वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री — पृष्ठ 81–90

वेदार्थ पारिजात - शुक्लयजुर्वेद करपात्र भाष्य - ८ - स्वामी करपात्री · पृष्ठ 81–90

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४८ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यद्वा - कारणरूपं कार्यकारणातीतं वाऽऽत्मतत्त्वमुक्तम् अथेदानीं कार्यरूपेणोच्यते । तिस्रोऽनुष्टुभः । तदेव सर्वप्राणिरूपेणावस्थितं सत् एजति चलति सक्रियं भवति तन्नैजति तदेव च न चलति, स्थावर-रूपेणावस्थितमचलम् । तदेव दूरे नक्षत्रादिरूपेण दूरेऽवस्थितम् । तदु तदेव च उः समुच्चये, अन्तिक पृथिव्यादिरूपेणात्यन्तं सन्निकृष्टम्, " सर्व खल्विदं ब्रह्म " २ ० ( छान्दो ० उप ० ३ -१४ - १ ) इति श्रुतेः । तदेवास्य सर्वस्य प्राणिजातस्य प्रत्यगात्मरूपेणान्तर्यामिरूपेण चान्तर्मध्यत आस्ते । तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः - सर्व प्राणिजातस्य विषयादिरूपेणावस्थितं चेतनाचेतनरूपमनन्तं सर्वगं ब्रह्म त्यर्थः । अनयोपासनया फलप्राप्त्यर्थमचिरादिचिंतनमपि नोपयुज्यते - ' न अथवा — कारणरूप अथवा कार्य - कारण से अतीत ब्रह्मात्मतत्त्व का वर्णन पूर्वमंत्र में कर दिया, इसके अनन्तर इस मंत्र में कार्यरूप ब्रह्म का वर्णन किया जाता है । सर्वप्राणियों के रूप में स्थित हुआ वह ब्रह्म ( आत्मतत्त्व ) चलता है अर्थात् सक्रिय है । स्थावरवस्तु के रूप में स्थित अचल है । वही नक्षत्रादिरूप से दूर स्थित है और वही पृथिवी आदि के रूप में स्थित हुआ अत्यन्त समीप है । क्योंकि " सर्वं ” ग्रह श्रुति इस सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म ही कह रही है । वह आत्मतत्त्व ( ब्रह्म ) ही इस सर्वप्राणिसमुदाय के अन्तः ( मध्य ) में प्रत्यक् ( अन्तर ) -आत्मा तथा अन्तर्यामीरूप से स्थित है । वही इस सर्वप्राणिसमुदाय के विषय ( भोग्यवस्तु ) आदि के रूप से स्थित है । भाव यह है कि वह चेतन - अचेतन जगत्रूप, अनन्त सर्वव्यापक ब्रह्म है । ' सर्वचेतन - अचेतन ब्रह्म ही है ' इस उपासना से फल की प्राप्ति के लिये अचिरादिमार्ग का चिन्तन भी उपयोगी नहीं है । क्योंकि श्रुति ऐसे उपासक के प्राणों का अन्यत्र -गमन - निषेध तथा यहाँ ही विलय है । २०. यह सर्व जगत् ब्रह्म ही है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.स.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ४६ तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रेव समवनीयन्ते ब्रह्मव सन् ब्रह्माप्येति ' I २१ ( बृह ० उप ० ४ । ४ । ६ ) इति श्रुतेः । यद्वा - तदेव ब्रह्म शिवविष्ण्वादिरूपेण एजति चलति व्यवहरति, तदपि मायया लीलया वा व्यवहरति स्वरूपेण तु कूटस्थं निर्विकारत्वा-चलति । दयानन्दः-- - " हे मनुष्याः तद्ब्रह्म जति तन्न जति तदूरे तद्वन्ति-के तदस्य सर्वस्य बाह्यतो वर्तत इति निश्चिनुत " इति । तदप्यसत् । वस्तुतः कारणत्वेनाभिमतस्य निष्क्रियत्वानुपपत्तेः, अथवा - वही ब्रह्म, शिव, विष्णु आदिरूप से चलता अर्थात् माया अथवा लीलासे व्यवहार करता है । स्वरूप से कूटस्थ है; अतः निर्विकार होने से चलता नहीं, अर्थात् सर्वविकाररहित है । दयानन्दभाष्य - " हे मनुष्यो! वह ब्रह्म चलता है तथा नहीं भी चलता है । वही दूर तथा वही समीप भी है । वह इस सारे संसार के बाहर भी विद्यमान है, ऐसा निश्चय करो । ” यह भाष्य उचित नहीं, क्योंकि दयानन्दजी को परमेश्वर संसार का कारणरूप से अभिमत है । जैसे घट का कारण कुम्भकार होता है, वैसे ही संसार का निमित्तकारण वे परमेश्वर को मानते हैं; परन्तु जैसे कुलाल निष्क्रिय नहीं है, उसी प्रकार संसार का निमित्तकारणरूप परमेश्वर भी निष्क्रिय नहीं हो सकता । ऐसी दशा में ' वह परमेश्वर नहीं चलता अर्थात् निष्क्रिय है ' यह कथन कैसे संभव हो सकता है? अतः यह भाष्य अनुचित है । यदि कहा जाय कि - सिद्धान्त में परमेश्वर चेष्टा से रहित निष्क्रिय है, तब उसके द्वारा संसार की २१. आप्तकाम, पूर्णकाम उस ब्रह्मवेत्ता के प्राण इस देह से दूसरे देह की प्राप्ति के लीन हो जाते हैं । प्राप्त करता है । लिये ऊर्ध्वगमन नहीं करते, अपितु यहाँ ही ब्रह्मवेत्तापुरुष ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्म को

