वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 51–60

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 51 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कर्त्तरि विविधानात् परमात्मनश्च षड्भावविकारवजितत्वेन कूटस्थत्वेन च कथं क्विबन्तेट् शब्दवाच्यतेति चेत् न, मायोपाधिवशात् परमेश्वरस्येशनकर्तृ ' त्वोपपत्या क्विबन्तपदवाच्यत्वे विरोधाभावात् । न चैवमीशित्रीशितव्यभावेन भेदः प्रसज्येतेतिवाच्यम्, अधिष्ठानारोप्य-भावे कल्पितभेदेन तदुपपत्त्या पारमार्थिक कल्पनाऽनुपपत्तेः । यथादर्शादिषु प्रतिबिम्बानामात्मा सन् बिम्बभूतो देवदत्त ईशिता भवति तद्वदेव सर्वभूतानामात्मा सन् परमेश्वरः सर्वं नियच्छति । वस्तु-तस्तु तदधीनस्थितिप्रवृत्तिमत्त्वमेव तन्नियम्यत्वन्तच्चाधिष्ठातारो-प्ययोः बिम्बप्रतिबिम्बयोः जलतरङ्गादिष्वेवोपपद्यते । अधिष्ठानसत्ता-स्फूर्तिभ्यामेवारोप्यसत्तास्फूर्तिमत्त्वं भवति अधिष्ठानसत्तास्फूर्त्यतिरिक्त-योरारोप्यसत्तास्फूर्त्योरनङ्गीकारात् । बिम्बस्थितिगतिभ्यामेव प्रति-बिम्बानां स्थितिगतयः प्रत्यक्षमनुभूयन्ते । तदनुविधानदर्शनात् तेषां जलाधीनैव तरङ्गाणां स्थित्यादयः, जलाभावे तेषां संभव हो जाने से क्विबन्त पदवाच्यता में कोई विरोध नहीं । ' नियम्य-नियामकभाव से तो भेद प्राप्त हो जायगा ' यह कहना भी उचित नहीं, क्योंकि अधिष्ठान तथा आरोप्यपने में कल्पितभेद रहने से नियम्य-नियामकभाव की सिद्धि संभव है, अतः पारमार्थिकभेद की कल्पना संभव नहीं । जैसे दर्पणादिगत प्रतिबिम्बों का आत्मा ( स्वरूप ) हुआ बिम्बभूत देवदत्त नियन्ता होता है, वैसे ही सर्वभूतों का आत्मभूत हुआ परमेश्वर सर्व का नियमन करता है । वस्तुतः नियन्ता के अधीन स्थिति तथा प्रवृत्ति वाला ही नियम्य होता है । ऐसा नियम्य नियामक-भाव, बिम्ब प्रतिबिम्ब, अधिष्ठान - आरोप्य तथा जलतरङ्गादिकों में ही बन सकता है । अधिष्ठान की सत्ता - स्फूर्ति से ही आरोप्य ( अध्यस्त ) की सत्ता - स्फूर्ति होती है । क्योंकि अधिष्ठान की सत्ता-स्फूर्ति से अतिरिक्त अध्यस्त की सत्ता - स्फूर्ति का अङ्गीकार ही नहीं । fara की गति - स्थिति आदि से ही प्रतिबिम्ब की गति स्थिति प्रत्यक्ष देखी जाती हैं । तरंगों में जल का अनुसरण देखा जाने से जल के अधीन ही तरङ्गों की स्थिति आदिक होती हैं । क्योंकि जल के अभाव में तरङ्गों के स्वरूप की ही सिद्धि नहीं होती । तटस्थ शासक के सिपाही, न्यायालयादि से सीमित ही शासन होता है । क्योंकि नियन्ता की आँखों में धूल डालकर अपराधियों की भी अपराध से मुक्ति देखी

पृष्ठ 52

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 52 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ १६ स्वरूपानुपलम्भात् । तटस्थस्यशास्तुस्त्वरक्षिन्यायालयादिभिः सीमित-मेवशासनम्, नियन्तृनेत्रधू लिप्रक्षेपादिभिरपराधिनामपि मोक्षदर्शनात् ।

