वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 31–40
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 31–40
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ३० प्रस्तुत ' करनेवाले के रूप में जिन - जिन महानुभावों ने अपनी अहैतुकी कृपा से इस कार्य को सम्पन्न किया है, वे सभी हमारे परम सम्मान-नीय पूज्य आचार्य विद्वन्मूर्धन्य आत्मीय हैं । इन सभी के चरणों में धन्यवाद और अभिनन्दन के स्वरूप नत मस्तक होकर हम सदा ही कृपा की आशा रखते हैं । जिनके चरणों धन्यवाद प्रस्तुत करते हैं वे हैं— ( १ ) अनन्त श्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर श्रीस्वामी निरञ्जनदेवतीर्थ जी महाराज ( पुरी ) ( २ ) विरक्त शिरोमणि पूज्य परमहंस श्रीस्वामी वामदेव जी महाराज ( वृन्दावन ) ( ३ ) श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ( वृन्दाबन ) ( ४ ) श्री पं. राजवंशी द्विवेदी जी महाराज ( वृन्दावन ) ( ५ ) श्री पं ० मार्कण्डेय जी ब्रह्मचारी ( वाराणसी ) ( ६ ) श्री पं ० सच्चिदानन्द द्विवेदी जी ( वृन्दावन ) ( ७ ) श्री डा ० गिरीश शर्मा जी ( वाराणसी ) श्री हरिनाम प्रेस के सुयोग्य विद्वान् प्रबन्धक तथा सहृदय कर्मचारियों के स्नेहपूर्ण सौजन्य भरे मुद्रणादि कार्य के सहयोग सम्पादन को स्मरण कर इन्हें बहुत - बहुत धन्यवाद देते हैं । निवेदक-हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान |
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श्रीहरिः वाजसनेयि- माध्यन्दिन - शुक्ल यजुर्वेदसंहिता चत्वारिंशोऽध्यायः ईशावास्योपनिषत् विषयानुक्रमणिका * भूमिका..... पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य अनन्त श्रीविभूषित श्रीस्वामी निरञ्जनदेव तीर्थ जी ( पुरी ) श्रीकरपात्राष्टकम्.... महामहोपाध्याय डा ० श्रीशशिधर शर्मा ज ( चण्डीगढ़ ) . स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वती जी .. श्रीहनुमान् प्रसाद धानुका जी * दिग्दर्शन.. * प्रकाशकीय........ मन्त्र सं ० मन्त्र प्रतीकानि १. ईशा वास्यमिदं सर्वं २. कुर्वन्नेवेह कर्माणि विषयाः पृष्ठ सं c आत्मज्ञाननिष्ठतया आत्मरक्षणोपदेशः १-२१ असंस्कृत चित्तं कर्मठं प्रति उपदेश: २१-३३ ३. असुर्या नाम ते लोका: विपर्यासमतीनां निन्दा ३३-३६ ४. अनेजदेकं मनसो जवीयः । ५. तदेजति तन्नेजति ६. यस्तु सर्वाणि भूतान्या ० ७. यस्मिन्सर्वाणि भूतान्या ० ८. स पर्यगाच्छुक्रमकाय ० कर्ममार्ग एव श्रेयः साधनमिति आत्मतत्त्वं यस्य हननादविदुषां ३७ - ४६ बन्धनं विदुषाञ्च मुक्तिः ४६-५० आत्मतत्त्वे रतिः कथं जायते? ५०-५३ " ५४-५६ आत्मा स्वेन रूपेण किं लक्षणम्? ५७-६७ ६. अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसं ० व्याकृताव्याकृतोपासनयोः पृथगुपादाने निन्दा समुच्चिचीषया ६७-७२
