वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 211–220

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 211–220

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१७८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यदुक्तम्

" न जातिर्नकुलं राजन् न स्वाध्यायः श्रुतं न च ।

कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव हि कारणम् ॥

किं कुलं वृत्तहीनस्य करिष्यति दुरात्मनः । ” इत्यादिभिस्तु वृत्तस्य प्रशंसैव विवक्षिता । न च तत्र ब्राह्मणा-दिजात्यपलापः । न हि वृत्त ब्राह्मणेतराणामेव भवति, न ब्राह्मणाना-मिति नियमः ।

" कपालस्थं यथा तोयं वहतौ च यथा पयः ।

दूष्यं स्यात्स्थान दोषेण वृत्तहीनं तथा श्रुतम् ॥

चतुर्वेदोऽपि दुर्वृत्तः शूद्रादल्पतरः स्मृतः । " इत्याद्यपि वृत्तप्रशंसा परमेव । शास्त्रादि सिद्धाया जातेरपलापा-संभवात् । यत्त, तत्त्वज्ञानानन्तरं ' श्रीशंकराचार्यदृष्ट्या सन्यासोऽनिवार्य ः ' इति तदपि यत्किञ्चित् । ब्रह्मनिष्ठालक्षणस्य सन्यासस्यैवानिवार्थ-त्वात् । तदर्थमेव निम्नोक्तानि तदीयानि वचनानि -तुमको सर्व पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो । ” जैसे यह भगवान् का वाक्य अर्जुन के लिये नहीं है; किन्तु अर्जुन के बहाने से इस साधना के अधिकारी के लिये ही यह वचन है । क्योंकि अर्जुन को निमित्त बनाकर अधिकार के अनुसार ही शरण का प्रतिपादन है; वैसे ही समाधान कर लेना चाहिये । जो यह कहा जाता है कि - " शिष्ट शिरोमणि ऋषभ, जड़भरत, निदाघ, रैवत, पृथु, सुशील, देवराति तथा जनक आदिक राजाओं ने सर्वकर्तृत्वादि के अभिमान का त्यागरूप पंचमाश्रम में प्रवृत्ति की है " यह भी कुछ नहीं । क्योंकि उनकी ब्रह्मनिष्ठा का ' बोधन किया गया है, आश्रमरूप सन्यास वहाँ नहीं कहा है । क्योंकि ऐसे ब्रह्मनिष्ठ पुरुष तो विधि - निषेध से परे होते हैं । यह जो कहा कि - " हे राजन् जाति, कुल, स्वाध्याय तथा शास्त्रों का श्रवण, ये ब्राह्मणत्व के कारण नहीं हैं; किन्तु सदाचरण ही ब्राह्मणत्व का कारण है । आचरणहीन दुरात्मा का कुल क्या करेगा? " इत्यादि वचनों से तो सदाचार की प्रशंसा ही कहने को इष्ट है । उक्त वाक्यों में ब्राह्मणादि जातियों का अपलाप ( निराकरण ) नहीं है । यह

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वेदार्थपारिजात ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १७६ ' यदि ते जनकादयः प्राप्तसम्यग्दर्शनास्ततो लोकसंग्रहार्थं प्रारब्ध-कर्मत्वात् कर्मणा सहैवासन्यस्यैव संसिद्धिमास्थिता इत्यर्थः । अथाप्राप्तसम्यग्दर्शना जनकादयस्तदा कर्मणा सत्त्वशुद्धिसाधनभूतेन क्रमेण संसिद्धिमास्थिता इति व्याख्येयः श्लोकः । अथ मन्यसे पूर्वैरपि जनकादिभिरप्यजानद्भिरेव कर्तव्यं कर्म कृतं तावता नावश्यमन्येन कर्तव्यं सम्यग्दर्शनवता कृतार्थेनेति, तथापि प्रारब्धकर्मायत्तस्त्वं लोक-संग्रहमेवापि लोकस्योन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणं लोकसंग्रहस्तमेवापि प्रयोजनं सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि । ( भगवद्गीता ३.२० ) " लोकसङग्रहः किमर्थं कर्तव्य इत्युच्यते " " यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

