वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 241–250
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 241–250
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२०८ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ' अहमदः पूर्ण ब्रह्मास्मि ' इत्येवं पूर्णमादाय तिरस्कृत्यापूर्ण स्वरूपताम-विद्याकृतां नामरूपोपाधिसम्पर्कजामेतया ब्रह्मविद्यया पूर्णमेव केवल-मवशिष्यते । तथा चोक्तम् - ' तस्मात्तत्सर्वमभवत् ' - ( १.४.१० ) इति । अत्र वर्णयन्ति पूर्णात्कारणात् पूर्ण कार्यमुद्रिच्यते । उद्रिक्त कार्य वर्तमानकालेऽपि पूर्णमेव परमार्थवस्तुभूतं द्वंतरूपेण । पुनः प्रलयकाले पूर्णस्य कार्यस्य पूर्णतामादायात्मनि धित्वा पूर्णमेवावशिष्यते कारण-रूपम् । एवमुत्पत्तिस्थितिप्रलयेषु त्रिष्वपि कालेषु कार्य - कारणयोः पूर्ण-तैव । सा चैकैव पूर्णता कार्यकारणयोर्भेदेन व्यपदिश्यते । एवञ्च तात्मकमेकं ब्रह्म । यथा किल समुद्रो जलतरङ्ग फेनबुबुदाद्यात्मक एव । यथा च और ' इदं पूर्ण ' यह ' ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् ' इसका अर्थ है । ऐसी ही एक दूसरी श्रुति भी है ' यदेवेह तदमुत्र ' = " जो यहाँ है, वही परलोक है और जो परलोक में है, वही यहाँ "; अत: ' अदः ' शब्दवाच्य जो पूर्णब्रह्म है, वही ' इदं पूर्णम् ' अर्थात् कार्यवर्ग में स्थित नाम - रूपात्मक उपाधि से युक्त अविद्याजनित ( कार्यब्रह्म ) है । वह इसी परमात्मस्वरूप परब्रह्म से अन्य - सा प्रतीत होता है । ऐसी स्थिति में जब अपने को ही पूर्ण परब्रह्म जानकर ' मैं ही यह पूर्ण ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार पूर्णत्व को लेकर इस ब्रह्मविद्या के द्वारा अविद्याकृत नामरूपोपाधि के संसर्ग से " उत्पन्न हुई अपूर्णरूपता का तिरस्कार कर दिया जाता है तो केवल पूर्ण ही रह जाता है । यह तथ्य ' तस्मात्तत्सर्वमभवत् ' इस वचन के द्वारा कहा गया है । यहाँ कोई ऐसा वर्णन करते हैं कि पूर्ण कारण से पूर्ण कार्य उत्पन्न होता है । वह उत्पन्न हुआ कार्य वर्तमान समय में भी पूर्ण ही है | अभिप्राय यह कि द्वौ तरूप से परमार्थ वस्तुरूप ही है । फिर प्रलय-काल में पूर्णकार्य की पूर्णता को लेकर उसका आत्मा में आधान करने पर कारणरूप पूर्ण ही रह जाता है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय - तीनों ही कालों में कार्य - कारणकी पूर्णता ही है । यह एक पूर्णता ही कार्य - कारण के भेद से कही जाती है । इस प्रकार द्व ेताद्वतरूप एक ब्रह्म है | जिस प्रकार समुद्र जल - तरङ्ग - फेन- बुदबुदादिरूप ही है और
