वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 61–70
वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 61–70
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२८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् शोक एकत्वमनुपश्यत ' ( ईशा ० ७ ) इति सनिदानानर्थप्रहाणं ज्ञान-निष्ठाफलम् । देशान्तरस्वर्गादिगमनं हिरण्यगर्भपदप्राप्त्यादिलक्षणं तु कर्मफलम् । ' अग्ने नय सुपथा राये ( ईशा ० १६ ) इति मार्गयाचनं, ज्ञाने तु ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्तीहैव समवनीयन्ते ' ( बृहदा ० ४.४.६ ) इति तदनपेक्षमेव स्वात्मनावस्थानलक्षणं फलम् । ' इमौ द्वावेव पन्थानावनु-निष्क्रान्ततरौ भवतः क्रियापथश्चपुरस्तात् संन्यासश्चोत्तरेण तयोः संन्यासपथ एवातिरेचयति ' ( तैत्ति ० नारायणो ० ) इति श्रुत्यापि भिन्ना-धिकारित्वं तयोः प्रतिपाद्यते । पुरस्तात् सृष्टिकाले अनुनिष्क्रान्ततरौ भूतसृष्टिमनुप्रवृत्तौ भिन्नाधिकारित्वादुभयोः संन्यास एवातिरिक्तः श्रेष्ठोभवति । परम-पुरुषार्थाव्यवधानात् । तैत्तिरीयकेऽपि - " कर्माणि प्रयुतानि वा एता-है । क्योंकि जीवन की इच्छा का तो पहिले ही निषेध कर दिया है । ज्ञान के अधिकारी को स्त्री से असम्बन्धित आश्रम का विधान है अत: पति - पत्नी दोनों के साथ अधिकार से होने वाले कर्म ज्ञानाधि-कारी संन्यासी को सम्भव नहीं है । संन्यासाश्रम से लौटने का तो निषेध है ही । “ तत्र को मोहः " इस श्रुति से कारण के सहित सर्व अनर्थ की निवृत्ति ज्ञाननिष्ठा का फल है । देशान्तरस्वर्गादिगमन तथा हिरण्यगर्भ पद की प्राप्ति आदि कर्म का फल है । " अग्ने नय " इस श्रुति के अनुसार कर्म तथा उपासना का अधिकारी श्रेष्ठमार्ग से गमन की याचना करता है । " न तस्य प्राणाः " इस श्रुति के अनुसार ज्ञान होने पर तो मार्ग की अपेक्षा के बिना अपने स्वरूप से स्थिति ही फल है । “ इमौ द्वावेव ” इस श्रुति से भी ज्ञान तथा कर्म के अधिकारी भिन्न ही प्रतिपादन किये गये हैं । भिन्नाधिकारी वाले होने से ज्ञान - कर्म दोनों में संन्यास श्रेष्ठ है । भाव यह है कि यदि समुच्चयवादी के अनुसार ज्ञान - कर्म का एक ही अधिकारी होता तथा दोनों मिलकर मोक्ष प्रदान करते तो दोनों की समता होने से किसी को श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता था । भिन्न अधि-कारी होने से तथा मोक्ष का साक्षात् साधन होने से ही संन्यास श्रेष्ठ कहा गया है । तैत्तिरीयक ब्राह्मण में भी कहा है, ' कर्मों का विप्रकृष्ट फल है । अर्थात् सातिशय फल है । ज्ञानमार्ग का अतिशय ( सर्वश्रेष्ठ )