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्.. [ ३२ १०. अन्यदेवाहुः संभवाद ० अनयोः उपासनयोः पृथगनुष्ठाने फलभेदः ११. सम्भूतिञ्च विनाशञ्च अनयोः समुच्चयानुष्ठाने १२. अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये s विद्या ० १३. अन्यदेवाहुर्विद्यायाः १४. विद्याञ्चाविद्याञ्च १५. वायुरनिलममृतमथेदं ७३-७४ फलातिशयः ७४-८१ ज्ञानकर्मणोः पृथगनुष्ठानस्य निन्दा समुच्चिचीषया ८२-६१ विद्याऽविद्ययोः पृथक् फल-प्रसक्तिप्रदर्शनम् ६२-६३ तयोः विद्याऽविद्ययोः समुच्चयानुष्ठानम् ६३-१९ ६ उपासकस्य स्वमरणावस्था-प्रार्थनम् ११-१२२ १६. अग्ने नय सुपथा राये उपासकस्य पुनः मार्ग-प्रार्थनम् १२२-१२४ १७. हिरण्मयेन पात्रेण विद्याविद्यादिदेवताज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुष्ठाने अमृतमार्ग प्राप्तिः १२५-१२८ परिशिष्टानि * संन्यासाश्रमः १२६-२०१ * पूषन्नेकर्षे यम! ( काण्व १६ ) उपास्य तेज: पुञ्जेत प्रतिहता अस्मदीया दृष्टिः, अतः तत्तेजस: अपनयने प्रार्थना २०१-२०३ * ऋग्वेदादि विभागेन शान्तिपाठः २०४ * पूर्णमदः पूर्णमिदं २०५-२१६ * काण्वशाखानुसारमुपनिषन्मत्राणां पाठः २१६-२२१ * विद्याऽविद्यादितत्त्वमीमांसा २२२-२३४
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ॐ श्रीहरिः वाजसनेय - माध्यन्दिन शुक्ल यजुर्वेद - संहिता वेदार्थपारिजाताख्यभाष्य - विभूषिता चत्वारिंशोऽध्यायः ईशावास्योपनिषत् करपात्र - भाष्यम् इत्थं दर्शपौर्णमासादि प्रवर्ग्यान्तेषु विविधेषु कर्मसु विनियुक्ताः ' इषे त्वा ' इत्यादयो द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहेत्यन्ता मन्त्राः कर्मकाण्ड -परत्वेन व्याख्याताः । यद्यपि तत्र तत्रानेके मन्त्रा ब्रह्मप्रतिपादका अपि सन्ति तथापि तत्तद्विनियोगवशात् तेषामन्यशेषत्वेन न ब्रह्मपरत्वम्, तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयांसीतिन्यायेन तेषामतत्प्रधानत्वेन द्वैतपराणां प्रत्यक्षानुमानागमानाम्बाधने सामर्थ्याभावात् । ईशा वास्य-मित्यादयस्तु मन्त्राः कर्मष्वविनियुक्ताः, श्रुतिलिङ्गादिविनियोजक प्रमा-वाजसनेयसंहिता अध्याय 80 विनियोजक प्रमाणानुसार दर्शपूर्ण मास से लेकर प्रवर्ग्यान्त अनेक-विधकर्मों में विनियोगवाले " इषे त्वा " इत्यादि तथा “ द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा " पर्यन्त मन्त्र कर्मकाण्ड के बोधकरूप से भाष्य के द्वारा व्याख्यात कर दिये हैं । यद्यपि उन उन कर्मों के प्रकरण में भी अनेक मन्त्र ब्रह्म के प्रतिपादक हैं, तथापि उन - उन मन्त्रों के विनियोजक प्रमाण के बल से कर्म का अङ्ग होने से उन मन्त्रों को मुख्य ( प्रधान )
