विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 21–30
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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- सर्पके -उत्तम - सबके २४ ॥ ( १७ ) १०४ वसुः सत्र भूतोंके वासस्थान, १०५ वसु-मनाः- उदार मनवाले, १०६ सत्यः सत्यस्वरूप, १०७ समात्मा - सम्पूर्ण प्राणियों में एक आत्मारूपसे विराजने-वाले, १०८ असम्मितः- समस्त पदार्थोंसे मापे न जा सकनेवाले, १० ९ समः - सब समय समस्त विकारोंसे रहित, ११० अमोघः - भक्तों के द्वारा पूजन, स्तवन अथवा स्मरण किये जानेपर उन्हें वृथा न करके पूर्णरूपसे उनका फल ईश्वरों- प्रदान करनेवाले, १११ पुण्डरीकाक्षः - कमल के समान - सबके नेत्रोंवाले, ११२ वृषकर्मा - धर्ममय कर्म करनेवाले, ११३ १०० वृषाकृतिः - धर्मकी स्थापना करनेके लिये विग्रह धारण च्युत करनेवाले ॥ २५ ॥
१०२ रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
घृतः- अमृतः शाश्वतस्याणुर्वरारोहो महातपाः ॥ २६ ॥
२४ ॥
११४ रुद्रः – दुःख या दुःखके कारणको दूर भगा 1 देनेवाले, ११५ वहुशिरा: - बहुत - से सिरोंवाले, ११६ २५ ॥ बभ्रुः - लोकों का भरण करनेवाले, ११७ विश्वयोनिः-
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( १८ ) विश्वको उत्पन्न करनेवाले, ११८ शुचिश्रवाः - पवित्र अधूरे कीर्तिवाले, ११ ९ अमृतः - कभी न मरनेवाले, १२० अवा शाश्वतस्थाणुः - नित्य - सदा एकरस रहनेवाले एवं स्थिर, कविः-१२१ वरारोहः- आरूढ़ होनेके लिये परम उत्तम लोका अपुनरावृत्तिस्थानरूप, १२२ महातपाः - प्रताप ( प्रभाव ) रूप महान् तपवाले ॥ २६ ॥ चतुरात
सर्वगः सर्वविद्धानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । १३ सुराध्य वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः || २७ || अनुरूप १२३ सर्वगः - कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, वाले, १ १२४ सर्वविद्भानुः - सब कुछ जाननेवाले तथा प्रकाशरूप, अकृत, १२५ विष्वक्सेनः– युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही चार दैत्यसेनाको तितर - बितर कर डालनेवाले, १२६ जनार्दनः- स्थिति, भक्तोंके द्वारा अभ्युदय - निःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी चार द याचना किये जानेवाले, १२७ वेदः - वेदरूप, १२८ भुजाओं वेदवित् - वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् जाननेवाले, भ्राजिष १२ ९ अव्यङ्गः - ज्ञानादिसे परिपूर्ण अर्थात् किसी प्रकार अनघो
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( १ ९ ) -- पवित्र अधूरे न रहनेवाले सर्वाङ्गपूर्ण, १३० वेदाङ्गः - वेदरूप १२० अङ्गवाले, १३१ वेदवित् - वेदोंको विचारनेवाले, १३२ वं स्थिर, कविः - सर्वज्ञ ॥ २७ ॥
उत्तम लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
प्रभाव ) चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ २८ ॥
१३३ लोकाध्यक्षः - समस्त लोकोंके अधिपति, १३४ सुराध्यक्षः - देवताओंके अध्यक्ष, १३५ धर्माध्यक्षः-| २७ || / अनुरूप फल देनेके लिये धर्म और अधर्मका निर्णय करने-नेवाले, वाले, १३६ कृताकृतः - कार्यरूपसे कृत और कारणरूपसे काशरूप, अकृत, १३७ चतुरात्मा सृष्टिकी उत्पत्ति आदिके लिये त्रसे ही चार पृथक् मूर्तियोंवाले, १३८ चतुर्व्यूहः- उत्पत्ति, स्थिति, नाश और रक्षारूप चार व्यूहवाले, १३ ९ चतुर्दष्टः-र्दिनः-षार्थी चार दाढ़वाले नरसिंहरूप, १४० चतुर्भुजः - चार भुजाओंवाले वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु ॥ २८ ॥
१२८
नेवाले, आजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
प्रकार अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥२ ९ ॥
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( २० ) १४१ भ्राजिष्णुः - एकरस प्रकाशस्वरूप, २४२ स्वयंस भोजनम् - ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप, १४३ १५८ भोक्ता - पुरुषरूपसे भोक्ता, १४४ सहिष्णुः - सहनशील, सर्ग: १४५ जगदादिजः - जगत्के आदिमें हिरण्यगर्भरूपसे रहकर स्वयं उत्पन्न होनेवाले, १४६ अनघः - पापरहित, १४७ प्रजाको विजयः - ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि गुणों में सबसे यमः-बढ़कर, १४८ जेता - स्वभावसे ही समस्त भूतोंको जीतने-वाले, १४ ९ विश्वयोनिः - प्रकृतिस्वरूप, १५० पुनर्वसुः- वेद्यो पुनः पुनः शरीरों में आत्मरूप से बसनेवाले ॥ २ ९ ॥ उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः । ३० । १५१ उपेन्द्रः- इन्द्रको अनुजरूपसे प्राप्त होने वाले, १५२ वामनः – वामनरूपसे अवतार लेनेवाले, १५३ प्रांशुः - तीनों लोकोंको लाँघने के लिये त्रिविक्रमरूपसे ऊँचे होनेवाले, १५४ अमोघः - अव्यर्थ चेष्टावाले, १५५ शुचिः-स्मरण, स्तुति और पूजन करनेवालों को पवित्र कर देनेवाले, अतीन १ योग्य, सदाय धर्मकी १६७ म तरह स सर्वथा = १५६ ऊर्जितः - अत्यन्त बलशाली, १५७ अतीन्द्र: - डालनेवा
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( २१ ) १४२ स्वयंसिद्ध ज्ञान - ऐश्वर्यादिके कारण इन्द्रसे भी बड़े चढ़े हुए, १४३ १५८ संग्रहः - प्रलय के समय सबको समेट लेनेवाले, १५ ९ इनशील, सर्गः - सृष्टिकै कारणरूप, १६० धृतात्मा- जन्मादिसे रहित रूप रहकर स्वेच्छा से स्वरूप धारण करनेवाले, १६१ नियम: -१४७ प्रजाको अपने - अपने अधिकारों में नियमित करनेवाले, १६२ में सबसे यमः - अन्तःकरणमें स्थित होकर नियमन करनेवाले ॥३० ॥
जीतने-सुः- वैद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ॥ अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥३१ ॥
ः । १६३ वेद्यः - कल्याणकी इच्छावालोंके द्वारा जानने -: ३० | योग्य, १६४ वैद्यः - सब विद्याओंके जाननेवाले, १६५ निवाले, सदायोगी - सदा योग में स्थित रहनेवाले, १६६ वीरहा-- १५३ धर्मकी रक्षा के लिये असुर योद्धाओंको मार डालनेवाले, से ऊँचे १६७ माधवः - विद्याके स्वामी, १६८ मधुः - अमृतकी शुचि: - तरह सबको प्रसन्न करनेवाले, १६ ९ अतीन्द्रियः - इन्द्रियोंसे नेवाले, सर्वथा अतीत, १७० महामायः - मायावियोंपर भी माया न्द्र: - खाळनेबाळे महान् मायावी, १७१ महोत्साहः –जगत्की
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(. RR २२ ) उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिये तत्पर रहनेवाले उत्साही, १७२ महावल: - महान् बलशाली ॥ ३१ महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् १७३ महाबुद्धिः - महान् बुद्धिमान्, १७४ परम अपने ॥ गतिः । भक्ति ।३२ । सुरान गोवि महा-१८८ वीर्यः - महान् पराक्रमी, १७५ महाशक्ति: - महान् स्वामी सामर्थ्यवान्, १७६ महाद्युतिः - महान् कान्तिमान्, १७७ मरी अनिर्देश्यवपुः - अनिर्देश्य विग्रहवाले १७८ श्रीमान्-ऐश्वर्यवान्, १७ ९ अमेयात्मा - जिसका अनुमान न किया हिरण् जा सके ऐसे आत्मावाले, १८० महाद्रिधृक्- अमृतमन्थन और गोरक्षणके समय मन्दराचल और गोवर्धन नामक दमनः महान् पर्वतोंको धारण करनेवाले ॥ ३२ ॥ करनेव
कराने महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । सुन्दर अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः । ३३ । श्रेष्ठ १८१ महेष्वासः - महान् धनुषवाले, १८२ मही- " रमणीय भर्ता - पृथ्वीको धारण करनेवाले, १८३ श्रीनिवासः- नारायण
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परम १ ॥ ।३२ । महा-- महान् • १७७ मानू-( २३ ) अपने वक्षःस्थलमें श्रीको निवास देनेवाले, १८४ सतां गतिः - सत्पुरुषोंके परम आश्रय, १८५ अनिरुद्धः - सच्ची भक्तिके बिना किसीके भी द्वारा न रुकनेवाले, १८६ सुरानन्दः - देवताओं को आनन्दित करनेवाले, १८७ गोविन्दः - वेदवाणीके द्वारा अपनेको प्राप्त करा देनेवाले, १८८ गोविदां पतिः - वेदवाणीको जाननेवालों के स्वामी ॥ ३३ ॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
न किया हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ ३४ ॥