तदुक्तम्-गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम् ।

इह प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥

( नारदीय मनुस्मृतिः १८.१०८, महा ० उद्योग ० ३५.७१ ) यद्यपि योगसिद्धः कश्चित्तटस्थोऽपिशासकः सर्वज्ञ सर्वशक्ति-कल्पः सन् प्रच्छन्नपापान पिदण्डयित्वाऽन्तः शरीरेष्वपि शासको भवति, यथोक्त कविना कालिदासेन कार्तवीर्यार्जुनस्यलोकोत्तरं प्रभावं

वर्णयता--अकार्य चिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवंश्चापधरः पुरस्तात् ।

अन्तः शरीरेष्वपि यः प्रजानां प्रत्यादिदेशाविनयं विजेता ॥

( रघु ० स ० ६ श्लो ० ३६ ) तथापि तदधोनगतिस्थितिमत्त्वं तटस्थे शासने सर्वथैव न जाती है । ऐसा " गुरुरात्मवतां " ( महा ० उ ० ३५.७१ ) इस श्लोक से कहा भी है । यद्यपि योगस्रिद्ध सर्वज्ञसर्वशक्तिमान् के सदृश हुआ तटस्थ शासक, छिपे पाप करनेवालों को भी दण्ड देकर मनुष्यों के अन्तःकरणों का भी शासक होता है, जैसाकि कार्तवीर्य अर्जुन के अलौकिक प्रभाव का वर्णनकर्ता कविकालिदास ने “ अकार्यचिन्ता १० ( रघु ० ६.३ ९ ) इस

श्लोक से कहा है ।

६. संयमशाली पुरुषों का शासक गुरु, दुष्टात्माओं का शासक राजा तथा छिपकर पापकर्ताओं का शासक सूर्यपुत्र यमराज होता है । १०. शासक कार्तवीर्यार्जुन पाप के विचार समकाल ही धनुष - बाण धारण किये पाप के विचारकों के सामने प्रकट हो, प्रजा के मानस अपराधों को भी निवृत्तकर देता था ।

पृष्ठ 53

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 53 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् संभवति । तस्मादारोप्यस्याधिष्ठानमिव प्रतिबिम्बानां बिम्बमिव तरङ्गाणां जलमिव सर्वेषां चेतनाचेतनानामात्मा सन्नेव परमेश्वरो नियच्छति । यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरः पृथिवी यं न वेद पृथिवी यस्य शरीरम्, एष त आत्मा अन्तर्याम्यमृत ' ( बृहदा ० ३-७-३ ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणवचनसहस्र ेभ्यः । दयानन्दः - ' - " हे मनुष्य? त्वं यदिदं प्रकृत्यादि पृथिव्यन्तं सर्वं जगत्यां गम्यमानायां सृष्टौ जगत् यद्गच्छति तत् ईशा ईश्वरेण सकलं-श्वर्यसम्पन्नेन सर्वशक्तिमता परमात्मना वास्यमाच्छादयितुं योग्यं सर्वतोऽभिव्याप्यमस्ति । तेन त्यक्त ेन वजितेन तच्चित्तर हितेन भुञ्जीथाः भोगाननुभवेः । किञ्च कस्यस्वित् कस्यापि स्विदिति प्रश्ने वा, धनं वस्तुमात्रं मा गृधः माभिकांक्षीः " इति तदपि यत्किञ्चित् तथापि शासक के अधीन गति स्थितिरूपशासन तटस्थ शासक में सर्वथा संभव नहीं । इसलिये यथा आरोप्य का अधिष्ठान, प्रतिबिम्बों का बिम्ब तथा तरङ्गों का जल नियमन करता है, वैसे ही चेतन-अचेतन सर्व पदार्थों का आत्मा हुआ ही परमेश्वर नियमन करता है । ऐसा ही “ यः पृथिव्यां " ( बृ ० ३.७.३ ) इत्यादि श्रुति स्मृति तथा पुराणों के हजारों वचनों से सिद्ध है । दयानन्दभाष्य - हे मनुष्य! तुम इस ज्ञायमानसृष्टि में जो यह परिवर्तनशीलजगत् है, वह सकल ऐश्वर्यसम्पन्न सर्वशक्तिमान् परमात्मा से आच्छादन करने योग्य अर्थात् सर्व ओर से व्याप्य है । उस त्यागे हुए जगत् अर्थात् संसार में संलग्नचित्त से रहित जगत् से भोगों को अनुभव कर । किसी के भी धन ( वस्तुमात्र ) की अभिलाषा मत कर । अथवा स्वित् शब्द प्रश्नार्थक है । भाव यह है कि धन किसका है? यह पूर्वोक्त स्वामिदयानन्दकृत अर्थ उचित नहीं । क्योंकि व्याप्तिमात से आच्छादन संभव नहीं, आकाश की व्यापकता ( व्याप्ति ) होने पर भी आकाश से घटादि का आच्छादन नहीं देखा जाता । आच्छादनशब्द आवरणार्थक है । मंत्र में ' तेन ' यह पद पूर्वका परामर्शक है । इससे पूर्व में जगत्का त्याग प्रकरण में प्राप्त है नहीं तेन शब्दका जगत् का त्याग अर्थ नहीं किया जा सकता तथा त्यागे, अतः रो भोगों का अनुभव संभव भी नहीं, क्योंकि त्यागी वस्तु का आत्मा जगत्

पृष्ठ 54

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 54 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २१ व्याप्तिमात्रेणाच्छादनानुपपत्त ेः । आकाशस्य व्यापकत्वेऽपि तेन घटा-द्याच्छादनादर्शनात्, आच्छादनस्य प्रावरणार्थकत्वात् । तेनेति पूर्वपरा-मशिपदं न च पूर्व जगत्त्यागः प्रकृतः । कथं च त्यक्त ेन जगता भोगानु-भवः संभवति त्यक्तस्यात्मसम्बन्धित्वाभावेन भोगसाधनत्वानुपपत्तेः । किञ्च संस्कृत हिन्दी व्याख्यानयोविरोधः त्यक्त ेन वर्जितेन तच्चित्त-रहितेनेति कस्य शब्दस्यार्थः? न च चित्तपदं वर्जितत्वविशिष्टवृत्ति-परम्, लोके वेदेऽपि तादृशव्यवहारादर्शनात् ॥ १ ॥

1

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।

ए॒वं त्वयि॒ नान्यथेतोऽस्ति॒ न कर्म लिप्यते नरे ॥२ ॥

इस लोक में जो सौ वर्ष जीने की इच्छा करे, वह अग्निहोत्रादि कर्मों को करते हुए ही जीने की इच्छा करे; मनुष्यत्वादि सकल संसार-धर्मों से हीन अद्वितीय आत्मतत्त्व है । उसे न जाननेवाले नरत्वाभिमानी तुझ मनुष्य के लिये इससे अतिरिक्त और कोई प्रकार नहीं है, जिससे तुझमें पाप का स्पर्श ( लेप ) न हो ॥ २ ॥

पूर्वोक्तार्थग्रहणेऽशक्तस्यासंस्कृतचित्तस्येदमुपदिशति । कर्माणि अग्निहोत्रादीनि निष्कामानि मुक्ति हेतूनि कुर्वन्नेव निर्वर्तयन्ने वेहलो के शतं समाः शतसंख्याकान् वत्सरान् एतावदेव मनुष्याणां विधात्रा से सम्बन्ध न होने से उसमें भोग साधनता ही असंभव है । यह दोष और भी है कि इनके हिन्दी तथा संस्कृत के व्याख्यानों में विरोध है । यदि कहा जाय ' त्यक्तपद का अर्थ वर्जित अर्थात् तच्चित्तरहित है ' तो यह प्रश्न होगा कि ऐसा अर्थ किस मूल के शब्द का है? ' चित्तपद वर्जितत्व विशिष्टवृत्ति का बोधक है, ' यह भी उचित नहीं, क्योंकि लोक तथा वेद में कहीं भी तादृश अर्थ में चित्तपद का प्रयोग नहीं देखा गया है ॥१ ॥

