वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 201–210

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 201–210

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१६८ 1 वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् स्याशक्तत्वात् । “ जन्मना जायते शूद्रः ब्रह्मज्ञानाच्च ब्राह्मण: " इति वाक्यन्तु कुत्रापि प्रामाणिकस्मृतिषु नोपलभ्यते । ' जो यह कहा जाता है कि ' ब्रह्म होने की इच्छावाला मुमुक्षु को ब्राह्मण कहा गया है ' यह कहना भी सारहीन है; क्योंकि जाति से भिन्न अर्थ में ब्राह्मण पद व्याकरण से ही सिद्ध नहीं तथा अतिरिक्त कोई प्रमाण भी नहीं है । जो विद्वत्सन्यास पक्ष में कहा गया है कि-' ब्रह्मवेत्ता ही ब्राह्मण है । यह भी उचित नहीं, क्योंकि इस कथन का कोई मूल नहीं तथा ब्राह्मण शब्द की ब्रह्मवेत्ता में शक्ति भी नहीं है । प्रव्रज्याविधानात् त्रयाणामपि वर्णानां प्रव्रज्याधिकारोस्त्विति चेत् । मैवं यथा क्षत्रियशब्दस्य क्षत्रियत्वं वैश्यशब्दस्य वैश्यत्वं गोशब्दस्य गोत्वं तथा ब्राह्मणशब्दस्य ब्राह्मणत्वमेवार्थ इति शेषजैमिनि-बादरायणादिभिरङ्गीकृतं तदुव्याहन्येत तथा चोक्तव्याघातभयाद् ब्राह्मणशब्दस्य ब्राह्मणत्वं वेदाध्ययनवत्त्वं चोभयमपि वाच्यत्वेन परि-कल्प्येत तदा ' अन्यायश्चानेकार्थत्वम् ' इति तान्त्रिकैरेकस्यानेकार्थत्वं विरुद्ध तेन न्यायेन सह विरोधः स्यात् । अथैवं ब्रूषे - ' अन्यायश्चानेकार्थत्वम् ' इति न्याये जाग्रत्यपि गवादिशब्दानां यथानेकार्थत्वं तथा ब्राह्मणशब्दस्याप्यनेकार्थत्वम-स्त्विति, न चैतदुचितम् । अगतिका हीयं गतिर्यदनेकशक्तिकल्पनयाप्यने-कार्थत्वस्वीकरणम् । शब्दार्थज्ञाने वृद्धव्यवहारः प्रमाणम् । वृद्धा हि गवादिशब्दानामनेकशक्तिकल्पनया नेकार्थत्वमङ्गीकुर्वते न ब्राह्मण-शब्दस्य, अत एवाभिधानकारैरपि गवादिशब्दा अनेकार्थवर्गे पठिता-स्तेषामपि व्यवहारः शब्दश्लेषादिष्वेव न शास्त्रार्थनिर्णये । शास्त्रार्थ -परिज्ञाने तु प्रसिद्धार्थस्यैव ग्रहणं नेतरस्य इतरस्यापि ग्रहणे गोपशु-विधायक वाक्ये प्रतिग्रहनिवृत्तये गां दद्यादित्येवं रूपे सास्नाद्युपेतगोपिण्ड-व्यतिरिक्तस्यापि दिग्दृष्ट्यादेरपि ग्रहणं स्यान्न च गृह्यते, तस्माच्छा-स्त्रार्थनिर्णयेषु प्रसिद्धार्थस्यैव ग्रहणं युक्तं विपरीतार्थद्योतकवाक्यशेषा-द्यभावे, अतोऽनेकशक्तिकल्पनाभयाद् ब्राह्मणशब्दस्य ब्राह्मणत्वजाति-रेवार्थ: । ( वंशीधरी भागवत ११.१८.४१ )