उत्सीयेयुरिमेलोका न कुर्यां कर्म चेदहम्! संकरस्य च कर्तास्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः || ” ( भगवद्गीता ३।२१-२४ ) नियम भी नहीं है कि ' ब्राह्मण से अतिरिक्त वर्णों में तो सदाचार रहता है, ब्राह्मणों में नहीं रहता । ', मनुष्य के कपाल में स्थित जल तथा कुत्ते की खाल के पात्र में स्थित दुग्ध, स्थान के दोष से त्याज्य है तथा आचरण से हीन सत् - शास्त्र का श्रवण भी ग्राह्य नहीं होता, इसी प्रकार चार वेदों का ज्ञाता यदि दुराचारीहै, तो वह शूद्र से भी निकृष्ट है, इन कथनों का तात्पर्य भी सदाचार की प्रशंसा में है । जाति के अपलाप में तात्पर्य नहीं है । क्योंकि शास्त्र से सिद्ध जाति का शास्त्र के द्वारा अपलाप संभव नहीं है । जो यह कहा कि ' तत्त्वज्ञान के अनन्तर श्रीशंकराचार्य जी की दृष्टि से सन्यास अनिवार्य है ', अर्थात् तत्त्वज्ञान के अनन्तर जब संन्यास अनिवार्य है तो तत्त्वज्ञान तो सर्व वर्णों को ही संभव है, तब तो सर्ववर्णों का ही सन्यास सिद्ध होता है, ' वर्णत्रय का होता है इसका तो कहना

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१८० ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यदि पुनरहमिव त्वं कृतार्थबुद्धिरात्मविदन्यो वा तस्याप्यात्मनः कर्तव्याभावेऽपि परानुग्रह एव कर्तव्य इत्याह--" सक्ताः कर्माण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वाँस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षु र्लोकसंग्रहम् ॥ ” ( भगवद्गीता ३.२५ ) एवं लोकसंग्रहं चिकीर्षोर्न ममात्मविदः कर्तव्यमस्त्यन्यस्य वा लोकसंग्रहं मुक्ता । ततस्तस्यात्मविद इत्युपदिश्यते ही क्या? यह भी कथन उचित नहीं । क्योंकि शंकराचार्यजी तत्त्वज्ञान के पश्चात् जिस सन्यास की अनिवार्यता कह रहे हैं, वह ज्ञाननिष्ठारूप सन्यास है, न कि आश्रमरूप । उस ज्ञाननिष्ठारूप सन्यास के ही विषय शंकराचार्य जी के ये वचन भी हैं - यदि जनकादिक सम्यक्ज्ञानी थे तब तो प्रारब्ध कर्म शेष रहने से लोकसंग्रह लिये ही कर्म के साथ अर्थात् विना सन्यास लिये ही संसिद्धि ( ज्ञाननिष्ठा ) को प्राप्त हुए । ' कर्मणैव हि संसिद्धमास्थिताः जनकादयः ' इस गीताश्लोक का यह अर्थ है - यदि ऐसा अर्थ मानते हो कि " तत्त्वज्ञान को प्राप्त किये विना ही पूर्वज जनकादिकों ने कर्म किया है, तब तो यह आवश्यक नहीं, कि अन्य कृतार्थ यथार्थ ज्ञानी के द्वारा कर्म करना ही है । " फिर भी तुम प्रारब्धकर्म के आधीन हो, अतः लोकसंग्रहरूप प्रयोजन को देखते हुए कर्म करो | शास्त्रविहित मार्ग को त्यागकर स्वतन्त्र प्रवृत्ति के निवारण को लोकसंग्रह कहते हैं । लोकसंग्रह किसलिये करना चाहिये? इसका उत्तर कहा जाता है कि - " श्रेष्ठपुरुष राजादि जिस शुभ अथवा अशुभ कर्म को करता है, उसीको अन्य साधारण उनका अनुगामी पुरुष भी करता है । वह श्रेष्ठ पुरुष जिसको प्रमाण मानता है, लोक भी उसी को प्रमाण माता है । भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि " यदि मैं कर्म न करूँ तो ये लोक भी नष्ट हो जायेंगे । मैं ही वर्णसंकर का कर्ता हो जाऊँगा, इस प्रकार धर्म के लोप के द्वारा मैं ही इन प्रजाओं का नाश करनेवाला सिद्ध हो जाऊँगा । "

