वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 221–230

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 221–230

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१८८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ( ३.२० ) इत्यत्र सहयोगे कर्मणेति तृतीयाऽङ्गीकृता । कर्मणा सहैव-कर्माण्यपरित्यज्यैव संसिद्धिमास्थिता इत्युक्तम् । यदि संसिद्धिरन्तः-करणशुद्धिरुच्यते तदा तु कर्मणैवान्तःकरणशुद्ध प्राप्नुवन्तः इत्येवार्थः । एवमेवान्यत्र ज्ञानिनां कर्मसत्त्वेऽपि ज्ञानस्यैव मोक्षहेतुत्वम्, न कर्मणाम् । यथा पिङ्गलताविशिष्टेऽग्नौ पिङ्गलतायाः सहभावेऽपि दाहेऽग्रेरेव हेतुत्वम्, न पिङ्गलतायाः तथैव ज्ञानकर्मणोः सहभावेऽपि ज्ञानस्यैव मोक्षहेतुत्वं न कर्मणो हेतुत्वमित्यादिना च ज्ञानिनामपि कर्मानुमतं भाष्यकारैः । अर्थ किया जाता है । जो यह कहा जाता है कि - ' शंकराचार्य जी की रीति से उनके भाष्य के द्वारा प्रत्यक् - चेतन आत्मा के यथार्थस्वरूप के ज्ञाता को वर्ण और आश्रम का अभिमान न रहने से कर्म में अधिकार नहीं, इसलिये सन्यास स्वभाव से ही प्राप्त है, यह कथन भी कुछ नहीं । स्वाभाविक सन्यास तो शास्त्र से विहित चतुर्थ - आश्रमरूप सन्यास से भिन्न है; क्योंकि वह स्वभाव से प्राप्त है विधि से नहीं, अतः विहित अधिकार की चर्चा उस सन्यास की नहीं । गीता भाष्या-दिकों में ज्ञानियों को भी लोकसंग्रह के लिये कर्म का समर्थन किया है । यदि ज्ञानियों को प्राप्त स्वाभाविक सन्यास तथा विधि प्राप्त सन्यास एक होते तो ज्ञानी के लिये लोकसंग्रह करने के लिये कर्म का समर्थन न किया जाता; क्योंकि विधिप्राप्त सन्यास तो विहितकर्मों का त्याग रूप ही है, उसके लिये कर्म का समर्थन तो कथमपि संभव नहीं; अतः स्वाभाविक सन्यास से विहित सन्यास भिन्न है । ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता: ' इस वाक्य में ' कर्मणा ' इस पद में सहयोग में तृतीया अंगीकार है । ' कर्म के साथ ही अर्थात् कर्म का त्याग किये बिना ही कादिक सिद्धि को प्राप्त हुए हैं ' ऐसा अर्थ किया है । यदि संसिद्धि शब्द का अर्थ, अन्तःकरण की शुद्धि कहा जाय तो कर्म से ही अन्त: -करण की शुद्धि को जनकादिक प्राप्त हुए हैं, यही अर्थ है । कहीं भी ज्ञानी पुरुषों में कर्म का वर्णन हो वहाँ ज्ञान को ही मोक्ष की कारणता है, कर्म को नहीं । यदि कहा जाय कि ' ज्ञानियों में यदि ज्ञान के साथ कर्म है तो मोक्ष की कारणता क्यों नहीं ' इसका उत्तर है कि जैसे पिङ्गलरूप से युक्त अग्नि में पिङ्गलरूप साथ है भी, परन्तु दाह कारणता अग्नि को ही है, पिङ्गलता को नहीं । उसी प्रकार ज्ञान और