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वेदार्थपारिजातः ( वा.स. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ २६ न्यवराणि संन्यास एवातिरेचयति " इति कर्मणां विप्रकृष्टफलत्वम्, ज्ञानमार्गस्यातिशयितफलत्वञ्चाम्नातम् । भगवता व्यासेनापि तथैव स्मृतम् - ' द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः । प्रवृत्तिलक्षणो धर्म: निवृत्तिश्च विभावितः ' ( महा ० शान्ति ० २४१.६ ) इति । चर्यास्तु त्वयति तवेति व्यत्ययेन मुक्तिरिति शेषमभ्यु-पगच्छन्ति । एवं कर्मानुष्ठानात्तव मुक्तिरस्ति अन्यथा इतः प्रकाराद-न्यथा मुक्तिर्नास्तीति तदपि पूर्वोक्तरीत्या समाधेयम् । ननु कर्मानुष्ठानेन ' कर्म न लिप्यते ' इति विपरीतमेतत्, तत्त्व-ज्ञानेनात्मनोऽसंगत्वज्ञानेन कर्मालेपवादस्यैव संगतत्वात् । ' यथा पुष्कर-पलाश आपो न श्लिष्यते । एवं विदि कर्म न श्लिष्यते ' ( छान्दो ० ४. १४. ३ ) इति श्रुत्यभिप्रायात् । ' असंगो न हि सज्जते ' ( बृह ० ४.२.४ ) इति श्रुत्यनुसारेण यद्यप्यात्मा नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः कर्तृत्वादि विकार-होन एव तथापि जपाकुसुमसान्निध्येन लौहित्यमिव स्फटिके देहेन्द्रियादि फल है । ', भगवान् व्यासजी ने भी कहा है कि - ' जिनमें सम्पूर्ण वेद प्रतिष्ठित हैं वे दो ही मार्ग हैं । एक प्रवृत्तिरूप धर्म ( कर्ममार्ग ), दूसरा निवृत्तिरूप धर्म अर्थात् संन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा । ' उव्वटाचार्य तो कहते हैं— ' कर्मानुष्ठान से तेरी मुक्ति होगी । इससे और प्रकार से मुक्ति नहीं है । ' इसका समाधान भी यह है कि अन्तःकरण की शुद्धि तथा ज्ञान द्वारा ही कर्म मुक्ति का साधन है । शङ्का – “ कर्म के अनुष्ठान से कर्मलेप नहीं होता, यह तो विपरीत कथन है । क्योंकि तत्त्वज्ञान से आत्मा की असङ्गता का निश्चय हो जाने से कर्म के लेप न होने का कथन ( प्रवाद ) ही संगत है । यथा ' पुष्करपलाश ' इस श्रुति का भी यही अभिप्राय है कि ज्ञानी में ही कर्मले नहीं होता । " असंग आत्मा किसी से लिप्त ( सम्बन्धि ) नहीं होता " इस श्रुति के अनुसार यद्यपि आत्मा नित्यं शुद्ध - बुद्ध - मुक्त - स्वभाव कर्तृत्वादि विकारहीन ही है, तथापि जपाकुसुम की समीपता से स्फटिक में लालिमा के समान देहेन्द्रियादि के सान्निध्य ( तादात्म्याध्यास ) से असंग आत्मामें व्यापार भासता है । भले ही लालिमा की प्रतीतिकाल में भी स्फटिक स्वच्छ ही है । उसी प्रकार देहेन्द्रियादि की समीपता से आत्मा में प्रतीयमान व्यापार
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३० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् सान्निध्यवशात् असंगेऽप्यात्मनि मिथ्याव्यापारवत्त्वं भासते । लौहित्य-भानदशायामपि यद्यपि स्फटिकः स्वच्छ एव, तथैव व्यापारबद्द हादिसा-न्निध्यवशादवभासमानमपि व्यापारवत्वमात्मनि मिथ्यैव । तच्च यद्यपि स्वरूपतो ज्ञानाज्ञानवत्सु साधारणमेव तथापि ज्ञानी ज्ञानवशा-निपत्त्रमात्मनः प्रत्येति, तदितरस्त्वज्ञानाल्लिप्यते । तस्मात् कर्मानु-ष्ठानात्कर्मनिर्लेपत्वमसंभवमेवेति चेन्न तत्र कर्मपदेन पापकर्मण एव विवक्षितत्वात् । कंटकेन कंटकोद्धारो यथा भवति तथा वैदिकैः कर्मभिः पाशविकानि कर्माणि विरुद्धयन्ते, ' अविद्यया मृत्यु तोव ' ( ईशा ० ११ ) इति श्रुतेः । कर्माकरणेन विपरीतकरणप्रसवतेन ' अकुर्वन् विहितं कर्म ' ( मनु ० ११.