्र का परित्याग न करे, यदि मन्त्र के बिना करे तो वह भस्म में आहुति के समान निष्फल होता है । २. विधान किये कर्मों के संक्षेप होने से आतुर सन्यास कहा गया है । इसलिये हे मुने! आतुर - सन्यास में मन्त्रों की आवृत्ति का विधान है । ६३. यदि आतुरपुरुष अग्नि को न प्राप्त कर सके तो जल में ही हवन करे; क्योंकि जल सर्वदेवमय है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६१

यदुक्तम्-त्याग एव हि सर्वेषां मोक्षसाधनमुत्तमम् ।

त्यजतैव हि विज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक्परं पदम् ॥

इति भालविश्रुतेः, तदपि श्रुतिषु नोपलभ्यते । उपलम्भे तु ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ती ' ति विशेषानुसारेणैव नयनमुचितम् । ६४ जो यह कहा कि - ' सर्व के लिये त्याग ( सन्यास ) ही उत्तम मोक्ष का साधन है, त्यागनेवाले के द्वारा ही त्यागकर्ता का अन्तरात्मा-रूप परमपद विज्ञेय ( जानने योग्य ) है ' इस भाल्लविश्रुति से सर्व का सन्यास सिद्ध होता है । ६४. श्रीभगवत्पादशङ्कर के द्वारा उद्धृत श्लोक ( मन्त्र ) में आरम्भ के दो चरण भिन्न हैं । यथा -" मोक्षमिच्छन्सदा कर्म त्यजेदेव ससाधनम् । त्यजतैव हि तज्ज्ञ यं त्यक्तुः प्रत्यक्परं पदम् ॥ ” ( केनोपनिषत् ४.७ शां. पदभाष्य ) श्री आनन्द गिरिजी के द्वारा उद्धृतवचनों में अन्तिम दो चरण उपलब्ध हैं । द्रष्टव्य ईशावास्योपनिषत् १ व्याख्या । ध्यान रहे, दोनों प्रकार के वचन त्याग के अद्भुत माहात्म्य बताने में प्रयुक्त हैं । इन वचनों के आधार पर ' सबके लिये संन्यास-आश्रम विहित है ' ऐसा सिद्ध नहीं होता । अविद्या और काम के त्याग से भी सर्वत्याग मान लिया जाता है । अविद्या और काम अर्थात् कर्मासक्ति, फलासक्ति, अहंकृति, नानात्वबुद्धि और अभिनिवेशविरहित कर्म ‘ अकर्म ’ हो जाते हैं - ' कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ' ( भगवद्गीता ४.१८ ), ' तस्य कार्यं न विद्यते ' ( भगवद्गीता ३. १७ ) । तत्त्वज्ञ द्वारा अविद्या और काम के साथ ही नित्य नैमित्तिक और प्रायश्चित्तरूप कर्मों का ऋषभादि की तरह स्वरूपतः त्याग किये जाने पर भी बाह्याभ्यन्तर त्याग के कारण उक्त- वचनों की सार्थकता हो जाती है । ऐसा होने पर भी ' सर्व वर्णों का सलिङ्गसन्यास में अधिकार है ' यह सिद्ध नहीं होता;

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१६२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' अथ परिव्राड्विवर्णवासो मुण्डोऽपरिग्रही शुचिरद्रोही भैक्षाणो ब्रह्मभूयाय कल्पते ( भवति ) ' इति जाबालश्रुतिः ( जाबालोपनिषत् ५ ) " ऋणत्रयमपाकृत्य निर्ममो निरहंकृतः । ब्राह्मणः क्षत्रिय वाऽथ वैश्यो वा प्रव्रजेद्गृहात् ॥ ± ५ त्रैवर्णिकानां सन्यासो विद्यते नात्र संशयः । शिखायज्ञोपवीतानां त्यागपूर्वेकदण्डयुक् ॥ ” ६ ६ यह वचन, श्रुतियों में मिलता ही नहीं है । यदि मिले भी तो इसका भी नयन ( गति ) ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' इस विशेषवाक्य के अनुसार ही करना उचित है । इसी प्रकार ' अथ परिव्राड् ' यह सामान्य जाबालश्रुति भी विशेषश्रुति की अनुसारिणी है, ऐसा समझना चाहिये | ' ऋणत्रयमपाकृत्य ' इत्यादिक ब्रह्माण्डपुराण के वचन, तैव-fre सन्यास की सिद्धि में कहे जाते हैं । वे वचन ब्रह्माण्डपुराण में न मिलने से ही अर्थशून्य हैं । त्रैवाणिकसन्यास के साधक नहीं हैं । विदुर जी तो तत्त्वज्ञाननिष्ठ थे, इसलिये ' ज्ञान ही सन्यास का लक्षण है । ' इस रीति से विदुरजी का तो ज्ञाननिष्ठारूप ही सन्यास था । लिङ्ग क्योंकि नारदपरिव्राजकोपनिषत् में जहाँ त्याग की महिमा का प्रति-पादन है, वहीं ' ब्राह्मण का संन्यास में अधिकार है ' ऐसा भी । यथा—

" यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु ।

तदा संन्यासमिच्छेत पतितः स्याद्विपर्यये ॥

विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्सरक्तस्तु गृहे वसेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन्हि द्विजाधमः । यस्यैतानि सुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरं करः । संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥ " ( नारदपरिव्राजकोपनिषत् ३.१२ - १४ ) ६५. तीनों ऋणों को निवृत्त करके ममता तथा अहंकार से रहित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य गृहस्थाश्रम से सन्यास ग्रहण करले । ९ ६. शिखा तथा यज्ञोपवीत के त्यागपूर्वक, एक दण्ड से युक्त सन्यास तीनों वर्णों को है, इसमें कोई संशय नहीं ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६३ इति ब्रह्माण्डपुराणवचनन्त्वनुपलम्भपराहतम् । विदुरस्तु तत्त्व-निष्ठ एव आसीदिति ' ७ ' ज्ञानं सन्यासलक्षणमि ' ( नारदपरि ० ३.१६ ) ति रीत्या तस्य ज्ञाननिष्ठेव संन्यासः । तदुक्तम् -तत एव -' ज्ञानदग्धशरीराणां पुनर्दाहो न विद्यते । '

दग्धस्य दहनं नास्ति पक्वस्य पचनं यथा ।

ज्ञानाग्निदग्धदेहस्य न च श्राद्धं न च क्रिया ॥

( पैङ्गलोपनिषत् ४.७ ) धर्मराजश्च तत्रैनं संस्कारयिषुस्तदा । दग्धुकामोऽभवद्विद्वानथवागभ्यभाषत H

भो भो राजन् न दग्धव्यमेतद्विदुरसंज्ञकम् ।

कलेवर मिहैवं ते धर्म एष सनातनः ॥

यतिधर्ममवाप्तोऽसौ नैव शोच्यः परन्तप ॥

( आश्रमवासिक ० २६. ३१-३३ ) सन्यास नहीं था । ' ज्ञानाग्नि से दग्ध शरीरवाले पुरुष की दाह तथा श्राद्धादिक क्रिया आवश्यक नहीं ऐसा पैङ्गलोपनिषदादि में कहा है । इसलिये ही " विद्वान् धर्मराज युधिष्ठिर ने जैसे ही विदुर के शरीर के संस्कार करने की इच्छा की वैसे ही आकाशवाणी हुई । हे राजन्! विदुरनामवाला यह शरीर जलाना नहीं चाहिये । यही आपका सनातन धर्म है । यह तो यतिधर्म ( ज्ञाननिष्ठा ) को प्राप्त हो ६७. " प्रवृत्तिलक्षणं कर्म ज्ञानं संन्यासलक्षणम् । तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥ ” ( नारदपरिव्राजको ० ३.१६ ) ८. ज्ञान से दग्ध शरीरवाले ज्ञानियों के शरीर का पुनः दाह नहीं होता । जिस प्रकार पकाए हुए को पुनः नहीं पकाया जाता, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि से दग्ध का पुनः दाह नहीं होता । ज्ञाना-ग्नि से दग्ध देहवाले ज्ञानीपुरुष की क्रिया तथा श्राद्ध नहीं होता ।

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१६४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् तावताऽपि न शूद्राणां वैधलिङ्गसन्यासः शक्यसमर्थनः । सन्यास-विधायक वाक्येषु ब्राह्मणग्रहणेन राजसूये क्षत्रियाणामिव ब्राह्मणानामेव सन्यासेऽधिकारात् । यत्तु -सा त्वेनमब्रवीद्राजन् क्रियतां