पूर्वोक्त मन्त्र के अर्थग्रहण में असमर्थ अनिर्मल चित्त! के पुरुष

पृष्ठ 55

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 55 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् औचित्येन कल्पितमायुः, तावत्पर्यन्तं जिजीविषेत् जीवितुमिच्छेत् । ११ पुरुषव्यत्ययेन जीवितुमिच्छेः १२ पथ्यहितमित भक्षणेन । शतं समा इत्युपलक्षणम् यावदायुः पर्यवसानमित्यर्थः । नात्र जिजीविषा विधेया तस्या रागप्राप्तत्वादप्राप्ते शास्त्रमर्थवदिति न्यायात्, किन्तु यथा प्राप्तानुवादेन यच्छतं वर्षाणि जीवितुमिच्छेः तत्कर्माणि कुर्वन्नेव जिजीविषेरित्यर्थः । एवमनेन प्रकारेण जिजीविषति नरे नरमात्राभि-मानिनि मनुष्यत्वादिसकलसंसारधर्म हीनमद्वयमात्मतत्त्वमजानाने त्वयि इतः एतस्मात् अग्निहोत्रादिनिर्वर्तनात् अन्यथा प्रकारान्तरं नास्ति येन प्रकारान्तरेण कर्म पापं न लिप्यते पापस्पर्शः त्वयि न भवेत्, तत्प्रका-रान्तरं नास्तीत्यर्थः । यस्मादेवं तस्मात् शास्त्रविहितानि अग्निहोत्रा-दीनि कर्माणि सदा कुर्वन्नेव जिजीविषेः । यथा स्वर्गप्राप्तौ नाना लिये आगे कहे मन्त्र का उपदेश दिया जाता है । निष्काम, मुक्ति के कारण अग्निहोत्रादि कर्मोंको कर्ता हुआ ही इस लोक में सौ वर्षपर्यन्त जीवन की इच्छा करे 1 " शतं समाः " यह वाक्य यावज्जीवन ( आयु की समाप्ति ) का उपलक्षण है । यहाँ जीवन की इच्छा का विधान नहीं है, क्योंकि जीवन की इच्छा तो राग से ही प्राप्त है । अन्य से अप्राप्त अर्थ का बोधक शास्त्र अर्थवाला होता है । किन्तु यथा प्राप्त ( राग से प्राप्त ) का अनुवाद होने से, जो सौ वर्ष जीने की इच्छा करे वह कर्मकर्ता हुआ ही जीने की इच्छा करे । मनुष्यत्वादि सकल संसार धर्मों से हीन अद्वितीय आत्मतत्त्व को न जाननेवाले जीने के इच्छुक ११. मन्त्र में " जिजीविषेत् " यह प्रथम पुरुष का प्रयोग है । भाष्य में ' जीवितुमिच्छे: ' यह मध्यम पुरुष के रूप में जो अर्थ किया है वह प्रथम पुरुष के स्थान में मध्यम पुरुष का परिवर्तन कर किया है । क्योंकि शंकराचार्यादि भाष्यकारों ने भी इसी प्रकार से अर्थ किया है । १२. पथ्य, हित, मित भक्षणपूर्वक जीवन की इच्छा कर । आयुर्वेद के अनुसार पथ्य, धर्मशास्त्र के अनुसार हित तथा योगशास्त्र के अनुसार मित भोजन कर शतवर्ष जीवन की इच्छा करे । इस औचित्य से ही यहाँ शतवर्ष जीवन कहा गया है ।