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् " जन्मना ब्राह्मणो ज्ञ ेयः संस्काराद्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते ॥ " [ १६( मनु ० १०.७४ ) ' जन्मना ब्राह्मणः श्रेयान् ', ' जन्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ' ( भविष्य ० २.५.१ ), ' जन्मनो नाम भगवान् जन्मप्रभृति पूज्यते । ' ( शान्ति ० २६६. १२ ) इत्यादि विपरीतस्मृत्युपलम्भाच्च । क्वचित् सत्त्वे शूद्रसम एव तदर्थः । न हि जन्मना शूद्रस्य संस्कारोऽपि सम्भवति । ' वसन्ते ब्राह्मण-मुपनीत ' इत्यादिषु शूद्राणामुपनयन कल्पनाया अपरामर्शात् । १०१ " न यस्य जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभिः । सज्जतेऽस्मिन्नहंभावस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ' " अर्थात् ब्राह्मणशब्द ब्रह्मवेत्ता का वाचक नहीं है । ' जन्म से शूद्र ही पैदा होता है, ब्रह्मज्ञान से ब्राह्मण होता है ' यह वाक्य भी प्रामाणिक स्मृतियों में नहीं मिलता, साथ ही जन्म से शूद्र मान लेने पर तो संस्कार भी संभव नहीं है । क्योंकि ' वसन्तऋतु में ब्राह्मण का उपनयन करावे ', इत्यादिक वेदवाक्यों में ब्राह्मण का तो वसन्त ऋतु में उपनयन का विधान है, शूद्र का नहीं । यदि जन्म से कोई ब्राह्मण होता ही नहीं है, जन्म से सर्व शूद्र ही होते हैं, तो ' शूद्र का वसन्त ऋतु में उपनयन करावे ' ऐसा विधान होना चाहिए था, किन्तु ऐसा विधान कहीं नहीं, अतः सिद्ध होता है कि ब्राह्मण आदिक जातियाँ जन्म से ही हैं । यद्यपि ' न यस्य जन्मकर्मभ्यां ' इस वाक्य में जन्म कर्म - जाति आदि के अभिमान से रहित पुरुष को ब्राह्मण कहा है, तथापि इसमें भी सार नहीं है; क्योंकि ऐसा ब्राह्मणपना प्राप्त हो जाने पर तो " मैं ब्राह्मण हूँ, मैं सन्यासी बनूँ " ऐसा उसको अभिमान नहीं, न इच्छा ही है तो शास्त्रविधि से सन्यास लेने में प्रवृति ही संभव नहीं, न वेषमात्र के सन्यास लेने में ही प्रवृत्ति संभव है । स्मृतियों में ब्राह्मणों के भी १०१. " न यस्य जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभिः । सज्जतेऽस्मिन्नहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः || ” ( भागवत ० ११.२.५१ )