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १८१ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः

कर्मसङ्गिनाम् ।

समाचरन् ॥

( भगवद्गीता ३.२६ ) भोक्तव्यं चास्य कर्मणः बुद्धिर्भेदो बुद्धिभेदो मयेदं कर्तव्यं फलमिति निश्चितरूपाया बुद्धेर्भेदनं चालनं बुद्धिभेदस्तं न जनयेत्रो -त्पादयेदज्ञानामविवेकिनां कर्मसंगिनां कर्मण्यासक्तानामासंगवतान् । किन्तु कुर्यात् जोषयेत् कारयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् स्वयं तदेवाविदुषां कर्म युक्तोऽभियुक्तः समाचरन् । येषां तु कर्मणां कर्तारं मां मन्यसे परमार्थतस्तेषामकर्तेवाहम्, यतः ' न मां कर्माणि लिम्पन्ति ' ( भगवद्गीता ४.१४ ), ' नाहं कर्ता, न मे कर्मफले स्पृहेति । ', एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरप्यतिक्रान्तैर्मुमुक्षुभिः ( भगवद्गीता ४.१५ ) कुरु तेन कर्मैव त्वं न तूष्णीमासनं नापि सन्यासः यदि मेरे समान तुम तथा अन्य भी कोई आत्मतत्त्ववेत्ता हो तो, उसको अपने लिये कर्तव्य का अभाव होने पर भी दूसरे के ऊपर तो अनुग्रह करना ही चाहिए । ऐसा ही भगवान् कहते हैंकि “ अविद्वान् पुरुष कर्म के फल में आसक्त पुरुष जैसे लगन से कार्य करता है, लोक-संग्रह के करने की इच्छावाला फल क़ी आसक्ति से रहित विद्वान् ( ज्ञानी ) पुरुष भी उसी प्रकार लगन से कार्य करें । ” लोकसंग्रह के इच्छुक मुझ को अथवा मुझ से अन्य आत्मवेत्ता पुरुष को लोकसंग्रह के विना और कोई कर्तव्य नहीं है । इसलिये आत्मवेत्ता को लोकसंग्रह का उपदेश दिया गया है । " कर्म में आसक्त अज्ञानी पुरुषों की बुद्धि को अकर्ता आत्मा के उपदेश से विचलित न करे. किन्तु विद्वान् पुरुष संलग्न हुआ स्वयं कर्म करता हुआ अविद्वानों के लिये सर्व कर्म करे तथा करावे । " अर्जुन! कर्मों का तुम मुझे कर्ता मानते हो वास्तव से मैं उनका अकर्ता ही हूँ । क्योंकि " कर्म मुझे लेप प्रदान करके मुझे बन्धन में नहीं डालते हैं । नहीं करते, अर्थात् देह इसलिये न मैं कर्मों का कर्ता हूँ, न मुझे कर्म के फल की इच्छा ही है । ' अकर्ता आत्मा को कर्म

