वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 231–240

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 231–240

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१६८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ननु शुद्ध चित्तस्य मम नास्ति कर्मापेक्षेत्याशंक्याह - लोकेति । लोकस्य संग्रहः स्वधर्मे प्रवर्तनम् । ननु स्वप्रयोजनाभावेऽपि केवलं लोक-संग्रहार्थं चेत्कर्म कर्तव्यं तदा विदुषां ब्राह्मणानामपि सन्यासो न स्यात् । यतीनेव सन्यासधर्मान् ग्राहयितुं तेषां सन्यास इति चेत्, अर्जुनेऽपि न तद्दण्डवारितमस्ति । नतु क्षत्रियस्य सन्यासेऽधिकारो नास्तीति चेत्, लिङ्गधारणेऽधिकाराभावेऽपि भरतऋषभादिवद्विक्षेपक कर्मत्यागमात्रे-ऽधिकारात् । " सर्वाधिकारविच्छेदि ज्ञानं चेदभ्युपेयते । कुतोऽधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते बलात् ॥ " इति वातिके विद्वत्सन्यासे क्षत्रियादेरप्यधिकारस्य साधि-तत्वात् । अतो लोकसंग्रहो न मुख्यं कर्मप्रयोजनम्, इति चेत्, सत्यम्, । ' न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ ' ( गीता ० ३.२२ ) ब्राह्मण भी सन्यासग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि ज्ञान होने पर ब्राह्मण भी लोकसंग्रह के लिये कर्म ही करते रहेंगे । यदि कहा जाय कि अन्य सन्यासियों के लिये सन्यासधर्म में प्रवृत्ति कराने के लिये ब्राह्मणों को सन्यासग्रहण करना चाहिये तो अर्जुन को भी अन्य सन्यासियों को अपने धर्मग्रहण कराने के लिये सन्यास ग्रहण को कौन अवरुद्ध करेगा? ' क्षत्रिय का सन्यास में अधिकार ही नहीं है, यदि ऐसा कहा जाय तो यह उचित नहीं, क्योंकि लिङ्गधारणसन्यास में अधिकार न होने पर भी भरत तथा ऋषभदेवादि के समान विक्षेपक कर्म के त्यागरूप सन्यास तो अधिकार है ही । ' सर्वाधिकार विच्छेदि " इस वार्तिकवचन में क्षत्रियादिकों के लिये भी विद्वत्सन्यास में अधिकार सिद्ध किया है । इसलिए लोकसंग्रह ज्ञानी के कर्म का मुख्य प्रयोजन नहीं है । यदि ऐसा कहते हैं, ठीक हैं । भगवान् कहते हैं कि " हे अर्जुन! मेरे लिये तीनों लोकों में कोई कर्तव्य नहीं है, तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो मेरे लिये प्राप्त हो तथा मुझे प्राप्त करनी हो, फिर भी मैं कर्म करने में ही