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२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् णासत्त्वात् यन्नैव तन्नैवं यथा इषे त्वादयः । न च मन्त्रत्यादिषे त्वादिवत्तेषामपि कर्मशेषत्वमनुमातव्य ' मिति वाच्यम्, तत्र विनियो-जकप्रमाणसत्त्वस्योपाधित्वात् । इषे त्वादौ " इषे त्वेति शाखां छिनत्ति " इति विनियोजक प्रमाणसत्त्वे साध्यव्यापकत्वम्, ईशा वास्यादौ? मन्त्रत्वे सत्यपि विनियोजक प्रमाणासत्त्वेनोपाधेः साधनाव्यापकत्वात् । ननु श्रौत रूप से ब्रह्मबोधकता नहीं । क्योंकि " तत्प्रधान प्रमाण, अतत्प्रधान प्रमाणों से बलवान होते हैं ", इस न्याय के अनुसार कर्मप्रकरण में पठित ब्रह्मबोधकमन्त्रों को अतत्प्रधानता होने से द्वंतबोधक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम के बाध करने में सामर्थ्य नहीं है । " ईशा वास्यं " इत्यादिक मन्त्र तो कर्म में विनियुक्त हैं नहीं, क्योंकि उनका कर्म में विनियोग करनेवाला कोई प्रमाण ही नहीं । जो कर्म में विनियोजक प्रमाण से शून्य नहीं, वह कर्म में अविनियुक्त भी नहीं, जैसे " इषे त्वा " इत्यादि मन्त्र । मन्त्रत्वरूप हेतु से ' इषे त्वा ' इत्यादिक मन्त्रों के समान ईशावास्यादि मन्त्रों में भी कर्मशेषता अनुमान कर लेनी चाहिये, यह कहना भी उचित नहीं, क्योंकि उक्त अनुमान में ' विनियोजक प्रमाण की विद्यमानता ' उपाधि है । इस अनुमान में साध्य कर्मशेषत्व है, ' इषे त्वा ' इत्यादिक मन्त्रों में ' इषे त्वा शाखां छिनत्ति ' इस विनियोजक प्रमाण की विद्यमानता होने से उक्त उपाधि में साध्य व्यापकता है तथा ईशावास्यादि मन्त्रों में मन्त्रत्व विद्यमान होने पर भी विनियोजक प्रमाण की अविद्यमानता होने से साधनाव्यापकत्व भी है । १. ईशा वास्यमित्यादयो मन्त्राः कर्मशेषा मन्त्रत्वाविशेषादिषे त्वादिमन्त्रवत् । २. वेति शाखां छिनत्तीत्यादिवद्विनियोजक प्रमाणादर्शनात्प्रकर-णान्तरत्वाच्चेत्यर्थः ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ३ विनियोगाभावेऽपि ' बहिर्देवसदनं ' दामी ' त्यस्य ( मै. सं. १.१.३ ) वहिलं वन-प्रकाशन सामर्थ्यरूपेणलिङ्ग ेन बहिर्लवने विनियोगः तथा कर्मशेषात्म-प्रकाशनसामर्थ्येन कर्मष्वेषां विनियोग इति चेन्न, तेषामकर्मशेषस्यात्मनो-शुद्धबुद्धमुक्तकत्वाकर्तृत्वादियाथात्म्यप्रतिपादकत्वेन तदसंभवात् । ननु एवं कर्मणः कर्तृ भोक्तृसाकांक्षत्वेन तदपेक्षितात्मप्रतिपादनेन तेषामप्यस्तु कर्मशेषत्वमित्यपि न वाच्यम्, तेषां शुद्धत्वैकत्वापापविद्धत्वाशरीरत्वा-कर्तृत्वाभोक्तृत्वसर्वगतत्वादियाथात्म्यप्रतिपादकत्वेन कर्मविरुद्ध-त्वात् । यदि ह्याप्यः संस्कार्यः उत्पाद्यो विकार्यः कर्ताभोक्तोपासनोप-योगी प्रत्यग्भिन्नो