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१७० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् इत्यपि यत्किञ्चित् । तादृशे ब्राह्मण्ये लब्धे शास्त्रीयाधिकार-मुल्लंघ्य वेषसन्यासधारणे प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । स्मृतिषु ब्राह्मणेष्वेव दशवि-धत्वमुक्तम् । ब्राह्मणशूद्र ब्राह्मण वैश्यब्राह्मणराजन्यब्राह्मणब्राह्मणादिभेदा उक्ताः । तथा च न जातिमात्रेण मुख्य ब्राह्मण्यं किन्तु यस्य जन्मकर्मणा-दिभिर्देहादावहं भावो न सज्जते तमेव देवा मुख्यं ब्राह्मणं विदुः । यदपि ' जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिर्भिणैर्ऋ णवान् जायते ' ( बोधायनस्मृतिः २.६.४१ ) इत्यत्र ब्राह्मणशब्दो यथा वर्णत्रयोपलक्षकस्तथैव सन्यासप्रसंगे-s पि ब्राह्मणशब्दो वर्ण त्रयोपलक्षक इति तदपि यत्किञ्चित् १ ०२॥ ऋणा-पाकरण हेतु यज्ञाध्ययनदानादिषु राजन्यवैश्ययोः स्वशब्देनापि तत्र तत्रा-ब्राह्मणशूद्र, ब्राह्मणवैश्य, ब्राह्मणक्षत्रिय, ब्राह्मणब्राह्मणादि अनेकभेद कहे हैं । अतः जहाँ चारों वर्णों के लिये सन्यासविधि हो भी तो वहाँ चारों प्रकार के ब्राह्मणों के लिये ही समझना चाहिये । जो ऐसा कहना है कि " जातिमात्र से ब्राह्मण नहीं होता; किन्तु जन्म, कर्म, जाति आदिके अभिमान से रहित को ही ब्राह्मण कहा जाता है तथा ' उत्पन्न हुआ ब्राह्मण तीन ऋणोंसे युक्त ही उत्पन्न होता है ' इस वाक्य में ब्राह्मणशब्द तीनों वर्णों का उपलक्षक है, उसी प्रकार सन्यास के प्रसंग में भी तीनों वर्णों का उपलक्षक है; अतः तीनों वर्णों का संन्यास सिद्ध होता है । " ' यह कथन भी उचित नहीं । क्योंकि ऋण की निवृत्ति के कारण यज्ञ, अध्ययनादि कर्मों में अधिकार क्षत्रिय तथा वैश्य का शास्त्र में स्पष्ट श्रवण होता है । अतः ऋण बोधकवचन में १०२. दृष्टान्तदन्तिकयोर्वैषम्यात् । तथाहि - ' ब्रह्मचर्येण षभ्यो यज्ञ न देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः ' इति, वाक्यशेषे ब्रह्मचर्यादिभि ऋष्याघृणत्रयापाकरणप्रतीतेब्रह्मचर्यादिषु च त्रैवर्णिकस्याधि-कारात्कलचमसवत् । यथा सोमपाने स्थाने ब्राह्मणेतरयोः क्षत्रियवैश्ययोः फलचमसयोविहितत्वेनाधिकारस्तथात्राप्य स्त्वित्यर्थः । शाखांतरे - ' यजमानो वै ब्राह्मणः ' इत्यत्रापि त्रैर्वाणकानुप्रवेशाद्युज्यते तत्र त्रैवर्णिकपरत्वं, प्रकृते तु वाक्यशे-षाद्यभावान्न त्रैवर्णिकपरत्वम् ( वंशीधरी, भागवत ११.१८.४१ ) ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १७१ धिकारश्रवणात् युक्तं ऋणबोधकवचने ब्राह्मणशब्दस्य वर्णत्रयोपलक्षक-त्वम् । सन्यासे तु क्वचिदपि श्रुतौ राजन्यवैश्ययोरधिकाराश्रवणात् कथं ब्राह्मणपदं तदुपलक्षकं स्यात्? अन्यथा कुतो न ' राजा राजसूयेन यजेत ' इत्यत्रापि राजपदस्यापि ब्राह्मणवैश्ययोरुपलक्षकत्वं न स्यात् । ननु " राजधर्मेषु वर्णधर्मप्रस्तावे - ' तथा वैश्यस्य राजेन्द्र राज-पुत्रस्य चैव हि ' ( शान्तिपर्व ० ६२.१४ ) इति क्षत्रियवैश्ययोः सन्यासं प्रतिज्ञाय

कृतकृत्यो वयोऽतीतो राज्ञः कृतपरिश्रमः ।

वैश्यो गच्छेदनुज्ञातो नृपेणाश्रमसंश्रयम् ॥

इति वैश्यस्य सन्यासं विधाय -इत्यादिकमुक्त्वा ( शा ० पर्व ० ६३।१५ ) ( शान्तिपर्व ० ६३ | १६ ) ( शान्तिपर्व ० ६३।२१ ) ब्राह्मणशब्द को तीनों वर्णों का उपलक्षण मानना उचित है । सन्यास के विषय में तो कहीं भी श्रुति में क्षत्रिय तथा वैश्य का अधिकार श्रवण है नहीं; अतः ब्राह्मणपद तीनों वर्णों के सन्यास का उपलक्षक कैसे हो सकता है? क्षत्रिय तथा वैश्य का सन्यास के अधिकार का श्रुति में स्पष्ट कथन न होने पर भी ब्राह्मणशब्द को तीनों वर्णों के सन्यास का उपलक्षण मानने पर तो ' राजा राजसूय यज्ञ करे ' इस श्रुति-वाक्य में स्थित राजाशब्द को भी ब्राह्मणादि तीनों वर्णोंका उपलक्षण मानने की आपत्ति हो जायगी; ऐसा किसी प्रकार उचित नहीं! क्यों कि शास्त्र में राजाशब्द का केवल क्षत्रियजाति के राजा लिये ही प्रयोग स्वीकार किया है । " वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्राणि चानघ । " " अन्तकाले च सम्प्राप्ते य इच्छेदाश्रमान्तरम् । सोऽनुपूर्व्याश्रमान्राजन् गत्वा सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ”

