वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 41–50
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 41–50
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८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् पनिषदात्मनिश्चयवत इष्यत एव कर्म काण्डाप्रामाण्यम्, मिथ्यात्मदर्शन-प्रत्येव तत्प्रामाण्यात् । न केवलं उपनिषद एव ब्रह्मणि पर्यवसिताः, सर्वेषामपि वेदानां कर्मोपासनाभिश्चित्तशुद्धिविक्षेपनिराकरणपारम्पर्येण ब्रह्मण्येव पर्यवसानात् ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ', ' वेदैश्च सर्वैरहमेववेद्य ' ( कठोपनिषद् १ - २ - १५, गीता १५-१५ ) इति श्रुतिस्मृतिभ्याम् । आत्मदेवत्यो अनुष्टुप् छन्दस्कोऽयमध्यायः दधीचाथर्वणेन दृष्टः । गर्भाधानादिभिः संस्कारैः संस्कृतमधीतवेदं समुत्पादितपुत्रं यथा शक्त्यनुष्ठितयज्ञं निष्पापं निःस्पृहं यमनियमोपेतं जन्मान्तरीयैः कर्मभिः सत्संस्कारैर्वा नित्यानित्यविवेकेनेहामुत्रफलभोगवैराग्यवन्तं शान्तं दान्तं देखता है और सबभूतों का विनाश होते हुए भी परमेश्वर को अविनाशी देखता है, वही यथार्थ देखता है । ' और ' एक एवहि भूतात्मा ' - ' एक ही सब प्राणियों की आत्मा प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है, स्वरूप से एक होता हुआ भी, अनेक उपाधि के कारण प्रतिबिम्ब रूपसे अनेक प्रकार जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान देखने में आता है ' इस भगवद्गीता और मोक्षशास्त्र में प्राप्त वचन से भी अद्वैत ही सिद्ध होता है । " जैसे किसीभूत की हिंसा मत करो " इस निषेधशास्त्र के अर्थ के निश्चयवाले पुरुष के लिये श्येनादियाग की विधि का अप्रामाण्य और जैसे तीव्र क्रोध से व्याप्त अन्तःकरणपुरुष के प्रति ही श्येनादि-विधि का प्रामाण्य है, उसी प्रकार औपनिषद् आत्मा के निश्चयवाले पुरुष के लिये कर्मकाण्ड का अप्रामाण्य स्वीकार किया ही जाता है, क्योंकि मिथ्यात्मा के दर्शनवाले के लिये ही उसका प्रामाण्य है । केवल उपनिषदें ही ब्रह्म में तात्पर्यवाली नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण वेदों का भी कर्म तथा उपासना से चित्तशुद्धि व विपेक्ष की निवृत्ति द्वारा ब्रह्म में ही तात्पर्य है । अतएव सर्ववेदों का वेद्य ही ब्रह्म को ' सर्वे वेदा: ' इस श्रुति तथा ' वेदैश्च सर्वै: ' इस स्मृति में कहा है । इस ४० वें अध्याय के आत्मा देवता, अनुष्टुप् छन्द तथा दधीच आथर्वण ऋषि हैं ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ S उपरतितिक्षं श्रद्धासमाधानवन्तं मुमुक्षं साधनचतुष्टयसम्पन्नं पुत्रं-शिष्यं वा ऋषिरुपदिशन्नाह-ईशा वास्यमिद सर्वंयत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १ ॥