४४ ) इति विहिताकरणेन विपरीतकरणप्रसक्तेः ' नहि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ' ( गीता ० ३. ५ ) इति गीतोक्तेः । मिथ्या ही है । यद्यपि व्यापार ज्ञानी तथा अज्ञानी सर्व में प्रतीत होता है, तथापि ज्ञानी ज्ञान के बल से आत्मा की निर्लेपता ही अनुभव करता है । ज्ञानी से अतिरिक्त अज्ञानी पुरुष तो अज्ञान की महिमा से असंग आत्मा को कर्मादि से लिप्त अनुभव करता है । इसलिये अज्ञानी पुरुष को कर्मानुष्ठान से कर्मलेप का अभाव असंभव है, ” यदि ऐसा कहा जाय तो वह भी उचित नहीं । क्योंकि श्रुति में कर्मपद से पापकर्म ही कहा गया है, अतः शास्त्रीय पुण्यकर्म से पाप का लेप न होना ( निवृत्ति ) स्वाभाविक है । जैसे कंटक से कंटक का उद्धार हो जाता है, उसी प्रकार वैदिक कर्मों से पाशविक ( पाप ) कर्मविरुद्ध हैं ही अर्थात् निवृत्त हो जाते हैं । वैदिक कर्मों से पापरूप मृत्यु से पार होना स्वयं तभी कह ही रही है । अज्ञानी पुरुष के लिये कर्म न करने से भी अलेप संभव नहीं है | विहित कर्म न करने से विपरीत कर्मकी प्राप्ति हो जाती है । क्योंकि स्वयं गीता का कथन है कि कोई भी अज्ञ पुरुष एक क्षण भी कर्म करने से अछूता नहीं रहता । कर्तृत्वाभिमान बना ही रहता है । ऐसी दशा में कर्म न करने से भी कर्मका अलेप संभव नहीं । और जो यह कहा कि " भगवदर्पण बुद्धि से किये जानेवाले कर्म से कर्मलेप नहीं होता है, क्योंकि ऐसा स्वयं ' यज्ञार्थात् ' यह गीता-वाक्य कह रहा है, " यह कथन भी बुद्धि की शुद्धि द्वारा तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति से ही संभव है, अर्थात् भगवदर्पण बुद्धि से किये कर्म से बुद्धि-
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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ३१ यत्तु भगवदर्पणबुद्ध्यानुष्ठीयमानकर्मणा कर्मलेपो न भवतीति ' यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयं कर्मबन्धनः ' ( गीता ३.६ ) इत्युक्त -रिति तदपि बुद्धिशुद्धिद्वारा तत्वज्ञानोत्पादनद्वारेवोपपद्यते, असंगा-त्मानुभवमन्तराऽकर्ता मयाऽनुष्ठितानि कर्माणीतिमानिवृत्तेः । तस्माद वैदिककर्मानुष्ठानेन पाप कर्म न लिप्यत इत्येवार्थः । निःस्पृहस्यापि ज्ञाननिमित्ते कर्मण्यधिकार इति उव्वाचार्यः । अन्येषां रीत्या तु मा गृधः कस्यस्विद्धनमितिरीत्या येषां धनाकांक्षा-त्यागपूर्वके ज्ञाननिष्ठानये संन्यासेऽधिकारो नास्ति तेषामेव कर्मस्वधि-कारः । निःस्पृहस्यापि भगवदाराधनबुद्धया क्रियमाणे कर्मण्यधिक्रिय-मपि न सिद्धान्तहानिः । तादृशैः कर्मभिर्वैराग्यतत्तद्दाढर्योत्पत्ति-सम्भवाच्च । अत एव तादृशैषणात्रयतद्ध तुवैराग्यसाधनविवक्षया भगवदाराधन निष्कामभावेन कर्मणां विधानं युक्तम्-" आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ " ( गी ० ६.३ ) इति गीतोक्तः । शुद्धि, उससे तत्त्वज्ञान, तत्त्वज्ञान से कर्मों का अलेप होता है, यह अभिप्राय है । क्योंकि असङ्ग आत्मा के अनुभव के बिना " मैं कर्ता हूँ ", " मेरे द्वारा कर्म किये गये हैं " यह भ्रम निवृत्त नहीं होता । इसलिये ' वैदिक कर्मानुष्ठान से पापकर्म लेप नहीं करता ', यही श्रुति का अर्थ है । ' नि: स्पृह पुरुष का भी ज्ञान के निमित्त कर्म में अधिकार है, ' ऐसा उव्वाचार्य का अभिप्राय है । अन्याचार्यों की रीति से जिनका की आकांक्षा के त्यागपूर्वक ज्ञाननिष्ठामय संन्यास में अधिकार नहीं है, उनका ही कर्म में अधिकार है । निःस्पृहपुरुष का भगवदा-रान बुद्धि से किये जाने वाले कर्म में अधिकार मानने पर भी सिद्धान्त की हानि नहीं है; क्योंकि फल की इच्छा से रहित भगवदा-राधन बुद्धि से किये कर्मों से वैराग्यादिक उन उन साधनों को दृढ़ता की उत्पत्ति भी संभव है । इसलिये ही तीनों एषणा तथा उसके साधन स्त्री आदिकों से वैराग्य के साधनों को कहने के तात्पर्य से भगवद्-
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३२ ] वेदार्थपारिजात ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् न च फलाकांक्षाभावे कर्मणि प्रवृत्यनुपपत्तिरितिवाच्यम्, ' तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ' ( गी ० ३.१६ ) इति गीतोक्तचा भगवदाज्ञावशंवदस्य कर्मणि प्रवृत्युपपत्तेः " कर्माकरणे प्रत्ययवायभयेन च कर्मणि प्रवृत्युपपत्तेः । न च ' कर्मणा बद्ध्यते जन्तुः ' ( शान्तिपर्व २४१.७, संन्यासो ० ६८ ) इति बन्धनत्वं स्यात् कर्मणाम् ' असक्तो ह्याच-रन् कर्म परमाप्नोतिपूरुष: ' ( गीता ३.१६ ) इति निष्कामकर्मणां पर-मात्मप्राप्तिहेतुत्वोक्तः, " ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा ॥ " ( गी ० ५.१० ) इति भगवदुक्तः ॥ दयानन्दः " मनुष्य इह संसारे कर्माणि धर्म्याणि वेदोक्तानि front मकृत्यानि कुर्वन्नेव शतं समाः जिजीविषेत् । एवं धर्म्य कर्मणि प्रवर्तमाने त्वयि नरेन कर्मलिप्यते, इतोऽन्यथा नास्ति लेपाभाव " इति । तदप्यसत्, जिजीविषाया राग प्राप्तत्वेन विधानानर्हत्वात्, वैदिकानि कानि कर्माणीत्यद्याप्यनुक्तः । न चाग्निहोत्रदर्शपूर्णमास-चातुर्मास्यज्योतिष्टोमराजसूयवाजपेयाश्वमेधाख्यानि कर्माणि सत्राणि आराधनपूर्वक निष्कामकर्मों का विधान उचित ही है । क्योंकि " आरुरुक्षोः " यह गीतावाक्य भी इसी अर्थ को कह रहा है । ' फल की आकांक्षा न होने पर कर्म में प्रवृत्ति ही असंभव है, ' ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि - ' तस्मादसत्त: ' इस गीता के कथन से भगवान् की आज्ञा में रहनेवाले की निष्कामकर्म में प्रवृत्ति संभव है । फल की आकांक्षा से रहित पुरुष की कर्म न करने पर पाप के भय से भी कर्म में प्रवृत्ति बन सकती है । यदि कहा जाय कि " कर्मणा " इस शास्त्र के वाक्यानुसार तो निष्कामकर्म भी बन्धनरूप ही होगा, तो यह कहना भी उचित नहीं; क्योंकि “ असक्तो ह्याचरन् " और " ब्रह्म-याधाय कर्माणि ' यह भगवदुवचन निष्कामकर्मयोग को परमात्म-प्राप्ति में और पाप से अलिप्त रहने में हेतु बता रहा है, अत: निष्कामकर्म बन्धनरूप नहीं ।
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ३३ वा त्वयाभिप्रेयन्ते तत्पराणामन्यथाऽन्यथा त्वया व्याख्यातत्वात् । ब्राह्मणानि त्वरीत्या व्याख्यानमात्राणीति न तानि स्वातन्त्र्येण कर्म-बोधकानि । सूत्राणि तु न स्पृश्यन्ते त्वया ॥२ ॥
सुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तांस्ते प्रेत्यभिगच्छन्ति ये के चात्मनो जनाः ॥
( ४०.३ ) अद्वितीय परमानन्द - परमात्मतत्त्व के अनभिज्ञ अनात्मप्रपञ्च - बाह्य जगत् और देहेन्द्रियादि में रमण करनेवाले उस ब्रह्मात्मतत्त्व की अपेक्षा निश्चय ही ' असुर ' कहे जाते हैं । भोगायतनरूप देवादिदेह इस दृष्टि से असुर सम्बन्धी - लोक ' हैं | ये अज्ञानान्धकार से आच्छादित हैं । परमानन्दस्वरूप अजर - अमर ब्रह्मात्मतत्त्व को देहेन्द्रियादि अनुरूप जानकर जगत् में रमण करनेवाले आत्मतिरस्कार के कारण आत्महत्यारे हैं । ऐसे बहिर्मुख पुण्य - पाप के अर्जन में ही रमे रहते हैं | देहत्याग के बाद कर्मानुरूप देव, मनुष्यादि लोकों को प्राप्त होते हैं || ३ || स्वामी दयानन्द कहते हैं कि - ' मनुष्य इस संसार में धर्म से प्राप्त वेदोक्त निष्कामकर्मों को करता हुआ ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे । इस प्रकार धर्मयुक्त कर्म में प्रवृत्त होनेवाले पुरुष में कर्मलेप नहीं होता । इससे अन्य किसी प्रकार से कर्मलेपाभाव नहीं हो सकता । ' यह उनका कहना असत् ( अनुचित ) है; क्योंकि जीने की इच्छा तो राग से प्राप्त है, उसका विधान संभव नहीं - विधान के योग्य नहीं । जिन वैदिककर्मों के अनुष्ठान से लेपाभाव कहा, उन वैदिककर्मों का अब तक अपने भाष्य में वर्णन ही नहीं किया कि वे वैदिककर्म हैं कौन? यदि कहें कि अग्निहोत्र - दर्श पूर्ण मास चातुर्मास्य - ज्योतिष्टोम - राजसूय- वाजपेय-अश्वमेध नामवाले ही वे कर्म हैं तथा अन्य सत्ररूप वे कर्म हैं तो आपने
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३४ ] वेदार्थपारिजात ( वा. सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् ब्रह्मात्मज्ञानप्रशंसार्थमविद्वन्नदानेन मन्त्रेणोच्यते । असूर्या: -अद्वयं परमात्मभावमपेक्ष्य देवादयोऽप्यसुराः, अशोभनेऽनात्मप्रपञ्चे रमणात् । असुषु प्राणोपलक्षितेषु देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्रभृतिषु जगत्सु रमणाद्वा असुराः । तेषां स्वभूता लोका असूर्याः । नाम शब्दः प्रसिद्धौ । ते ये यत्तदोर्व्यत्ययः । लोक्यन्ते दृश्यन्ते भुज्यन्तेविषया एषु इतिलोकाः देवादि जन्मानि । एवम्विधाः प्रसिद्धाः असुर्याः लोकाः । ये च अन्धेन ब्रह्मात्मतत्वादर्शनात्मकेन तमसा अज्ञानेनावृता आच्छादिताः । तान् तादृशान् लोकान् ते मूढाः प्रेत्य वर्तमान देहं त्यक्त्वा अभिगच्छन्ति प्राप्नु-ति स्वस्वपुण्यापुण्य परिपाकवशात् देवमनुष्यादिरूपां विदिधां योनि प्रपद्यन्त इत्यर्थः । के ते इति तानाह ' ये के चात्मनो जनाः ' आत्मानं घ्नन्ति ये ते आत्महनो जनाः । यजुर्वेद संहिता में उन कर्मों को स्वीकार ही नहीं किया । रही ब्राह्मण-ग्रन्थों की बात, सो आपकी रीति के अनुसार वे तो वेदों के व्याख्यान-मात्र हैं, वे स्वतन्त्ररूप से कर्म के बोधक आपके मत में हैं ही नहीं । सूत्रों को तो आपने छूआ तक नहीं ॥ २ ॥
ब्रह्मात्मज्ञान की प्रशंसा के लिये अविद्वान् ( अज्ञानी ) की निन्दा इस तृतीय मंत्र से कही जा रही है । अद्वितीय परमात्मरूपता की अपेक्षा से देवादि भी असुर हैं । क्योंकि देवादि भी तुच्छ प्रपञ्च में रमण करते ( आनन्दमनाते ) हैं । अथवा ' असु ' अर्थात् प्राण से उप-लक्षित देहेन्द्रिय - मन - बुद्धि आदिक जगत् के पदार्थों में रमण करने से देवादि भी असुर कहे जाते हैं । उनके भोगसाधनरूप लोक, असुर्य अर्थात् असुरसम्बन्धी लोक कहे जाते हैं । मंत्र में नामशब्द प्रसिद्धि का वाचक है । जिन स्थानों में शब्द - स्पर्शादि विषयों का अनुभव किया जाता है, उनको लोक कहते हैं । वे लोक कौन हैं? वे हैं - देवादि के शरीर, क्योंकि शरीर में स्थित होकर ही सर्व जीव विषयों का अनुभव करते हैं । ऐसे प्रसिद्ध जो देवादिक शरीर हैं, वे ही असुर सम्बन्धी लोक हैं । ये लोक अर्थात् ये शरीर ब्रह्माभिन्न आत्मतत्त्व के अज्ञानरूप अन्धकार से आवृत ( आच्छादित ) हैं । अज्ञानरूप अंधकार से आच्छादित इन लोकों को मूढ़ ( अज्ञानी ) पुरुष वर्तमानदेह को त्यागकर प्राप्त होते हैं । अर्थात् अपने पुण्य - पाप के कारण देव - मनुष्यादिरूप अनेक योनियों को प्राप्त