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५० ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

अनीहादविक्रियात् कार्यानुत्पत्तेः । सिद्धान्ते विवर्तवादाश्रयणान्न दोषः ।

जगदाकारेण परिणममानाया मायाया अधिष्ठानत्वेनैव ब्रह्मणो कर्तृत्वा-भ्युपगमात् ॥५ ॥

1

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति ।

सर्वभूतेषु चा॒त्मानं॒ ततो॒ न विचिकित्सति ॥६ ॥

जो मुमुक्षु - संन्यासी ब्रह्म से अभिन्न आत्मा में अव्यक्त से लेकर स्थावर पर्यन्त ( शास्त्रगम्य और प्रत्यक्ष ) भूतों को अनुभव करता है । - आत्मा से अतिरिक्त नहीं जानता तथा उन सर्वभूतों में कारणरूप से या आत्मरूप से स्वयं को अनुगत ( अनुस्यूत - प्रोत ) जानता है, वह तत्त्वदर्शी उस आत्मदर्शन के फलस्वरूप ' न विचिकित्सति ' - संशय नहीं करता, ' न विजुगुप्सते ' - घृणा नहीं करता ॥६ ॥

ननु तथाभूत आत्मतत्त्वे सकलविषयत्यागेन कथं सुदृढा स्थितिः स्यादिति तत्राह - यस्तु ब्रह्मक्षवलक्षणः मुमुक्षुः परिव्राट् सर्वाणिभूतानि अव्यक्तादीनिभूतानि, आत्मन् आत्मनि सप्तम्या अलुक्, स्वरूप एवानुपश्यति आत्मव्यतिरिक्ततया न जानाति तेषु चात्मानं कारण-त्वेनात्मत्वेन वा अनुस्यूतं पश्यति, यथा अस्य कार्यकारणसंघातस्या-सृष्टिरूप कार्य कैसे होता है? हमारे सिद्धान्त में तो विवर्तवाद स्वीकार होने से कोई दोष नहीं; क्योंकि परमेश्वर से अधिष्ठित माया जगत् के आकार में परिणत होती है । उसका अधिष्ठान होने से ही परमात्मा को कारण ( कर्ता ) कहा जाता है ॥ ५ ॥

पूर्वोक्तपरमात्मा से अभिन्न आत्मतत्त्व में सकलविषय त्याग से स्थिति किस प्रकार हो, ऐसी आशंका होने पर मन्त्र कहता है ' जो ब्राह्मण - क्षत्रियरूप मुमुक्षु संन्यासी अव्यक्त से लेकर सर्वभूतों को अपने स्वरूप में ही अनुभव करता है, आत्मा से अतिरिक्त नहीं जानता है