सर्व शास्ता परमेश्वर सर्वप्राणियों का अन्तरात्मा है, वही सब का नियन्ता है । नियम्य से बाहर स्थित राजा के समान वह तटस्थ नहीं है । मायाभूमि ब्रह्माण्डभूमि में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्रतीयमान दृष्ट और अदृष्ट नाम - रूप - क्रियात्मक जगत् वस्तुतः मिथ्या ही है । सत्य आत्मस्वरूप परमात्मा से यह स्थावर - जङ्गमात्मक जगत् ज्ञातरस्सी से कल्पित सर्पादिवत् आच्छादनीय ( बाधनीय ) है । ईश्वर से अभिन्न आत्मा की भावनावाला तू सर्वेषणा के त्याग से आत्मा का पालनकर अर्थात् अध्यासका निराकरण कर । अपने तथा दूसरे के धन की अभिलाषा मत कर । भला यह धन किसका है? किसीका नहीं, मिथ्या ही तो है । ' ईष्ट इति ईट, ईश ऐश्वर्ये ' ईशिता सर्वशास्ता परमेश्वरः । स हि सर्वप्राणिनामन्तरात्मा सन् सर्वमीष्टे न बहिरंगराजादिवत् तटस्थ ईश्वरः । तेन स्वात्मभूतेन सत्येनात्मनेशा परमात्मना इदं प्रत्य-क्षादिभिर्दृश्यमानमनृतं दृष्टादृष्ट सर्वं नामरूपात्मकं जगद्वास्यमा-च्छादनीयं ज्ञातया रज्ज्वा कल्पितं सर्पादिवद्बाधनीयम् । वस आच्छा-दने, ' ऋहलोर्ण्यत् ' पा ० ३ | १ | १२४ इति ण्यत् प्रत्ययः । न चात्रावारकेण गर्भाधानादि संस्कारों से युक्त, कृतवेदाध्ययन, पुत्रवान, यज्ञो के ' अनुष्ठान से युक्त, निष्पाप, निःस्पृह यम - नियम से युक्त अथवा जन्मान्तरीय संस्कारों से नित्यानित्यवस्तु विवेक, इसलोक तथा परलोक के भोग से वैराग्ययुक्त, राम- दम - उपराम - तितिक्षा - श्रद्धा - समा धानादि साधनवान् मुमुक्षु अर्थात् साधन - चतुष्टय से सम्पन्न पुत्र अथव शिष्य को उपदेश करता ऋषि कहता है- ' ईशावास्यमिद 23 सर्व '
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१० ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् वस्त्रादिना फलादिकमिवाच्छादनीयम् । दुःखात्मकस्य प्रपंचस्य सम्ब-रणमात्रेणानर्थनिवृत्या पुरुषार्थासिद्ध ेः । तस्मात् सर्वमिदंकारास्पदं दृश्यं मिथ्याभूतमनात्मजातं प्रत्यक्चैतन्याभिन्नेनाधिष्ठानभूतेन परमार्थ-सत्येन परमात्मना ‘ स्वात्मभूतपरमात्मैवेदं सर्वमिति ' परमार्थदर्शनेना-नात्मतिरस्करणमे वाच्छादनम् । इदम्पदनिर्दिष्ट ं किमित्यत आह - जगत्यां मायभूमौ यत् किंच किञ्चित् जगत् जङ्गमादिकम् तत्सर्वमप्याच्छाद-नीयम् । यद्वा किञ्चेति भिन्नक्रमः । किञ्च यत् जगत्यां पृथिव्यां जगत् जङ्गमादि स्वस्वामिभावसम्बन्धोपलक्षितं तेन सर्वेण त्यक्तेन त्यक्तस्व-स्वामिसम्बन्धेन भुञ्जीथाः भोगाननुभवेः । जगत्यां पृथिव्यां ब्रह्माण्ड-ईष्ट इति ईट, ईश ऐश्वर्ये ईशिता सर्व शास्ता परमेश्वर, वही सर्व प्राणियों का अन्तरात्मा हुआ सर्व का नियन्ता है । नियम्य से बाहर स्थित राजा के समान ईश्वर तटस्थ नहीं है । उस स्वात्मभूत सत्य-स्वरूप ईश्वर = परमात्मा से, यह प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्रतीयमान, मिथ्या दृष्ट व अदृष्ट सर्व नाम - रूपात्मकजगत् आच्छादनीय ( बाधयोग्य ) है, जैसे ज्ञातरज्जु से कल्पित सर्पादिक बाधयोग्य होता है । आच्छाद-नार्थक वस धातु से यत् प्रत्यय होकर ' वास्य ' शब्द सिद्ध हुआ है । यहाँ आवरकवस्त्रादि से फलादि के समान जगत् आच्छादनीय नहीं है, क्योंकि दुःखात्मक प्रपञ्च के आच्छादनमात्र से अनर्थ की निवृत्ति से होनेवाली पुरुषार्थ की सिद्धि असंभव है । अत: इदंकारास्पद, मिथ्याभूत अनात्मसमुदायरूप सर्व दृश्य, प्रत्यक्चैतन्य से अभिन्न, अधिष्ठानभूत परमसत्य परमात्मा से आच्छादनीय अर्थात् बाधनीय है । यहाँ " आत्मभूत परमात्मा ही यह सर्व है " इस परमार्थ ( वास्तविक ) ज्ञान से अनात्मा का तिरस्कार ही आच्छादन ( बाध ) है | श्रुति में ' इदं ' पद से कहा हुआ कौन है? इस आकांक्षा का श्रुति स्वयं उत्तर कहती है कि-" जगत्यां " = मायाभूमि में जो कुछ स्थावर - जंगम जगत् है, वह सर्व आच्छादनीय है । अथवा ‘ किञ्च ' से भिन्नक्रम है । पृथिवी में स्वस्वामिभावसम्बन्ध से उपलक्षित चराचर जगत् है, उस त्यक्तस्वस्वामिभाव सम्बन्धवाले सर्व चराचर जगत् से भोग कर । अथवा जगत्यां पृथिवी अर्थात्
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ११ हवा, जगत्यामित्युपलक्षणार्थत्वात् । सर्वत्र यत्रक्वापि नामरूप-कर्माख्यं विकारजातं तत्सर्वमपि परमार्थसत्यात्मभावनया वास्यं त्यक्तव्यमेव । तत्त्वमसीत्यादि छन्दोग्योक्त्यापि सदहं न देहादिरित्येव प्रतिपत्तव्यम्, " ब्रह्म व सर्वमात्मैव सत्प्रकाशविशेषतः । हेयोपादेयभावोऽयं न सन् स्वप्नवदीर्यते ॥ ' " न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्ति न विकल्पोऽस्ति तत्त्वतः । नित्य प्रकाश • एवास्ति विश्वाकारो महेश्वरः ॥ " इत्युक्तः । यद्वा बाह्यवासनया भावनया विजातीयप्रत्ययानन्तरित सजातीयप्रत्ययप्रवाहेण सर्वं तिरस्करणीयम् । औपदेशिकज्ञानमात्रेणा-तदृष्टिबाधाभावेऽपि यथा चन्दनागर्वादेरुदकतृणमृदादिसम्बन्धादाद्र-भावादिना जातस्योपाधिकदौर्गन्ध्यस्य तत्स्वरूपनिघर्षणाभिव्यक्त न स्वाभाविकगन्धेन तिरस्करणं तद्वद्विचारादिना स्वाभाविकपरमार्थात्म-ब्रह्माण्डकटाहभूमि में ऐसा अर्थ करना, क्योंकि यहाँ जगती शब्द सर्व ब्रह्माण्ड के उपलक्षण के लिये है । जहाँ कहीं भी सर्वत्र नाम रूप - कर्म-संज्ञक विकार समुदाय है, वह सर्व भी परमार्थसत्आत्मा की भावना से त्याग के योग्य है । ' समस्त नामरूपात्मक विकारसमुदाय सच्चिदा-नन्दब्रह्म है, अतिरिक्त नहीं, ' ऐसा निश्चय ही त्याग है । ' तत्त्वमसि ' इस छान्दोग्य के कथनसे भी यही जानने योग्य है कि ' मैं सत्य ब्रह्म हूँ, न कि देहादिक ' । इस अर्थ के पोषक ' ब्रह्म ' वसव ', ' न बन्धोस्ति ' इत्यादि अन्य प्रमाण भी हैं । अथवा ब्रह्मवासना - भावना से उत्पन्न विजातीय प्रत्ययों के व्यवधान से रहित सजातीयप्रत्यय के प्रवाह से सर्व जगत् तिरस्कार के योग्य है । ' सर्व परमात्मा ही है, उससे अतिरिक्त जगत् कुछ नहीं, ' यही जगत् का तिरस्कार है । जैसे तृण, जल, मृत्तिका आदि के सम्बन्ध से चन्दन, अगरु आदि पदार्थों में गीलापन, मलिनता आदि से औपा-धिक दुर्गन्ध हो जाती है, परन्तु चन्दनादि के घर्षणादि से अभिव्यक्त सुगन्ध से उस दुर्गन्ध का तिरस्कार हो जाता है, उसी प्रकार उपदेश-प्राप्तपरोक्षज्ञानमात्र से मिथ्यादृष्टि के बाध न होने पर भी विचारादि से स्वाभाविक परमार्थ आत्मा के स्वरूप के सर्व मिथ्याप्रपंच का तिरस्कार हो जाता है। आविर्भाव से औपाधिक प्रपंच का तिरस्कार ही
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१२ ] वेदार्थ पारिजात: ( वा. सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् सत्यात्मस्वरूपाविर्भावेनोपाधिकस्य सर्वस्यानृतस्य प्रपञ्चस्य तिर -स्करणमेवाच्छादनम् । एवमीश्वरात्मभावनया युक्तस्य पुत्राद्य षणात्रय-संन्यास एवाधिकारो न कर्मस्विति तदाह तेन त्यक्तेनेति । तेन हेतुना त्यक्त ेन त्यागेन भुञ्जीथा आत्मानं पालयेथाः, भावे-निष्ठा प्रत्ययः । न च कर्मण्येव कुतो न निष्ठा प्रत्यय इति वाच्यम् त्यक्तस्य मृतस्य पुत्रभृत्यादेरात्मसम्बन्धित्वाभावेन पालकत्वासंभवात् । न च भुजोऽनवने इत्यस्यानवन एवेदृशं रूपमिति कथं पालनमर्थ इति-वाच्यम्, पालनेऽपि छांदसप्रयोग संभवात् । न च भोगार्थत्वेऽपि का हानिरिति वाच्यम्, भोगस्य रागप्राप्तत्वेन विधानानर्हत्वात्, तत्त्वज्ञानेन भक्त भोग्यभोगादेनिवर्तयितव्यत्वात् । पालनमपि अनात्मतादात्म्या -भिमाननिराकरणमेव, तदपि चाधिष्ठानसत्ताऽतिरिक्तायाः कल्पित-आच्छादन है । एवं ईश्वर से अभिन्न आत्मा की भावना से युक्त पुरुष-का पुत्र- वित्त तथा लोकैषणा के संन्यास में ही अधिकार है, कर्मों में नहीं, इसलिए यह कहा कि - तेन त्यक्तेन । मन्त्र में त्यक्त शब्द त्याग का वाचक है, न कि त्यागे हुए का । त्यागा हुआ मृत पुत्र, सेवकादि का आत्मा के साथ सम्बन्ध न होने से पालकपना ही असंभव है । अतः एषणाओं से रहित पुरुषका संन्यास में ही अधिकार होने से त्याग से आत्मा का पालन कर । “ भुजधातु अपालनार्थक है । उसका ही भुञ्जीथा: यह रूप है, अत: इस शब्द का पालन अर्थ कैसे संभव है? " यह कहना उचित नहीं, इसका पालन अर्थ छांदस है । ' इस शब्द का भोग अर्थ स्वीकार करने में क्या हानि है? " यह कहना भी उचित नहीं । क्योंकि भोग तो राग से ही प्राप्त है, उसके लिये विधान की आवश्यकता ही नहीं तथा तत्त्वज्ञान से भोक्ता-भोग्य - भोगादिरूप त्रिपुटी ही निवृत्त हो जाती है, तब तत्त्वज्ञ के लिये भोग का विधान कैसे सम्भव है? देहादि अनात्मा का आत्मा के साथ तादात्म्य - अध्यास हो रहा है, उसका निराकरण ही पालन है । यह ८. परिशिष्ट में संन्याससम्बन्धी विवेचन का अवलोकन और अनुशीलन करें ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १३ सत्ताया अनङ्गीकारेणैव सुसंम्पादनम् । तथा च योऽयं नामरूपक्रियात्म-कोऽध्यस्तः प्रपञ्चः स अधिष्ठानभूतस्य परमात्मनो याथात्म्यावगमेन मिथ्याभूतत्वेन त्यक्तव्यः । तेनानात्मप्रपञ्चविषयेण त्यागेन हे मुमुक्षो आत्मानं पालयेथाः सर्वेषणा त्यागेन संकल्पितात् संसारात् आत्मरक्षां कुरु । मा गृधः कस्यस्विद्धनम् । गृधु अभिकांक्षायाम् । कस्यस्वित् कस्यचित् स्वस्य परस्य वा धनं मा कांक्षीः । स्विदित्यनर्थको निपातः । आक्षेपार्थको at fir शब्दः । मा गृधः कस्मात् कस्यस्विद्धनमस्ति यद् गृध्येत न कस्यचिदित्यर्थः, आत्मैवेदं सर्वमित्यात्मभावनया सर्वस्य बाधितत्वेन त्यक्तत्वात् । आत्मन एवेदं सर्वमात्मैव च सर्वमतो मिथ्या-विषय गृद्धि मा कार्षीः । जडस्य सर्वस्यात्मशेषत्वात् अस्ति चेदात्मन प्राप्तत्वादेवांशानुपपत्तिः । बाधितत्वाच्चाकांक्षा विषयस्यैवा-अध्यास का निराकरणरूप पालन भी सम्पादन करना सुलभ है; क्यों कि अधिष्ठानभूत आत्मसत्ता से अतिरिक्त, कल्पित देहादिक की सत्ता अङ्गीकार ही नहीं । जो यह नाम रूपात्मक अध्यस्त प्रपंच है, वह अधिष्ठानभूतपरमात्मा के यथार्थबोध से मिथ्यात्वरूप से त्याग के योग्य है । अर्थात् अधिष्ठानभूत परमात्मा के यथार्थ अद्वैतबोध से मिथ्या जान लेना ही जगत् का त्याग है । हे मुमुक्षो! अनात्मरूप प्रपञ्चविषयकत्याग से आत्मा की रक्षा कर, अर्थात् सर्वेषणा के त्याग से कल्पितसंसार से आत्मरक्षा कर । किसी के अर्थात् अपने तथा दूसरे के धन की अभिलाषा मत कर; अथवा धन की अभिलाषा मत कर; क्योंकि धन किसका है; जो इसकी इच्छा की जाय अर्थात् किसी का भी नहीं । क्योंकि " यह सर्व जगत् आत्मा ही है " इस प्रकार की आत्मभावना ( आत्मविषयक दृढ़ निश्चय ) से सर्व जगत् को बाधित होने से त्याग दिया है । यह सर्व-जगत् आत्मा से ही उत्पन्न तथा आत्मा ही है, अतः मिथ्या की इच्छा मत कर । यदि यह जगत् है भी तब भी इस सर्व जड़ जगत् को आत्मा की शेषता ( भोगसाधनता ) होने से यह आत्मा का ही है । व्यापक आत्मा सदा प्राप्त है, इससे भी इसकी आकांक्षा संभव नहीं । बाधित
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१४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् भावादाकांक्षां मा कृथाः । अन्ये तु ईशा परमात्मना वास्यं वासनीयम् सर्वमिदं परमात्मन एवेति भावनीयम् । जगत्यां पृथिव्यां यज्जगत् जङ्गमादिकं स्वस्वामि-सम्बन्धालिङ्गितं स्यात् । तेनानेन सर्वेण त्यक्त ेन त्यक्तस्वस्वामिसम्ब-न्धेन भोगान् भुञ्जीथाः अनुभवेः । धनविषयामाकाङक्षां मा कृथाः । किं कारणम्? कस्यस्विद्धनम्? न कस्यचिदित्यर्थः । स्त्रियं पतिरन्यथा भुंक्त पुत्रोऽन्यथा भुंक्त प्राणिकोऽन्यथा । कटकाद्यलङ्करणान्यन्य-ञ्चान्यञ्चोपतिष्ठमानानि दृश्यन्ते । अतः सर्वार्थस्य यः स्वस्वामि-सम्बन्धो ममेदमिति बुद्धिः सात्वविद्या