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६इति स्वदृष्टान्तेनाधिकारिकत्वादर्जुन एवैवं नियोज्यते, न तु क्षत्रियमात्रम् ' इति तुष्यतु भवान् । नीलकण्ठप्रतिपादितक्षत्रियवैश्या-दीनां भैक्ष्याचरणन्तु न सन्यासरूपं किन्तु देहयात्रा निर्वाहार्थमेव । तस्य सन्यासपदवाच्यताविचारस्तु व्यर्थ एव । ब्रह्मनिष्ठायाः सर्वकर्म-सन्यासरूपत्वेऽपि व्यवहारे न सत्यासपदवाच्यता, जनकादिषु व्य-भिचारात् । १२२ प्रवृत्त रहता हूँ " इस वाक्य में भगवान् ने अपने दृष्टान्त से आधिकारिक अर्जुन को ही लोकसंग्रह के लिये कर्म करने की प्रेरणा दी है । क्षत्रियमात्र के लिये भगवान् का यह कथन नहीं है । यदि ऐसा आप कहते हैं तो आप प्रसन्न रहें । नीलकण्ठ प्रतिपादितक्षत्रियवैश्यादिकों के लिये भिक्षा का आचरण सन्यासरूप नहीं है, किन्तु देह के निर्वाह के लिये लौकिक है | अतः " लौकिक-भिक्षाचरण सन्यास पद का वाच्य है, " यह विचार तो व्यर्थ ही है । ब्रह्मनिष्ठा सर्वकर्मों का सन्यास ( त्याग ) रूप है, किन्तु लोकव्यवहार में उसे सन्यास नहीं कहा जाता है । क्योंकि जनकादिकों में ब्रह्मनिष्ठा-रूप सन्यास विद्यमान है, फिर भी उनको सन्यासी नहीं कहा जाता । १२२. ध्यान रहे, ( १ ) ' तुरीयातीतोपनिषत् ' में तुरीयातीत और अवधूतों के मार्ग का निरूपण है । उसमें कुटीचक को अधिका-रानुसार बहूदक, बहूदको हंस हंसको परमहंस और परमहंस को तुरीयातीत तथा अवधुत होने का उपदेश है । उसी सन्दर्भ में चरमभूमिका की अभिव्यक्ति होने की स्थिति में दण्डादि आश्रमसूचक चिह्नों के जल में विसर्जन का प्रतिपादन अवश्य है; परन्तु द्वन्द्वातीत दिगम्बर होकर बालोन्मत्तपिशाचवत् एकाकी विचरण करने का असाधारण वर्णन भी है! उसके बल पर दण्डादि के त्याग का समर्थन अनर्गल और अमङ्गल है । सन्यासोपनिषत् और शाट्यायनी उपनिषत् में स्पष्ट ही निषेध है । ( २ ) बहुत से महानुभाव मैत्रेयी और गार्गी को अविवा-हिता और सन्यासिनी मानकर स्त्रियों के सलिङ्गसंन्यास और

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२०० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अविवाह का समर्थन करते हैं । उनका यह कृत्य शास्त्रविरुद्ध है । कारण यह है कि मैत्रेयी श्रीयाज्ञवल्क्य महर्षि की धर्मपत्नी थी । उसने पतिदेव से ज्ञान अवश्य प्राप्त किया; परन्तु वह ' संन्यासिनी हो गयी ' यह कथन सर्वथा भ्रामक है । " अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्व े भार्ये बभूवतुमैत्रेयी च कात्या-यनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव । सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृतास्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे विब्रूहीति । " ( बृह ० ४.५.१,४ ) ही गार्गी की बात । वह भी विवाहिता थी । अन्यथा शतपथब्राह्मण बृहदारण्यक में उसके वंशधर - पुत्र का उल्लेख कैसे होता? यह बात दूसरी है कि सत्संग और पौर्वदैहिक प्रज्ञा के बल पर वह त्याग और तपसे सम्पन्न तथा ब्रह्मवादिनी थी । अथ स्त्री प्रधानो विद्यावंशः ( ४ ) पाराशरी पुत्रो गार्गी पुत्रात्, ( ५ ) गार्गीपुत्रः पाराशरी कौण्डनी पुत्रात्, ( ६ ) पाराशरी कौण्डिनी पुत्रो गार्गी पुत्त्रात्, ( ७ ) गार्गी पुत्रो गार्गी पुत्रात्, ( ८ ) गार्गी पुत्रो बाडेयी पुत्रातु, ॥ ( शतपथ ब्राह्मणम् १४ का ५ प्र ०, ५ ब्रा ०, ३० बृहदा ० ६ अ ०, ४ ब्रा ०, ३० ) स्त्रियों के लिये अविवाहिता रहना अनुपयुक्त है । इस तथ्य की विशेष जानकारी महा ० शल्यपर्व वृद्धाकन्या के इति-हास से प्राप्त करें ( अध्याय ५२, गीताप्रेस ) । ( ३ ) इसी सन्दर्भ में यह भी समझ लेना आवश्यक है कि बृहदारण्यक उपनिषत् के अनुसार यह तथ्य भी सिद्ध है कि अवरवर्ण का शिष्य बनना और वरवर्ण को अपना शिष्य बनना प्रतिलोम ( विपरीत ) है -“ प्रतिलोमं चैतद्यद् ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयात् ” ( बृह ० उप ० २.१.१५ ) स्मृति के अनुसार भी यह तथ्य सिद्ध है कि ' बहुश्रुत