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ५१ त्माहं सर्वप्रत्ययसाक्षिभूतश्चेता ( चेतयिता ) केवलो निर्गुणोऽनेनैव स्वरूपेणाव्यक्तादीनां स्थावरान्तानामहमेवात्मेति सर्वभूतेषु चात्मानं निर्विशेषं यस्त्वनुपश्यति स आत्मवित् ततः तस्मादेवात्मदर्शनान्न विचिकित्सति न संशेते, ' कित रोगापनयने संशये च ' इति - धातोः ' गुप्तिकिद्भयः सन् ' ( पा ० ३.१.५ ) इति स्वार्थे सन् प्रत्ययः । सर्वः संदेहोऽन्यदात्मनः पश्यतो भवत्यात्मानमेवात्यन्तं शुद्ध निरन्तरं पश्यतो न संदेहावकाशः । उभय कोटिक ज्ञानरूपः संशयो द्वं तं पश्यतो भवति न त्वात्मैक्यज्ञस्य । ' न विजुगुप्सत ' इति शाखान्तरीयः पाठः तत्रायमर्थः -- जुगुप्सां घृणां न प्राप्नोति । आत्मानमेवत्वत्यन्तविशुद्ध सांसारिकदोषविनि-मुक्त निरतिशयानन्दरूपमद्वयं पश्यतः किं निमित्ता घृणा जायेत । तस्मादात्मनः सार्वात्म्यानुसंदधानस्य जुगुप्सा न जायते इति युक्त-तरम् ' घृणा दया जुगुप्सा वा जायते भेददर्शिनः । ' तथा उन सर्वभूतों में कारणरूप से या आत्मरूप से स्वयं को अनुस्यूत ( प्रोत ) जानता है अर्थात् जैसे ' इस कार्य करण - संघात ( शरीर ) का आत्मा मैं सर्वघट - पट - ज्ञानों का साक्षी - चेतन तथा केवल ( द्वितीय से रहित ) निर्गुण हूँ, इसी रूप से ( वैसे ही ) अव्यक्त से लेकर स्थावर-पर्यन्त सर्वभूतों का भी आत्मा मैं ही हूँ, इस प्रकार सर्वभूतों में जो निर्विशेष आत्मा को जानता है, वह आत्मवेत्ता उस आत्मज्ञान के बल से किसी प्रकार का संशय नहीं करता । क्योंकि सर्वसंशय आत्मा से अतिरिक्त वस्तु को जाननेवाले को ही होते हैं । भेदरहित अत्यन्त शुद्ध आत्मा को जाननेवाले को तो जब संशय का अवकाश ही नहीं, तब संशय कैसे हों? दो कोटि ( प्रकार या धर्म ) वाला संशयरूप ज्ञान द्वै तदर्शी पुरुष को ही होता है, न कि एक अद्वितीय आत्मा के ज्ञाता को । " न विचिकित्सति " के स्थान में दूसरी शाखा में ' न विजुगुप्सते ' यह पाठ है । इसका यह अर्थ है - विद्वान् ' जुगुप्सा ' - घृणा को प्राप्त नहीं होता । क्योंकि अत्यन्त शुद्ध सांसारिक दोषों से रहित निरतिशय आनन्दस्वरूप अद्वय ( द्व े तवर्जित ) आत्मतत्त्व को जाननेवाले को घृणा किस निमित्त से होगी! जबकि आत्मा से अतिरिक्त का उसकी दृष्टि