तामपनीय योगे प्रवर्तितव्यमि-त्यर्थः । अस्मिन्पक्षेऽप्यविद्यात्यागो विवक्षितः । केचित्तु -- ' ईशा वास्य ' परमेश्वरे वसितं सर्वं सचराचरं जगत्, ( मिथ्या ) होने से आकांक्षा का विषय ही नहीं, अतः आकांक्षा मत कर । अन्य तो यह अर्थ करते हैं कि - परमात्मा से वास्य = वासनीय है, अर्थात् ' यह सर्व जगत् परमात्मा का ही है ' इस चिन्तन के योग्य है । पृथिवी में जो भी स्थावर - जङ्गम जगत् है, वह स्वस्वामिभाव - सम्बन्ध से युक्त है । भाव यह कि सर्वजगत् में जीव ने ऐसा सम्बन्ध स्थापित कर लिया है, " मेरा यह भोगसाधन है, मैं इसका स्वामी हूँ " इस सम्बन्ध को दूर करने के लिये " यह सर्व जगत् परमात्मा का है ", ऐसा चिन्तन करना चाहिये । पूर्वोक्त सम्बन्ध रहित इस सर्व जगत् से भोगों को अनुभव कर । धनविषयक आकांक्षा मत कर । क्योंकि धन किस का है, न किसी का । एक स्त्रीको पति, पुत्र तथा आघूर्णक ( घूरने वाला ) भिन्न - भिन्न प्रकार से भोगते हैं । अतः वह किसी की नहीं । यदि किसी की होती तो एक प्रकार से ही भोगी जाती । कटक, कुण्डलादि भूषण भी अन्य अन्य मनुष्यों को प्राप्त होते देखे जाते हैं । अतः पदार्थ किसी एक का नहीं । एक का न होने से सर्व का है, जो सर्व का है उसमें " यह मेरा है " ऐसी बुद्धि करना ही अविद्या है । इस अविद्या को निवृत्त कर योग में प्रवृत्त होना चाहिये । इस पक्ष में भी अविद्या का त्याग ही विवक्षित ( तात्पर्य का विषय ) है ।
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पारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १५ संव्याप्तम् । संव्याप्तिश्च मृदेव घटस्य कार्यस्यकारणेनैव सम्भवति । कार्यञ्च कारणानतिरिक्तमेव । तस्मात् सर्वजगद् ब्रह्मकार्यत्वाद् ब्रह्म-व्याप्यत्वाद् ब्रह्मात्मकमेवेति ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति ' ( छान्दो -ग्यो ० ३.१४. १ ) श्रुतेः । यथा तज्जत्वात् तल्लत्वात् तदनत्वात् तरङ्ग फेन-बुदबुदादयः समुद्रात्मका एव तथैवाभिन्ननिमित्तोपादानकत्वेन सर्वस्य जगतस्तज्जत्वादिना ब्रह्मात्मकत्वमेव सर्वं । यस्मात् ब्रह्मात्मकं तस्मात्त्यक्त नात्मानं पालयेथाः । यद्वा ' ईशावास्यं सर्वमिदमी ' श्वर एवेति बुद्धिसम्पादनमेव जगतः परमेश्वरेण वासनमाच्छादनं वा । द्वा सर्वमिदमीशावास्यं वासयोग्यं । वस निवासे इत्यस्मात् बाहुलकात् अधिकरणे ण्यत् परमेश्वरस्य वासार्हम् । कोई ऐसा अर्थ करते हैं - यह समस्त जगत् परमेश्वर में वसित अर्थात् संव्याप्त है । और संव्याप्ति तो मिट्टी से घट की तरह, कारण से कार्य की ही संभव है । कार्य कारण से अतिरिक्त होता नहीं । इसलिए सर्वजगत् ब्रह्म का कार्य तथा व्याप्य होने से ब्रह्मात्मक ( ब्रह्म-रूप ) ही है । क्योंकि ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ०३.१४.