पृष्ठ 56

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 56 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २३ प्रकाराः सन्ति, तथा कर्मालेपाय नाना प्रकाराः न भवन्ति । स्वधर्मा-नुष्ठानलक्षण एक एव प्रकारोऽस्ति येन कर्मलेपो न भवति । उव्वटा-चार्यरीत्या तु यथा स्वर्गप्राप्तौ नानाभूताः प्रकाराः सन्ति न तथा मुक्ति-प्राप्तौ । ननुकर्मणां फलेन भवितव्यम्, अथ कथं मुक्तिप्राप्तिरित्याशंक्याह –'न कर्म लिप्यते नरे ' नहि मुक्त्यर्थं क्रियमाणं कर्म नरे मनुष्ये लिप्यते सम्बध्यते, मुक्तिप्रदानेनोपक्षीणशक्तिकत्वात्, तथा च बृहदारण्यकम् -' तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन ' ( बृहदा ० उ ० ४.४.२२ ) इति । विविदिषन्ति वेदितुमिच्छन्ति इति । अनेन एतद्दर्शयति यावदिच्छाप्रवृत्तिस्तावत्कर्मष्वधिकार इति । यद्यप्युबटा-चार्यस्येदं भाष्यं सिद्धान्तविरुद्धमिव प्रतीयते कर्मणां मुक्तिहेतुत्व-वर्णनात्, यावज्जीवन कर्मानुष्ठानवर्णनेन संन्यासबाधनादिति, तथापि पुरुषत्व के अभिमानी तुझ मनुष्य के लिये इस अग्निहोत्रादिकर्म के अनुष्ठान से अतिरिक्त और कोई प्रकार नहीं है, जिस प्रकारान्तर से तुममें पाप का स्पर्श न हो, वह प्रकारान्तर नहीं है । प्रकारान्तर नहीं है, अत एव शास्त्र से विहित अग्निहोत्रादिककर्मों को सदा करता हुआ ही जीने की इच्छा कर । जैसे स्वर्ग की प्राप्ति में अग्निहोत्रादिक अनेक प्रकार हैं, उसप्रकार कर्म से असम्बन्ध के लिये नाना प्रकार नहीं हैं । किन्तु स्वधर्म का अनुष्ठानरूप एक ही प्रकार है, जिससे कि कर्म का लेप नहीं होता । उव्वटाचार्य की रीति से तो जैसे स्वर्ग की प्राप्ति में नाना प्रकार है, उस प्रकार मुक्ति की प्राप्ति में अनेक प्रकार नहीं, यह अर्थ है | कर्म का तो कोई फल होना चाहिये, कर्म से मुक्तिप्राप्ति कैसी? ऐसी आशंका कर श्रुति कहती है " न कर्म लिप्यते नरे " मुक्ति के लिये किया कर्म मनुष्य को नहीं लगता अर्थात् स्वर्गादिफल नहीं देता । क्योंकि मुक्ति प्रदान कर देने से फल देने की शक्ति क्षीण हो जाती है । इसी अर्थ का बोधक " तमेतं " यह बृहदारण्यकवाक्य है । इस वाक्य से यह बोधन होता है कि जब तक फल की इच्छा से प्रवृत्ति होती है, तब तक ही पुरुष का कर्मों में अधिकार है । यद्यपि उव्वाचार्य का यह भाष्य सिद्धान्त से विरुद्ध - जैसा प्रतीत होता है; क्योंकि इसमें कर्मों को