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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २०६ जलं सत्यं तदुद्भवाश्च तरङ्ग फेनबुबुदादयः समुद्रात्मभूता एवाविर्भाव-तिरोभावधर्मणः परमार्थसत्या एव । एवं सर्वमिदं द्वतं परमार्थसत्य-मेव जलतरङ्गादिस्थानीयम्, समुद्रजलस्थानीयं तु परं ब्रह्म । एवं च किल द्वैतस्य सत्यत्वे कर्मकाण्डस्य प्रामाण्यं, यदा तं तमिवाविद्याकृतं मृगतृष्णिकावदनृतम्, अद्व ेतमेव परमार्थतः, तदा किल कर्मकाण्डं विषयाभावादप्रमाणं भवति । तथा च विरोध एव स्यात् - वेदैकदेशभूतोपनिषत् प्रमाणम्, परमार्थाद्व तवस्तुप्रतिपादक-त्वात्; अप्रमाणं कर्मकाण्डम् असद्वंत विषयत्वात् । तद्विरोध परि-जिहीर्षया श्रुत्यैतदुक्तं कार्यकारणयोः सत्यत्वं समुद्रवत् ' पूर्णमदः ' इत्यादिनेति । तदसत् । विशिष्टविषयापवादविकल्पयोरसम्भवात् । न हीयं सुविवक्षिता कल्पना, कस्मात्? यथा क्रियाविषय उत्सर्गप्राप्तस्यैक-देशेऽपवादः क्रियते, यथा " अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्य: " ( छा ० उ ० ८.१५.१ ) इति हिंसा सर्वभूतविषयोत्सर्गेण निवारिता, तीर्थे उसमें जैसे जल सत्य है, उसी प्रकार उससे निष्पन्न आविर्भाव - तिरो-भाव - धर्मी तरङ्ग,, फेन और बुदबुदादि भी समुद्ररूप और परमार्थ सत्य हैं । इस प्रकार यह जलतरङ्गादिस्थानीय सारा द्व ेतप्रपञ्च परमार्थ सत्य ही है और परब्रह्म तो समुद्रजलस्थानीय ही है । इस प्रकार द्वै तके सत्य होने पर ही कर्मकाण्ड की प्रामाणिकता हो सकती है । जब त केवल द्वैत - सा तथा अविद्याकृत और मृगतृष्णा के तुल्य मिथ्या है - वस्तुतः अद्वैत ही सत्य है - ऐसा मानते हैं, तब तो अपने विषयका अभाव हो जाने के कारण कर्मकाण्ड अप्रामाणिक ही हो जाता है । ऐसा मानने पर परमार्थ अद्वैत का प्रतिपादन करनेवाली होने के कारण वेद के एक देशरूपा उपनिषदें तो प्रामाणिक हैं; किन्तु अत विषयक होने से कर्मकाण्ड अप्रमाणिक हैं - विरोध अनिवार्य होगा । उस विरोध का परिहार करने की इच्छा से ही ' पूर्णमदः ' इत्यादि मन्त्र द्वारा श्रुति ने समुद्र के समान कार्य - कारण की यह सत्यता बतलायी है । ऐसा कहना अनुचित है, क्योंकि ब्रह्म वस्तुत: निर्विशेष है । ' उसमें विशिष्ट के विषयभूत अपवाद और विकल्प सम्भव नहीं हैं ।
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२१० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् विशिष्ट विषये ज्योतिष्टोमादावनुज्ञायते; न च तथा वस्तुविषय इहा-ब्रह्मोत्सर्गेण प्रतिपाद्य पुनस्तदेकदेशेऽपवदितु ं शक्यते, ब्रह्मणोऽद्वैत-त्वादेवैकदेशानुपपत्तेः । तथा विकल्पानुपपत्तेश्च । यथा ' अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति ' ( मै ० स ० ४.७.६ ), ' नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति ' इति ग्रहणाग्रहणयोः पुरुषाधीनत्वाद्विकल्पो भवति; न त्विह तथा वस्तुविषये ' द्व'तं वा स्याद्वैतं वा ' इति विकल्पः सम्भवति, अपुरुषतन्त्रत्वादात्मवस्तुनः, विरोधाच्च द्वैताद्वै तत्वयोरेकस्य । तस्मान्न सुविवक्षितेयं कल्पना । श्रुतिन्यायविरोधाच्च - ' सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनं निरन्तरं पूर्वापरबाह्याभ्यन्तरभेदविवर्जितं ' ( बृ ० ४.