१ ) यह श्रुति जगत् को ब्रह्मरूप ही कह रही है । जैसे समुद्र से उत्पन्न उसी में लीन तथा उसी से जीवन को प्राप्त तरङ्ग, फेन, बुदबुदादिक समुद्र ही हैं; उसी प्रकार ब्रह्म ही सर्व जगत् का अभिन्न निमित्तोपादान होने से ब्रह्म से उत्पन्न, ब्रह्म में ही लीन होनेवाला तथा ब्रह्म से ही जीवन प्राप्त जगत् ब्रह्म ही है । क्योंकि सर्व जगत् ब्रह्मात्मक है, अतः त्याग से आत्मा की रक्षा कर । अथवा ' यह सर्व जगत् ईश्वर ही है ' इस प्रकार की बुद्धि की प्राप्ति करना ही जगत् का परमेश्वर से वासन तथा आच्छादन है । अथवा यह सर्व जगत् ईश्वर के वासयोग्य है । अथवा ' सर्वमीशावास्य ' ' यह सर्वजगत् कारणभूत ज्ञात परमात्मा से परमात्मा में ही निवास के योग्य है । अर्थात् परमात्मा का अपरोक्ष-ज्ञान होने पर परमात्मा से अतिरिक्त जगत् अन्यत्र नहीं, अपि तु परमात्मा में ही परमात्मारूप से स्थित है ' ऐसा जानने योग्य है ।
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१६ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यद्वा सर्वमीशावास्यं सर्वमिदं जगत् ईशा कारणेन परमात्मना विज्ञातेन तस्मिन्नेव निवास्यम् । यद्वा परमेश्वरेण वासितमुत्पादितं स्थापितं नियमितञ्च ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसं-विशन्ति ' ( तैत्ति ० ३.१ ) इति श्रुतेः । न केवलं प्रत्यक्षगम्यमीशा वास्यम-पितु सावरणं ब्रह्माण्डमित्याह यदिति । यत् किञ्चित् श्रुतिप्रमाणसिद्ध स्थापितं जगत्यां जगत् स्थावरजङ्गमात्मकं शेषं विश्वमीशेनोत्पादितं नियमितञ्चेत्यर्थः । ( यत्किञ्च श्रुत्यादि प्रतिपाद्यं दिव्यमलौकिकं देवादिस्वर्गादि च ब्रह्मलोकपर्यन्तमनन्तकोटि ब्रह्माण्डव्याप्तं सर्वमेवेश्व-रेणाच्छादनीयम् । ) कारणस्यैवानुगत रूपेणकार्येषुपलभ्यमानत्वेन च निवासार्हता पटेषु तन्तूनां कटकमुकुटादिषु सुवर्णस्येव प्रपंचे परमा-त्मनः उपलभ्यमानत्वात् सर्वभूतेषु चात्मानमिति वक्ष्यमाणत्वात् । तेन त्यक्त ेन भूतजातेन न ममेति त्यक्तस्वीयसम्बन्धेन संन्यासेन नामरूप-त्यागेन भुञ्जीथाः पूर्वोक्तमात्मानमनुभवेः । भोगस्यानुभवानतिरिक्त-त्वात् यदृच्छाप्राप्तभोगान्वाऽनुभवेः । अथवा परमेश्वर से वासित = उत्पन्न किया, स्थापित तथा नियमित यह जगत् है, क्योंकि ' यतो वा इमानि भूतानि ' ( तै ०३. १ ) यह श्रुति जगत् को ब्रह्म से उत्पन्न, स्थित तथा नियमित कह रही है । केवल प्रत्यक्ष से गम्य जगत् ही ईश्वर से आच्छादनीय नहीं, अपि तु जो कुछ श्रुति आदि से गम्य स्वर्गादि भी ब्रह्म से आच्छादनीय है । कार्यों में कारण की अनुगत प्रतीति होती है, अतः कार्यों में कारण की ही निवास-योग्यता है । जैसे कार्यभूत पट, कटक - मुकुट आदिकों में कारणभूत तन्तु तथा सुवर्ण की निवासयोग्यता है । प्रपंच में परमात्मा की अस्ति-भाति - प्रियरूप से प्रतीति होने से निवासयोग्यता है । भूतों में