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पूषन्नेक यम सूर्य प्राजापत्य॒ व्यूह रश्मीन्समूह । तेजो यत्ते रूपङ्कल्याणतमन्तत्र्त्त पश्यामि योऽसावसौ पुरुषस्सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥

( शुक्लयजुर्वेद काण्वसंहिता ४०.१.१६ ) पूषन्, एक, यम, सूर्य, प्राजापत्य, व्यूह, रश्मीन्, समूह । तेजः, यत्, ते, रूपम्, कल्याणतमम्, तत्, ते, पश्यामि, य:, असौ, असो, पुरुषः, सः, अहम्, अस्मि ॥१६ ॥

हे जगत् पोषक! हे एकाकी गमन करनेवाले! हे यम- संसार का संयमन करनेवाले! हे सूर्य - रश्मि, प्राण और रसों के धारक! हे प्रजापतिनन्दन! आप अपनी किरणों को समेट लें! आप श्री के अनुग्रह से मैं आपके अत्यन्त शोभनस्वरूप का दर्शन करता हूँ । मैं आपके भूः, भुवः स्वः रूप शिर, भुजा और चरणयुक्त पुरुषाकार हिरण्यगर्भात्मक- प्रज्ञा और प्राणशक्ति से विशिष्ट अन्तर्यामिरूप पूर्ण -स्वरूप से अपनी एकरूपता का अनुभव करता हुआ ही आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ ॥१६ ॥

तथा ज्ञान - गुण - कर्म से युक्त होने पर भी क्षत्रियादि का ब्राह्मण अभिवादन न करे ' - -" नाभिवाद्यास्तु विप्रेण क्षत्रियाद्याः कथञ्चन । ज्ञानकर्मगुणोपेता यद्यप्येते बहुश्रुताः ॥ " ( वीरमित्रोदये संस्कारप्रकाशे )