पृष्ठ 57

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 57 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४ ] वेदार्थ पारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यावदिच्छाप्रवृत्तिस्तावत्कर्मस्वधिकार इत्युक्त्या यावद्रागस्तावत्कर्म-स्वधिकार इति सिद्धान्तं प्रतिपादयति । यद्यपि " तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय " ( श्वेताश्वतरोपनिषद् ३. ८ ) इति श्रुत्या ज्ञानैकसाध्यत्वं मोक्षस्योक्तम्, ज्ञानातिरिक्तस्य मोक्ष-साधनत्वं प्रतिषिद्धमेव, तथापि चित्तशुद्धिद्वारा कर्मणाम्पारम्पर्येण सिद्धान्तेऽपि मुक्तिहेतुत्वाङ्गीकारेणाविरोध एव । ' मुक्तिप्रदानेनोपक्षीण-शक्तिकत्वादित्यस्य मुक्तिहेतुतत्त्वज्ञानोपयोग्यन्तःकरणशुद्धयापादने-नोपक्षीणशक्तिकत्वादित्यर्थो बोद्धव्यः । ननु पूर्वमन्त्रेण ब्रह्मात्मज्ञानप्रतिपादनं कुर्वन्नेवेहेति मन्त्रेण कर्मप्रतिपादनमिति समुच्चितयोरेव ज्ञानकर्मणोर्मुक्तिसाधनत्वप्रतीतौ सत्यामधिकारव्यवस्थानुपपन्नेति चेन्न ज्ञानकर्मणीविरोधात् । मुक्ति का कारण कहा है तथा जीवनपर्यन्त कर्मों के अनुष्ठान का वर्णन होने से शास्त्र सिद्धसंन्यास का बाध भी होता है । तथापि ' जबतक राग है, तब तक कर्मों में अधिकार है ' यह उव्वटभाष्य का वर्णन सिद्धान्त को ही प्रतिपादन करता है, अतः सिद्धान्तविरुद्ध नहीं । यद्यपि " तमेव विदित्वा " इस श्रुति के द्वारा मोक्ष को ज्ञान से साध्य कहा है । ज्ञान से अतिरिक्त मोक्ष के साधन का निषेध भी किया है । तथापि चित्तशुद्धि द्वारा कर्मों का परम्परा से मुक्तिहेतुत्व सिद्धान्त में भी मान्य होने से अविरोध ही है । ' मुक्ति प्रदान से उपक्षीणशक्तिक होने से ' इसका तात्पर्य ' मुक्तिहेतु जो तत्त्वज्ञान है, उसके उपयोगी अन्तःकरण-शुद्धिसम्पादन से उपक्षीणशक्तिक होने से ऐसा समझने योग्य है | " ईशावास्य " इस पूर्व मन्त्र ने ब्रह्मज्ञान का प्रतिपादन किया है, " कुर्वन्नेवेह " इस मन्त्र ने कर्म का प्रतिपादन किया है, अतः यह सिद्ध होता है कि समुच्चय को प्राप्त ( मिले हुए ही ) ज्ञान तथा कर्म मुक्ति के साधन हैं । ऐसी प्रतीति होने पर अधिकार - व्यवस्था अनुपपन्न ( असिद्ध ) है " ऐसा कहना उचित नहीं; क्योंकि ज्ञान तथा कर्म का विरोध है । विरोध इस प्रकार है कि कर्म आत्मा में कर्तृत्व- भोक्तृत्व-नानात्वादिक धर्मों की अपेक्षा करके प्रवृत्त होते हैं । अर्थात् ' मैं कर्ता-भोक्ता तथा नाना हूँ ' ऐसा अभिमान होने पर ही कर्म में प्रवृत्ति होती है । ज्ञान तो कर्तृत्व- भोक्तृत्व - नानात्व से शून्य ( रहित ) अद्वितीय,

पृष्ठ 58

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 58 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २५ तथाहि कर्माणि तावदात्मनः कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वादिकमपेक्ष्य प्रवर्तन्ते ज्ञानं तु कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वशून्यमद्वयमपेतब्रह्मक्षत्रादिभेदं ब्रह्माणं प्रकाशयति । तेन त्यक्तेनेत्यादिना कर्तृत्वभोक्तृत्वनानात्वप्रमुख-स्यत्यागानुवादेन सच्चिदानन्दात्मकमद्वितीयब्रह्मात्मज्ञाननिष्ठादाद-नात्मनः पालनीयत्वमुपदिश्यते । तादृशं ज्ञानं न कर्मणा समुच्चयार्हम्, कर्तृत्वादिप्रविलापनेन तन्निरोधात् । ननु ज्ञानकर्मणोर्वेदविहितत्वेन शुद्धिसाम्याद् विरोधोऽसिद्ध इति तदप्यसत्, ऋतुगमनत्रिदण्डिधर्मयोरप्यविरोधप्रसंगात् । तदुभयं नैकस्य विहितमितिचेत्, प्रकृतेऽपि तत्तुल्यत्वात् । न च तत्रप्रतिषेधात् कर्तृत्वमिति वाच्यम्, " न कर्मणा न प्रजया न धनेन त्यागेनैकेऽमृ-तत्वमानशुः, ( तै ० आ ० १०. १०, नारायणो ० १२.३ ), " नानुध्या दुबहूञ्छ-ब्दान् " ( बृहदा ० ४.४.२१ ) इत्यादि प्रतिषेधस्य प्रकृतेऽपि तुल्यत्वात् । ब्राह्मण - क्षत्रियादिक भेद से रहित, ब्रह्मस्वरूप आत्मा को जनाता है । “ तेनेत्यक्तन ” इत्यादिमन्त्रभाग से कर्तृत्व - भोक्तृत्व- नानात्व जिसमें प्रमुख हैं, उस सारे ही संसारके त्यागपूर्वक सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वितीय ब्रह्म से अभिन्न आत्मा के ज्ञान की दृढ़ निष्ठा से आत्मा की रक्षा का उपदेश किया गया है । अतः सिद्ध होता है कि कर्तृत्व-भोक्तृत्व से शून्य ब्रह्मात्मा का ज्ञान, कर्तृत्व- भोक्तृत्व की अपेक्षा रखनेवाले कर्म के साथ समुच्चय ( मेल ) के योग्य नहीं है । समुच्चय तो तभी संभव है, जब ज्ञान के समय कर्म रहे; परन्तु ज्ञान के समय तो कर्तृत्व - भोक्तृत्व के विलय होने से कर्म का ही बाध हो जाता है । ' ज्ञान तथा कर्म दोनों को ही वेद से विहित होने के कारण शुद्धि ( प्रामाणिकता ) समान होने से विरोध सिद्ध नहीं होता ', यह शंका भी अर्थहीन है । क्योंकि इस तरह तो स्त्री का ऋतुकाल गमन तथा त्रिदण्डिसंन्यासी के धर्म ( स्त्री का अस्पर्श ) का भी विरोध न रहेगा । यदि कहा जाय कि ' वह दोनों धर्म एक के लिये विहित नहीं । ऋतुगमन गृहस्थ के लिये तथा स्त्री का अस्पर्श त्रिदण्डि संन्यासी के लिये है । ', यह तो प्रकृत में भी समान है । यदि कहा जाय कि ' त्रिदण्डसंन्यास में स्त्री प्रसंग का निषेध है, अतः उन