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१८२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कर्तव्यस्तस्मात् पूर्वैरप्यनुष्ठितत्वाद् यद्यनात्मज्ञस्त्वं तदा आत्मशुद्धय-र्थम्, तत्त्वविच्चेल्लोकसंग्रहार्थम्, पूर्वेर्जनकादिभिः पूर्वतरं कृतं नाधुना-तनं कृतं निर्वर्तितम् ( ४.१५ ) । यस्त्वकर्मादिदर्शी सोऽकर्मादिदर्शनादेव निष्कर्मा सन्यासी जीवनमात्रार्थचेष्टः सन् कर्मणि न प्रवर्तते, यद्यपि प्राग्विवेकतः प्रवृत्तः । यस्तु प्रारब्धकर्मा सन्नुत्तरकालमुत्पन्नात्मसम्यग्दर्शनः स्यात् स कर्मणि प्रयोजनमपश्यन् ससाधनं कर्म परित्यजत्येव । स कुतश्चिन्निमि-त्तात्कर्मपरित्यागासंभवेऽपि सति कर्मणि तत्फले च संगरहिततया स्वप्र-योजनाभावाल्लोकसंग्रहार्थं पूर्ववत् कर्मणि प्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चि-त्करोति ', ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात्तदीयं कर्माकमव सम्पद्यते, इत्येतमर्थं दर्शयिष्यन्नाह - ' त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् ' ( ४.२० ) विदुषा क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्मैव, तस्य निष्क्रियात्म-का लेप नहीं होता है ', ऐसा जानकर भूतकालीन मुमुक्षुओं ने कर्म किया है, इसलिये ही तुम भी कर्म करो, चुप न बैठो, न सन्यास ही करो; क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने भी कर्म ही किया है । " ( भगवद्गीता ४-१५ ) यदि तुम अनात्मज्ञ हो तो अन्तःकरण की शुद्धि के लिये कर्म करो । तत्त्ववेत्ता हो तो लोकसंग्रह के लिये करो । क्योंकि पूर्वकालिक जनकादिक मान्यपुरुषों ने भी पूर्वकाल में कर्म किये हैं । जो आत्मा को कर्मरहित प्रत्यक्ष अनुभव करता है, वह पुरुष तो आत्मा में कर्म अनुभव नहीं करता । ऐसा अकर्ता आत्मा का ज्ञाता तो आत्मा में अकर्म दर्शन करने से ही कर्मरहित सन्यासी होता है । उसकी तो जीवनमात्र के लिये ही चेष्टा होती है । ऐसा हुआ ही कर्म में जीवनयात्रा के लिये प्रवृत्त होता है । भले ही वह ज्ञान से पूर्व तो कर्म में वस्तुतः प्रवृत्त होता था; परन्तु ज्ञान होने के पश्चात् वस्तुतः कर्म में प्रवृत्त नहीं होता । जिसने कर्मों का प्रारम्भ किया है, पश्चात् यथार्थ ज्ञान जिसको उत्पन्न हो गया है, वह सर्व कर्मों में कोई प्रयोजन न देखता हुआ साधन के सहित कर्म को त्याग ही देता है । वह ब्रह्मवेत्ता किसी प्रारब्धादि निमित्त से कर्म के त्याग क -

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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १८३ दर्शनसम्पन्नत्वात् । तेनैवंभूतेनस्वप्रयोजनाभावात् ससाधनं कर्मपरित्यक्त-व्यमेवेति प्राप्ते सति ततो निर्गमासंभवाल्लोकसंग्रहचिकीर्षया शिष्ट विग-णापरिजिहीर्षया वा पूर्ववत् कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि निष्क्रियात्मदर्शन-सम्पन्नत्वान्नैव किञ्चित्करोति सः । ' सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ' ( ५/७ ) सर्वेषां ब्रह्मा-दीनां स्तम्बपर्यन्तानां भूतानामात्मभूत आत्मा प्रत्यक्चेतनो यस्य स सर्वभूतात्मभूतात्मा सम्यग्दर्शोत्यर्थः । स तत्रैवं वर्तमानो लोकसंग्रहाय कर्म कुर्वन्नपि न लिप्यते न कर्मभिर्बध्यत इत्यर्थः ( ५.७ ) । तथा च ' यस्य नाहं कृतो भाव: ' ( १८.१७ ) देहाद्यात्मबुद्धया हन्ताहमिति लौकिक दृष्टिमाश्रित्य ' हत्वापी ' त्याह, पारमाथिकों दृष्टिमाश्रित्य ' न हन्ति न निबध्यते ' इति । असंभव होने पर भी कर्म में कर्तृत्वाभिमान से शून्य तथा कर्म के फल की इच्छा से शून्य होने से अपना कोई प्रयोजन नहीं, फिर लोकसंग्रह के लिये अज्ञानदशा के समान कर्म में प्रवृत्त हुआ भी " मैं कुछ नहीं करता हूँ ' इस ज्ञानाग्नि से कर्मों को दग्ध हो जाने से उस का कर्म अकर्म ही हो जाता है । इस अर्थ को दिखलाने की इच्छा से भगवान् कहते हैं कि - ' वह ब्रह्मवेत्ता कर्म के फल की आसक्ति को त्यागकर कर्म में प्रवृत्त होता भी कुछ नहीं करता ' ( भगवद्गीता ४. २० ) । विद्वान् के द्वारा किया हुआ कर्म वास्तव से अकर्म ही है । क्योंकि ज्ञानीपुरुष तो निष्क्रिय ( कर्म से सदा असंग ) आत्मा के दर्शन से युक्त रहता है । ऐसे निष्क्रिय आत्मदर्शी के द्वारा तो कर्म त्याग ही देने योग्य है, क्योंकि उसको कर्मसे कोई प्रयोजन नहीं है, अतः कर्म - त्याग प्राप्त होने पर भी, किसी निमित्त से गृहस्थादि आश्रम से निकलना असंभव होने से लोकसंग्रह की इच्छा अथवा शिष्ट पुरुषों से प्राप्त निन्दा के परित्याग की इच्छा से कर्म में प्रवृत्त भी ज्ञानी पुरुष, निष्क्रिय आत्मदर्शी होने से कुछ नहीं करता । अत एव भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि- ' ब्रह्मा से लेकर क्षुद्र चींटीपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों का आत्मारूप ही जिसका आत्मा है । ऐसा विद्वान् सर्वभूतात्मभूत अर्थात् सम्यक्दर्शी कहलाता है । वह