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१७२ ] वेदार्थ पारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् इत्यनेन क्षत्रियस्य सन्यासं विदधाति स्म स एव भगवान् व्यासः " इति, तदपि यत्किञ्चित् । उक्त प्रघट्टके न कस्यापि सन्यास-विधानम् | क्षत्रियस्याश्रमान्तरपदेन वानप्रस्थाश्रमो युज्यते । ' क्षत्रधर्मो-न मुण्डनम् ' ( शान्ति ० २३.४७ ), ' मुखजानामयं धर्म: ' ( देवलदत्तात्रेय -वचनम् ), ' नान्यवर्णस्य कस्यचित् । ' ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो । वर्णास्तान्नानुवर्तन्ते त्रयो भारतसत्तम इति निषेधस्य बलवत्त्वात् । ( महा ० शान्ति ० ६२.२ )

१०३ बहिः सूत्रं त्यजेद्विप्रो योगविज्ञानतत्परः ।

ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स मुक्तिभाक् ॥

१०४ ( परब्रह्मोपनिषत् ५ )

०४ बहिरन्तश्चोपवीती विप्रः सन्यस्तुमर्हति ।

एकयज्ञोपवीती तु नैव सन्यस्तुमर्हति ॥

( परब्रह्मोपनिषत् १४ ) " राजधर्मों में वर्णधर्म के प्रसङ्ग में क्षत्रिय तथा वैश्यों के सन्यास की प्रतिज्ञा करके ' कृतकृत्यः ' इस श्लोक से वैश्य के सन्यास का विधान करने के पश्चात् ' अन्तकाले ' इस श्लोक से भगवान् व्यास जी क्षत्रिय के सन्यास का विधान करते हैं । अतः तीनों वर्णों का सन्यास सिद्ध होता है । " यह कथन भी सारहीन है । क्योंकि उक्त प्रसंग में किसी के भी लिये सन्यास का विधान नहीं । क्षत्रिय के लिये १०३. योगविज्ञान में तत्पर विप्र ( बाह्मण ) ब्राह्यसूत्र ( यज्ञोपवीत ) का त्याग करदे । ब्रह्मभावरूपसूत्र ( यज्ञोपवीत ) को जो ब्राह्मण धारण करता है, वह मुक्ति का भागी होता है । १०४. बाह्य तथा अन्तः उपवीती ब्राह्मण सन्यास का अधिकारी है । एक यज्ञोपवीतवाला सन्यास का अधिकारी नहीं है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

१०५ विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्सरक्तस्तु गृहे वसेत् ।

रागो नरकं याति प्रव्रजन्हि द्विजाधमः ॥

१० ६ यस्यैतानि सुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरं करः ।

सन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥

[ १७३ ( नारदपरि ० ३ १३, १४ )

१० " सन्यासिनं द्विजं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः ।

एष मे मण्डलं भित्त्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

( सन्यासोपनिषत् २।६ ) १०८ त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्ग विप्राणां मुक्तिसाधनम् । निर्वाणं सर्वधर्माणा मितिवेदानुशासनम् ॥ आश्रमान्तर का विधान किया है सो आश्रमान्तर पद से यहाँ वानप्रस्थ आश्रम का ग्रहण ही उचित है, न कि सन्यास का । क्योंकि ' क्षत्रिय का gust ( सन्यास ) धर्म नहीं ', ' लिंग सन्यास ब्राह्मण का धर्म है ', ' अन्य किसी वर्ण का नहीं, ' इत्यादिक निषेध वलवान् हैं, अतः यहाँ क्षत्रिय-वैश्य के सन्यास का विधान नहीं है । १०५. बुद्धिमान् विरक्त ब्राह्मण ही संन्यास ग्रहण करे, यदि रागवान् है तो गृह में ही रहे । रागयुक्त संन्यासलेनेवाला ब्राह्मणाधम निश्चित नरक को जाता है । १०६. जिस ब्राह्मण के जिह्वा, उपस्थ, उदर तथा कर भली प्रकार संयत हैं, वह ब्रह्मचर्यवान् जिसने विवाह नहीं किया है, ऐसा ब्राह्मण सन्यासग्रहण करे । १०७. सन्यासी ब्राह्मण को देखकर सूर्य भगवान् स्थान से हट जाते हैं । यह सन्यासी ब्राह्मण मेरे मण्डल का भेदन करके परब्रह्म को प्राप्त हो रहा है । १०८. विष्णु भगवान् का लिङ्ग ( चिह्न ) त्रिदण्ड ब्राह्मणों की मुक्ति का साघन है तथा सर्व धर्मो का निर्वाण - संन्यास है, ऐसा वेद उपदेश है ।