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १८६ तु ' ब्रह्मविद्ययाऽविद्यायामतीतायां कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्व-बुद्ध्यपगमान्न सम्भवत्येव कर्मेति ' तदपि यत्किञ्चित्, बाधितानुवृत्त्या ' पश्वादिभिश्चाविशेषादि ' ( ब्र ० अध्यास ० ) त्युक्त ेश्च । कर्म सम्भवात्, वस्तुतस्तु कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वबुद्धिपूर्वकस्य साभिनिवेशा-हङ्कारकर्मण एवं कर्मत्वम् । कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वबुद्धिबाधपूर्वक-निरहंकारं तु कर्म कर्माभासमेव यथा श्रीकृष्णस्य कर्माकर्मव । वशिष्ठा-दीनां सर्वाधिकार विच्छेदिनि ज्ञाने जातेऽपि यथा मर्यादादिपरिपालनार्थ-fat रामस्य युद्धादौ प्रवृत्तिः लोक संग्रहार्थम्, योगवासिष्ठादि-त्या वसिष्ठविश्वामित्ररामादयोऽपि तथाभूताकर्मिण आसन् । fi बहुना, ब्रह्मविष्णुरुद्रादयोऽपि कर्मवन्तोप्यकर्मिण एवासन् । ' नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ' ( ५.८, ६ ) इति गीतोक्त च । कर्म का सहभाव होने पर भी ज्ञान को ही मोक्ष के प्रति कारणता है, कर्म को मोक्ष के प्रति कारणता नहीं है । इत्यादिक कथनों से भाष्य-कारों ने ज्ञानियों के लिये भी कर्म की अनुमति दी है । जो कहा कि ' ब्रह्मज्ञान से अज्ञान के समाप्त हो जाने पर कर्तृत्व- मोक्तृत्व - नानात्वबुद्धि के अभाव हो जाने से ज्ञानी का तो कर्म सम्भव ही नहीं ' यह ठीक नहीं; क्योंकि बाधितानुवृत्ति से कर्म सम्भव है तथा व्यवहार में तो विवेकी भी पशु आदि के ही समान होता है । ' इस भाष्य के कथन से भी विवेकी पुरुष में कर्म संभव है । ज्ञानी का कर्म कर्म नहीं होता; क्योंकि कर्तृत्व - भोक्तृत्व तथा नानात्वबुद्धि से किया गया अहङ्कार के सहित जो कर्म होता है, कर्म वही होता है । कर्तृ त्व भोक्तृत्व तथा नानात्वबुद्धि के बाध ( मिथ्यात्व निश्चय ) पूर्वक किया गया तथा अहंकारशून्य कर्म तो कर्माभास ही होता है । जैसे श्रीकृष्ण महाराज का कर्म कर्म नहीं था, अपितु अकर्म ही था । सर्वप्रकार के अधिकार को समाप्त कर देनेवाले आत्मज्ञान के हो जाने पर भी वशिष्ठ आदिकों की जैसे मर्यादा के परिपालन के लिए अग्निहोत्रादिकों में तथा राम की युद्धादिकों में प्रवृत्ति लोकसंग्रह के लिये हुई थी, वह प्रवृत्ति आभासरूपा ही थी । योगवासिष्ठादि प्रन्थों की रीति से तो वशिष्ठ, विश्वामित्र तथा रामादिक कर्म करते हुए भी अकर्मी ही थे । ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रआदि भी कर्म करते हुए भी अकर्मी ही थे ।

