विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 31–40
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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साक्ष : -- हजार ॥३८ ॥
स्वभाव-स्वरूप, २३१ मर्दन व्यक्तया रनेवाले २३५ धारण ३ ९ ॥ ( २७ ) २३६ सुप्रसादः - शिशुपालादि अपराधियोंपर भी कृपा करनेवाले, २३७ प्रसन्नात्मा - प्रसन्न स्वभाववाले अर्थात् करुणा करनेवाले, २३८ विश्वधृक - जगत्को धारण करनेवाले, २३ ९ विश्वभुक् - विश्वको भोगनेवाले अर्थात् विश्वका पालन करनेवाले, २४० विभुः - विविध प्रकारसे प्रकट होनेवाले, २४१ सत्कर्ता - भक्तोंका सत्कार करनेवाले, २४२ सत्कृतः - पूजितोंसे भी पूजित, २४३ साधुः - भक्तोंके कार्य साधनेवाले, २४४ जह्रुः - संहारके समय जीवोंका लय करनेवाले, २४५ नारायणः - जलमें शयन करनेवाले, २४६ नरः- भक्तोंको परम धाममें ले जानेवाले ॥ ३ ९ ॥ असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ४० २४७ असंख्येयः - नाम और गुणोंकी संख्यासे शून्य, २४८ अप्रमेयात्मा -किसीसे भी मापे न जा सकनेवाले, २४ ९ विशिष्टः- सबसे उत्कृष्ट, २५० शिष्टकृत् - शासन करनेवाले, २५१ शुचिः - परम शुद्ध, २५२ सिद्धार्थः-
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( २८ ) इच्छित अर्थको सर्वथा सिद्ध कर चुकनेवाले, २५३ सिद्धसङ्कल्पः - सत्य सङ्कल्पवाले, २५४ सिद्धिदः - कर्म भुजा करनेवालोंको उनके अधिकारके अनुसार फल देनेवाले, सकने २५५ सिद्धिसाधनः- सिद्धिरूप क्रिया के साधक ॥ ४० ॥ करने =
वृपाही वृषभो विष्णुर्वृपपर्वा वृषोदरः । २६७ वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥४१ ॥ महेन्द्र
२५६ वृषाही - द्वादशाहादि यज्ञोंको अपनेमें स्थित २७० रखनेवाळे, २५७ वृषभः- भक्तों के लिये इच्छित वस्तुओंकी २७२ वर्षा करनेवाले, २५८ विष्णुः - शुद्ध सत्त्वमूर्ति, २५ ९ सूर्यकि वृषपर्वा - परम धाम में आरूढ़ होनेकी इच्छावालोंके लिये प्रकाश धर्मरूप सीढ़ियोंवाले, २६० वृषोदरः- अपने उदर में धर्मको ओज धारण करनेवाले, २६१ वर्धनः- भक्तोंको बढ़ानेवाले, ऋद्धः २६२ वर्धमानः - संसाररूपसे बढ़नेवाले, २६३ विविक्तः-संसारसे पृथक् रहनेवाले, २६४ श्रुतिसागरः - वेदरूप * जल के समुद्र ॥ ४१ ॥ शूरवीर
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । २७६ नैकरूपो वृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥४२ ॥ प्रताप
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( २ ९ ) , २५३ २६५ सुभुजः - जगत्की रक्षा करनेवाली अति सुन्दर दः कर्मभुजाओंवाले, २६६ दुर्धरः- दूसरोंसे धारण न किये जा देनेवाले, ॥ ४० ॥
1 ॥४१ ॥
नमें स्थित वस्तुओंकी २५ ९ लोंके लिये सकनेवाले, पृथ्वी आदि लोकधारक पदार्थोंको भी धारण करनेवाले और स्वयं किसीसे घारण न किये जा सकनेवाले, २६७ वाग्मी - वेदमयी वाणीको उत्पन्न करनेवाले, २६८ महेन्द्रः - ईश्वरों के भी ईश्वर, २६ ९ वसुदः - धन देनेवाले, २७० वसुः - घनरूप, २७१ नैकरूपः - अनेक रूपधारी, २७२ वृहद्रूपः - विश्वरूपधारी, २७३ शिपिविष्टः-सूर्यकिरणोंमें स्थित रहनेवाले, २७४ प्रकाशन: - सबको प्रकाशित करनेवाले ॥ ४२ ॥
में धर्मको ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । दानेवाले, ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रचन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः विक्तः- । ४३ । 3- वेदरूप २७५ ओजस्तेजोद्युतिधरः - प्राण और बल, शूरवीरता आदि गुण तथा ज्ञानकी दीप्तिको धारण करनेवाले, 1 २७६ प्रकाशात्मा - प्रकाशरूप विग्रहवाले, २७७ ॥४२ ॥ प्रतापनः - सूर्य आदि अपनी विभूतियोंसे विश्वको तप्त
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( ३० ) करनेवाले, २७८ ऋद्धः - धर्म, ज्ञान और वैराग्यादिसे भूतभ सम्पन्न, २७ ९ स्पष्टाक्षर: - ओंकाररूप स्पष्ट अक्षरवाले, कामह २८० मन्त्रः - ऋक्, साम और यजुरूप मन्त्रोंसे जानने योग्य, २८१ चन्द्रांशुः - संसारतापसे सन्तप्तचित्त पुरुषोंको चन्द्रमा की किरणोंके समान आह्लादित करनेवाले, २८२ वर्तमान भास्करद्युतिः - सूर्य के समान प्रकाशस्वरूप ॥ ४३ ॥ २ ९ २
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । अनल औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः || ४४ || कामना सकाम २८३ अमृतांशूद्भवः- समुद्रमन्थन करते समय २ ९ ७ चन्द्रमाको उत्पन्न करनेवाले समुद्ररूप, २८४ भानु: - महादेव भासनेवाले, २८५ शशविन्दुः - खरगोशके समान चिह्न उनकी वाले चन्द्रमाकी तरह सम्पूर्ण प्रजाका पोषण करनेवाले, प्रभुः-२८६ सुरेश्वरः – देवताओंके ईश्वर, २८७ औषधम्- युगाद संसाररोगको मिटानेके लिये औषधरूप, २८८ जगतः सेतुः - संसारसागरको पार करानेके लिये सेतुरूप, २८ ९ सत्यधर्मपराक्रमः- सत्यस्वरूप धर्म और पराक्रम- ३० वाले ॥ ४४ ॥ ३०१ य