देवतारूपवात्मेह प्रतिपिपादयिषितः स्यात्तदाभवेदपि कर्मशेषता । न च तयेह, तस्मान्नकर्मशेषत्वमिति । न खलु नित्ये कूटस्थे नित्यप्राप्तेनाधेयातिशये स्वप्रकाशे चिदात्मनिकर्मकाण्डफलं चतुर्विधमुत्पत्तिविकारप्राप्तिसंस्कारलक्षणं सम्भवति । शंका- ' श्रौत विनियोग का अभाव होने पर भी जैसे बहिर्लवन प्रकाशन की सामर्थ्य रूप लिङ्ग से ' बहिर्देवसदनं दामि ' ( मै. सं. १. १. ३ ) इस मन्त्र का बाह ( कुशा ) छेदन में विनियोग है, उसी प्रकार कर्म का शेष ( अङ्ग ) - भूत आत्मा के स्वरूप के प्रकाशनसामर्थ्यरूप लिंगप्रमाण से ईशावास्यादि मन्त्रों का कर्म में विनियोग है, ' यह कहना भी उचित नहीं; क्योंकि ईशावास्यादि मन्त्र कर्मों का अनङ्ग शुद्ध-आत्मा की शुद्धता - ज्ञानस्वरूपता मुक्तता - एकता - अकर्तृत्वादि यथार्थ -स्वरूपता के प्रतिपादक हैं, अतः इनकी कर्मशेषता असंभव है । ' कर्म को कर्ता - भोक्ता आत्मा की अपेक्षा होने से कर्मसिद्धि के लिये अपेक्षित कर्ता भोक्ता आत्मा का प्रतिपादन करने से ईशावास्यादिक मन्त्रों को भी कर्मशेषता हो ', यह भी कहने योग्य नहीं; क्योंकि शुद्धता, एकता, पाप - पुण्यशून्यता, अशरीरता, अकर्तृ ता - अभोक्तृता, सर्वगततादिरूप आत्मा की यथार्थ स्वरूपता का प्रतिपादन करने से ईशावास्यादि मन्त्रों का कर्म के साथ विरोध है । यदि प्राप्ति, संस्कार, उत्पत्ति तथा ३. बहिर्दर्भमुष्टिः । एकत्र संघीभूता मुष्टिपरिमिता अनेके दर्भा इति यावत् । दर्भाश्च कुशकाशादयो दशविधाः । न त्वन्ये तृणविशेषा उलपादयः । सदनं स्थानम् । दामीत्यत्र दाप लवन इति धातुः । लवनं छेदनम् । पुरोडाशस्थानभूतं बहिश्छिनद्मीत्यर्थः ।
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४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा सं अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ननु स्वाध्यायाध्ययन विधिगृहीतवेदराशेः कर्मपरत्वेनैव सार्थक्या-ज्ञानकाण्डस्यैव बाधोयुक्तः, तदन्यथाऽनुपपत्या कर्तृ भोक्तृनानात्म-बोधनपरा एव इमे मन्त्रा इति चेन्न, अविद्याकृतमात्मनोऽनेकत्वकर्तृत्व-भोक्तृत्वाशुद्ध त्वपापविद्धत्वादीनि लोक सिद्धान्येवादायकर्मणां विधान-संभवे नान्यथोपपत्तेः ज्ञानकाण्डविरुद्ध कर्तृत्वादिप्रतिपादने कर्मकाण्ड -बोध वाक्यानामपि तात्पर्याभावात् । अत एव न सुन्दोपसुन्दन्यायेन परस्परव्याघातेनोभयाप्रामाण्यप्रसंगः, ब्रह्मात्मसाक्षात्कारात्प्राक्कर्म-काण्डस्य लब्धावकाशत्वेनोभयोः सामञ्जस्यात् । ब्रह्मात्मसाक्षात्कारात् प्राक्यो हि दृष्टेन ब्रह्मवर्चसादिनाऽदृष्टेन स्वर्गादिना कर्मफलेनार्थी सन्नहं द्विजाति कर्ताभोक्ताकर्माधिकारवानित्यात्मानं मन्यते तस्यैव कर्माधिकारान् न हि अपेत ब्रह्मक्षत्रादिभेदस्य