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१६० ] वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अत एव ब्राह्मणग्रहणमुपलक्षणार्थमित्यप्यसङ्गतम् । तथात्वे ' राजा राजसूयेन यजेत ' ( आप ० श्र ० १०.८.१, ४ ) इत्यत्राप्युपलक्षणत्वापातात् ध्वस्तविद्यगृहीतयेऽपि न ब्राह्मणग्रहणं युक्तम्, मुख्यार्थत्यागे माना-भावात् । शीघ्रोपस्थितिकत्वेन प्रसिद्ध जात्यर्थापेक्षया बिलम्बोपस्थिति-कस्य गौणार्थस्य दुर्बलत्वात् । तथैव सर्वाधिकारविच्छेदि ज्ञानसम्पन्न ेष्वपि अधिकारनियमो युक्त एव । अत एव ' क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् ' ( शान्ति ० २३.४७ ) ' ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ' ( विष्णुस्मृतिः ४ ६७ ) ' चतुर्थाश्रमं गच्छेत्सन्यासविधिना द्विज: ' ( हारीत स्मृ ०६२ ), द्विजः प्रव्रजितो भवेत् ' ( संवर्त स्मृतिः १०६ ), ' द्विजो ब्रह्माश्रमीभवेत् ' ( शंखस्मृति: ६ | ७ ), ' सन्यसेद् बुद्धिमान् द्विजः ( कौमें पूर्वा ० ३।५ ), ' तत्रैव सन्यसेद्विद्वाननिष्ट्वापि द्विजोत्तमः ( कौमें पूर्व ० ३।६ ) ' ब्राह्मणः प्रव्रजेद्गृहात् ' ( मनुस्मृतिः ६।३८ ), ' भयं हृत्वा च भूतानाममृती भवति द्विज: ' ( याज्ञवल्क्यो ० ३, यज्ञ ० स्मृ ० यति ० ३.६१ ), ' संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ' ( नारद ० परि ० ३.१४ ), ' त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्ग ' विप्राणां मुक्तिसाधनम् ' ( शाट्यायनीयो ० १० ), ‘ मैं " निष्ठावान् तत्त्वज्ञानी पुरुष ' कुछ भी नहीं करता हूँ ' ऐसा ही माता अर्थात् इसी प्रकार के निश्चयवाला होता है " इस गीता के कथन से भी यही सिद्ध होता है कि तत्त्ववेत्ता करता हुआ भी कुछ नहीं करता, अर्थात् उसका कर्म कर्माभास ही होता है । इसलिये ' सन्यास विधायक श्रुति में ब्राह्मण का ग्रहण क्षत्रिय तथा वैश्य के उपलक्षण के लिये है, ' यह कथन भी असङ्गत है; क्योंकि तब तो राजापद को भी ब्राह्मण तथा वैश्य का उपलक्षण मानना पड़ जायगा | जिसका ज्ञान से अज्ञान नष्ट हो गया है, ऐसे अविद्या से शून्य ब्रह्मवेत्ता के ग्रहण के लिये भी सन्यास विधायकश्रुति में ब्राह्मणपद का ग्रहण नहीं; क्योंकि ब्राह्मण पद का मुख्य अर्थ जातितः ब्राह्मण है, अतः श्रुति के ब्राह्मणपद का मुख्य अर्थ जातितः ब्राह्मण के त्याग में कोई प्रमाण नहीं है । किसी भी पद का उच्चारण होते ही उसका मुख्य अर्थ शीघ्र उपस्थित ( स्मृत ) होता है तथा गौण अर्थ विलम्ब से उपस्थित होता है; अत एव गौण अर्थ दुर्बल होता है । प्रसंग में ' जातितः ब्राह्मण ' की अपेक्षा ' ब्रह्मज्ञानी ' गौण अर्थ है । अतः गौण - अर्थं दुर्बल होने से ग्रहण नहीं किया जा सकता ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् " ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो । वर्णास्तान् नानुवर्तन्ते त्रयो [ १६१ भारतसत्तम ॥ " ( महा ० शान्ति ० ६२.२ )