मदनुग्रहः ।

प्राद्राज्य महमिच्छामि तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् ॥

( उद्योग पर्व ० १७५/४१ ) इत्यादिभिरपि न स्त्रीणां सन्यासः सिद्धयति तत्र प्राव्राज्यपदेन निवृत्तेरेव विवक्षितत्वात् । अत एव दुश्चरतपश्चर्यैवोक्ता | ' स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् । ' इति भगवद्वाक्येऽपि भगवद्भक्त्या स्त्यादीनामपि सद्गतिरे-वोक्ता न सन्यासविधानम् ( भगवद्गीता ६.३२ ) । गया है । अतः यह शोक करने के योग्य भी नहीं है । " इस आश्रम -वासिकपर्व के वचनों के अनुसार ज्ञाननिष्ठ होने से आकाशवाणी ने विदुर को अदाह्य तथा अशोच्य कहा है, न कि सन्यासी होने के कारण । अत एव श्लोक में ' यति हो गया है ' ऐसा न कहकर ' यतिधर्म ( ज्ञाननिष्ठा ) को प्राप्त हो गया है ' ऐसा ही कहा है । इस विदुर के प्रसंग से भी शुद्रों के लिये सलिंगसन्यास विहित है, यह समर्थन नहीं किया जा सकता । उसने कहा " हे राजन्! मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये I । मैं प्राव्राज्य ( निवृत्ति ) चाहती हूँ; क्योंकि मैं कठोर तपस्या करूँगी । " इत्यादि उद्योगपर्व के वचनों से भी स्त्रियों का सन्यास सिद्ध नहीं होता । इसलिए उसने कठोर तपस्या करने को कहा है । सन्यास तपस्या के लिये नहीं होता; अपि तु ज्ञाननिष्ठा के लिये लिया जाता है । अतः श्लोक में ' प्रव्रज्या ' शब्द का अर्थ सन्यास नहीं, अपितु निवृत्ति ही विवक्षित है । " स्त्री, शूद्र तथा वैश्य भी परमगति को प्राप्त हो जाते हैं " इस गीता के वाक्य में भी भगवान् ने स्त्री, शूद्र आदिकों की सद्गति तो कही है, सन्यास का विधान नहीं किया है । यदि स्त्री, शूद्रादि कभी ब्राह्मण के समान परमगति ( सद्गति ) के लिये सन्यास की अपेक्षा होती तो भगवान् उनके लिये भी सन्यास का विधान अवश्य करते |

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६५ यत्तु -" प्रव्रज्यावसिता यत्र त्रयो वर्णा द्विजातयः । विवासं कारयेद्विप्रं दास्यं क्षत्रियवैश्ययोः ॥ " इति कात्यायनवाक्यविहितप्रायश्चित्तसंसूचितार्थापत्त ेः, उक्त बहु स्मृतिप्रामाण्यान्यथानुपपत्तिप्रसूतार्थस्य क्षत्रियकृततुर्याश्रमस्यानुप-पत्तेश्च सत्वात् तत्सिद्धिरिति तदपि यत्किञ्चित् । कात्यायनसूत्रस्मृ-त्यादौ तद्वचनानुपलम्भात् । तादृशस्मृतीनां सिद्धान्तानुसारेण £ श्रुत्य-नुसारेणैव नेयत्वात् । श्रुतयस्तु तथाविधाः नोपलभ्यन्ते । और जो यह कहा गया है कि " प्रव्रज्यावसिता " इस कात्यायन के वाक्य से सन्यास से पतन हो जाने पर तीनों वर्णों के लिये प्राय-श्चित्त कथन किया गया है, वह तभी संभव है जबकि तीनों वर्णों के सन्यास का विधान हो तथा बहुत - सी उन स्मृतियों का जिनमें क्षत्रिय को सन्यास लेना कहा है, प्रामाण्य तभी संभव है, जबकि क्षत्रियों का सन्यास स्वीकार किया जाय । तीनों वर्णों के संन्यास की विधि के विना प्रायश्चित्त की अनुपपत्ति तथा क्षत्रियों को सन्यास की बोधक स्मृतियों के प्रामाण्य की अनुपपत्ति से त्रैवणिक सन्यास की सिद्धि होती है । " यह कहना भी सारयुक्त नहीं है, क्योंकि - कात्यायन मुनि के नामसे ६६. श्रुतिविरुद्धस्यापि स्मार्तवचननिचयस्य सर्वथाऽप्रामाण्य-परिजिहीर्षया श्रुत्यनुकूल एवार्थः परिकल्पनीयः । तत्र ' त्रयाणां वर्णानां वेदमधीत्य चत्वार आश्रमाः ' इति छन्दोगसूत्रस्यायमर्थः - त्रयाणां वर्णानां यथोदितं चत्वार आश्रमा इति औचित्यं श्रुत्यविरोधाय ब्राह्मणस्यैव तुर्याश्रमाधिकारविधौ नान्यत्रैवर्णिकानां संन्यासो विद्यते, नात्र संशयः “ शिखायज्ञोपवीतानां त्यागपूर्वेकदण्डयुक् " इति ब्रह्माण्ड-पुराणमपि छन्दोगसूत्रसमानार्थम् । यच्च ब्रह्मवैवर्तवचनम् – " वैराग्यो-त्पत्तिमानेव संन्यासे परियुज्यते । रागवान्न तु विप्रोपि वेदवेदांग-वित्तमः ॥ ” इति वेदवेदाङ्गवित्तमपि विप्रो रागवांश्चेत्तर्हि संन्यासे न युज्यत इत्यन्वयः । एवञ्च - विरक्तस्य विप्रस्यैवाधिकारोऽभिहितो न क्षत्रियादेः । यच्च स्मृत्यन्तरम् - " ऋणत्रयमपाकृत्य निर्ममो निरहं-कृतः । ब्राह्मणः क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा प्रव्रजेद्गृहात् ॥ ” इति, तस्या-