नभोवन्निष्क्रियस्य दुःखा-संसर्गिणः परमानंदस्वभावस्य सुखं मे स्याद् दुःखं च माभूदित्यर्थत्वं संभवति । विकार के योग्य कर्ता - भोक्ता अथवा उपासना में उपयोगी प्रत्यक् आत्मा से भिन्न देवतारूप आत्मा इन मन्त्रों में प्रतिपादन करने को इष्ट होता तो मन्त्रों को कर्मशेषता भी हो जाती; परन्तु ईशावास्यादि मन्त्रों में तो आय, संस्कार्यादिरूप आत्मा का प्रतिपादन है नहीं, अतः कर्म-शेषता भी नहीं । नित्य कूटस्थ, नित्यप्राप्त, अनाधेयातिशय, स्वप्रकाश चिदात्मा में उत्पत्ति विकार प्राप्ति तथा संस्काररूप चार प्रकार का कर्मकाण्ड - का फल संभव नहीं है । शंका- ' स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ' ( श ० ११.५.६.३ ) इस वेदाध्ययन-विधि से गृहीतवेदसमुदाय का कर्म में तात्पर्य होने से ही उसकी सार्थकता होने से ज्ञानकाण्डका ही बाध उचित है, वेदसमुदायका कर्मबोधक रूप से सार्थक्य और प्रकार से असिद्ध होने से ईशावास्या-दिक मन्त्र कर्ता - भोक्ता नाना आत्मा के बोधन में ही तात्पर्यवाले हैं यह सिद्ध होता है; यह शंका भी उचित नहीं, अविद्याकृत आत्मा के अनेकत्व, कर्तृत्व- भोक्तृत्व, अशुद्धत्व, पापयुक्तत्व आदि धर्म, ' अहं कर्ता भोक्ता पापी ' इत्यादि लौकिक अनुभव से सिद्ध हैं, इनलोक सिद्ध धर्मों को लेकर कर्मों का विधान संभव हो जाने से ज्ञानकाण्ड से विरुद्ध आत्मा में कर्तृत्वादि के प्रतिपादन करने में कर्मकाण्डबोधक वेदवाक्यों
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ५ ननूपनिषदां जपोपयोगित्वादन्यस्य प्रमाणस्य तादृशात्मन्य-सत्त्वान्नास्त्येव नित्यशुद्धबुद्धमुक्त प्रत्यक्चैतन्याभिन्नाकर्त्र भोक्त ब्रह्मा-त्मतत्त्वमितिचेन्न, ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थ ' इतिमीमांसाप्रसिद्धन्याय-विरोधेनोपनिषदां तात्पर्यनिर्णायकोपक्रमादिषड्विधलगब्रह्मात्मैक्ये-तात्पर्यावधारणेन जपोपयोगित्वमात्रस्य वर्णयितुमशक्यत्वात् । तथाहि ' ईशावास्यमित्युपक्रम्य ' स पर्यगाच्छुक्रमकायमित्युपसंहारात्, ' अनेजदेकं ', ' तदेजति तन्नैजति ', तदन्तरस्य सर्वस्ये ' त्यभ्यासदर्शनात् ' नैनद्द वाआप्नु-वन् पूर्वमर्षत् ' इत्यपूर्वता संकीर्तनात्, ' को मोहः कः शोक एकत्वमनु पश्यतः ' इति फलवत्तासंकीर्तनात्, ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' इतिजिजीविषो भेददशिनः कर्मकरणानुवादेन ' असुर्या नाम ते लोका ' इति निन्दयै-कात्म्यदर्शनस्य संस्तुतत्वात्, ' तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाती ' तियुक्तया सर्व द्रष्टुरधिष्ठानभूतस्य परमात्मनः प्रतिपादनादस्या उपनिषदस्ता-का भी तात्पर्य नहीं है, क्योंकि वेद के बोधन बिना ही कर्ता - भोक्ता आत्मा लोक से ही सिद्ध है । वेद के