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१८४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ननु भाष्यकार वार्तिककारयोविषयाभेदेन सन्यास तदभाव-प्रतिपादन एव विरोधोद्भावनादि सङ्गच्छते, नान्यथा । प्रकृते च बृ ० १.४.१५,३.५.१ इत्यत्र भाष्यकारैः सन्यासे ब्राह्मणस्यैवाधिकार उक्तः । उभयत्र वार्तिककारैर्भाष्यकारमतं श्रुतिविरुद्धमुक्त्वा खण्डितम् । ' पारि-व्राज्यदर्शनाच्च ' ( १.४.१५ ) ' ब्राह्मणानाम् एवाधिकारो व्युत्थाने ' ( बृ ० ३.५.१ ) इत्यस्य भाष्यस्य त्रयाणामपि वर्णानां श्रुतौ सन्यासदर्शनात् । ब्राह्मणस्यैव सन्यास इति श्रुत्या विरुद्धयते ॥ '

१११ उपलक्षणं वा तदुग्राह्यं ब्राह्मणग्रहणं श्रुतौ ।

ब्राह्मणस्य प्रधानत्वाद्युक्तं तदुपलक्षणम् ॥

( बृ ० वार्ति ० १.४. १६५१, १६५३ ) ' न हि क्षत्रियवैश्ययोः पारिव्राज्यप्रतिपत्तिरस्ति ' ( बृ ० भा ० ४.५.१५ ) इत्यपि वार्तिककारैः खण्डितम् । लोकसंग्रह के लिये कर्म करता हुआ भी कर्मों से बन्धन को प्राप्त नहीं होता । " अत एव भगवान् कहते हैं कि कर्तृत्वाभिमान से रहित तथा कर्मफल की आसक्ति से शून्य पुरुष तीनों लोकों का हनन करके भी न हनन करता है, न उससे बन्धन को प्राप्त होता है ( गी ० १८.१७ ) । ११२. क्षत्रियस्य ब्राह्मणत्वलाभः राजसूये आसन्दीस्थो राजा अध्वर्यु -माह - ब्रह्माहम् इति । अध्वर्युश्च राजानमाह - त्वं राजन् ब्रह्मासि इति । एवं वैश्यस्तोमे संवादं उदाहार्यः । तेन क्षत्रिय-वैश्ययोः ब्राह्मणत्वलाभः अग्निब्राह्मणायत्तः न जन्मतः अतो ब्राह्मणस्यैव जन्मतो ब्राह्मणत्वलाभात् प्राधान्यमित्यर्थः । न च तर्हि शुद्रस्यापि ब्राह्मणग्रहणेनोपलक्षणात्क्षत्रिया-देरिव शूद्रस्य पारिव्राज्यं स्यादिति युक्त, तस्य ' सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्र ं त्यजेदिति ( नारदपरि ० ३.७७ ) शिखात्याग-पूर्वकोपवीतत्यागानधिकारित्वादादावेवासतः शिखादेस्त्यागा-योगात् । अपशूद्राधिकरणे च वेदद्वारा विद्याधिकारं तस्य निरस्यद्भिर्वैदिकसंन्यासेऽपि तदधिकारनिरासदर्शनादिति द्रष्टव्यम् ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् १ १ ३ त्रयाणामविशेषेण सन्यासः श्रूयते श्रुतौ । यदोपलक्षणार्थं स्याद् ब्राह्मणग्रहणं तदा । [ १८५ ( बृ ० वार्तिक ३२५ ८६ )