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५२ ] वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् यद्वा — यस्तु मुमुक्षुः सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवास्मिन्नीशस्वरूप आनन्दात्मनि स्वयञ्ज्योतिष्येव, प्रत्यक्षरात्मनोर्भेद वारणार्थ एव-कारः, मयिप्रत्यक्चैतन्याभिन्ने परमात्मन्येव सर्वाणि भूतान्यध्यस्ता-नीति साक्षात्करोति । सर्वभूतेषु चात्मानम् - वस्तुतोऽहमेव सर्वभूतेष्व-वस्थितो न मदतिरिक्तान्येतानि । एवं विज्ञानवतः फलमुच्यते प्रत्यक्चै-तन्याभिन्नश्चिदेकरसोऽस्मीति विज्ञानवान् न विचिकित्सति, ऐकात्म्य-ज्ञानात् संशयविपर्ययादिरहितो भवति । ' न विजुगुप्सते ' वा निन्दास्तुति-रहितो भवतीत्यर्थः । दयानन्दः -- '- " हे मनुष्याः यः आत्मन्येव सर्वाणि भूतान्यनुपश्यति यस्तु सर्वभूतेष्वात्मानं च समीक्षते स ततो न विचिकित्सतीति यूयं विजानीतेति । " में अस्तित्व ही नहीं, जिससे कि घृणा हो । अतः यह कहना अत्यन्त युक्तिसंगत है कि आत्मा की सर्वरूपता का अनुसंधान ( अपरोक्षज्ञान पूर्वक चिन्तन ) करनेवाले को घृणा नहीं होती । अत एव अभियुक्त-वचन है कि " घृणा अथवा दया आदिक मनोवृत्तियाँ भेददर्शी को ही होती हैं । " अथवा – मन्त्र में ' एव ' शब्द आत्मा तथा परमात्मा के भेद के निवारण के लिये प्रयोग किया गया है । जो मुमुक्षु ' प्रत्यक्चैतन्य स्वयं-ज्योति आत्मा से अभिन्न परमात्मा में सर्वभूत अध्यस्त ( रज्जुसर्प के समान कल्पित ) है, ' ऐसा प्रत्यक्षअनुभव वस्तुत: ' मैं ही सर्वभूतों में स्थित हूँ, मेरे से अतिरिक्त भूत करता है । नहीं हैं । इस प्रकार का ज्ञान जिस पुरुष को है, उसको जो फल मिलता है वह कहा जाता है । ' प्रत्यक् चैतन्य से अभिन्न चिदेकरस मैं हूँ ' ऐसा ज्ञानवाला पुरुष, संशय-विपर्यय से रहित होता है, क्योंकि उसे केवल आत्मा का ही ज्ञान है, अन्य का नहीं । अथवा " न विजुगुप्सते " इसका अर्थ है कि वैसा आत्मज्ञानी निन्दा - स्तुति से रहित होता है । श्रीदयानन्दभाष्य - " हे मनुष्यो! जो आत्मा में सर्वभूतों को देखता है तथा सर्वभूतों में आत्मा को देखता है, वह उस ज्ञान से संशय को प्राप्त नहीं होता है । "

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वेदार्थ पारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ५३ तन्न, त्वद्रीत्या प्रकृति महति आकाशेऽपि सर्वभूतानां सत्त्वेन ब्रह्मणस्तदविशेषापत्तेः । न चोपादानोपादेयभावेन जगतः परमेश्वरा-श्रयत्वात् त्वया प्रकृतेरेवोपादानत्वाभ्युपगमात् । न चात्मशब्दश्च प्रत्य-गात्मपर एव मुख्य: ' आत्मनस्तु कामाय सर्वंप्रियं भवतीति श्रुतेः ( बृहदा ० उ ० २.४. ५ ) न च परमात्मानं जीवो द्रष्टु ं शक्नोति, परमात्म-विज्ञाने साधनानुपपत्तेः । न चक्षुरादि तत्र कारणं रूपाद्यभावात्, न च मानसं तत्र कारणं तस्य बहिरस्वातन्त्र्यात् । अन्तर्यामिणोऽबाह्यत्वेऽपि धर्माधर्मादिवदन्यात्मवच्चायोग्यत्वेनापि तदनुपपत्तेः ॥६ ॥