किसी भाग का भी कर्ता - भोक्ता आत्मा के प्रतिपादन में तात्पर्य न होने से ' सुन्दोपसुन्दन्याय ' से परस्पर विरोध होने से दोनों काण्डों के अप्रामाण्य की भी आपत्ति नहीं है; क्योंकि ब्रह्म से अभिन्न आत्मा के साक्षात्कार से पूर्व कर्मकाण्ड को अवकाश प्राप्त होने से दोनों ही काण्डों का सामञ्जस्य ( अविरोध ) है | ब्रह्मसाक्षात्कार से पूर्व जो पुरुष दृष्ट ब्रह्मवर्चसादि, अदृष्ट स्वर्गादि कर्मफल का इच्छुक हुआ ' मैं द्विजाति कर्ता - भोक्ता कर्म का अधिकार वाला हूँ, ' ऐसा अपने को मानता है, उसी का कर्म में अधिकार होता है; अतः जिसका ब्राह्मणक्षत्रियादिक भेद समाप्त हो गया है, जो आकाश के समान निष्क्रिय परमानन्द स्वरूप है, उसको ' मुझे सुख हो, दुःख न हो ' यह इच्छा ही संभव नहीं तो उसका कर्म में अधिकार कैसे? अन्य प्रमाण शुद्ध आत्मा में है नहीं, जप में उपयोगी होने से उपनिषदों को प्रमाण माना जा सकता नहीं, तब तो नित्य - शुद्ध - बुद्ध-मुक्त प्रत्यक् चैतन्याभिन्न अकर्ता - अभोक्ता ब्रह्म आत्मतत्त्व ही नहीं, यदि ऐसा कहा जाय तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि ' जिसमें शब्द का तात्पर्य होता है वही शब्द का अर्थ होता है ' इस मीमांसाप्रसिद्धन्याय से उक्त कथन का विरोध है । तात्पर्य के निर्णायक उपक्रमादिषलिंगों
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६ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् त्पर्येण प्रतिपादनं सिद्धमेव । एवमेवान्यासामप्युपनिषदामुपक्रपोपसंहा-रैकरूप्याभ्यासापूर्वताफलवत्तार्थवादयुक्त्युपपादनानि षट्तात्पर्यलिङ्गा-नि तत्र तत्र द्रष्टु ं शक्यानि । तानिलिङ्गानि च उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वताफलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये । इति प्रसिद्धानि । प्रत्ययान्तर संवादोऽपि बलवत्वे ' कारणंभवति, सर्वासामुपनिषदां गीतानां मोक्षधर्माणाञ्चैवं विधे ब्रह्मणि समन्वयादप्युपनिषदां बलवत्वेन स्वविरुद्धप्रत्यक्षानुमानागमानां बाधकत्वमेवोपचरितत्वं तु दूरोत्सा-रितम् प्रमाणान्तरानुपलम्भेऽपि नोपनिषदर्थः प्रत्याख्यातुं शक्यः, के द्वारा उपनिषदों का ब्रह्मात्मा की एकता में तात्पर्य निर्णय हो जाने पर जपमात्र में उपयोग कैसे वर्णन किया जा सकता है? षड्लिङ्ग दिखाते हैं, ' ईशावास्य ' इस से उपक्रम, ' स पर्यगात् ' इस वाक्य से उपसंहार, ' अनेजदेकं ' इत्यादि से अभ्यास, नैनद्द वा आप्नुवन् ' इससे अपूर्वता, ' को मोहः कः शोक: ' इससे फलवत्ता, ' असुर्या नाम ' इत्यादि से भेददर्शीकी निन्दा से एकात्म्यदर्शन की स्तुति-रूप अर्थवाद ' तस्मिन्नपो मातरिश्वा ' इस वाक्य से युक्ति प्रदर्शन कर देने से एक अद्वितीय