५.१३ ), ' सबाह्याभ्यन्तर-मजं ', ' नेति नेत्यस्थूलमनण्वह्रस्वमज रमभयममृतम् ' - इत्येवमाद्याः श्रुतयो निश्चितार्थाः संशयविपर्यासाशङ्कारहिताः सर्वाः समुद्र े प्रक्षिप्ताः स्युरकिञ्चित्करत्वात् । आपकी यह कल्पना उपयुक्त नहीं है । क्यों? जिस प्रकार क्रिया के विषय में उत्सर्ग से सामान्यतः प्राप्त किसी क्रिया का किसी एक देश में विशेष - वचन द्वारा अपवाद कर दिया जाता है; जैसे " तीर्थों ( पुण्य-कर्मों ) को छोड़कर अन्यत्र सभी प्राणियों की हिंसा न करता हुआ " इस वाक्य में जिस सब प्राणियों की हिंसा का सामान्यतः निवारण किया है, उसकी तीर्थ यानी विशिष्ट विषय - ज्योतिष्टोमादि यज्ञों में अनुज्ञा दी जाती है । वैसा उस प्रकार वस्तु के विषय में यहाँ अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन कर, फिर उसके किसी एक देश में ब्रह्म का अपवाद ( बाघ ) नहीं किया जा सकता; क्योंकि अद्वैत होने के कारण ब्रह्म का कोई एक देश नहीं हो सकता । इसी प्रकार विकल्प न होने के कारण भी ऐसा असम्भव है जिस प्रकार ' अतिरात्र में षोडशी का ग्रहण करे ', ' अतिरात्र में षोडशी का ग्रहण नहीं करे ' इस प्रकार ग्रहण और अग्रहण पुरुष के अधीन होने के कारण उनमें विकल्प हो सकता है, उस प्रकार ' क्वचिद् अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति क्वचिन्न गृह्णाति ' ( कहीं अतिरात्र में षोडशी का ग्रहण करे और कहीं न करे ) यहाँ वस्तु के विषय में ' वह त हो या अद्वैत हो " ऐसा विकल्प नहीं हो सकता; क्योंकि आत्मा '
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २११ तथा न्यायविरोधोऽपि सावयवस्यानेकात्मकस्य क्रियावतो नित्यत्वानुपपत्तेः । नित्यत्वं चात्मनः स्मृत्यादिदर्शनादनुमीयते । तद्वि-रोधश्च प्राप्नोत्यनित्यत्वे भवत्कल्पनानर्थक्यं च; स्फुटमेव चास्मिन् पक्षे कर्मकाण्डानर्थक्यम्, अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशप्रसङ्गात् । ब्रह्मणो द्वैताद्वैतात्मकत्वे समुद्रादिदृष्टान्ता विद्यन्ते, कथ-मुच्यते भवतस्य ताद्वै तत्वं विरुद्धमिति । न अन्यविषयत्वात् । नित्यनिरवयववस्तुविषयं हि विरुद्धत्वम-वोचाम द्वैताद्वै तत्वस्य, न कार्यं विषये सावयवे । तस्माच्छु, तिस्मृतिन्या-विरोधादनुपपन्नेयं कल्पना; अस्याः कल्पनाया वरमुपनिषत्परित्याग एव । पुरुषतन्त्र नहीं है । इसके अतिरिक्त एक ही वस्तु का द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध भी है । इसलिये यह कल्पना युक्तियुक्त नहीं है । श्रुति और युक्ति से विरुद्ध होने के कारण भी उक्त कथन उचित नहीं । ' सैन्धवधन के समान प्रज्ञान एकरस घनरूप - निरवयव निरव-काश तथा पूर्वापर और बाह्याभ्यन्तर भेद से रहित है ', ' सबाह्याभ्य-न्तर अज हैं ', ' नेति - नेति ', ' अस्थूल - अनणु - बह्रस्व - अजर - अभय और अमृत है ' इत्यादि श्रुतियाँ जो निश्चितार्थ और संशय- विपर्यय तथा शङ्का से रहित हैं, सारी ही समुद्र में डाल देनी होंगी; क्योंकि रहकर भी वे कुछ नहीं कर सकतीं । इसी तरह युक्तिविरुद्ध भी है । कारण यह है कि सावयव, अने-कात्मक और क्रियावान् पदार्थ का नित्य होना संभव नहीं है । साथ ही स्मृति आदि के अवलोकन से आत्मा के नित्यत्व का अनुमान होता है । उसका अनित्यत्व मानने पर उस युक्तिसिद्ध नित्यत्व से विरोध प्राप्त होता है । साथ ही यदि आत्मा का अनित्यत्व स्वीकार भी किया जाय तो भी आपकी कल्पना व्यर्थ ही ठहरती है । इस पक्ष में कर्मकाण्ड की व्यर्थता स्पष्ट ही है; क्योंकि ( आत्मा को अनित्य मानने पर ) बिना किये की प्राप्ति और किये हुए का नाश होने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । " किन्तु ब्रह्म के द्व ैताद्वैतरूप होने में समुद्रादि दृष्टान्त विद्यमान हैं, फिर आप ऐसा कहते हैं कि एकका द्वैताद्व तरूप होना विरुद्ध है? "
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२१२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अध्येयत्वाच्च न शास्त्रार्थेयं कल्पना । न हि जननमरणाद्यनर्थ-शतसहस्रभेदसमाकुलं समुद्रवनादिवत् सावयवमनेकरसं ब्रह्म ध्येयत्वेन विज्ञत्वेन वा श्रुत्योपदिश्यते । प्रज्ञानघनतां चोपदिशति, " एकधैवानुद्रष्टव्यम् " ( बृ ० उ ० ४. ४.२० ) इति च अनेकधादर्शनापवादाच्च - " मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' ( ४.४. १६ ) इति । यच्च श्रुत्या निन्दितं तत्र कर्तव्यम्, यच्च न क्रियते न स शास्त्रार्थः ब्रह्मणोऽनेकरसत्वमनेकधात्वं चतरूपं निन्दितत्वान्न द्रष्टव्यम्; अतो न शास्त्रार्थः । यत्वेकरसत्वं ब्रह्मणः; तद् द्रष्टव्यत्वात् प्रशस्तम्, प्रशस्तत्वाच्च शास्त्रार्थो भवितु-मर्हति । ऐसा कहना उपयुक्त नहीं । कारण यह है कि हम जो विरोध दर्शाते हैं, उसका विषय अन्य है । हमने नित्य और निरवयव वस्तु के विषय में द्वैताद्वैत का विरोध बतलाया है, सावयव कार्य के विषय में नहीं । इसीलिये श्रुति स्मृति - युक्तिविरुद्ध होने के कारण यह कल्पना अनुचित है । इस कल्पना की अपेक्षा तो उपनिषत् का परि-त्याग कर देना ही अच्छा है । सावयव ब्रह्म का ध्येयरूप से उपदेश न होने के कारण भी यह कल्पना शास्त्र का तात्पर्य नहीं हो सकती । जो जन्म - मरणादि सैकडों - सहस्रो अनर्थरूप भेद से सम्पन्न और समुद्र तथा वनादि के समान सावयव और अनेकरस है, ऐसे ब्रह्म का श्रुति द्वारा ध्येय या विज्ञेय-रूप से उपदेश नहीं किया जाता । और भी । श्रुति उसकी प्रज्ञानघनता का भी उपदेश देती है तथा ऐसा भी बताती है कि " उसे निरन्तर एक प्रकार ही देखना चाहिये । ", " जो यहाँ नानावत् देखता है, वह मृत्यु - से - मृत्यु को प्राप्त होता है ", इस प्रकार अनेकरूप देखने की निन्दा की जाने से भी यही सिद्ध होता है । साथ ही श्रुति ने जिसकी निन्दा की हो, वह कर्तव्य नहीं हो सकता तथा जो नहीं किया जाता, वह शास्त्र का तात्पर्य नहीं हो सकता । ब्रह्म के द्वतरूप अनेकरसत्व और नानात्व की निन्दा की गयी, इसलिये उसे ब्रह्म में नहीं देखना चाहिये, अत एव वह शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । ब्रह्म की जो एकरसता है, वही द्रष्टव्य