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२०२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् एवमुपासकः मार्गं याचित्वा, उपास्यतेजः पुञ्जेन प्रतिहता ( मा ) अस्मदीया दृष्टिः ताम् आक्षिप क्षमस्वेति तत्तेजसः अपनयनं प्रार्थयते । हे पूषन्! जगतः पोषक सूर्य, हे एकर्षे! ' ऋषिः गत्यर्थः ' एक एव ऋषति गच्छतीति एकषि:! " सूर्य एकाकी चरति " ( यजुः अ. मा. सं. २३.४६ ) इति श्रुतेः । सर्वस्य संनियमनात् यमः, हे यम! रश्मीनां प्राणानां रसानाञ्च स्वीकरणात् प्रेरणात् सूर्यः, हे सूर्य! प्रजापतेरप-त्यगुणविशिष्ट, हे प्राजापत्य! त्वदीयान् रश्मीन् किरणसंघान् व्यूह विगमय ते तेजस्तापकः ज्योतिः - उत्कृष्टं ज्योतिः समूह सूर्य एकीकुरु उपसंहर । ते तव यद्रूपं कल्याणतमं अत्यन्तशोभनं तदहं पश्यामि साक्षा-करोमि तव प्रसादात् पश्यामि । किञ्चाहं न त्वां भृत्यवद्याचे । अपि • च तव असौ यः खलु प्रसिद्धः अस्य मण्डलान्तर्वर्त्तो भूरित्यादि व्याह-त्यवयवः ' तस्य भूरिति शिरः, भुव इति बाहू, सुवरितिप्रतिष्ठा ' ( बृह ० ५.५.३ ), पुरुष: पुरुषाकारत्वात्पूर्णं वानेन प्राणबुद्ध्यात्मना जगत्सम-स्तमिति पुरुष: पुरिशयनाद्वा " य एषोन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः ” ( छान्दो ० अ. १, खं. ६.६ ) इति श्रुत्यन्तरम् । सः अहमस्मि तद्विधो इस प्रकार उपासक मार्ग की याचना करके उपास्य के तेजः-पुञ्ज से प्रतिहत होकर उसके संवरण की प्रार्थना करता है । है पूषन्! अर्थात् आप जगत् के पोषक हैं । हे एकर्षे! आप अकेले ही चलते हैं । जैसा कि ' सूर्य एकाकी चरति ' इस श्रुति से सिद्ध है । हे यम! आप सबके नियायक हैं । हे सूर्य! आप रश्मि, प्राण और रसों के धारक और प्रेरक हैं । हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि अपनी प्रशस्त और प्रखर किरणमाला को दुरा लीजीए - समेट लीजिए । आपका अत्यन्त शोभन - कल्याणतम जो दिव्यरूप है, आपके अनुग्रह से मैं उसका दर्शन करता मैं आपसे भृत्य की तरह याचना नहीं करता, अपितु जो आपका आदित्यमण्डलान्तर्गत ' भू: ' आदि व्याहृतिरूप दिव्य हिरण्यगर्भात्मक पूर्णस्वरूप है, उससे अपनी एक-रूपता का अनुभव करके - आपसे एकरूप हो करके, प्रार्थना कर रहा हूँ । सूर्य! आप मुझे अनुग्रहपूर्वक अङ्गीकार करें – अपनाएँ ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २०३ पासनादहमपि तद्रूप एव भवामि । अतः हे सूर्य! मां अनुगृहाण इति भावः । यद्वा - इदानीं तत्संबोधनानि कार्यान्तरार्थं - पूषन् हे पूषन्नेकर्षे! एकश्चासावृषिश्च कर्षिस्ततत्संबोधनमे कर्षे एकाकित्वेन गन्तः, यम! हे नियन्तः, सूर्य! हे सुडुगमन, प्राजापत्य, हे प्रजापतेरपत्यभूत! इदानीं कार्यमाह - व्यूह, उपसंहर रश्मी किरणान्समूह सम्यक् स्वात्ममात्रं कुरु । तेजश्चन्द्रमण्डलम् । तत्रापि प्रयोजनमाह -- यत्प्रसिद्ध ते तव रूपं स्वयञ्ज्योतिः स्वभावं कल्याणतममतिशयेन कल्याणमानन्दात्मरूपं तदुक्तं ते तव पुनस्ते शब्द उपचार निवारणार्थः । पश्यामि साक्षा-करोमि । द्रष्टृदृश्यप्रयुक्त भेदं वारयति यः प्रसिद्धोऽसावादित्यमण्डल -स्थ: परोक्षोऽसौ शास्त्रदृष्ट्या प्रत्यक्षः पुरुषः परिपूर्णः स उक्तो यः प्रसिद्धः स एवाहमस्मत्प्रत्ययालम्बनोऽस्मि भवामि ॥ १६ ॥

अथवा अब प्रयोजनान्तर की सिद्धि के लिये संबोधनान्तर का प्रयोग किया जाता है । हे पूषन्! हे एकर्षे! आप एक हैं और ऋषि हैं, अर्थात् अकेले ही गमन करते हैं 1 । हे यम! आप नियन्ता होने से यम हैं । हे सूर्य! आप सुष्ठु - शोभन गमन करनेवाले हैं । हे प्राजा-पत्य! आप प्रजापतिनन्दन हैं । आपसे जो कार्य है, उसे मैं निवेदित करता हूँ । आप किरणसमूह का उपसंहार कीजिए । आप परम आह्लादक - आनन्दप्रद स्वप्रकाश आनन्दात्मकचन्द्र हैं । निःसन्देह आपके दिव्य स्फूर्तिप्रद रम्य इस रूपका मैं साक्षात्कार करता हूँ, आपको दृश्य और स्वयं को द्रष्टा बनाकर नहीं - अपि तु आप से निज ऐक्य का अनुभव कर सर्वथा एकीभूत होकर । शास्त्रसिद्ध हिरण्यगर्भात्मकरूप से मैं यही कहता हूँ कि जो यह आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुष है, वह मैं हूँ || १६ ||