११४ कर्माधिकारविच्छेदि ज्ञानं चेदभ्युपेयते ।

कुतोऽधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते बलात् ॥

( ३० )

११ ५ प्रत्यग्याथात्म्य विज्ञानस्वभावश्चेत्समर्थ्यते ।

व्युत्थानं यस्य यस्य स्यात्स स व्युत्थानमर्हति ॥

( ३।५।१ ) शङ्का — भाष्यकार तथा वार्तिककार का एक जैसे सन्यास के विधान तथा उसके अभाव के प्रतिपादन में ही विरोध का प्रदर्शन करना संभव हो सकता है । भिन्न प्रकार के संन्यास में तो ऐसा संभव नहीं है । ( बृ ० उ ० १ । ४ । १५ तथा ३. ५. १ ) भाष्य में भाष्यकार ने संन्यास ब्राह्मण का ही अधिकार कहा है । इन बृहदारण्यक के दोनों स्थलों में वार्तिकार ने भाष्यकार के मत का खण्डन किया है । ( बृहदा ० १.४. १५ ) के ' ब्राह्मण काही सन्यास देखा जाने से ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार है ' इस भाष्य का भी ' तीनों वर्णों का श्रुति में सन्यास देखा जाता है । अत: ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार है, यह भाष्य-वाक्य श्रुतिविरुद्ध है । ' कहकर तथा ' क्षत्रिय तथा वैश्य के सन्यास की श्रुति से प्राप्ति नहीं है ' इस बृ ० ४।५ । १५ के भाष्यवाक्य का भी वार्तिक-कार ने यह कहकर कि ' तीनों वर्णों का समान रूप से सन्यास श्रुति में सुना है ' खण्डन किया है । ११३. तीनों वर्णों का समान रूप से सन्यास श्रुति में सुना जाता है, तब श्रुति में ब्राह्मण का ग्रहण तीनों वर्णों के उपलक्षण के लिये है । ११४. जब कर्मों के अधिकार की समाप्ति करने वाला ज्ञान को स्वीकार किया जाता है, तब जबरन अधिकार का नियम क्यों किया जाता है? ११५ ' यदि प्रत्यग् आत्मा के यथार्थ ज्ञान का स्वभाव ही सन्यास है '

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१८६ ] ११६ वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

६ एवं चेद्ब्राह्मणोक्तिः स्याद्ध्वस्ताविद्यगृहीतये ।

' स ब्राह्मण ' इति स्पष्टं श्रुतिरन्ते च वक्ष्यति ॥

( ZILIER ) एतेन स्पष्टमेव भाष्यरीत्या यद्यपि ब्राह्मणस्यैव सन्यासाधिकारस्त-थापि वार्तिककाररीत्या श्रुतौ त्रयाणामपि वर्णानां सन्यासश्रवणात् ' ब्राह्मणस्यैवाधिकारः ' इति कथनं श्रुतिविरुद्धमेवेति चेन्न, त्रयाणामपि वर्णानां सन्यास विधायक श्रुतेरद्याप्यदर्शनात् । तु ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा । यद-हरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ' ( जाबालोपनिषत् ४, नारद परि ० उ ० ३।७७ ) इति श्रुतेस्त्रयाणामपि वर्णानां सन्यास विधायकत्वं केनचिदुक्तम्, तत्त्व-ति तुच्छम् श्रुतौ क्षत्रियवैश्ययोर्नामाश्रवणात् । यत्तु ' वेदे त्रयाणां वर्णानामधिकाराद्वदर्वाणत सन्यासे सुतरां पूर्वोक्त सन्दर्भ से भाष्य की रीति से स्पष्टरूप से ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार है, तथापि वार्तिककार की रीति से श्रुति में तीनों वर्णों के सन्यास का श्रवण होने से ' ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार है ' यह कथन श्रुति से विरुद्ध ही है । समाधान- तीनों वर्णों के सन्यास की विधायक श्रुति का अब तक दर्शन न होने से केवल ब्राह्मण का ही सन्यास में अधिकार है, यह कथन श्रुति से विरुद्ध नहीं है । ' यदि वेतरथा ' इत्यादिक सामान्यश्रुतियों को जो सन्यास की विधायक किसी ने कहा है, वह भी उचित नहीं, क्योंकि किसी श्रुति में क्षत्रिय तथा वैश्य का नाम ही श्रवण नहीं है । ऐसा समर्थन किया जाता है, तब तो जिस - जिसको ज्ञान प्राप्त-हो जाय वह, वह सन्यास का योग्य है । ११६. ऐसा यदि स्वीकार किया जाता है तो अविद्या नष्टवाले तत्त्व-वेत्ता के ग्रहण करने के लिये ही श्रुति में ब्राह्मण शब्द है । श्रुति अन्त में विद्वान् के लिये कहती भी है ' कि वह ब्राह्मण है । ' ( ३. ५. १ बृह ० ) ।