यह आपका भाग्य उचित नहीं; क्योंकि आपकी रीतिसे प्रकृति, महत्तत्त्व और आकाश में भी सर्वभूतों की विद्यमानता होने से ब्रह्म की आकाशादि से विशेषता न रहेगी अर्थात् ब्रह्म भी आकाशादि के समान हो जायगा । परन्तु मन्त्र में ब्रह्म में भूतों की तथाभूतों में ब्रह्म की असाधारणस्थिति का वर्णन है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि ' ब्रह्म जगत् का उपादानकारण है तथा जगत् उपादेय ( कार्य ) है; अत: ब्रह्म में जगत् की तथा जगत् ( भूतों ) में ब्रह्म की विशेषस्थिति है । उस प्रकार की स्थिति जगत् ( भूतों ) की आकाश में ' तथा भूतों में आकाश की नहीं है " क्योंकि आपने भूतों का उपा-दानकारण ब्रह्म नहीं माना, अपि तु प्रकृति को ही माना है । मन्त्र में आत्मशब्द प्रत्यक् - आत्मा का ही मुख्यरूप से वाचक है; क्योंकि “ आत्मनः ” इस बृहदारण्यकश्रुति में आत्मशब्द का प्रयोग प्रत्यक्-आत्मा के लिये ही किया गया है । आत्मशब्द का अर्थ परमात्मा मान भी लिया जाय तो इस मान्यता में दोष यह है कि परमात्मा को जीव देख नहीं सकता तथा मंत्र में आत्मशब्द के वाच्य का प्रत्यक्ष अनुभव कहा गया है, अतः मन्त्र में आत्मशब्द, परमेश्वर का वाचक नहीं । परमात्मा के प्रत्यक्ष जानने के साधन भी असिद्ध हैं । चक्षु तो रूप तथा रूपवाली वस्तु के जानने में समर्थ है, परमात्मा रूपादि के अभाववाला है, अतः परमात्मा के प्रत्यक्ष जानने में चक्षुः आदि इन्द्रिय साधन नहीं । मन भी इन्द्रियों के बिना बाह्यवस्तु के जानने में असमर्थ है । अन्तर्यामी यद्यपि बाह्य है नहीं, तथापि उसके जानने में मन की योग्यता उसी प्रकार नहीं, जिस प्रकार अन्तःस्थित धर्मा-धर्मादि के जानने की उसमें योग्यता नहीं । अपने से अन्य देवदत्तादि

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५४ ] वेदार्थपारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत्

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७ ॥

जिस कालविशेष अथवा आत्मा में ब्रह्मात्मतत्त्व की सर्वरूपता को जाननेवाले के लिये सर्वभूत अपने कल्पित स्वरूप को त्यागकर अकल्पित - चिदानन्दस्वरूप आत्मा ही हो जाता है; उस काल अथवा आत्मा में असंग अद्वितीय आत्मा के एकत्वदर्शी को कारण सहित संसार का निवारण हो जाने से शोक और मोह नहीं होता || ७ || यस्मिन् अवस्थाविशेषे यस्मिन् काले आत्मनि वा सर्वाणिभूतानि चेतनाचेतनानि; विजानत: - ' आत्मैवेदं सर्वं ' ( छा ० ७. २५.२ ), ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ० ३.१४.१; महा ० नारा ० १.३ ) त्येवमादिवाक्य-विचारेणावधृतपरमार्थस्य सतः आत्मैवाभूत् स्वं स्वं रूपं परित्यज्य कल्पितमकल्पितमानन्दात्मस्वरूपमेवाभूत्, परमार्थदर्शनादात्मैव संवृत्तः, तत्र तस्यामवस्थायां तत्रात्मनि वा विशुद्धमाकाशतुल्यमात्मैकत्वं पश्यतः को मोहः कश्चशोकः, न कश्चिदपीत्यर्थः । अविज्ञातात्मतत्त्वस्यैव शोकमोहादिसंसारसंभवात् एकत्वमनुपश्यत इति हेतुगर्भविशेषणम्, में परमात्मा का प्रत्यक्ष उसी प्रकार संभव नहीं है, जिस प्रकार दूसरे के आत्मा का प्रत्यक्ष संभव नहीं ॥ ६ ॥

जिस कालविशेष, अथवा आत्मा में भूतों को जाननेवाले को अर्थात् " यह सर्व आत्मा ही है " अथवा " यह सर्वब्रह्म हो है " इत्यादि वाक्यों के विचार से परमार्थस्वरूप को जाननेवाले को सर्वभूत आत्मा ही हो गया अर्थात् अपने कल्पित स्वरूप को त्यागकर परमार्थदर्शन से अकल्पित ( वास्तविक ) आनन्दस्वरूप आत्मा ही हो गया ( हो जाता है, उस काल अथवा आत्मा में विशुद्ध आकाश के समान असंग