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१७४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

१० त्यक्त्वा विष्णोलिङ्गमन्तर्बहिर्वा यः स्वाश्रमं सेवते नाश्रमं वा ।

प्रत्यापत्तिं भजते वातिमूढो नैषां गतिः कल्पकोट्याऽपि दृष्टा ॥

( शाट्यायनीयोपनिषत् १०,२७ ) इत्यादि सन्यासविधायकवाक्येषु ब्राह्मणग्रहणस्य जागरूकत्वाच्च । ' ब्रह्मवेदस्तन्निष्ठस्तदध्ययनवान् ब्राह्मणः ' इति व्युत्पत्तौ ' ब्राह्मोऽजातो ' इति वचनमेव बाधकम् । अन्यथा राजपदस्यापि राज्यकर्तृत्वेन वैश्यब्राह्मणयोरपि सम्भवेन राजसूयादावपिसमेषामधि-कारापत्त ेः । तच्चानिष्टमेव, सनातनपारम्पर्य लोपप्रसङ्गात् । समाजि-मतप्रवेशापत्तेश्च । ' रूढिर्योगाद्वलीयसी ', ' रूढियोंग मपहरति ' इति न्यायस्य सर्वत्रैव बलीयस्त्वमेव । ' बहिः सूत्र ' इत्यादिक सन्यास का विधान करने वाले वाक्यों में ब्राह्मण का ग्रहण होने से क्षत्रिय तथा वैश्यको सन्यास का विधान नहीं है । यदि ब्राह्मणशब्द की ऐसी व्युत्पत्ति की जाय कि ' ब्रह्म नाम वेद का है वेद में निष्ठावान् अर्थात् वेद के अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण है ' तो इस व्युत्पत्ति के अनुसार वेद के अध्ययन करनेवाले तीनों बर्णं ही ब्राह्मण हैं; अतः ऐसे तीनों वर्णरूप ब्राह्मणों का सन्यास में अधिकार सिद्ध होता है । इस कथनका बाधक ' ब्राह्मोऽजातो ' यह वचन है । अतः तीन वर्णों का संन्यास सिद्ध नहीं होता । अन्यथा राजाशब्द को राज्य करनेवाले वैश्य तथा ब्राह्मण का वाचक मानलेने पर तो क्षत्रियोचित राजसूयादिक कर्मों में ब्राह्मण तथा वैश्य के अधिकार की आपत्ति हो जायगी । ऐसा मानना अनिष्ट ही है, क्योंकि इस प्रकार तो समस्त सनातनमर्यादा का ही लोप हो जायगा तथा समाजियों के मत में प्रवेश की भी आपत्ति हो जाएगी । योगवृत्ति से ब्राह्मणशब्द वेद के अध्ययनकर्ता का वाचक होता है तथा रूढिवृत्ति से ब्राह्मणजाति का १०६. विष्णुलिंग ( दण्डादि ) का - बाहर दण्डादिरूप अथवा अन्दर संयम और ज्ञानादिरूप का त्यागकर अपने आश्रम का सेवन करता है अथवा नहीं करता, पर जो अत्यन्तमूढ़ प्रत्यापत्ति को प्राप्त हो जाता है, भी नहीं देखी है । ऐसे पुरुषों की गति करोड़ों कल्प में