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१६६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यत्तु ' अथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातकोऽस्नातको वोत्सन्नाग्निको वानग्निको वा यदहरेव विरेजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( नारदपरिव्राजकोप-निषद् ३.७७ ) इति द्विजातीनां सर्वेषां सन्यासाधिकारः सिध्यतीति तदपि यत्किञ्चित् । तस्या अपि श्रुतेर्ब्राह्मणविषयकत्वोक्तः । यत्तुI " सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो । घृणा दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ " उद्धृत किया प्रायश्चित्त बोधकवाक्य, कात्यायनसूत्र तथा कात्यायन-स्मृति में मिलता ही नहीं, तब उससे त्रैवर्णिकसन्यास की सिद्धि तो अत्यन्त दूर है । जो स्मृतियाँ क्षत्रिय के सन्यास का बोधक हैं, उनका प्रामाण्य श्रुति से विरुद्ध होने से ही समाप्त है । श्रुति ऐसी मिलती नहीं, जिसमें क्षत्रिय आदिकों के सन्यास का विधान हो । तथा जो " अथ पुनरव्रती वा " इस नारदपरिव्राजक उपनिषद् की सामान्यश्रुति से त्रैवणिक सन्यास की सिद्धि होती है, ऐसा कहा गया है, वह कथन भी बलहीन है । वह श्रुति भी ब्राह्मण को ही सन्यास यमभिप्रायः - गृहात् प्रव्रजेद्वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत् । प्रव्रज्या शब्दो यद्यपि संन्यासे रूढस्तथाप्यत्र श्रुतिविरोधपरिहाराय तृतीयाश्रम पर-स्याऽपि वैराग्य हेतुकत्वात् । यद्वा - यदा ब्राह्मणः स्ववृत्तावजीवन्क्षत्रिय-वृत्तिमाश्रितस्तत्राप्यजीवन्वैश्यवृत्तिं ततस्तामापदं निस्तीर्यापि न वर्णान्तरवृत्तिं परित्यजति किन्तु तत्रैवावस्थितस्तदा तत्तत्क्षत्रियादि-वृत्तिजीवनेन स एव ब्राह्मणः क्षत्रिय वैश्य इति च व्यपदिश्यते शास्त्रा-ननुज्ञातकालेऽपि क्षत्रियादिवृत्तिनिरतत्वात्तस्यापि प्रव्रजेदिति प्रव्रज्या-धिकारं दर्शयति । अत एव - " ब्राह्मणः क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा प्रव्रजे-दुगृहात् " इत्यत्राथशब्द उपात्तः, ब्राह्मण एवाथानन्तरं क्षत्रियवृत्याश्र-यणात् क्षत्रियः अथ वैश्य इत्यानन्तर्यप्रतिपादनादयमर्थो गम्यत इत्यर्थः । एतेन " ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्ततो गच्छेद्वनं गृही । संन्यसेद्वाथ वा शान्तः । " इत्येतदपि व्याख्यातम् । एवञ्च मनुदत्तात्रेयादिवचना-न्यप्यनुकूलानि भवेयुः । तस्माच्छ्र ुतिविरोधपरिहारायान्यान्यपि विरुद्धवचनानि ज्ञेयानि ( वंशीधरी भागवत ११.१८.४१ ) ।