आत्मा ( परमात्मा ) का निवास आगे ' सर्वभूतेषु चात्मानं ' यह श्रुति भी कह रही है । ' यह मेरा नहीं है ' इस प्रकार, जिससे अपनेपने का सम्बन्ध त्याग दिया है ऐसे भूतसमुदाय से अर्थात् नाम रूप के त्यागात्मक संन्यास से पूर्वोक्त आत्मा को अनुभव कर । भोग अनुभव से अतिरिक्त नहीं होता, अत: ' भोग कर ' के स्थान में ' अनुभव कर यह अर्थ भी विरुद्ध नहीं है | अथवा ' अदृष्ट ( प्रारब्ध ) से प्राप्त भोगों का अनुभव कर ' यह भी अर्थ है ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १७ यद्वासर्व जगत् ' परमेश्वरेण वास्यमुत्पादितं स्थापितं नियमित-मतः कारणात् तेनेशा परमेश्वरेण त्यक्त ेन विसृष्टेन दत्तेन स्वादृष्टानु-सारिणा विषयेण भुञ्जीथाः भोगाननुभवेः । इतोऽधिकं मा गृधः, परमेश्वराधीनत्वेन त्वदिच्छाया व्याहतत्वात् । यद्यपीदमपि व्यावहा-रिक दृष्ट्या न विरुद्धम्, तथापि साधारणं तत् कर्मप्रकरणेष्वपि तथैव ज्ञातत्वात् परमेश्वरस्यैव कर्मफलदातृत्वाङ्गीकारेण परमेश्वरेण दत्त नैव सर्वोऽपि भोगान् भुंक्त े । अत्र तु ज्ञानकाण्डे ज्ञाननिष्ठाङ्गतया पुत्राद्यषणात्रयत्याग विधित्सयैव " तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः " इत्युक्तिः समञ्जसा । भोगा अपि लोकत एव प्राप्ताः । सर्वेषणात्यागेनात्मपालन-मेव तु ज्ञानकाण्डोपयोगि, तत एव शङ्करभगवत्पादैस्तथैव व्याख्यातम् । ' ईश ऐश्वर्ये ' इत्यस्य धातोः कर्तरिक्विब विधानात् क्विपि लुते कृदन्तरूपमीट इति निष्पद्यते तस्य तृतीयैकवचनमीशेति । ननु अथवा ' यह सर्वजगत् परमेश्वर से उत्पन्न, स्थापित तथा निय-मित है, इसलिये उस परमात्मा से त्यक्त ( प्रदत्त ) अपने अदृष्टानुसारि-विषय से भोग का अनुभव कर । इससे अधिक की इच्छा मत कर । क्योंकि परमेश्वर के अधीन होने से आपकी इच्छा का व्याघात संभव है । ' यद्यपि यह अर्थ भी व्यावहारिक दृष्टि से विरुद्ध नहीं, तथापि यह अर्थ कर्मप्रकरण साधारण है, क्योंकि कर्मप्रकरण में भी ऐसा ही जाना जाता है कि परमेश्वर को ही कर्मफलदाता स्वीकार करने से परमेश्वर के द्वारा दिये पदार्थ से ही सर्व प्राणी- समुदाय भोगों को भोगता है । यहाँ ज्ञानकाण्ड में तो ज्ञाननिष्ठा के साधनरूप से पुत्रादि तीनों एषणाओं के त्याग का विधान करने के तात्पर्य से ही " त्याग से पालन कर " यह कथन उचित है । भोग भी लोक ( राग ) से प्राप्त हैं, अतः उनका विधान आवश्यक भी नहीं । सर्व एषणाओं के त्याग से आत्मा का पालन ही ज्ञानकाण्डोपयोगी है । अत एव भगवत्पादशंकराचार्यजी ने ऐसा ही व्याख्यान किया है । नियमनकर्ता का वाचक ' ईट् ' शब्द है । आत्मा को षट् - भाव-विकारों से रहित तथा कूटस्थ होने से ' ईट् ' शब्द की वाच्यता कैसे? क्योंकि ' नियमन करना तो विकार है । ' यह शंका भी उचित नहीं; क्योंकि मायारूप उपाधि के बल से परमेश्वर का ईशन ( नियमन ) कर्तृत्व