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १७५ न च रूढिवृत्त रगत्या रथकारन्यायेन यागादिविषय एव चारि-तार्थ्यमिति वाच्यम्, रूढ रन्यत्र योगवृत्त रेपि चरितार्थत्वाविशेषात् । रूढिप्रसंगे तु यौगिकार्थस्य विलम्बोपस्थितिकत्वेन समुदायार्थस्य शीघ्रोपस्थितिकत्वेन रूढ: सर्वत्रैव प्राबल्यात् । ११० यत्तु पंङ्गीरहस्यब्राह्मणे ऋषभादीन क्षत्रियवरानुदृिश्य ' यदि मृत्योः परं शान्तमनामयं शाश्वतं पदमिच्छुरसि तत्परमहंसो भव ' इति सन्यासविधायकं वचनमस्तीति तदपि न । वाचक है । रूढिवृत्ति, योगवृत्ति से बलवती होती है, ' रूढिवृत्ति, योग-वृत्ति का बाध कर देती है ' यह नियम सर्वत्र बलवान् है । अत: रूढिवृत्ति से ब्राह्मणशब्द ब्राह्मणजाति का ही वाचक है । ' रथकार इष्टि का अधिकारी रथ बनानेवाला किसी भी जाति का पुरुष है अथवा रथकार जाति वाला पुरुष? ' ऐसा प्रश्न होने पर उपर्युक्तनियम से रथकारशब्द को रथकार जातिवाले का वाचक माना है । क्योंकि वहाँ और कोई प्रकार संभव नहीं था; अतः यज्ञ के विषय में रूढ़िशक्ति की चरितार्थता हो जाने से यज्ञ में सावकाशरूढ़िवृत्ति से, यज्ञ से अन्यत्र सन्यास विधायकादिवाक्यों में निरवकाश योगवृत्ति बलवती होकर रूढि का बाध कर देगी; अतः सन्यासविधायक वाक्यों में प्रयुक्त ब्राह्मणशब्द का अर्थ योगवृत्ति से ही करना उचित है; योगवृत्ति से ब्राह्मणपद का अर्थ वेद का अध्ययन करनेवाला ही होगा । वेद के अध्ययन करनेवाले तीनों वर्ण हैं, तीनों ही वर्ण ब्राह्मणपद के वाच्य हो जायेंगे; अतः तीनों वर्णों को संन्यास का अधिकार है, यह सिद्ध होता है । " ऐसा कथन भी उचित नहीं; क्योंकि रूढ़ि के प्रयोगों से ११०. यावताकालेनावयवव्युत्पत्त्या लक्षणया वा ब्राह्मणशब्देन प्रत्यायेते ततः प्रागेव ' रूढिर्योगमपहरति ' इति न्यायाल्लब्धात्मिकाया रूढ़: प्राबल्यादनुपपत्त्यभावाच्च रूढ्या ब्राह्मणत्वमेव प्रत्याय्यते । अतः प्रथमप्रतीतब्राह्मणोद्देश्येन प्रव्रज्याविधेश्चरितार्थत्वान्न चरमप्रतीतयौगिकार्थस्वीकरण-मुचितम् ।

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१७६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् १११ तथात्वे सिद्धान्तलेशकृता तदुपस्थाप्येत । न चोपस्थापितं, तेन विप्रतिपन्नमेव तादृग्वचनम् । तथात्वे भाष्यकारोऽपि ब्राह्मण-सन्यासमेव कथं समर्थयेत् । सत्त्वेऽपि यथा ' सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहंत्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ” ( भगवद्गीता १८.६६ ) इत्युक्तिर्नार्जुनं प्रति, किन्तु तद्व्याजेनाधिकारिणं प्रत्येव तदुक्तेः अर्जुनं निमित्तीकृत्य यथाऽधिकारं तत्प्रतिपादनात् तथैव तदुपपत्त ेः । अतिरिक्त स्थलों में पाचक आदिक शब्दों के अर्थ करने के लिये योगवृत्ति की भी चरितार्थता समान ही है, भाव यह है कि पाचक आदि स्थलों में योगवृत्ति को सावकाश होने से अन्यत्र स्थलों में निरवकाश रूढ़ि ही बलवती सिद्ध होगी । रूढ़ि से अर्थ करने पर ब्राह्मणशब्द जाति का ही वाचक होगा, अत: ब्राह्मण जातिवाले पुरुष का ही सन्यास में अधिकार सिद्ध होता है । वस्तुत: जहाँ रूढ़ि की भी प्राप्ति होती है वहाँ सर्वत्र यौगिक अर्थ की विलम्ब से उपस्थिति होती है, रूढ़ अर्थ ( समुदाय | र्थ ) की शीघ्र उपस्थिति हो जाती है; अतः रूढ़ि ही बलवती होती है । ब्राह्मणशब्द से ब्राह्मण जाति की शीघ्र उपस्थिति होने से जातितः ब्राह्मण ही सन्यास का अधिकारी सिद्ध होता है । " पैङ्गिरहस्य ब्राह्मण में ऋषभ आदिक क्षत्रिय श्रेष्ठों को उद्देश्य बनाकर ' यदि मृत्यु के पार, शान्त, सर्वरोगों से मुक्त, सदा रहने वाले पद के इच्छुक हो तो परमहंस हो जाओ ' यह सन्यासविधायक वचन है । " यह भी कथन संभव नहीं ' पैङ्गी रहस्य ब्राह्मण में इस वचन के विद्यमान होने पर तो सिद्धान्तलेश के कर्ता इस वचन को अवश्य उपस्थापित करते, उपस्थापित नहीं किया है; अतः यह वचन विवादग्रस्त है । इस वचन के विद्यमान रहने पर तो भाष्यकार भी १११. अनंदं चिन्त्यं किं जडभरतं ( भरतं ) प्रत्ययमुपदेश उत लक्षणया क्षत्रियमात्रं प्रति । आद्ये भरतस्यैव नेतरक्षत्रियप्राप्तिः । किंच भरतोऽपि प्रेषोच्चारणपूर्वकमाश्रमं गृहीतवानिति न क्वापि श्रूयते । अत: ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ( बृह ० ४.४.२२ ) इत्यनुरोधात् ' परमहंसो भव ' इत्यस्यायमर्थः - ' परमहंसो भव निर्ममो भव । '