सर्वाधिष्ठान सर्वद्रष्टा परमात्मा का ही इस उप-निषद् ने तात्पर्य से प्रतिपादन किया है, यह सिद्ध हुआ । इसी प्रकार अन्य उपनिषदों के उपक्रम तथा उपसंहार की एकरूपता, अभ्यास, अपूर्वता, फलवत्ता, अर्थवाद तथा युक्ति का उपपादन रूप षट् तात्पर्य के निर्णायकलिङ्ग उन - उन स्थलों में देखे जा सकते हैं । वे लिङ्ग ' उप-क्रमोपसंहारौ ' इस श्लोकवार्तिक में प्रसिद्ध हैं । प्रत्ययान्तरसंवाद भी बलवत्ता में कारण होता है । सर्व उपनिषद्, गीता तथा महाभारत के ४. प्रमाणतौल्यं तुल्यप्रमाणमिति यावत् ५. तव तावत्प्रत्ययो मन्त्राः कर्मशेषा इति ममत्वशेषा इति, तत्र मदीयप्रत्ययस्य बलवत्त्वे इत्यर्थः ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ७ इन्द्रियान्तरेणानुपलभ्यमानत्वेऽपि चक्षुषोपलभ्यमानस्य रूपस्य नापला-पो यथा तथा प्रमाणान्तरैरनुपलभ्यमानत्वेऽपि वेदान्तैरुपलभ्यमान आत्मा नापलापमर्हति -I समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं
परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्व विनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥
( भगवद्गीता १३.२७ )
एक एव हि भूतात्मा भूतेभूते व्यवस्थितः ।
एकधा बहुधाचैव दृश्य जलचन्द्रवत् ॥
इति गीतायां मोक्षधर्मे च वचनात् । fire यथा ' न हिस्यात्सर्वा भूतानि ' ( महा ० शान्ति ० २७८.५, वन ० २१२।३२ ) इतिनिषेधशास्त्रार्थनिश्चयवतः श्येनादिविधेरप्रामाण्यमेव, यथा च तीव्रक्रोधाक्रान्तस्वान्तं प्रत्येव श्येनादिविधेः प्रामाण्यम्, तथैवौ-मोक्षधर्म का भी एक अद्वितीय सर्वद्रष्टा सर्वाधिष्ठान ब्रह्म में समन्वय ७ है । अतः उपनिषदों को ही बलवान् प्रमाण होने से, अपने से विरुद्ध भेदप्रतिपादक ( बोधक ) प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम को बाध करने का सामर्थ्य है । उपनिषदों का उपचरितत्व तो दूर से व्यक्त है । उपनिषदों ' से अतिरिक्त अद्वैत का बोधक प्रमाणान्तर न उपलब्ध होने पर भी उपनिषदों का यह अर्थ किसी प्रकार नहीं त्यागा जा सकता । जैसे चक्षु से अतिरिक्त इन्द्रिय से अप्रतीयमान भी चक्षुइन्द्रिय से प्रतीयमानरूप का अपलाप नहीं होता उसी प्रकार प्रमाणान्तरों से अप्रतीयमान होने पर भी वेदान्तों से प्रतीयमान आत्मा अपलाप के योग्य नहीं ' समं सर्वेषु ' -' जो समस्त प्राणियों में समभाव से स्थित ( व्याप्त ) परमात्मा को ६. ब्रह्मविन्दूपनिषत् १२, त्रिपुरातापिन्युपनिषत् ५.१२, पञ्चदशी १५.७ ७. उपक्रमोपसंहारादि षड्विधलिङ्गों के द्वारा केनादि उपनिषत्, भगवद्गीता, मोक्षधर्म और विष्णुपुराणादिका परमतात्पर्य सर्वा धिष्ठान परमतत्त्व में ही परिलक्षित होता है; अतः ' ईशादि ' मंत्रो का जो तात्पर्य यहाँ व्यक्त किया गया है; वह परम पुष्ट है ।