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वेदार्थपारिजात: ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् [ ५५ शोकमोहयो र विद्या कार्ययोराक्षेपेणासंभवप्रदर्शनात् सकारणस्य संसार-स्यात्यन्तमेवोच्छेदः प्रदर्शितः । यस्मिन् निर्विकल्पे परेऽव्यये स्वात्माभिन्ने ब्रह्मणि सर्वाणिभूतान्यात्मैव संवृत्तः, तत्र तस्मिन् अवि-द्यातत्कार्यमुक्त े कः शोकः को मोहः स्वव्यतिरिक्तस्यैवाभावात् सर्वं विकारजातं तस्य विदुषः स्वात्मरूपमेव भवति । तत्र शोकमोहयोः कुतः प्रसंग:? कुत एतदिति चेत्तत्रोच्यते - एकत्वम् - परमात्मना सह -कत्वमनु पश्यतः गुरुमुखान्महावाक्यार्थं श्रुत्वाऽनुपश्चात् साक्षात्कुर्वतः । निरतिशयानन्दं सर्वदुःखासंस्पृष्टमात्मानमजानत एव शोको भवति मोहश्च । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां शोकादेरविद्याकार्यत्वावधारणान्मूलावि-द्यानिवृत्त्यैव शोकादेः समूलोन्मूलनात् । आत्मा के एकत्व के देखने ( प्रत्यक्ष अनुभव करने ) वाले को कोई मोह और शोक नहीं होता । क्योंकि जो एक अद्वितीय आत्मतत्त्व को नहीं जानता, उसी को शोक- मोहादि संभव हैं, तत्त्वज्ञ को नहीं । एकत्व को जाननेवाले के लिये आक्षेपपूर्वक शोक - मोह असंभव प्रदर्शन करने से यह सिद्ध किया है कि अज्ञानरूप कारण के सहित शोक- मोहादि सर्वसंसार का उच्छेद हो जाता है । जिस निर्विकल्प आत्मा से अभिन्न अव्यय परब्रह्म परमात्मा में सर्वभूत आत्मा ही हो गये, उस अविद्या तथा अविद्या के कार्य से मुक्त आत्मा में कौन शोक तथा मोह है? अर्थात् न कोई । क्योंकि अपने से अतिरिक्त का अभाव हो जाता है, ऐसे विद्वान् को तो सर्व विकार समुदाय स्वात्मरूप हो जाता है । ऐसे ( उस ) विद्वान् में शोक - मोह की किस निमित्त से प्राप्ति संभव है? अर्थात् किसी से नहीं । यदि कहा जाय कि ऐसा कैसे? तो कहा जाता है कि वह विद्वान् गुरु के मुख से महावाक्य के अर्थ ( एकत्व ) को श्रवण करने के पश्चात् एक अद्वितीय आत्मतत्त्व का साक्षात्कारवाला होने से उसके शोक - मोह नष्ट हो जाते हैं । निरतिशय आनन्दस्वरूप सर्व-दुःखों से असम्बन्धित आत्मा को न जाननेवाले को ही शोक और मोह होते हैं । " अविद्या होने पर शोक मोह होते हैं, अविद्या ( अज्ञान ) न होने पर नहीं होते " इस अन्वय - व्यतिरेक - युक्ति से शोक और मोह अविद्या के कार्य हैं, ऐसा निश्चय होता है; अतः शोक तथा मोह, आत्मतत्त्व के अज्ञानी को ही होते हैं । परमात्मा से अभिन्न आत्मा के

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५६ ] वेदार्थ पारिजात: ( वा. सं. अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् दयानन्दः -- " यस्मिन्परमात्मनि विजानतः सर्वाणिभूतान्या-मैवाभूत्, तत्रैकमनुपश्यतः को मोहोऽभूत् कः शोकश्च " इति । तदपि न शोकमोहादिहेतोः संसारस्य सत्त्वे शोकमोहाक्षेपा-सम्भवात् । परमात्मन एकत्वेऽपि संसारस्य बाधानङ्गीकारात् । सिद्धान्ते तु सर्वस्य संसारस्य ब्रह्मणि कल्पितत्वात् तज्ज्ञानेन तद्बाधितत्वात् सम्भवत्येव हेतुराहित्येन शोकादिबाधः ॥ ७ ॥