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ऋग्वेदादिविभागेन शान्तिः अथ हैनं श्रीरामचन्द्र मारुतिः पप्रच्छ ' ऋग्वेदादि विभागेन पृथक् शान्तिमनुब्रूहि ' इति । स होवाच श्रीरामः । ऐतरेय कौषीतकी -नादबिन्द्वात्मप्रबोधनिर्वाणमुद्गलाक्षमालिका त्रिपुरासौभाग्यबह्वृचाना-मृग्वेदगतानां दशसंख्याकानामुपनिषदां ' वाङ मे मनसी ' ति शान्तिः ॥ १ ॥

ईशावास्य बृहदारण्यजाबाल हंसपरमहंससुबालमन्त्रिकानिरालम्ब-त्रिशिखीब्राह्मणमण्डलब्राह्मणाद्वयतारकपै ङ्गलभिक्षुतुरीयातीताध्यात्म -तासारयाज्ञवल्क्यशाट्यायनी मुक्तिकानां शुक्लयजुर्वेदगतानामेकोनवि-शति संख्याकानामुपनिषदां ' पूर्णमद: ' इति शान्तिः ॥२ ॥

कठवल्ली तैत्तिरीय कब्रह्मकैवल्यश्वेताश्वतरगर्भनारायणामृतबि -मृतनादकालाग्निरुद्रक्षुरिकासर्व सारशुकरहस्यतेजोबिन्दुध्यानबिन्दु ब्रह्मविद्यायोगतत्त्वदक्षिणामूर्तिस्कन्दशारी रकयोगशिखैकाक्षराक्ष्यव धूत कठरुद्रहृदययोगकुण्डलिनीपञ्च ब्रह्मप्राणाग्निहोत्रवराहक लिसंतरण -सरस्वती रहस्यानां कृष्ण यजुर्वेदगतानां द्वात्रिंशत्संख्याकानामुपनिषदां ' सह नाववत्व ' ति शान्तिः ॥३ ॥

केनच्छान्दोग्यारुणि मैत्रायणिमंत्रेयी वज्रसूचिकायोगचूडामणि-वासुदेव महत्संन्यासाव्य क्त कुंडिकासावित्री रुद्राक्षजाबालदर्शन जाबालीनां सामवेदगतानां षोडशसंख्याकानामुपनिषदा ' माप्यायन्त्वि ' ति शान्तिः ॥४ ॥

प्रश्नमुण्डकमाण्डूक्याथर्व शिरोऽथर्व शिखाबृहज्जाबालनृसिंहताप -नीनारदपरिव्राजकसीताशरभमहानारायणराम रहस्य रामतापनीशाण्डि-ल्यपरमहंसपरिव्राजकान्नपूर्णासूर्यात्मपाशुपतपरब्रह्मत्रिपुरातपन देवीभाव-नाब्रह्मजाबालगणपतिमहावाक्यगोपालतपन कृष्ण हयग्रीवदत्तात्रेयगारुडा-नामथर्ववेदगतानामेकत्रिंशत्संख्याकानामुपनिषदां ' भद्रं कर्णेभिरिति शान्तिः || ५ || ( मुक्तिकोपनिषत्सु १ )