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २१३ यत्क्तं वेदेकदेशस्याप्रामाण्यं कर्मविषये द्वताभावादद्व ते च प्रामाण्यमिति तत्र यथाप्राप्तोपदेशार्थत्वात् । न हि द्वैौतमद्वैतं वा वस्तु जातमात्रमेव पुरुषं ज्ञापयित्वा पश्चात् कर्म वा ब्रह्मविद्यां वोप-दिशति शास्त्रम् । न चोपदेशाहं द्वंतम्; जातमात्रप्राणिबुद्धिगम्यत्वात् । न च स्यानृतत्वबुद्धिः प्रथममेव कस्यचित्स्यात्, येन द्वैतस्य सत्यत्वमुप-दिश्य पश्चादात्मनः प्रामाण्यं प्रतिपादयेच्छास्त्रम् । नापि पाषण्डिभिरपि प्रस्थापिताः शास्त्रस्य प्रामाण्यं न गृह्णीयुः । तस्माद् यथाप्राप्तमेव द्वंौतमविद्याकृतं स्वाभाविकमुपादाय स्वाभाविक्यैवाविद्यया युक्ताय रागद्वेषादिदोषवते यथाभिमतपुरुषार्थ-साधनं कर्मोपदिशत्यग्रे पश्चात् प्रसिद्धक्रियाकार कफलस्वरूप दोषदर्शन-होने के कारण प्रशस्त है और प्रशस्त होने के कारण वह शास्त्र का तात्पर्य भी हो सकती है । साथ ही यह जो कहा कि " द्व ेत का अभाव होने के कारण वेद के कर्मविषयक एक भाग की तो अप्रामाणिकता हो जायगी और अद्वैतविषय में प्रामाणिकता होगी । " वह उपयुक्त नहीं; क्योंकि शास्त्र तो यथाप्राप्त वस्तु का उपदेश करने के लिये है । जन्म लेते ही किसी पुरुषको द्वैत या अद्वैत तत्त्व का बोध कराकर फिर उसे कर्म या ब्रह्मविद्या का उपवेश शास्त्र नहीं कर देता । यह भी हृदयङ्गम कर लेना आवश्यक है कि ' द्व'त ' उपदेश के योग्य है भी नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्येक जन्मधारी जीवकी बुद्धि का विषय है | आरम्भ से ही किसी की द्वौत में मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती, जिससे शास्त्र उसे द्वैत का सत्यत्व समझकर फिर अपनी प्रामाणिकता का प्रतिपादन करे । साथ ही पाखण्डियों द्वारा प्रवृत्त किये हुए शिष्य-गण शास्त्र का प्रामाण्य स्वीकार न करें, ऐसी भी बात नहीं है । अतः अविद्याकृत यथाप्राप्त स्वाभाविक द्वैत को ही ग्रहणकर जो स्वाभाविक अविद्या से युक्त और रागद्वेषवान् है, उस पुरुष को शास्त्र पहले उसके अभिमत कर्मरूप पुरुषार्थ के साधन का उपदेश करता है । पीछे जो प्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलस्वरूप कर्म में दोष