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वेदार्थ पारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १८७ त्रयाणामपि वर्णानामधिकारः ' इत्युच्यते, तदपि यत्किञ्चित् । तथात्वे, राजसूयेऽपि ब्राह्मणवैश्ययोरधिकारप्रसक्तः । ' तत्र क्षत्रियवाचक राज-पदशान्न तत्र ब्राह्मण वैश्ययोरधिकारः ' इत्युच्यते चेर्त्तार्ह प्रकृतेऽपि सन्यासविधायकेषु ब्राह्मणग्रहणात्तत्रापि न क्षत्रियवैश्ययोरधिकार इति समं समाधानम् । विशेषानुसारेणैव सामान्यस्य नयनं युक्तं, न सामा-न्यानुगुण्येन विशेषस्य नयनम् । ' कथमयज्ञोपवीती ब्राह्मण: ' ( नारद परि ० ३.७७ ) इति प्रसङ्ग ेन तत्रापि ब्राह्मणस्यैव ' यदहरेव विरजेत् ' इत्याद्य ुक्तिरित्यप्युक्तमेव । अत एव ' पुरोडाशं चतुर्धा करोतीति सामान्यस्य ' आग्नेयं चतुर्धा करोति ' इत्यनेनैकवाक्यतयैव शाब्दबोधो जायते । यत्तु शङ्कराचार्याणां रीत्या तत्र भाष्येण प्रत्यग्याथात्म्यज्ञानवतो वर्णाश्रमाभिमानाभावात् कर्मस्वनधिकारत्वाद्व्युत्थानं स्वभावप्राप्त इति तदपि यत्किञ्चित् । स्वाभाविक व्युत्थानस्य स्वाभाविकत्वादेव विहितचतुर्थाश्रमसन्यासभिन्नत्वम् । गीताभाष्यादिषु ज्ञानिनामपि लोक-संग्रहार्थं कर्मादरसमर्थनात्, ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः जो यह कहा गया है कि - ' वेद में तीनों वर्णों का अधिकार है, इसलिये वेदविहित सन्यास में भी तीनों वर्णों का अधिकार होना ' चाहिए ' ऐसा मानने पर तो राजसूययज्ञ में भी ब्राह्मण तथा वैश्य के अधिकार का प्रसंग हो जायगा । यदि कहा जाय कि ' राजसूय के विधायक वाक्य में क्षत्रियवाचक राजपद है, उसके बल से राजसूययज्ञ में ब्राह्मण तथा वैश्व का अधिकार नहीं है ', तो प्रकृत में भी सन्यास-विधायकवाक्यों में ब्राह्मणपद का ग्रहण होने से सन्यास में भी क्षत्रिय, वैश्य का अधिकार नहीं । यह समाधान समान ही है । विशेष के अनुसार ही सामान्यवाक्य की गति उचित है, न कि सामान्य के अनुसार विशेष को । " अयज्ञोपवीती सन्यासी ब्राह्मण कैसे? " इस प्रसंग से सामान्य वाक्यों के स्थलों भी ' यदहरेव विरजेत् ' यह कथन भी ब्राह्मण ' के सन्यास का ही है, यह पूर्व में कह दिया है । विशेष के अनुसार सामान्य होता है, इसलिए ही ' पुरोडाश को चतुर्धा करे, ' इस सामान्य का ' आग्नेय पुरोडाश को चतुर्धा करे ' इस विशेषवाक्य के अनुसार