पृष्ठ 59

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 59 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६ ] वेदार्थपारिजात ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् न च ' ल कर्मणेति निषेधस्य केवलकर्मविषयत्वेन चरितार्थत्वेन न समुच्चयविषयत्वं, केवलपदव्यवच्छेद्यस्य समुच्चयस्याद्याप्यसिद्ध-त्वात् । ज्ञानाज्ञानाद्यवस्थाभेदेन ज्ञानकर्मणोः क्रमेण कपुरुषानुष्ठेयत्वे ज्ञानोत्तरसमुच्चयानुपपत्तेः । वशिष्ठ रामकृष्णादीनान्तु कर्मानुष्ठानानि न कर्माणि तत्रकर्तृत्वादि ' ' बुद्धयभावात्, किन्तु कर्माभासानि लोक-संग्रहैकप्रयोजनानि मुक्ति प्रति तेषामहेतुत्वात् । यथा दाहादव्यवहित-पूर्वक्षणवतित्वेऽपि नाग्नेः पिङ्गलताया दाह हेतुत्वमन्यथासिद्धत्वात् तथा कर्मणामप्रयोजकत्वान्न मोक्षहेतुत्वम्, नान्यः पन्था विद्यतेऽय-दोनों का एक कर्ता नहीं हो सकता ' यह कहना भी उचित नहीं; क्योंकि ' न कर्मणा ' इत्यादि श्रुतियों से कर्म से मोक्ष का प्रतिषेध समान ही है । " न कर्मणा " इस श्रुति में किये निषेध को केवल कर्मविषयक होने से गतार्थता है, वह निषेध कर्मसमुच्चय का नहीं है । अर्थात् श्रुति में किये निषेध का अभिप्राय यह है कि केवल कर्म मुक्ति का हेतु नहीं, वह निषेध कर्मसमुच्चय का नहीं है, " यह कहना उचित नहीं, क्योंकि यदि समुच्चय सिद्ध हो जाता तब तो ' केवल ' पद उसकी व्यावृत्ति करता, किन्तु समुच्चय तो अभी तक सिद्ध ही नहीं हुआ, अतः केवल कर्म का निषेध नहीं कहा जा सकता । ज्ञान तथा अज्ञान अवस्था के भेद से एक पुरुष के द्वारा ज्ञान तथा कर्म का क्रम से अनुष्ठान सिद्ध हो जाने पर ज्ञान के पश्चात् समुच्चय के सिद्ध न होने से केवल कर्म का निषेध नहीं । ज्ञान समकाल किया वसिष्ठ-राम कृष्णादि का कर्मानुष्ठान कर्म नहीं है, क्योंकि उनमें कर्तृत्व-भोक्तृत्वाभिमान का अभाव है । अत: उनका कर्मानुष्ठान कर्माभास ही है । उनके कर्माभास का प्रयोजन लोक - संग्रहमात्र है; क्योंकि कर्मों को मुक्ति के प्रति कारणता है ही नहीं । जैसे दाह से पूर्वक्षणवृत्ति, अग्नि की पिङ्गलता दाह के प्रति हेतु नहीं, क्योंकि अन्यथा सिद्ध है, इसी प्रकार कर्म मोक्ष के प्रति हेतु नहीं, क्योंकि मोक्ष के प्रति अप्रयो-aa ( असाधक ) है | ' नान्यः पन्था " यह श्रुति भी ज्ञान से अतिरिक्त १३. कर्तृत्व - भोक्तृत्व- अहङ्कार - नानात्वबुद्धि और अभिनिवेश ।