" गार्हस्थ्यं ब्रह्मचर्यं च वानप्रस्थं ११७ वयोऽश्रमाः ।

क्षत्रियस्यापि गदितो य आचारो द्विजस्य हि ॥

वैखानसत्वं गार्हस्थ्यमाश्रमद्वितयं विशः । गार्हस्थ्यमाश्रमं त्वेकं शूद्रस्य क्षणदाचर ॥ ” इति व्यवहारो युक्त एव । ( वामन पु ० १४. १७, १८ ) येषु ज्ञानिषु तत्त्वज्ञाने जातेऽपि प्रारब्धदोषाद्वं तं प्रतीयते परं तत्र विश्वासो न भवति, तेषां विधिषु श्रद्धाराहित्यान्न प्रवृत्तिः । तत्र श्राद्धस्यैवाधिकारात् । निश्चितगुडमाधुर्यो यथा पित्तदोषवशात् गुडे तिक्ततामनुभूय त्यजन्नपि न श्रद्दधाति, तद्वत् । निषेधे तु तादृशज्ञान-सर्वअधिकारों को समाप्त करनेवाले ज्ञान से युक्त ज्ञानियों में बाधितानुवृत्ति से कर्म संभव है, उसी प्रकार अधिकार का नियम भी सम्भव है । अत एव अधिकारनियम से प्राप्त सन्यास का ' क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् ' निषेध तथा ' ब्राह्मणः प्रव्रजेत् ' इत्यादि अनेक स्मृतियों से ब्राह्मण के लिये विधान भी बाधितानुवृत्ति से सम्भव है, अर्थात् उचित है । जिन ज्ञानियों में तत्त्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने पर भी प्रारब्ध-दोष से प्रतीत होता है; परन्तु द्वौत प्रतीति में विश्वास नहीं होता, उन विद्वानों की विधियों में श्रद्धा का अभाव होने से, विधि में प्रवृत्ति नहीं होती । क्योंकि विधि में तो श्रद्धावाले का ही अधिकार है । जैसे जिस पुरुष ने गुड की मधुरता का अनुभव कर लिया है, वह पित्तदोष के कारण गुड़ में कटुता ( कडुआपन ) का अनुभव करके गुड का त्याग में कर देता है, फेंक देता है, फिर भी गुड़ की कटुता विषयक प्रतीति विश्वास नहीं करता, उसी प्रकार प्रारब्ध दोष से संसार की प्रतीति ११७. अकारस्य ह्रस्व आर्ष: ।

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१ ९ २ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् वानपि भवत्येवाधिकारी, तत्र निषेध्यप्रतीतिरेवापेक्षिता न श्रद्धाऽपि । अत एव द्वं तमिथ्यात्व बोधेऽपि निषेधबलान्निवर्तितव्यमेव निषिद्ध ेभ्यः कर्मभ्यः । अतः सर्वाधिकार विच्छेदिनि ज्ञाने सत्यपि अधिकार-नियमो न विरुद्धयते । अधिकार विच्छेदिज्ञानं यत्र जातं तत्र सन्यासेऽपि नाग्रहो भवति । अतः क्षत्रियवैश्ययोः सन्याससाधनाग्रहोऽपि निरर्थक एव । ' सम्यक् नितरां ब्रह्मण्यास:: ' इति ज्ञानलक्षणां सन्यासस्तु ज्ञानेन स्वाभाविकः, सिद्धयत्येव । दण्डकाषायभिक्षाचर्यादिलक्षणसन्यासस्तु न स्वाभा-विकः, किन्तु चतुर्थाश्रमधर्मरूप एव । तेन तत्राधिकारनियमो युक्त एव । चतुर्थाश्रमधर्मरूपे सन्यासेऽधिकार नियमेऽपि स्वाभाविकेऽलिङ्ग सन्यासे तु नाधिकार नियमः, तस्य स्वाभाविकत्वात् । तत एव वार्तिक-होती है, परन्तु प्रारब्धदोष से होने वाली प्रतीति में विश्वास नहीं करता । किसी पदार्थ के निषेध करने में तत्त्वज्ञानी पुरुष भी अधिकारी होता है; क्योंकि किसी पदार्थ के निषेध के लिये तो निषेध्य की प्रतीति की अपेक्षा है, उसके लिये श्रद्धा भी अपेक्षित नहीं है । इसलिये ही के मिथ्यात्व का बोध होने पर भी निषेध के बल से निषिद्ध-कर्मों से निवृत्त होना ही चाहिए । सर्व अधिकारों को समाप्त करने वाले तत्त्वबोध के होने पर भी बाधितानुवृत्ति से अधिकार का नियम विरुद्ध नहीं है । जिस अधिकारी को सर्व अधिकारों को समाप्त करनेवाला ज्ञान होगया है, उसका सन्यास में भी कोई आग्रह नहीं रहता । इस लिये क्षत्रिय तथा वैश्यों के सन्यास की सिद्धि का आग्रह भी व्यर्थ है । यदि सन्यासशब्द का यह अर्थ किया जाय कि - सम्यक् ' – अतिशयरूप से, ब्रह्म में ' आस ' = स्थिति का नाम ही सन्यास है तो ऐसा ब्रह्मज्ञान में निष्ठारूप संन्यास तो ज्ञान से स्वाभाविक ही सिद्ध है । सिद्ध दण्ड तथा काषायवस्त्रधारण और भिक्षाचरणरूप विलक्षणसन्यास स्वाभा विक नहीं; क्योंकि वह विधि से प्राप्त होता है । वह चतुर्थ - आश्रम का धर्मरूप ही है । चतुर्थ - आश्रमरूप सन्यास को स्वाभाविक न होने से ही उसमें अधिकार नियम उचित ही है । चतुर्थ - आश्रम का धर्मरूप सन्यास में अधिकार का नियम होने पर भी जो स्वाभाविक