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १७७ यदपि शिष्टशिरोमणि ऋषभजडभरतनिदाघरैवतपृथुसुशील देवरातिजनकप्रभृतिभिः राजभिस्तदभिमानत्यागात्मके पञ्चमाश्रमे प्रवृत्तिरिति तदपि यत्किञ्चित्; तेषां ब्रह्मनिष्ठावैशेष्यमेव विज्ञायते । न तत्राश्रमरूपः सन्यासः, तादृशानां विधिनिषेधातीतत्वात् । ब्राह्मण के सन्यास का ही समर्थन कैसे करते? ऐसे वचन के होने पर भी " सर्वधर्मो का परित्याग कर एक मेरी शरण में प्राप्त होवो । मैं द्वितीयः अत्र हि लक्षणा, सा च न युक्ता ' न विधौ लक्षणा ' इति भट्टगुरुप्रभृतिभिर्विधौ लक्षणानिषेधात् । किञ्च लक्षणावदन्वादी प्रष्टव्यः किं विशिष्टविधिरुत् प्राप्ते कर्मण्यधिकारविधिरिति? पक्षद्वयेऽपि लक्षणा, दुर्वारा । ननुद्द श्ये लक्षणा न विध्यंशेऽतो न दोष इति चेत्त-ह्युश्येपि न युक्तेति ब्रूमः । तथा हि - सम्बन्धानुपपत्तिभ्यां हि लक्षणा, न चानुपपत्तिः पूर्वोक्तरीत्या वाक्यस्यार्थांत रपरत्वेनाप्युपपत्तेः । या च जाबालश्रुतिर्जनकयाज्ञवल्क्यसंवादे तत्र परमहंस इति अहन्ता-ममतयोरभावात्परमहंसा इति व्यपदिश्यन्त इति । ध्यान रहे, ' भिक्षुकोपनिषत् ' में जहाँ गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ प्रभृति को कुटीचक माना गया है, वहाँ काषाय और दण्डादिग्रहण का उल्लेख नहीं है, साथ ही ये सब ब्राह्मण ही मान्य हैं - ' कुटीचका नाम गौतमभरद्वाजयाज्ञवल्क्यवसिष्ठप्रभृतयः '; इसी प्रकार संवर्तक, अरुणि, श्वेतकेतु, जडभरत, दत्तात्रेय, शुक, वामदेव, हारीतक प्रभृति ब्राह्मणप्रवरों को ही परमहंस कहा गया है— " अथ परमहंसा नाम संवर्तकारुणिश्वेतकेतुजडभरतदत्तात्रेयशुक-वामदेवहारीतकप्रभृतयः । " “ तत्र परमहंसानाम संवर्तकारुणिश्वेतकेतुदुर्वासऋभु निदाघजड-भरतदत्तात्रेयरैवतकप्रभृतयः " ( जाबालोपनिषत् ६ ) जहाँ कहीं कूर्म पुराणादि की शैली में राजा सुशीलादि के संन्यास का वर्णन है, वह आश्रम संन्यास का द्योतक न होकर दीक्षा विशेष का ही द्योतक है । ' आत्याश्रम इति ख्यातं ब्रह्मादिभिरनुष्ठितम् ' ( कौमें १२ ) इस वचन में प्रयुक्त ब्रह्मादि द्वारा अत्याश्रम का अनुष्ठान औपचारिक ही है ।