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ईशावास्योपनिषत् [ २०५

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ १२३

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अदः पूर्णम् इदं पूर्णं पूर्णात् पूर्णं उदच्यते । पूर्णस्य पूर्ण आदाय पूर्णं एत्र अवशिष्यते । वह कारणब्रह्म पूर्ण है - परिच्छेदशून्य है । यह जगत् कार्यब्रह्म भी उस कारण ब्रह्म की पूर्णता से पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण उस कारणब्रह्म से पूर्ण यह कार्यजगत् उदित होता है । पूर्ण इस कार्य जगत की पूर्णता पृथक् कर लेने पर पूर्ण कारणब्रह्म ही शेष रहता है । कार्य का प्रतिषेध हो जाने पर ब्रह्म, कार्य - कारण विनिर्मुक्त अद्वितीय चिदात्मा अवशिष्ट रहता है । आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक प्रपञ्च की अध्यारोप और अपवाद - प्रक्रिया से परब्रह्मरूपता सिद्ध हो जाने पर सर्वात्मभाव के अमोघ - प्रभाव से त्रिविधतापों की निवृत्ति हो है । १२३. अदस्तत्पदलक्ष्यं ब्रह्म, पूर्ण माकाशवव्यापि अपरिच्छिन्नमिति यावत् । इदं च त्वं पद लक्ष्यं जीवस्वरूपमपि पूर्णम् । ननु द्वयोः पूर्णत्वं विरुद्ध वस्तुपरिच्छेदादित्यत आह पूर्णादित्यादि । पूर्णाद् ब्रह्मणः पूर्णमेव जीवस्वरूपमुदच्यत उद्रिच्यत उदेतीति यावत् । पूर्णस्य परिणामासंभवेन तत उत्पद्यमानस्योपाधिकत्वमेव महाकाशादुद्गच्छतो घटाद्याकाशस्य तथा दर्शनात् । औपाधि-कस्य च तदेव तथ्यं रूपं यतः स उदेतीति निदानाभेदात् पूर्णादुद्रिच्यमानं पूर्णमेवेति भावः । ननु जीवस्वरूपस्य पूर्णत्वे कुतस्तन्नानुभूयते तत्राह - पूर्णस्येत्यादि । ' पूर्णस्य यत्पूर्ण स्वरूपं तन्मात्रमादाय उपाध्यँशमपहायेति यावत् । पश्यत इति शेषः । पूर्णमेवावशिष्यते - पूर्णमेवस्वरूपमवभातीति यावत् । घटेन सहावलोक्यमानस्य नभसो s पूर्णत्वभानेऽपि घटांशं विहायावलो -पूर्णत्वस्यैवानुभवो यथेति भावः । त्रिः शान्तिरिति पठन-न्त्वाध्यात्मिकादित्रिविधोपद्रवशमनायेति ध्येयम् । आदौ च