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १ ९ ३ वचनानि भाष्यकारानुगुण्येनं व ११ नेतव्यानि । अत एव विषयैक्येऽपि न सन्यास तदभावयोविरोधोऽपि, आश्रमरूपसन्याससाधनस्य निर्युक्ति-कत्वेन भाष्यकारानुगुण्य नयनेनाविरोधसाधनमेव श्रेयः । अलिङ्गसन्यास है, उसमें अधिकार का कोई नियम नहीं; क्योंकि वह स्वाभाविक है । इसलिए वार्तिककार के वचनों का भाष्यकार के अनुसार ही नयन ( अर्थ ) करना चाहिये । भाष्यकार के अनुसार ही वार्तिककार के वचनों का अर्थ करने से ही विषय की एकता होने पर ११८. श्री वार्तिकार आचार्य सुरेश्वर ने ' ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ' ( बृह ० ४.४.२२ ) में ब्राह्मण को तीनों ही वर्णों का उपलक्षण माना है । शूद्रों के क्योंकि यज्ञोपवीतादि संस्कार नहीं; अतः यज्ञोपवीत के ग्रहण या विसर्जनपूर्वक सम्पन्न होने वाले संन्यास में अधि-कार भी नहीं । ऐसी स्थिति में ब्राह्मणपद से शूद्र का उपलक्षित होना संभव नहीं । इस मत में तीनों वर्णों का सलिङ्गसन्यास में Safaar सिद्ध होता है । ऐसा मानना इसलिये आवश्यक है; क्योंकि अलिङ्गसंन्यास ही यदि तीनों वर्णों का मान्य हो तो सर्वत्याग में शूद्रों के अधिकार के प्रतिपादक ' अन्तकाले च संप्राप्ते ' ( महा ० शा ० ६३.२० - २३ ), ' यतिधर्ममवाप्तोऽसौ ' ( महा ० आश्रम ० २६ । ३१-३३ ) आदि वचनों के बल पर ब्राह्मण ग्रहण तीनों ही नहीं; अपि तु चारों ही वर्णों का उपलक्षण हो जायगा । ऐसा मानने पर ( १ ) श्रुतिस्मृतियों में प्रयुक्त ब्राह्मण, विप्र, द्विज, द्विजोत्तम इन शब्दों के प्रसिद्धार्थ का सर्वत्र परित्याग करना होगा, जोकि ' प्रसिद्धार्थ परित्यागरूपदोष ' प्रापक होगा । ( २ ) संन्यासाश्रम के निषेधपरकवचनों की सार्थकता न सध पाने के कारण ' निषेधवचननिरवकाशदोष ' प्राप्त होगा । ( ३ ) ' बहूदकाः ब्राह्मणकुलेषु भैक्षाचर्या चरन्तः ' ( आश्रमो ० ४ ), ' गृहे च विप्रमुख्यानां यतिः सर्वोत्तमः स्मृतः ' ( नारद परि ०