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२१४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् वते तद्विपरीतौदासीन्यस्वरूपावस्थानफलार्थिने तदुपायभूतामात्मैक-त्वदर्शनात्मिकां ब्रह्मविद्यामुपदिशति । अथैवं सति तदौदासीन्यस्व-रूपावस्थाने फले प्राप्ते शास्त्रस्य प्रामाण्यं प्रत्यर्थित्वं निवर्तते । तद-भावाच्छास्त्रस्यापि शास्त्रत्वं तं प्रति निवर्तत एव । तथा प्रतिपुरुषं परिसमाप्तं शास्त्रमिति न शास्त्रविरोधगन्धो-यस्ति, अर्द्ध तज्ञानावसानत्वाच्छास्त्रशिष्यशासनादिद्व तभेदस्य । अन्य-तमावस्थाने हि विरोधः स्यादवस्थितस्य, इतरेतरापेक्षत्वात्तु शास्त्र-शिष्यशासनानां नान्यतमोऽप्यवतिष्ठते । सर्वसमाप्तौ तु कस्य विरोध आशङ्कताद्वै ते केवले शिवे सिद्ध े ? नाप्यविरोधता अत एव । देखनेवाला तथा उससे विपरीत उदासीनरूप से स्थितिरूप फल का इच्छुक होता है, उसे ही वह उसकी उपायभूता आत्मैकत्वदर्शनरूपा ब्रह्मविद्या का उपदेश करता है । फिर ऐसा होने पर उस औदासीन्य-स्वरूप में स्थितिरूप फल की प्राप्ति हो जाने पर शास्त्र के प्रामाण्य के प्रति आकाङक्षा की निवृत्ति हो जाती है । उसका अभाव हो जाने पर उसके लिये शास्त्र का शास्त्रत्व भी निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार प्रत्येक पुरुष के प्रति शास्त्र का प्रयोजन पूरा हो जाता है, इसलिये शास्त्र के विरोध की तो गन्ध भी नहीं है, क्योंकि शास्त्र, शिष्य और शासनादि द्वैतभेद की तो अद्वैतज्ञान होने पर समाप्ति हो जाती है । यदि इनमें से कोई भी रह जाता तो उस रहे हुए का विरोध रहता । ये शास्त्र, शिष्य और शासनादि एक - दूसरे की अपेक्षा रखनेवाले हैं, इसलिये इनमें से कोई भी अवस्थित नहीं रहता । इस प्रकार सबकी समाप्ति हो जाने पर तो एकमात्र शिवस्वरूप नित्य-सिद्ध अद्वैत में किसके विरोध की आशङ्का की जाय! और इसी से उसका किसी से अविरोध भी नहीं है । अब हम ब्रह्म को द्वैताद्व तरूप मानकर भी बतलाते हैं कि उस रूप होने पर भी शास्त्र का विरोध ऐसा ही है । जब हम समुद्रादि के समान द्वैताद्वै तरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार करते हैं, उसके अतिरिक्त कोई अन्य वस्तु नहीं मानते, उस समय भी हम आपके बतलाये हुए शास्त्रविरोध से मुक्त नहीं होते । किस प्रकार? इस प्रकार कि द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, वह शोक- मोहादि से अतीत
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २१५ अथाप्यभ्युपगम्य ब्रूमः - द्वौ ताद्व तात्मकत्वेऽपि शास्त्रविरोधस्य तुल्यत्वात् । यदापि समुद्रादिवद् द्वौ ताद्वं तात्मकमेकं ब्रह्माभ्युपगच्छामो नान्यद् वस्त्वन्तरम्, तदापि भवदुक्ताच्छास्त्रविरोधान्न मुच्यामहे । कथम्? एकं हि परं ब्रह्म द्वैताद्वैतात्मकं तच्छो कमोहाद्यतीतत्वादुप-देशं न कांक्षति । चोपदेष्टा अन्यो ब्राह्मणो द्वैताद्वै तरूपस्य ब्रह्मण एकस्यैवाभ्युपगमात् । अद्वैतविषयस्यानेकत्वादन्योन्योपदेशो न ब्रह्मविषय उपदेश इति चेत्? तदा द्वाद्व तात्मकमेकमेव ब्रह्म नान्यदस्तीति विरुध्यते । यस्मिन्द्वं तविषयेऽन्योन्योपदेशः सोऽन्यो द्वैतं चान्यदेवेति समुद्रदृष्टान्तो विरुद्धः । न च समुद्रोदकैकत्ववद् विज्ञानैकत्वे