अज्ञान ( मूलाविद्या ) की निवृत्ति होने से ही शोक तथा मोह समूल नष्ट हो जाते हैं । श्रीस्वामी दयानन्दजी कहते हैं कि - जिस काल में परमात्मा में स्थित सर्वभूत विद्वान् को आत्मा हो जाता है, उस काल में सर्वभूतों में एक परमात्मा को देखने वाले को कौन शोक - मोह? अर्थात् कोई भी शोक - मोह नहीं होता । उनका यह लिखना भी उचित नहीं; क्योंकि शोक - मोहादिका कारण है संसार । वह जब तक विद्यमान है, तब तक सम्पूर्ण शोक-मोह की निवृत्ति असम्भव है । परमात्मा एक होने पर भी आपको संसार का बाध स्वीकार नहीं है । शोक - मोह के कारण संसार का बाध न होने से सर्वशोक - मोह की निवृत्ति संभव नहीं । हमारे सिद्धान्त २२. शोको ' मानसस्तापो मोहो विवेकाभाव: । आदि शब्दस्तदवा-न्तरभेदार्थः । स एव संसारस्य दुःखात्मनो बीजभूतो दोषस्त-स्योद्भवेकारणमहङ्कारो ममकारस्तद्धेतुरविद्या च ।...... मोहइति मिथ्या ज्ञानम् । आत्मयाथात्म्यज्ञानविरहवतो नाहं सुखी भवामि किन्तु दुःखीत्येवं विधम् । शोकश्च तत्प्रयुक्तो हृदयदाहविशेषः । तत्स्वरूपं - ' हा हतोऽहं न मे पुत्रोऽस्ति, न मे क्षेत्रम् ' । अहं - मम, कर्तृत्व- भोक्तृत्व, सुखित्व - दुःखित्वरूप संसार अविद्या का कार्य है । अविद्या की निवृत्ति से ही शोक-मोहसहित संसार की निवृत्ति संभव है । जिनके मत में संसार सत्य है, उनके मत में शोक - मोह की आत्यन्तिक - निवृत्ति अत है ।

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वेदार्थपारिजातः ( वा.सं.अ. ४० ) ईशावास्योपनिषत् 1 स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रण-मस्नाविरथंशुद्धमपापविद्धम् । 1 1 कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्य-[ ५७ तोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः॒ समा॑भ्यः ॥८ ॥

L ' ब्रह्म ' आकाशवत् व्यापक है । ' शुक्ल ' अर्थात् विशुद्धविज्ञानघन स्वप्रकाश चिदानन्दस्वरूप है । एकत्वविज्ञान से उसकी उपलब्धि होती है | वह स्वानुरूप दिव्यविग्रहयुक्त होने पर भी जीवोचित और भगव-त्समसत्ताक स्थूल - सूक्ष्म - कारण - देह रहित है । देहरहित होने से ' शुद्ध ' अर्थात् सत्त्व - रज - तमरूप त्रिगुणरहित है । ' अपापविद्ध ' अर्थात् क्लेश-कर्म - विपाक आशयरूप कर्तृत्वशून्य है । ' कवि: ' - क्रान्तदर्शी अर्थात् सर्व द्रष्टा है । ' मनीषी ' - मनका प्रेरक सर्वज्ञ परमेश्वर है । ' परिभू: ' -सर्वोपरि है । ' स्वयंभूः ' - सर्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्ति है । निज स्वात-त्र्य - शक्ति से सर्वभवन - समर्थ है । प्रजापतियों के लिये कर्मसाधन-सहित कर्तव्यपदार्थों का विधायक है । इस रहस्य का मर्मज्ञ अहंता-ममता - त्यागपूर्वक ही स्थावर - जङ्गमात्मक - प्रपञ्च के द्वारा भोग करनेवाला होता है ॥ ८ ॥

जगति य एवमात्मानं पश्यति स ईदृशं ब्रह्म पर्यगात् परिगच्छति में तो सर्व संसार ब्रह्म में कल्पित है; अतः परमात्मा के ज्ञान से संसार का बाघ हो जाने से शोक - मोह के कारण संसार के न रहने से शोक-मोहादि का भी बाध संभव है ही || ७ || संसार में जो कोई एक अद्वितीय परमात्मा से अभिन्न आत्मा