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१६४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अत एव भिक्षुकीत्यनेन स्त्रीणामपि प्राग्विवाहादुद्वैधव्यादूर्ध्वं वा सन्यासेऽधिकारसाधनम्, तासां त्रिदण्डादिसाधनत्वसङ्गतम्, भिक्षुकीति-स्मरणस्य जीवनयात्रार्थं लौकिकभिक्षाचरणेऽप्युपपन्नत्वात् । भी सन्यास तथा सन्यास के अभाव का विरोध भी नहीं । भाव यह है कि जिस सन्यास में भाष्यकारने ब्राह्मण का ही अधिकार कहा है, वह अधिकार के नियमपूर्वक चतुर्थ आश्रम का धर्मरूप है । जिस के विषय में वार्तिककार ने यह कहा है कि सर्वाधिकार को समाप्त करनेवाले ज्ञान के होने पर बलात् सन्यास का नियम क्यों थोपा जाय, वह स्वाभाविक सन्यास है जो कि ब्रह्मनिष्ठा ( ज्ञाननिष्ठा ) रूप है । अतः आश्रम के धर्मरूप सन्यास की सर्व के लिए सिद्धि करना शास्त्रानुसारी शून्य है । अत एव भाष्यकार के अनुसार वार्तिककार के वचनों का अर्थ करके दोनों आचार्यों का अविरोध सिद्ध करना ही श्रेष्ठ है । ६.६), ' सायंकाले तु विप्राणां गृहाणि ' ( लघु हारीते ६.१२ ), ' ब्राह्मण कुले वा यल्लभेत तद्भुञ्जीत ' ( वसिष्ठ स्मृति: ११. १८ ), सर्ववर्णेषु भिक्षूणां भैक्षाचर्यं ' ( निषेध ), ( नारायण स्मृति: ४ ) आदि वचनों के अनुसार ब्राह्मणघरों में विशेषकर कलियुग में भिक्षा माँगने के वचनों की सार्थकता सिद्ध करने पर ' ब्राह्मण-शोषणदोष ' चरितार्थ होगा । ( ४ ) क्षत्रिय और वैश्य भी संन्यासी होने लगेंगे तो रक्षा और अर्थ व्यवस्था दोनों ही शिथिल होगी । इस प्रकार ' अर्थव्यवस्थोच्छेददोष ' चरितार्थ होगा । ( ५ ) ऐसा होने पर ' आचार्य सांकर्यदोष ' भी प्राप्त होगा । तब तो ब्राह्मणपरिव्राजक ही नहीं, परिव्राजकमात्र आचार्य और पूज्य होने लगेंगे । ( ६ ) यज्ञोपवीत और वेदाध्ययनादिसाम्य के बल पर अवान्तर अधिकारभेद को न मानने पर ' वर्ण- सांकर्य और कर्मसां कर्य - दोष ' प्राप्त होंगे ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६५ वार्तिककारचरणैरपि ' सर्वाधिकार विच्छेदि ' इत्यादिना विद्वत्स-न्यासे नियमाभावस्य साधितत्वात् । तथा च -११८ब्राह्मणानामयं धर्मो यद्विष्णोलिङ्गधारणम् । १२० ब्राह्मण तथा उसमें भी पुरुष को ही सन्यास का अधिकार सिद्ध होने से सुलभा आदि स्त्रियों के लिये शास्त्र में भिक्षुकी पद को लेकर स्त्रियों का विवाह पूर्व अथवा विधवा हो जाने के पश्चात् सन्यास में अधिकार सिद्ध करना तथा त्रिदण्ड आदि को सिद्ध करना असंगत है । महाभारतादि ग्रन्थों में सुलभादि स्त्रियों के लिये जो भिक्षुकी पद का प्रयोग हुआ है, वह तो जीवनयात्रा के लिए लौकिक भिक्षाचरण करने पर भी संभव हो सकता है । ११६. विष्णु भगवान् का लिङ्ग - दण्डकाषायवस्त्रादि का धारण करना यह ब्राह्मण का ही धर्म है, क्षत्रिय तथा वैश्य का यह धर्म नहीं है । १२०. ' वैष्णवं दण्डमेकं ' ( नारद परिव्राजको ० ५ ), ' एकदण्डी त्रिदण्डी वासवं मोक्षं समश्नुते ' ( गोपीचन्दनोपनिषत् १ ), ' एकदण्डी भवेद्वापि त्रिदण्डी वापि वा भवेत् ' ( विष्णुस्मृति: ४.७६ ), ' एक-दण्डी त्रिदण्डी वा ' ( बौधायनस्मृतिः २.११.१, २.१०.५३ ), ' बहूदकास्त्रिदण्डधारिणः, हंसा एकदण्डधारिणः ' ( आश्रमोपनि-षत् ४ ), ' एकदण्डधरा हंसा:, मुण्डा: ' ( वृ ० पराशर ० १२.१६६, १७१ ), ' सखा मे गोपायेति दण्डं परिग्रहेत् । '