ब्रह्मणोऽन्यत्रोपदेशग्रह-णादिकल्पना सम्भवति । न हि हस्तादिद्व ताद्व तात्मके देवदत्त वाक्कर्ण-योर्देवदत्तं कदेशभूतयोर्वागुपदेष्ट्री कर्णः केवल उपदेशस्य ग्रहीता, देव-दत्तस्तु नोपदेष्टा नाप्युपदेशस्य ग्रहीतेति कल्पयितुं शक्यते; समुद्र-कोदकात्मत्ववदेकविज्ञानवत्त्वा देवदत्तस्य । तस्माच्छु तिन्यायविरोध-इचाभिप्रेतार्थासिद्धिश्चैवं कल्पनायां स्यात् । तस्माद् यथाव्याख्यात एवास्माभिः ' पूर्णमद: ' इत्यस्य मन्त्रस्यार्थः । होने के कारण उपदेश की आकांक्षा नहीं रख सकता । इसके सिवा उपदेश करनेवाला भी ब्रह्म से भिन्न नहीं हो सकता; क्योंकि द्वैताद्वैत-रूप एक ही ब्रह्म स्वीकार किया गया है । यदि ऐसा हो कि द्वैत विषय अनेकरूप है, इसलिए उसमें परस्पर उपदेश हो सकता है, ब्रह्मरूप विषय में उपदेश नहीं होता, तब तो " द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, उससे भिन्न कोई नहीं है " इस कथन से विरोध होगा । जिस द्वौ तविषय में परस्पर उपदेश होता है, वह तो अन्य होगा और द्व ेत अन्य होगा - इस प्रकार समुद्र का दृष्टान्त विरुद्ध ही रहा । यदि समुद्र के जल एकता के समान विज्ञान की भी एकता है, तो ब्रह्म से भिन्न उपदेशग्रहणादि की कल्पना संभव नहीं हो सकती । हस्त पादादि द्वैताद्वैतरूप देवदत्त में देवदत्त के एकदेश-भूतवाणी और कर्ण में से केवल वाणी उपदेश करनेवाली है और अकेला कर्ण उपदेश को ग्रहण करनेवाला है, देवदत्त न तो उपदेश करनेवाला है और न उसे ग्रहण करनेवाला - ऐसी कल्पना नहीं की जा
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२१६ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् सकती, क्योंकि जिस प्रकार समुद्र एकमात्र जलस्वरूप है, उसी प्रकार देवदत्त भी एक ही विज्ञानवान् है । अतः ऐसी कल्पना करने में श्रुति और युक्ति से विरोध तथा अभीष्ट अर्थ की असिद्धि भी होगी । इस लिये ' पूर्णमद: ' इस मन्त्र का अर्थ, जैसी हमने व्याख्या की है, है शुक्ल यजुर्वेदान्तर्गत काण्वशाखानुसार-मीशावास्योपनिषन्मन्त्राणां पाठः ॐ ईशा वास्यमिद ँ सर्वं L -यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विनम् ॥ १ ॥
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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २१७ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः ॥ ए॒वं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥
- L
सुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तास्ते प्रेयाभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
अनेजदेकं मनसो जीवीयो नैनद्दवा श्राप्नुत्र॒न्पूर्वमर्षत् । तद्भावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥
। तद॑जति॒ तन्नो॑ज॑ति॒ तद्दृरे तद्वा॑न्ति॒के तदन्तरस्य॒ सर्वस्य॒ तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥५ ॥