वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 71–80

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 71 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३८ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् एजत् अनेजत् । एजुकम्पने स्वावस्थाप्रच्युतिः कम्पनम्, तद्रूजितं सदैकरूपम् । तच्चैकमद्वितीयं सर्वभूतेषु “ एको देवः सर्वभूतेषु गूढ: " ( श्वेताश्वतर उप. ६/११ ) इति श्रुतेः । मनसः संकल्प विकल्पलक्षणा-ज्जवीयः वेगवत्तरम् । जत्रोऽस्यास्तीति जववत्, अतिशयितं तज्ज-वीयः । ईयसुनि कृते “ विन्मतोलु क् " ( पा ० ५।३।६५ ) इति मतुपो लुक् । ननु विरुद्धमिदमनेजत् मनसो जवीय इति चेत् नैष दोषः, निरुपाध्युपाधिमत्त्वेन तदुपपत्तेः । तत्र निरुपाधिकेन स्वेनरूपेणोच्यते-ऽनेजदेकम् । संकल्पविकल्पलक्षणस्य मनसोऽन्तःकरणस्यानुवर्तनमपेक्ष्य च मनसो जवीय उच्यते । यद्यपि मनसो बहिरस्वातन्त्र्याच्चक्षुराद्यन्तरा मनसो बहिर्गमनं न भवत्येव तथापि ब्रह्मलोकादिदूरस्थ संकल्पनं " ईशावास्यम् " इस मन्त्र में स्थित ईट् ( ईश ) शब्द का ही विवरण आगे के मन्त्रों से किया जाता है । अथवा यह जिज्ञासा होती है कि वह आत्मतत्त्व कौन है, जिसके हनन करने से अज्ञानी देवता भी आसुरीयोनि प्राप्त होते हैं, इसके विपरीत ज्ञानी जन जिसका आत्मनिष्ठा के द्वारा पालन करने से मुक्त हो जाते हैं? अतः उस आत्मतत्त्व का मन्त्र वर्णन करता है । जो चलता नहीं, चलना यहाँ पर अपने स्वरूप से प्रच्युति है, अर्थात् अपने स्वरूप से जो कभी चलायमान नहीं होता, सदा एकरूप ही रहता है, ऐसा वह आत्म-तत्त्व सर्वभूतों में एक अद्वितीयरूप से स्थित है । क्योंकि ऐसा “ एको -देव: " यह श्वेताश्वतर श्रुति भी कहती है । संकल्प - विकल्परूप मन से भी जो अधिक वेगवाला है । वेगवाले को " " जववत् " कहते हैं तथा जो अत्यन्त वेगवाला होता है, उसे " जवीय " कहते हैं । " यह कथन तो अत्यन्त विरुद्ध है कि चलता नहीं तथा मन से अधिक वेगवाला भी है, क्योंकि जो चलता ही नहीं वह वेगवाला कैसे हो सकता है? ", परन्तु आत्मतत्त्व में यह विरुद्धता का कोई दोष नहीं । क्योंकि आत्मा स्वरूप से निरुपाधिक होते हुए सोपाधिक भी है, अतः न चलना तथा अधिकवेग होना दोनों ही बन सकते हैं । वह आत्मतत्त्व निरुपाधिक अवस्था में अपने स्वरूप से न चलता हुआ एक कहा जाता है । संकल्प - विकल्परूप मन ( अन्तःकरण ) के अनुसरण की

पृष्ठ 72

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 72 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ३क्षणमात्रेण करोतीति मनसो जविष्ठत्वं लोके प्रसिद्धम् । तस्मिन् मनसि द्रुतं ब्रह्मलोकादीन् गच्छति सति प्रथमप्राप्त इवाऽऽत्मचैतन्यावभासो गृह्यतेऽतो मनसो जवीयः । ननु जवीयस्त्वेनाश्वादिवत् कुतो न चक्षुरादिग्राह्यत्वं स्यादा-मन इति चेत्तत्राह " नैतद्देवा आप्नुवन् ", एतत् एतदात्मतत्त्वं देवाः द्योतनशीलाः चक्षुरादीन्द्रियाणि नाप्नुवन् न प्राप्नुवन्तः न प्राप्तवन्तः -न प्राप्नुवन्ति । तेभ्यो देवेभ्यो जवीयो मनः ततोऽप्यात्मतत्त्वस्य rat स्त्वात् । चक्षुरादिप्रवृत्त मनो व्यापारपूर्वकत्वात्तदविषयत्वे चक्षु-रादिविषयत्वमप्यात्मनो न सम्भवत्येव । ननु मनोऽविषयत्वमेव कुत इति चेत्तत्राह - पूर्वमर्शत् यस्मात् जविष्ठान्मनसोऽपि पूर्वमर्शत् पूर्वमेव गतम् । ऋश गतौ । यथा मनसः परिमाणं मनसो न विषयो भवति, अत्यन्ताव्यवधानात्, तथाऽऽत्मा-प्यत्यन्ताव्यवधानान्मनसो विषयो न भवति, व्योमवद् व्यापित्वात् । अपेक्षा से मन से वेगवान् कहा जाता है । यद्यपि मन की बाह्यपदार्थों तक गमन करने में स्वतन्त्रता नहीं; अतः चक्षुरादि इन्द्रियों के बिना मन का बहिर्गमन नहीं होता, तथापि अत्यन्त दूर में स्थित ब्रह्म-लोकादि का संकल्प क्षणमात्र में करलेता है, अत एव मन की अत्यन्त वेगशालिता लोक में प्रसिद्ध है । ब्रह्मलोकादि के प्रति शीघ्र ही मन के चले जाने पर भी वहाँ पहिले से ही प्राप्त ( विद्यमान ) के समान चैतन्यात्मतत्त्व का प्रकाश अनुभव किया जाता है; अतः मन से भी अधिक वेगवाला आत्मतत्त्व है । यदि मन से पूर्व चैतन्य आत्मतत्त्व का स्वरूपभूत अवभास ( प्रकाश ) न होता तो ' मन ब्रह्मलोक को गया ', इसका अनुभव कैसे होता? अतः सिद्ध है कि मन से पूर्व ही वहाँ आत्मतत्त्व विद्यमान है, जहाँ मन जाता है । ' यदि आत्मतत्त्व वेगवान है तो अश्व आदि के समान चक्षुरादि इन्द्रियों से ग्राह्य भी होना चाहिए ' ऐसी शंका होने पर मन्त्र कहता है कि " नैनाद्दवा आप्नुवन् ” इस आत्मतत्त्व को प्रकाश करने के स्वभाववाले देव ( चक्षु आदिक इन्द्रियाँ ) प्राप्त नहीं होते, अर्थात् वह इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं, क्योंकि इन्द्रियों से वेगवान् मन है, मन से भी वेगवान् आत्मतत्त्व है । चक्षु आदि इन्द्रियों की प्रवृत्ति मन के व्यापाराधीन है, अतः जब मन

पृष्ठ 73

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 73 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४० ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् रूपादिहीनत्वाच्च चक्षुराद्यविषयत्वं प्रत्येतव्यम् । यथा प्रकाश्येन रूपा-दिना ss लोकादिना च प्रकाशकं चक्षुराद्यतीन्द्रियं न प्रकाश्यते, तथैव चक्षुरादिना तत्प्रकाशकं मनो न प्रकाश्यते, तद्वदेव सर्वप्रकाशकमात्म-तत्त्वमपि स्वप्रकाश्यैः मनोबुद्ध्यादिभिरिन्द्रियैश्च न प्रकाश्यते । " रूपं दृश्यं लोचनं दृक् तद्दृश्यं दृक्च मानसम् । दृश्याधी वृत्तयः साक्षी हगेव न तु दृश्यते ॥ ” ( वाक्यसुधा १ ) इत्युक्तः । यद्वा देवा अपि नैनत् प्राप्तुं शक्ताः सूक्ष्मत्वात् । पूर्वमत् अविनश्यदास्ते, अनादिनिधनमित्यर्थः । ' रिश हिंसायाम् ', रिशति नश्यति इति रिशत् न रिशदरिशत् अर्शत् । धातोरिकारलोपश्च्छा-न्दसः । सर्वसंसार धर्मवजितमात्मतत्त्वं स्वेन निरुपाधिकेन रूपेणावि-क्रियमेव सदुपाधिकृताः सर्वाः संसारविक्रिया अनुभवतीवाविवेकिना-मूढानामनेकमिव च प्रतिदेहं प्रत्यवभासते । तद्भावतः तदः स्थाने यदो वृत्तिरुद्द श्यत्वात् । यदात्मतत्त्वं धावतो द्रुतं गच्छतोऽन्यानात्म-विलक्षणवागिन्द्रियप्रभृतीन् अत्येति अतीत्यगच्छतीव । उसको विषय नहीं कर पाता, तब चक्षु आदि इन्द्रियाँ आत्मतत्त्व को कैसे विषय कर सकती हैं? शंका- ' आत्मा मन का विषय क्यों नहीं? ' उत्तर- " पूर्वमर्शत् " क्योंकि अत्यन्त वेगशाली मन से भी वह पूर्व ही प्राप्त है । जैसे मन का परिमाण मन का विषय नहीं; क्योंकि मन के अत्यन्त समीप है, उसी प्रकार मन का भी स्वरूप होने से आत्मा मन के अत्यन्त समीप है, अतः मन का विषय नहीं । आकाश के समान व्यापक होने से तथा रूपादिहीन होने से भी आत्मतत्त्व, चक्षु आदि इन्द्रियों का विषय नहीं, ऐसा जानलेना चाहिये । जैसे प्रकाश्य ( प्रकाश के विषय ) रूपादि तथा आलोकादि से प्रकाशक चक्षु आदिक अतीन्द्रिय पदार्थ प्रकाशित नहीं होते, उसी प्रकार चक्षु आदि से उनका प्रकाशक मन भी प्रकाशित होता नहीं । उसी प्रकार सर्वका प्रकाशक आत्मतत्त्व भी अपने प्रकाश्य मन, बुद्धि तथा इन्द्रियादि से प्रकाशित होता नहीं । इसी अर्थ का

पृष्ठ 74

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 74 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ४१ ननु मूलमन्त्र इव शब्दो नास्तीति कथमत्येतीवेत्युच्यत इतिचेन्न, तिष्ठत् गतिमकुर्वत्, अविक्रियमेव सत्, इतीवार्थस्य श्रुत्यैव दर्शितत्वात् । तस्मिन् अत्रापि तद: स्थाने यदोवृत्तिः, यस्मिन् तथाविधे नित्यचैतन्यस्वभावे स्वात्मचैतन्ये, मातरिश्वा मातर्यन्तरिक्षेऽव्याकृते वा बोधक ' रूपं दृश्यं’१४ यह अभियुक्तवचन भी है । अथवा सर्वज्ञदेवता भी इसको प्राप्त नहीं कर सकते । क्योंकि आत्मतत्त्व अति सूक्ष्म है । ' पूर्वमर्शत् ' इस वाक्य का अनादिनिधन भी अर्थ है । यद्यपि सर्व संसारधर्मों से रहित आत्मतत्त्व, अपने निरुपा -धिरूप से अविक्रिय एक ही है, तथापि आत्मा के यथार्थ स्वरूप को न जाननेवाले मूढ़ पुरुषों को आत्मतत्त्व अपनी उपाधि से की गई सर्व संसार की विक्रियाओं ( विकारों ) को अनुभव करनेवाला - जैसा तथा प्रत्येक शरीर में भिन्न अत एव अनेक - जैसा प्रतीत होता है । वह आत्मतत्त्व शीघ्रगतिशील वाग् आदिक सर्व पदार्थों का अतिक्रमण करता - जैसा है अर्थात् इनमें से किसी का भी विषय नहीं । ' मूलमन्त्र में इव ( जैसा ) अर्थवाला शब्द है ही नहीं, तब आपने अतिक्रमण करता - जैसा है, यह अर्थ कैसे कर दिया, यदि ऐसा कहा जाय तो इसका उत्तर यह है कि - श्रुति कहती है कि " तिष्ठत् " गति न करता हुआ ही, अतिक्रमण करता है; परन्तु जिसमें गति नहीं वह मुख्य अतिक्रमण कैसे करेगा? अतः इन दोनों पदों के अर्थ पर विचार करने पर यही सिद्ध होता है कि गत्यभाव उसमें मुख्य तथा अतिक्रमण मुख्य नहीं, अतिक्रमण - जैसा है । क्योंकि अतिक्रमण औपाधिक है । जिस नित्यचैतन्य स्वभाव आत्मचैतन्य के रहते ही मातरि १४. नीलपीतादिक रूप दृश्य हैं ( रूप यहाँ इतर विषयों का तथा नेत्र इतर इन्द्रियों का उपलक्षण है ), उसका द्रष्टा नेत्र है । नेत्र चरम-द्रष्टा न होने से दृश्य है, उसका द्रष्टा अन्तःकरणरूप मन अर्थात् बुद्ध सहित मन है । बुद्धिवृत्ति भी चरम द्रष्टा नहीं है, दृश्य ही है । बुद्धि का द्रष्टा - साक्षी ' द्रष्टा ' ही है, न कि दृष्टिगोचर होने-वाला दृश्य ।

पृष्ठ 75

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 75 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४२ ] वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् श्वयति श्वसिति गच्छति वर्धते सत्तां प्राप्नोति वा मातरिश्वा वायुः सर्वप्राणभृत् बुद्धिक्रियात्मको यदाश्रयाणि कार्यकरणजातानि यस्मिन्नोतानि प्रोतानि च स बुद्धिप्रधानत्वात् हिरण्यगर्भः प्राणप्रधानत्वात् सूत्रात्मा, अपः कर्माणि प्राणिनां चेष्टालक्षणानि, अग्न्यादित्यपर्जन्यादीनाञ्च ज्वलनदहनप्रकाशनाभिवर्षणादीनि दधाति विदधाति विभजति धारयति वा, " वायुर्वे गौतम तत्सूतं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति १५ ” ( बृ ० उ ० ३.७. २ ) इति श्रुतेः हिरण्यगर्भसृष्ट ं सकलं जगत् अर्थात् अन्तरिक्ष अथवा प्रकृति में जो गमन करता अर्थात् वृद्धि को प्राप्त होता है, अथवा सत्ता को प्राप्त होता है, उसे कहते हैं मात-रिश्वा ( वायु ) जो सर्वप्राणियों की पोषक है, ज्ञान तथा क्रियात्मक है । जिसके आश्रित प्राणियों के कार्य ( शरीर ) और करण ( इन्द्रिय ) का समुदाय है । जिसमें सर्वकरणसमुदाय ओतप्रोत है । वह ( मातरिश्वा a ) बुद्धि की प्रधानता से हिरण्यगर्भ, प्राण ( क्रिया ) की प्रधानता से सूतात्मा कहलाता है । वही सर्वप्राणियों की चेष्टारूप तथा अग्नि, आदित्य, पर्जन्य आदिकों के ज्वलन - दहन, प्रकाशन तथा वर्षा आदि सर्वकर्मों का विभाग तथा धारण करता है । इसी विषय को " वायुर्वा गौतम " यह बृहदारण्यक श्रुति ( ३.७.२ ) भी कहती है । हिरण्यगर्भ से रचित सर्वजगत् सर्वाधिष्ठान सर्वाधिकरणभूत उस आत्मतत्त्व के रहते ही जाना जाता है । अन्यथा चैतन्य के अभाव में जड़ जगत् का प्रकाश ही असम्भव हो जायगा । अग्न्यादि पदार्थों के धर्म तथा क्रिया नियत हैं, नियतधर्म तथा क्रिया विना नियामक के असंभव है । नियमन से नियन्ता परमेश्वर की सिद्धि होती है । इस अनुमान तथा अर्थापत्ति से ही नियन्ता परमेश्वर की सिद्धि नहीं, अपितु " भीषाऽस्मात् ” इस तैत्ति-रीय - आरण्यकश्रुति से भी उसकी सिद्धि है । कार्य के पूर्व कारण होता है, कारण से ही कार्य उत्पन्न होता है, हिरण्यगर्भ से लेकर चींटीपर्यन्त १५. हे गौतम! जिस सूत्र से यह लोक परलोक तथा सम्पूर्णभूत जुड़े हुए ( ग्रथित ) हैं, वह वायु है । अर्थात् सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ है ।

पृष्ठ 76

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 76 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ४३ सर्वाधिष्ठाने तस्मिन्नात्मतत्त्वेऽधिकरणभूते सत्येव प्रजायते, नियमनस्य नियन्तृपूर्वकत्वात् " भीषाऽस्माद्वातः पवते, भीषोदेति सूर्य: १६ ( तै ० आ ० ८.८, तै ० ज ० २.८. १ ) इति श्रुतेश्च । कार्यस्य कारणपूर्वकत्वाद-ध्यस्तस्याधिष्ठानपूर्वकत्वाच्च, ईश्वरस्यापि हिरण्यगर्भस्य नियतप्रवृत्त्य-न्यथानुपपत्त्यापि परमेश्वरोऽधिष्ठाता संभाव्यते । मातरिश्वाग्रहणमुप-लक्षणम्, सर्वाहि कार्यकारणादिविक्रियाः नित्यचैतन्यात्मस्वरूपे सर्वास्पदभूते सत्येव भवन्तीत्यर्थः । यद्वा - यस्मिन् मातरिश्वा अपः कर्माणि दधाति, आप्यायन्ते प्राप्यन्ते सुखदुःखानि याभिः ता आपः कर्माणि, ' आप्नोतेह स्वश्च ' ( उणादि - २. ५६ ) इति क्विप् धातोर्ह स्वश्च श्रौतानि कर्माणि सोमाज्यपयः प्रभृतिभिरद्भिस्सम्पाद्यन्त इति सम्बन्धाल्लाक्षणिको वा सर्व संसाररूप कार्य के कारणरूप से भी सर्वकारण परमेश्वर की सिद्धि होती है । अध्यस्त अधिष्ठानपूर्वक होता है, अत: अध्यस्त सर्वजगत् के अधिष्ठान के रूप में भी परमेश्वर की सिद्धि होती है । ' कार्यब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ की नियतप्रवृत्ति, अन्य प्रकार से अनुपपन्न ( असिद्ध ) होती हुई हिरण्यगर्भ के नियन्ता परमेश्वर का निश्चय कराती है, ' इस अर्था-पत्ति से भी परमेश्वररूप अधिष्ठाता निश्चित किया जाता है । " मात-रिश्वा " शब्द यहाँ सर्वकार्य - कारणभूत विकारों का उपलक्षण है, अतः सर्वाधिष्ठान चैतन्यात्मस्वरूप के रहते ही सर्वकार्य कारणभूत विकार होते हैं, यह वाक्यार्थ निष्पन्न होता है । अथवा - जिसके द्वारा सुख - दुःख प्राप्त किये जाते हैं उसे ' आप ' कहते हैं । इस व्युत्पत्ति के अनुसार सुख - दुःख को प्राप्त करानेवाले कर्म ही ' अप् ' शब्द के बाच्य हैं । श्रुति से प्रतिपादित अग्निहोत्रादि कर्मों का सोम, आज्य ( घृत ), दुग्धादि जलबहुलपदार्थों से सम्पादन १६. इस ब्रह्म से हुए भय से वायु पवित्र करता है, सूर्य उदय होता है । अर्थात् वायु, सूर्य आदि सर्वदेवता अपना - अपना कार्य करते हैं । भाव यह है कि वायु आदि का नियमन परमात्मारूप नियतापूर्वक ही है ।

पृष्ठ 77

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 77 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४४ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् कर्मस्वप शब्दप्रयोगः | १७ प्राणचेष्टायाश्चाप् निमित्तत्वाद्वा कारण-वाचकः शब्दः कार्ये लक्षणया प्रयुक्तः । सर्वाणि कर्माणि यज्ञदानहोमा-air समिष्टयजूंषि वायौ स्थाप्यन्ते । स्वाहा ' वाते धाः १८ ( यजुर्वेद अ ० २. म ० २१ अ ० ८ म ० २१ ) इति वायोः प्रतिष्ठात्वाभिधानात् । समष्टि-व्यष्टिरूपो ह्यसाविति वायुरपि यस्मिन् कर्माणि स्थापयति । याग-होमादीनां परमं निधानमित्यर्थः । तदात्मतत्त्वमित्यर्थः । यागहोमादि-कर्मणाम्परमास्पदत्वस्यापि ब्रह्मलक्षणत्वात् । अनेजदित्यनेनाचलं सर्वविक्रियावजितं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं होता है | अतः निमित्त - नैमित्तिकभाव सम्बन्ध से जलवाचक ' अप् ' शब्द का कर्मों में लक्षणा से प्रयोग हुआ है । प्राणचेष्टा रूपकर्म का कारण अप ( जल ) है, अतः कर्म के कारण जल के वाचक अप् शब्द का लक्षणा से कर्मों में प्रयोग हुआ है । सम्पूर्ण यज्ञ, दान, होमादिक कर्म तथा ' समिष्टयजुः ' नाम के होम वायु में स्थापन किये जाते हैं । क्योंकि " स्वाहा वातेधाः " - इस मन्त्र में वायु को सर्वकर्मों की प्रतिष्ठा कहा गया है । समष्टि तथा व्यष्टिरूप वायु भी सर्वकर्मों को जिसमें स्थापित करता है, ऐसा याग, होमादि सर्वकर्मों का परम निधान वह आत्म-तत्व है । याग, होमादि सर्वकर्मों का परम आस्पद ( अधिष्ठान ) होना भी परब्रह्म का लक्षण है । " अनेजत् " इस पद से अचल सर्व विकार से शून्य नित्य, शुद्ध, बुद्ध मुक्त स्वभाव, निर्विकार सत्य - ज्ञान - आनन्द स्वरूपब्रह्म विवक्षित १७. पाठा ० - ' प्राणिचेष्टायाः ' | ' आपोमयः प्राण: ' ( छा ० ६. ६.५ ) इति श्रुतेः प्राणस्यापोमयत्वात् प्राणचेष्टाया आपोमयत्वसिद्धेः प्राण-चेष्टाप्रयुक्तप्राणिचेष्टाया अपि अनिमित्तकत्वं सिद्धम् । १८. ' हे मनस्पते! हे देव! इस यज्ञको मैं आपके हाथ में देता हूँ । आप वायु में स्थापित कर दीजिये । ' इस मन्त्र के अनुसार यज्ञादिककर्मों की प्रतिष्ठा वायु है । उपर्युक्त अ ० ४०-४ इस मन्त्र के अनुसार वायु सर्वकर्मों को परमात्मतत्त्व में धारण करता है, अतः परमात्मतत्त्व सर्वकर्मों का अधिष्ठान है ।

पृष्ठ 78

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 78 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ४५ निर्विकारं सत्यज्ञानानंदलक्षणं ब्रह्म विवक्षितं भवति । तच्चैकं सजातीय-विजातीय स्वगत मे दशून्यं सर्वकारणं चक्षुरादीन्द्रियैर्मनसा चाप्रकाश्यं तत्प्रकाशकत्वादधिष्ठानत्वाच्च प्रत्यवचैतन्याभिन्नब्रह्मस्वरूपम् । दयानन्द: - " हे विद्वांसः, यदेकमनेजन्मनसो जवीयः पूर्वमशेत् ब्रह्मा-स्ति, एन वा नाप्नुवन् तत् स्वयंतिष्ठत् स्वानन्तव्याप्त्या धावतोऽन्या-नत्येति तस्मिन् सिद्ध स्थिरे सर्वत्राभिव्याप्ते मातरिश्वा वायुरिव-जीवो s पो दधातीति विजानीतेति । " तदपि यत्किचित्; वायुरिवेत्यस्य निर्मूलत्वात् । स्थिरस्य कथमन्यान् धावतोऽतिक्रम्योल्लंघन मित्यस्यासमाहितत्वात् । न च है | वह आत्मतत्त्व एक है, अर्थात् सजातीय - विजातीय - स्वगतभेद से शून्य सर्वका कारण चक्षु आदि इन्द्रियों तथा मनसे अप्रकाश्य ( अज्ञेय ) है; क्योंकि वह इन्द्रिय तथा मन आदिकों का भी प्रकाशक है । जैसे सूर्य से प्रकाश्य घट सूर्य का प्रकाशक नहीं, क्योंकि सूर्य घट का प्रकाशक है, उसी प्रकार आत्मतत्त्व अपने से प्रकाश्य मन, इन्द्रियादिकों का प्रकाश्य नहीं; क्योंकि वह इनका प्रकाशक है तथा सर्व का अधि-ष्ठान होने से प्रत्यक् चैतन्य से अभिन्न ब्रह्मस्वरूप है । श्रीस्वामी दयानन्द कहते हैं - " हे विद्वानो! जो एक अचल मन से भी वेगशील सर्व से पूर्व प्राप्त ब्रह्म है, इसको देवता प्राप्त नहीं होते, वह आत्मतत्त्व स्वयं स्थित रहता हुआ ही अपनी अनन्त-व्याप्ति से वेग से धावन करने ( दौड़ने वालों अन्य सभी का अति-क्रमण करता है । उस स्थिर सर्वव्यापक परमेश्वर के रहते ही वायु के समान जीव कर्मों का धारण करता है - ऐसा जानो । " यह उनका कहना कुछ नहीं, क्योंकि जो “ वायु के समान ” ऐसा अपने भाष्य में कहा है, उसका कोई मूल नहीं, अर्थात् मूलमन्त्र में समान अर्थ का वाचक कोई श द नहीं । उनके भाष्य में स्थिर परमेश्वर का अन्य दौड़नेवालों का अतिक्रम करना कैसे संभव है? इस शङ्का का कोई समाधान भी नहीं । यदि कहा जाय कि ' व्यापक होने से वेगवान् भी मन आदिकों का परमेश्वर अतिक्रमण करता है, ' तो यह कहना उचित नहीं, क्योंकि व्यापक होने से तो आकाशादिकों

पृष्ठ 79

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 79 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४६ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् व्याप्तिमात्रेणेन्द्रियबुद्ध्युल्लंघ्यातिक्रमणं संभवति, तथात्वे महदाका-शादीनामपि तथात्वापातात् ॥४ ॥

तद॑जति तन्नैजति॒ि तद्दूरे तद्वन्ति॒के ॥ तद॒न्तर॒स्य॒सर्व॑स्य॒ तद॒सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥५ ॥

वह आत्मतत्त्व अचल, निर्विकार है । अज्ञों की दृष्टि में वह चलता - सा है । अज्ञों की पहुँच उस तक नहीं, अतः वह दूर सा है । विज्ञों की दृष्टि में तो वह सर्वथा प्रत्यगात्मस्वरूप होकर स्फुरित होता है, अतः समीप ही है । इस नाम - रूप - क्रियात्मक जगत् में उसकी अनुगति है, वह इनका परमाश्रय ( अधिष्ठान ) होकर विद्यमान है, इसलिये ' समीप ही है । सम्पूर्ण जगत् के रूप में उसी की स्फूर्ति है । जङ्गमरूप से चल और स्थावर रूप से वह अचल है । नक्षत्रादिरूप से दूर और पृथ्वी आदि रूप से समीप है । अथवा ब्रह्मादि देवशिरो-मणियों के रूप से वह चलता है - लीला से व्यवहार करता है और स्वरूप से अचल है । अन्तर्यामी और प्रत्यगात्मरूप से सबके अन्दर और ' विषयरूप से बाहर है ॥ ५ ॥

को भी मन आदिकों का अतिक्रमण करने वाला कहा जा सकता है । यदि कहा जाय कि ' व्यापक आकाश भी ऐसा है ही ' तो यह कहना भी उचित नहीं, क्योंकि यहाँ धावनकर्ताओं का अतिक्रमण परमेश्वर की ही विशेषता के रूप में कहा गया है । यदि उस विशेषता को आकाश में स्वीकार किया जायगा तो वह परमात्मामात्र की विशेषता न रहेगी परमात्मा से भिन्न सर्व जगत् मूर्त तथा अमूर्त इन दो भागों में विभक्त है । जिनमें से कुछ पदार्थ चल हैं, कुछ अचल हैं । उन सर्व की व्यावृत्ति न चल है न अचल ' इन विशेषणों से करके सर्व शीघ्रगति-शीलपदार्थों का अतिक्रमणमात्र परमात्मा की विशेषता कही गयी है ॥४ ॥

पृष्ठ 80

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ४७ न मन्त्राणां जामिताऽस्तीति सकृदुक्त रहस्यं न चित्तमधिरो-हतीति पूर्वोक्तमेवार्थं पुनर्वदति । मातापितृशतादपि हितैषिणी श्रुतिः । तत् प्रकृतात्मतत्त्वमेजति चलति, तदेव च न एजति स्वतो नैव चलति, स्वरूपे सर्वदा कूटस्थमचलं स देवो मूढदृष्ट्या चलतीवेत्यर्थः । तदुदूरे-देशतः कालतश्च विप्रकृष्टदेशे वर्तते, वर्गकोटया कालेन महाप्रस्थानेन च अविद्वद्भिर्मनागपि प्राप्तुमशक्यत्वात् तत् उ तदेव अन्तिके समीपे, विदुषां प्रत्यगभिन्नत्वेन भासमानत्वात् । तथा अस्य सर्वस्य जगतः नामरूपक्रियात्मकस्य अन्तः - अन्तरेवात्मतत्त्वं, ' आत्मा सर्वान्तर १६ " ( बृहदारण्यकोपनिषत् ३ - ४ - १ ) इति श्रुतेः । सर्वभूताभ्यन्तरभूतः । तदु तदेव अस्य सर्वस्य जगतः बाह्यतः बहिर्भूतमपि बाह्याभ्यन्तरसकल-वस्तूनामधिष्ठानत्वेनाकाशवत्सर्वव्यापित्वात् । मन्त्रों में आलस्य नहीं है, एक बार उपदेश किया रहस्यभूत ( दुर्विज्ञेय ) -- वस्तु चित्त में नहीं स्थिर होती, अतः पूर्वोक्त अर्थ को ही यह मन्त्र पुनः कथन करता है । क्योंकि श्रुति ( वेद ) सैकड़ों माता - पिता से भी अर्थिक हितैषिणी है । वह प्रकरणप्राप्त आत्मतत्त्व चलता तथा वही आत्मतत्त्व स्वयं नहीं चलता; क्योंकि वह अपने स्वरूप में सदा निर्विकार तथा अचल है । वह देव मूढपुरुषों की दृष्टि से चलते के समान है, यह अर्थ है । वह आत्मतत्त्व दूर है अर्थात् देश - काल से व्यवहित देश में वर्तमान है; क्योंकि करोड़ों वर्ष तथा महाप्रस्थान से विद्वानों ( अज्ञानियों ) द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता । वही आत्मदेव समीप भी है; क्योंकि वह विद्वानों को अपने अन्तरात्मा से अभिन्न प्रतीत होता है तथा इस नाम - रूप - क्रियात्मक सर्वजगत् के अन्तः ( अन्दर ) वह आत्मतत्त्व है । क्योंकि बृहदारण्यक उपनिषद् उसे सर्वान्तर कहती है । सर्वान्तरभूत वह देव ही इस सर्व जगत् के बाहर भी है । ( क्योंकि ) सर्वबाह्याभ्यन्तर वस्तुओं का अधिष्ठान होने से वह आकाश के समान व्यापक है । व्यापक होने से ही वह सर्व के बाहर भी है । १६. आत्मा सर्व के अन्तर है, अर्थात् सर्वभूतों के अतिशय ( अत्यन्त ) अन्दर है ।