" दण्डं तु वैष्णवं सौम्यं सत्वचं समपर्वकम् ।

पुण्यस्थलसमुत्पन्न नाना कल्मषशोधितम् ॥

अदग्धमहतं कीटः पर्वग्रंथिविराजितम् ।

नासादघ्नं शिरस्तुल्यं भ्र ुवोर्वा बिभ्रयाद्यतिः ॥

दण्डात्मनोस्तु संयोगः सर्वथा तु विधीयते । न दण्डेन विना गच्छेदिषु क्षेपत्रयं बुधः ॥ ” ( संन्यासोपनिषत् २.६-११ ) " कुटीचको बहूदकश्चापि हंसः परमहंस इव वृत्त्या च भिन्नाः । सर्व एते विष्णुलिङ्ग

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१६६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् राजन्यवैश्ययोर्ने ति दत्तात्रेय मुनेर्वचः । ' इति बौधायनादि वचनानुसारेण काषायवस्त्रदण्डधारणादिनि-षेधपराणीति माधवाचार्याः ' चत्वार आश्रमा ब्राह्मणस्य त्रयो राजन्यस्य द्वौ वैश्यस्य ' इतिस्मृतेः । पुराणेऽपि ' मुखजानामयं धर्मः ' पूज्यवार्तिककारों ने भी ' सर्वाधिकार विच्छेदि ' इत्यादि कथन से विद्वत्सन्यास में नियम का अभाव सिद्ध किया ही है । सुलभा आदिकों का विद्वात्सन्यास है । उनका भिक्षाचरण शास्त्रीय नहीं; अपितु स्वाभाविक है । विद्वत्सन्यास में नियम का अभाव होने पर तो ' ब्राह्मणानामयं धर्मः ' इत्यादिक बौधायनवचन के अनुसार वार्तिककार के वचन भी काषायवस्त्र, दण्डधारणादि के निषेध में तात्पर्य वाले हैं । ऐसा माधवाचार्य जी का निर्णय है । यह निर्णय ' चत्वार आश्रमा ब्राह्मणस्य ' इस स्मृति से भी अनुमत है । पुराणों में भी ' मुखजानामयं धर्मः ' इत्यादि वाक्यों से क्षत्रिय तथा वैश्य के सन्यास का अभाव ही कहा है । ' क्षत्रिय तथा वैश्य का भी सन्यास में अधिकार है ' यह वार्तिककार का कथन प्रौढ़िवाद मात्र है । ' कर्मणैव हि संसिद्धिम् ', ' यद्यदाचरित श्रेष्ठ: ' इन श्लोकों की टीका में नीलकण्ठाचार्य ने कहा है कि- ' कर्मणैव ' इस श्लोक से भगवान् शिष्टपुरुषों के आचरण को प्रमाण में देते हैं तथा ऐसा अर्थ करते हैं कि कर्मों के साथ ही, दधाना वृत्त्या व्यक्तं बहिरन्तश्च नित्यम् ॥ " न त्यजेद्यावदुत्क्रान्तिरन्तेऽपि निखनेत्सह ॥ ” ( शाट्यायनीयो ० ११८ ) " त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्ग विप्राणां मुक्तिसाधनम् ॥ निर्वाणं सर्वधर्माणामिति वेदानुशासनम् ॥ ( शाट्यायनीयो ० १० ) उक्त उद्धरणों से सिद्ध है कि ( 1 ) ब्राह्मण को ही सलिंग २ ) कुटीचक, बहूद संन्यास- एकदण्ड या त्रिदण्ड का अधिकार है । ( हंस और परमहंस ये चारों ही दण्डी होते हैं । त्रिदण्डी, हंस और परमहंस एकदण्डी होते हैं । है । कुटीचक और बहूदक ( ३ ) दण्डत्याग अधर्म