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वेदार्थ पारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् “ यत्तैतन्न भवेत्सर्वं तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ॥ ” [ १६७ ( महाभा ० वनपर्व ० १८०.२१, २६ ) इति ब्राह्मणलक्षणलक्षितस्य त्रैर्वाणकस्य सन्याससिद्ध्यर्थमेव सन्यास विधायक वाक्येषु ब्राह्मणग्रहणमिति, तदपि यत्किञ्चित् । तथा सति कर्मणा वर्णव्यवस्थापत्तेः । न चेष्टापत्तिः ' चातुर्वर्ण्य-संस्कृतिविमर्श ' विस्तरेण तत्खण्डितत्वात् । यदपि ' ब्राभवितुकामस्य मुमुक्षोरेव ब्राह्मणपदार्थत्वमिति तदपि यत्किञ्चित्, निर्मूलत्वात् । ' ब्राह्मोऽजातो, इति रीत्याऽजात्यर्थे ' ब्राह्मण ' पदस्यैवासिद्ध: । यदपि विद्वत्सन्यासपक्षे " ब्रह्मविदेव ब्राह्मणः ” इति तदपि यत्किञ्चित् । १०० निर्मूलत्वात् ब्रह्मविदि ब्राह्मणशब्द-कह रही है, क्योंकि ' ब्राह्मणः ', ' द्विजः ' ( ३.१२-१४ ) कहने से इस श्रुति और अन्य श्रुतियों में स्पष्ट ब्राह्मण शब्द है; अतः यह भी ब्राह्मण IT ही सन्यास कह रही है । जो वनपर्व में यह लिखा है कि “ जिसमें सत्य, दान, क्षमा, शील, अहिंसा, तप तथा दया आदिक सद्गुण दिखाई देते हैं, वह ब्राह्मण है । जिसमें दया, क्षमा, दानादिक सर्वगुणों का समुदाय न हो, उसको ' शूद्र ' ऐसा निर्देश करे । पूर्वोक्त दया, दानादि लक्षणों से युक्त त्रैवर्णिक ब्राह्मण के सन्यास की सिद्धि के लिये ही सन्यास की विधि करनेवाले वाक्यों में ब्राह्मण का ग्रहण किया है, इससे भी त्रैवर्णिक सन्यास सिद्ध होता है । " यह कथन भी सारहीन है । क्योंकि ऐसा मानने पर कर्म से वर्णव्यवस्था माननी पड़ जायगी । यदि कहा जाय कि ' कर्म से वर्णव्यवस्था मानना तो इष्ट है ' यह कहना उचित नहीं; क्योंकि कर्म से वर्णव्यवस्था पक्ष का " चातुर्वर्ण्य संस्कृति विमर्श ” ग्रंथ में ( मेरे द्वारा ) विस्तार से खण्डन किया गया है । १०० ननु यदि भवेद्ब्राह्मणशब्दस्य ब्राह्मणत्वजातिर्वाच्योर्थ-तह तस्योद्देश्यत्वेन विवक्षितत्वात् क्षत्रिय वैश्ययोः प्रव्रज्यायां मा भूदधिकारः । न च तथा ब्राह्मणत्वजातिरर्थः, अपि तु ब्रह्मवेदस्तन्नि-ष्ठास्तदध्ययनवन्तो ब्राह्मणा इति वेदाध्ययनवत्त्वमेकोनुगतो धर्मः स च ब्राह्मणशब्दस्यार्थः । तथा च वेदाध्ययनवत्त्वरूपेण केनोपाधिना ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यास्त्रयोऽपि क्रोडीकृताः स्युः । एवं च ब्राह्मणोद्द श्येन