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वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्र [ ३५ नन्वात्मनो नित्यत्वात् कथमात्महननं संभवति इतिचेन्न, आत्मतिरस्कारस्य बधापेक्षयापि भयंकरत्वात् । ' सम्भावितस्य चा-कीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ' ( गीता २.३४ ) इत्युक्तः । अपास्ताशेषानर्थ-ब्रा निरतिशयानन्दस्वप्रकाशचिदात्मके आत्मतत्त्वे कर्तृत्वभोक्तृत्वा-दिसकलानर्थपरिप्लुतत्वस्यारोप एव तद्धननम् । ये के च जनाः आत्म-याथात्म्याज्ञानेन देहाद्यनात्मतादात्म्याभिमानेन कर्माणि कुर्वाणा आत्मत्वेनाभिमतान् देहादीनुत्पादयन्ति नाशयन्ति च ते आत्मानं न्ति तानसुर्यान् लोकान् प्राप्नुवन्ति । अजरामरस्याप्यात्मनोऽविद्या-दोषेण तिरस्करणात् तेषामात्महन्तृत्वम् । विद्यमानस्याप्यात्मनो यत्कार्यं फलमजरामरत्वादिसंवेदनं तद्धतस्येव तिरोभूतं भवतीति प्राकृताविद्वां-सोऽपि जना आत्महन उच्यन्ते । यथा कस्यचिच्छुद्धस्य मिथ्याभिशा-पोऽशस्त्रवध उच्यते, तद्वदात्मनि स्वभावशुद्धे कर्तृत्वभोक्तृत्वाशुद्धत्वा-यासोऽपि हि भवति । तेन ह्यात्महननदोषेण ते संसरन्ति । होते हैं । कौन हैं वे? जो आत्मा का हनन करते हैं वे ही मूढ़ हैं । ' आत्मा नित्य है, उसका तो हनन ही संभव नहीं, ' यह कहना उचित नहीं । क्योंकि आत्माका न जानना ही आत्मा का तिरस्कार है, हनन की अपेक्षा तिरस्कार अधिक कष्टप्रद होता है; अतः आत्मा का तिरस्कार ही यहाँ हनन है । अतएव स्वयं भगवान् ने भी गीता में कहा है कि - ' प्रतिष्ठित पुरुष का तिरस्कार मरण से भी अधिक कष्ट-प्रद होता है । ', सर्व अनर्थसमुदाय से रहित निरतिशय आनन्दस्वरूप स्वप्रकाश चेतन आत्मतत्त्व में कर्तृत्व- भोक्तृत्वादिक सकल अनर्थ का आरोप ही आत्मा का हनन है । जो मनुष्य आत्मा के यथार्थस्वरूप के अज्ञान से देहादिक अनात्मपदार्थों में तादात्म्य अभिमान ( ' मैं मनुष्य हूँ ', ' ब्राह्मण हूँ ' इस अहङ्कार ) से कर्म करते हैं, वे देहादिकों को उत्पन्न तथा नाश करते हैं; क्योंकि अहङ्कार से किये कर्मों से ही देहादिकों की उत्पत्ति तथा विनाश होता है । वे ही मनुष्य आत्मा का नाश करते हैं । वे ही पूर्वोक्त असुरसम्बन्धी लोकों को प्राप्त होते हैं । वे ही पुरुष अजर - अमर आत्मा का अविद्यादोष से तिरस्कार करने से आत्मघाती हैं । विद्यमान अजर - अमर आत्मा की अमरतादि का ज्ञान मुख्य फल है । परन्तु नष्ट हुए में जैसे अमरतादि का ज्ञान
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३६ ] वेदार्थ पारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् अन्ये तु -- ' मा गृधः ' इत्यादेः व्याख्यानमनेन मन्त्रेण क्रियते । धनाभिलाषवतां कष्टसंसारप्राप्तिवर्णनात् । ये श्वसूकरादिदेहाः कर्म-फलरूपा अन्धेन तमसा क्लेशचतुष्टयानुविद्धेन पञ्चमेनान्धतामि-त्रणाहंममाभिनिवेशरूपेणावृताः । धनाभिलाषेणेश्वरज्ञानशून्याः आत्मनः पूर्वोक्ता एव प्रेत्य तानभिगच्छन्तीति ॥३ ॥