तमन्थन १८ ९ मरीचिः - तेजस्वियोंके भी परम तेजरूप, १ ९ ० नामक दमनः- प्रमाद करनेवाली प्रजाको यम आदिके रूपसे दमन करनेवाले, १ ९ १ हंसः - पितामह ब्रह्माको वेदका ज्ञान करानेके लिये हंसरूप धारण करनेवाले, १ ९ २ सुपर्णः -३ । सुन्दर पङ्खवाले गरुडस्वरूप, १ ९ ३ भुजगोत्तमः - सर्पोंमें -: ।३३ । - श्रेष्ठ शेषनागरूप, १ ९ ४ हिरण्यनाभः - हितकारी और = मही- रमणीय नाभिवाले, १ ९ ५ सुतपाः - बदरिकाश्रममें नर-वास: - नारायणरूपसे सुन्दर तप करनेवाले, १ ९ ६ पद्मनाभः-
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( २४ ) कमलके समान सुन्दर नाभिवाले, १ ९ ७ प्रजापतिः-सम्पूर्ण प्रजाओंके पालनकर्ता ॥ ३४ ॥ गुरुत
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान्स्थिरः । २११
अजो दुर्मर्पणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ ३५ ॥ २१२
पराक्रम १ ९ ८ अमृत्युः -मृत्युसे रहित, १ ९९ सर्व - M कुछ देखनेवाले, २०० सिंहः- दुष्टों का विनाश करनेवाले, २१६ २०१ सन्धाता - पुरुषों को उनके कर्मों के फलोंसे संयुक्त वाचस करनेवाले, २०२ सन्धिमान् सम्पूर्ण यज्ञ और तपको बुद्ध भोगनेवाले, २०३ स्थिरः - सदा एकरूप, २०४ अजः - अग्रणी भक्तोंके हृदयोंमें जानेवाले तथा दुर्गुणको दूर हटा देने-वाले, २०५ दुर्मर्षणः- किसी से भी सहन नहीं किये जा सहस्र सकनेवाले, २०६ शास्ता - सवपर शासन करनेवाले, २०७ २ विश्रुतात्मा - वेद - शास्त्रोंमें विशेषरूपसे प्रसिद्ध स्त्ररूपवाले, वाले, २०८ सुरारिहा - देवताओं के शत्रुओंको मारनेवाले ॥ ३५ ॥ श्रीमान
प्रमाणों = गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । यन्त्रको निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः । ३६ । से चेष्टा
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( २५ ) नापतिः- २० ९ गुरुः- सब विद्याओंका उपदेश करनेवाले, २१० गुरुतमः - ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले, स्थिरः । २११ धाम - सम्पूर्ण प्राणियोंकी कामनाओंके आश्रय, ॥३५ ॥ २१२ सत्यः- सत्यस्वरूप, २१३ सत्यपराक्रमः- अमोघ
पराक्रमवाले, २१४ निमिषः - योगनिद्रा से मुँदे हुए नेत्रों-कसब वाले, २१५ अनिमिषः - मत्स्यरूपसे अवतार लेनेवाले, करनेवाले, २१६ स्रग्वी - वैजयन्ती माला धारण करनेवाले, २१७ संयुक्त वाचस्पतिरुदारधीः - सारे पदार्थोंको प्रत्यक्ष करनेवाली तपको बुद्धिसे युक्त समस्त विद्याओंके पति ॥३६ ॥
अजः अग्रणी ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।
हटा देने-किये जा सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥३७ ॥
, २०७ २१८ अग्रणीः- मुमुक्षुओंको उत्तम पदपर ले जाने-रूपवाले, वाले, २१ ९ ग्रामणीः- भूतसमुदाय के नेता, २२० ३ ॥३५ ॥ श्रीमान् - सबसे बढ़ी चढ़ी कान्तिवाले, २२१ न्यायः-प्रमाणके आश्रयभूत तर्ककी मूर्ति, २२२ नेता- जगत्रूप
यन्त्रको चलानेवाले, २२३ समीरणः -श्वासरूप से प्राणियों -7: | ३६ || से चेष्टा करानेवाले, २२४ सहस्रमूर्धा - हजार सिरवाले
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( २६ ) २२५ विश्वात्मा - विश्वके आत्मा, २२६ - सहस्राक्षः-हजार आँखोंवाले, २२७ सहस्रपात् - हजार कृपा पैरोंवाले ॥ ३७ ॥ अथ
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । धार अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः || ३८ || अथ २२८ - आवर्तनः - संसारचक्रको चलानेके स्वभाव- प्रका करन वाले, २२ ९ निवृत्तात्मा - संसारबन्धनसे मुक्त आत्मस्वरूप, सा २३० संवृतः - अपनी योगमायासे ढके हुए, २३१ समय सम्प्रमर्दनः - अपने रुद्र आदि स्वरूपसे सबका मर्दन शयन करनेवाले, २३२ अहः संवर्तकः - सूर्यरूपसे सम्यक्ता जाने दिनके प्रवर्तक, २३३ वह्निः - हविको वहन करनेवाले असं अग्निदेव, २३४ अनिलः - प्राणरूपसे वायुस्वरूप, २३५ धरणीधरः - वराह और शेषरूपसे पृथ्वीको धारण सिद्ध करनेवाले ॥ ३८ ॥
२४८ सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । २४ ९ सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जसुर्नारायणो नरः ॥३ ९ ॥ करने