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२०६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' पूर्णमद: ' ( बृह ० उप ० ५.१.१ ) पूर्ण न कुतश्चिद् व्यावृत्तं व्यापीत्येतत् । निष्ठा च कर्तरि द्रष्टव्या । ' अद ' इति परोक्षाभिधायि सर्वनाम, तत्परं ब्रह्मेत्यर्थः । तत् सम्पूर्णमाकाशवद् व्यापि निरन्तरं निरुपाधिकं च तदेवेदं सोपाधिकं नामरूपस्थं व्यवहारापन्न पूर्ण स्वे रूपेण परमात्मना व्याप्येव नोपाधिपरिच्छिन्न न विशेषात्मना । ' पूर्णमद: ' - पूर्णम् - जो कहीं से भी व्यावृत्त नहीं है, अर्थात् व्यापक है । ' पूर्ण ' शब्द में जो निष्ठा नामक ' क्त ' प्रत्यय हुआ है उसे कर्ता अर्थ में समझना चाहिये - ' पूरयति निरतिशयं वर्द्धत इति पूर्ण । ' अद: ' यह पद परोक्ष अर्थ को बतलानेवाला सर्वनाम है, इसका अर्थ है-वह परब्रह्म । वह सम्पूर्ण है, आकाश के समान व्यापक, अन्तरहित और उपाधिशून्य है । वही यह नाम रूप में स्थित व्यवहारदशा को प्राप्त प्रणवघोषो वेदोच्चारणनियतो मङ्गलमातनोतीति विज्ञेयम् । ' अदः ' परमात्मा और ' इदं ' जीव - दोनों ही स्वरूपतः पूर्ण हैं । उपाधिविनिर्मुक्त ( माया और अविद्या या पञ्चकोश विरहित ) ' तत् ' ( ईश्वर ) और ' त्वं ( जीव ) का ऐक्य स्वतः सिद्ध है । घटाकाश और महाकाशका ऐक्य इसमें दृष्टान्त है । इससे देशकृत परिच्छेदरूपा अव्यापकताको आशङ्का दूर हो जाती है । महाकाशतुल्य परब्रह्म से घटाकाशतुल्य ' जीवका : उदय होता है । जीवेश्वर में औपाधिक कार्य - कारणभावरूप सम्बन्ध होने से वस्तुकृत परिच्छेद भी नहीं है । उपाधि परामर्श के कारण जीव अपूर्ण - सा परिलक्षित होता है । उपाधिवारण-पूर्वक अवलोकन करने पर घटनिरसनपूर्वक नभदर्शनवत् जीव पूर्ण ही अवशिष्ट रहता है -- परिलक्षित होता है । क्योंकि ब्रह्म सर्व उपप्लव - द्वं तभेदविरहित है; अतः आध्यात्मिकादि त्रिवि -ताप से नित्य विनिर्मुक्त है । इस तथ्य की अनुभूति ' शान्तिः ' पद की तीन बार आवृत्ति करके की जाती है । ' ॐ ' यह ब्रह्मात्मक ब्रह्म नाम है । यह तत्त्व का बोधक और तत्त्वभावना से उपास्य है । वेदपाठ के प्रारम्भ में इसका उच्चारण मंगल-दायक होता है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २०७ तदिदं विशेषापन कार्यात्मकं ब्रह्म ' पूर्णात् ' कार्यात्मन ' उदच्यत ' उद्रिच्यत उद्गच्छतीत्येतत् । यद्यपि कार्यात्मनोद्रिच्यते तथापि यत् स्वरूपं पूर्णत्वं परमात्मभावं तन्न जहाति पूर्णमेवोद्रिच्यते । ' पूर्णस्य ' कार्यात्मनो ब्रह्मणः, ' पूर्ण ' पूर्णत्वमादाय गृहीत्वा आत्मस्वरूप कर सत्वमापद्य, विद्यया अविद्याकृतं भूतमात्रोपाधिसंसर्ग-जमन्यत्वावभासं तिरस्कृत्य पूर्णमेवानन्तरमबाह्य प्रज्ञानघनैकरस-स्वभावं केवलं ब्रह्मावशिष्यते । यदुक्त ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् तस्मात्तत् सर्वमभवत् ' ( बृह ० १.४.१० ) इत्येषोऽस्य मन्त्रस्यार्थः । तत्र ' ब्रह्मेत्य ' स्यार्थः ' पूर्णमद ' इति । ' इदं पूर्णमिति ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीदि ' त्य-स्यार्थः । तथा च श्रुत्यन्तरम् “ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह " ( क ० उ ० २.१.१० ) इति । अतोऽदः शब्दवाच्यं पूर्ण ब्रह्म तदेवेदं पूर्ण कार्य -स्थं नामरूपोपाधिसंयुक्तमविद्ययोद्रिक्तन् । तस्मादेव परमार्थस्वरूपाद-न्यदिव प्रत्यवभासमानम् । तद् यदात्मानमेव परं पूर्ण ब्रह्म विदित्वा सोपाधिकरूप भी पूर्ण है अर्थात् अपने परमात्मस्वरूप से व्यापक ही है-उपाधिपरिच्छिन्न ( सीमित ) विशेषरूप से व्यापक नहीं है । अभिप्राय यह कि उपाधिपरिच्छिन्न परिलक्षित होता हुआ भी वस्तुतः अपरिच्छिन्न वह यह विशेषभाव को प्राप्त हुआ कार्यात्मक ब्रह्म, पूर्ण से - कारणात्मक ब्रह्म से ' उदच्यते ' उद्रिक्त- उद्गत ( अभिव्यक्त ) होता है । यद्यपि यह कार्यरूप से उदित होता है, तथापि इसका जो स्वरूपभूत पूर्णत्व अर्थात् परमात्मभाव है, उसे नहीं छोड़ता । अभिप्राय यह कि पूर्ण ही प्रकट होता है । इस पूर्ण अर्थात् कार्यरूप ब्रह्म का सम्पूर्ण पूर्णत्व लेकर अर्थात् उसे आत्मस्वरूप के साथ एकरस करके अविद्याकृत भूतमात्रोपाधिके संसर्ग से होनेवाली भेदप्रतीति को मिटा देने पर पूर्ण ही अर्थात् अन्त-र्बाह्यशून्य प्रज्ञानघनैकरसस्वरूप शुद्धब्रह्म ही शेष रहता है । पहले जो यह कहा गया था ' ब्रह्म वा ' = " आरम्भ में यह एक ब्रह्म ही था, उसने अपने को जाना, इसलिये वह सर्व हो गया " यही इस मन्त्र का भी अर्थ है । इसमें ' ब्रह्म ' इस पद का अर्थ है ' पूर्णमदः '