नहीं होता, उसी प्रकार विद्यमान भी अजर - अमर आत्मा की अमरता-दिका ज्ञान तिरोभूत रहता है, अत एव अद्वं तवेदान्त के श्रवणादि से शून्य, लौकिकज्ञान से सम्पन्न भी पुरुष ( मनुष्य ) आत्मघाती कहे जाते हैं । जैसे अत्यन्त शुद्ध पुरुष को मिथ्या दोष का लग जाना, बिना शस्त्र के बध कहा जाता है, उसी प्रकार स्वभाव से शुद्ध आत्मा में कर्तृत्व - भोक्तृत्वादि अशुद्धि का आरोप भी आत्मा की हिंसा ( बध ) ही है । इस आत्मा की हिंसारूप दोष से ही अज्ञानी जन जन्म - मरण-रूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं । अन्य कोई विद्वान् तो ऐसा कहते हैं कि - " मा गृधः " इत्यादि मन्त्र का व्याख्यान ही इस तृतीय मन्त्र से किया जा रहा है । क्योंकि इस तृतीय मन्त्र में धनादि अनात्मपदार्थों की अभिलाषावालों के लिये कष्टदायी संसार की प्राप्ति का वर्णन है । जो श्व - सूकरादिक कर्म के फलस्वरूप देह हैं, वे अविद्या अस्मिता - राग तथा द्वेष इन चार क्लेशोंसे युक्त पंचम अहंता - ममता में अभिनिवेश रूप जो अन्ध ( गाढ़ ) तम अन्धतामिस्र ' है, उससे आवृत हैं । धन की अभिलाषा के कारण ईश्वर के ज्ञान से शून्य पूर्वोक्त आत्मघाती पुरुष इस देह को त्यागकर उन देहों को ही प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥
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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ३७ I 1 अनेजदेकं मनसो जवीयो नैन-देवा प्राप्नुवन् पूर्वमशत् ॥ तद्भावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्त-स्मि॑न्न॒षो मा॑त॒रिश्वा॑ दधाति ॥४०.४ ॥ जो अपने स्वरूप से च्युत ( चलायमान ) नहीं होता, सदा एक-रस- अद्वितीय रहता है, जो व्यापक और स्वप्रकाश होने से संकल्प -विकल्पात्मक मनकी गतिका भी अतिक्रमण करनेवाला है - सुदूर अवस्थित ब्रह्मलोकादि का जिसकी विद्यमानता के बिना मन में स्फुरण होना असंभव है, मन की अपेक्षा भी अपने सोपाधिक रूप से अधिक वेगवाला मान्य होने के कारण और अनादि - अनन्त - सर्वाधि-ष्ठान सर्वसाक्षी होने के कारण जिसे रूपादि विषयों के प्रकाशन में समर्थ इन्द्रियाँ और उनके अनुग्राहक देवगण भी ग्रहण करने में - प्रकाश्य बनाने में असमर्थ ही हैं । महत्तत्त्व, प्राण और वायुरूप से प्रकृति और अन्तरिक्ष में विचरण करनेवाला ' हिरण्यगर्भ ' और ' सूत्रात्मा ' कहलानेवाला वायुतत्त्व प्राणियों के कार्य - कारणात्मक स्थूल सूक्ष्म शरीर का उद्दीपक और रक्षक है, ज्ञान - क्रिया उसके अधीन है । वह सर्वकर्मों की प्रतिष्ठा है । पर, कर्म सहित स्वयं की और अपने आश्रय अन्तरिक्ष तथा प्रकृति की सत्ताको जिससे अधिष्ठित होकर ही लाभ करने में समर्थ है; वही है वह सर्वभेदशून्य आत्मतत्त्व, जिसकी आराधना के बिना देवगण भी आसुरभाव से मुक्त नहीं हो सकते ॥ ४ ॥
ईशावास्यमितिमन्त्रस्थस्य ईट शब्दस्यैव विवरणमेभिर्मन्त्रैः क्रियते । यद्वा किं तदात्मतत्त्वं यस्यहननादविद्वांस आसुरीं योनिमापद्यन्ते तद्विपर्ययेण विद्वांसो मुच्यन्ते इति तदाह - अनेजदेकम् । त्रिष्टुप् । न