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६७ इति क्षत्रियवैश्ययोः सन्यासाभाव एवोक्तः । ' क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्या-साधिकारः ' इति वार्तिककारोक्तिस्तु १२१ प्रौढिवादमात्रम् | ' कर्मणैव हि संसिद्धिम् ' ( गीता ३. २० ), ' यद्यदाचरति श्रेष्ठ: ' ( गीता ३.२१ ) इत्यत्र टीकायां नीलकण्ठाचार्य: - ' अत्र शिष्टाचारं प्रमाणयति कर्मणेति । कर्मणैव सह संसिद्धि श्रवणादिसाध्यां ज्ञाननिष्ठां गन्तुमास्थिताः प्रवृत्ता जनकादयस्त्वादृशाः क्षत्रियाः, न तु सन्यासेन । ' श्रवणादि से साध्य ज्ञाननिष्ठा को प्राप्त करने को आप जैसे क्षत्रिय प्रवृत्त हुए हैं । जनकादि क्षत्रिय सन्यास से ज्ञाननिष्ठा को प्राप्त करने को प्रवृत्त नहीं हुए हैं । अतः नीलकण्ठाचार्य को भी क्षत्रियों का सन्यास अभिमत नहीं । यदि अर्जुन कहे मेरा चित्त शुद्ध है, अतः मुझे कर्म की अपेक्षा नहीं है, तब भी लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिये । अपने धर्म में प्रवृत्ति कराने का नाम लोकसंग्रह है । यदि अपना कुछ प्रयोजन न होने पर भी लोकसंग्रह के लिये ही कर्म करना चाहिए तब तो १२१. " दान यन्न हि प्रोक्तं कर्तव्यत्वेन कोविदैः । कंचित्तद्धेतुमादाय तत्साधनमिहोच्यते 1 सर्वसाधनहीनत्वात्प्रौढिवादो बुधोज्झितः ॥ ” ध्यान रहे, संन्याससम्बन्धी उपनिषदों में नारदपरिव्राज-कोपनिषत् अत्यन्त प्रसिद्ध है । उसके प्रारम्भ के उपक्रम वाक्य में ' गृहस्थोचितकर्म कुर्वन्दौर्ब्राह्मण्यनिवृत्तिमेत्य स्वबंशवृद्धिकामः ' कह कर स्पष्ट ही ब्राह्मणवर्ण का उल्लेख है ( नारद ० २ ); पुन: ' यस्यैतानि सुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरं करः । संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥ " ( ३.१४ ) ' कथमय-ज्ञोपवीती ब्राह्मण: ' ( ३.७७ ) ' तदेतद्विज्ञाय ब्राह्मणः परिव्रज्य ' ( ३.८५ के बाद ) ब्राह्मणवर्ण का ही परामर्श है; अत: ' ब्राह्मण ' पद क्षत्रिय और वैश्य का द्योतक कथमपि नहीं हो सकता । परब्रह्मोपनिषत् में ' विप्र ' शब्द का प्रयोग भी इसी अर्थ का द्योतक है - ' बहिरन्तश्चोपवीती विप्रः । ', ' ब्राह्मणोऽग्नीन्समा -रोप्य ' ( बौधायनस्मृतिः १०.२.२५ ) आदि स्मृतियाँ भी इसी तथ्य का प्रकाश करती हैं ।