पृष्ठ 60

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 60 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २७ ना ' ( शुक्ल ० ३१.१८, श्वेता ० ६.१५, त्रिपाद विभूति ० ४ ) इति निषे-धात् । अज्ञानतत्कार्यनिवृत्तौ ज्ञानहेतुत्वस्य क्लृप्तत्वात् । कर्तृत्वाद्य-ध्यासाध्यं कर्म शुद्धत्वा कर्तृत्वादिज्ञानेनोपसृद्यत एव । मन्त्रलिङ्गादपि यो भिन्नाधिकारित्वमेव प्रतीयते । जिजीविषो रागिणः कर्मविहितम् । सर्वमीश्वर एवेति ज्ञानवतस्त्याग एव विहितः । किञ्च धनसम्पन्नस्य कर्माधिकारः सिद्धयति । प्रथम मन्त्रार्था-धिकारिणस्तु धनाकांक्षानिषेधेन कर्माधिकारनिषेधस्यार्थसिद्धत्वात् । जिजीविषाऽपि कर्माधिकारिण एव न ज्ञानाधिकारिणः, तस्य ' न जीविते मरणे वा गृद्धि कुर्वीत ' ( तैत्तिरीयशाखीय नारायणो ० ) इति जिजीविषा निषेधात् । ' अरण्यमियात् ' ( नारायणो ० ) इति च पदं ततो न पुनरियादित्यर्थपरम् । जीविताकांक्षायाः पूर्वमेव निषेधात् तस्य स्त्रीजनासंकीर्णाश्रमविधानाच्च । न दम्पत्योः सहाधिकार प्रयुक्ता-नि कर्माणि तस्य सम्भवन्ति, प्रत्यावृत्तिनिषेधात् । ' तत्र को मोहः कः कर्मादिका मोक्ष के प्रति निषेध करती है । अज्ञान तथा उसके कार्य निवृत्ति में ज्ञान हेतु है, यह रज्जुसर्पादि स्थल में प्रसिद्ध भी है । कर्तृत्वादि अध्यास के अधीन होने वाला कर्म आत्मा के शुद्धत्वाकर्तृ-त्वादि के ज्ञान से बाधित हो ही जाता है । मन्त्र में अर्थ प्रकाशन सामर्थ्यरूपलिंग से भी ज्ञान तथा कर्म के भिन्न अधिकारी हैं, यही प्रतीत होता है । जीवन की इच्छावाले रागी पुरुष के लिये कर्म विहित है तथा ' सर्व ईश्वर है ' इस प्रकार के ज्ञानवाले पुरुष को तो त्याग ही विहित है । भाव यह है कि रागी कर्म का अधिकारी है । विरागी ज्ञान का अधिकारी है । ' सर्व परमेश्वर है ' इस प्रकार ज्ञानवाले पुरुष के लिये त्याग ही विहित है । धन सम्पन्न पुरुष का ही कर्म में अधिकार सिद्ध होता है । प्रथम मन्त्र के अधिकारी के लिये धन की आकांक्षा का निषेध होने से कर्म में अधिकार का निषेध अर्थ से ही सिद्ध हो जाता है । जीवन की इच्छा भी कर्माधिकारी के लिये ही है न कि ज्ञानाधिकारी के लिये । क्योंकि ज्ञानाधिकारी के लिये तो श्रुति ने जीवन तथा मरण की इच्छा का निषेध किया | श्रुति के “ अरण्य. मियात् " इस पद का भी ' संन्यास से लौटकर न आवे ' इसी में तात्पर्य