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( ३१ ) वैराग्यादिसे भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । अक्षरवाले त्रों से जानने कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः । ४५ । त पुरुषों को २ ९ ० भूतभव्यभवन्नाथः - भूत, भविष्य और २८२ वर्तमान सभी प्राणियोंके स्वामी, २ ९ १ पवनः - वायुरूप, ४३ ॥ २ ९ २ पावनः – दृष्टिमात्रसे जगत्को पवित्र करनेवाले, २ ९ ३ : 1 अनलः - अग्निस्वरूप, २ ९ ४ कामहा - अपने भक्तजनोंके सकामभावको नष्ट करनेवाले, २ ९ ५ कामकृत् - भक्तोंकी = ॥ ४४ ॥ कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, २ ९ ६ कान्तः - कमनीयरूप,
रते समय २ ९ ७ काम: - ( क ) ब्रह्मा, ( अ ) विष्णु, ( म ) भानुः- महादेव- इस प्रकार त्रिदेवरूप, २ ९ ८ कामप्रदः - भक्तोंको नान चिह्न उनकी कामना की हुई वस्तुएँ प्रदान करनेवाले, २ ९९ करनेवाले प्रभुः- सर्वोत्कृष्ट सर्वसामर्थ्यवान् स्वामी ॥ ४५ ॥
औषधम्- युगादिकुद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । ८ जगतः सेतुरूपः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥४६ ॥
र पराक्रम- ३०० युगादिकृत् - युगादिका आरम्भ करनेवाले, ३०१ युगावर्तः - चारों युगोंको ' चक्रके समान घुमानेवाले,
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( ३३ ) ३०२ नैकमायः - अनेकों मायाओंको धारण करनेवाले, और ३०३ महाशनः - कल्पके अन्त में सबको ग्रसन करनेवाले, विद्य ३०४ अदृश्य: - समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके अविषय, ३०५ व्यक्तरूपः - स्थूलरूपसे व्यक्त स्वरूपवाले स्वरूपवाले,, ३०६ सहस्रजित् - युद्धमें हजारों देवशत्रुओंको जीतनेवाले, अच्य ३०७ अनन्तजित् - युद्ध और क्रीडा आदिमें सर्वत्र समस्त अप भूतको जीतनेवाले ॥ ४६ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । प्रथि क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥४७ ॥ प्राण
३०८ इष्टः - परमानन्दरूप होनेसे सर्वप्रिय, ३० ९ प्राण अविशिष्टः- सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित सर्वश्रेष्ठ, ३१० वास शिष्टेष्टः- शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ३११ शिखण्डी - जलको मयूरपिच्छको अपना शिरोभूषण बना लेनेवाले, ३१२ उपादा नहुषः - भूतको मायासे बाँधनेवाले, ३१३ वृषः- अधिक कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, ३१४ क्रोधहा क्रोधका नाश नव करनेवाले, ३१५ क्रोधकृत्कर्ता - दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले स्थित
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रनेवाले, रनेवाले, ३०५ ३०६ नेवाले, समस्त
।
॥४७ ॥
३० ९ ३१० चण्डी-( ३३ ) और जगत्को उनके क्रमके अनुसार रचनेवाले, ३१६ विश्वबाहुः - सब ओर बाहुओंवाले, ३१७ महीधरः-पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ४७ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ४८ ॥
३१८ अच्युतः - छः भावविकारोंसे रहित, ३१ ९ प्रथितः - जगत् की उत्पत्ति आदि कर्मोंके कारण, ३२० प्राणः - हिरण्यगर्भरूपसे प्रजाको जीवित रखनेवाले, ३२१ प्राणदः - सबका भरण - पोषण करनेवाले, ३२२ वासवानुजः- वामनावतार में कश्यपजीद्वारा अदितिसे इन्द्रके अनुजरूपमें उत्पन्न होनेवाले, ३२३ अपां निधिः-जलको एकत्रित रखनेवाले समुद्ररूप, ३२४ अधिष्ठानम्-- ३१२ उपादानकारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय, ३२५ अप्रमत्तः-वृष: - अधिकारियों को उनके कर्मानुसार फल देनेमें कभी प्रमाद का नाश न करनेवाले, ३२६ प्रतिष्ठितः - अपनी महिमा में रनेवाले स्थित ॥ ४८ ॥
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( ३४ ) स्कन्दः स्कन्दधरो घुर्यो वरदो वायुवाहनः । मृत्यु शौ वासुदेवो वृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥४ ९ ॥ समस्त ३२७ स्कन्दः - – स्वामिकार्तिकेयरूप, ३२८ सबके स्कन्दधरः- धर्मपथको धारण करनेवाले, ३२ ९ धुर्यः- अवता समस्त भूतों के जन्मादिरूप धुरको धारण करनेवाले, ३३० करने = वरदः - इच्छित वर देनेवाले, ३३१ वायुवाहनः - सारे दृष्टिवा वायुभेदों को चलानेवाले, ३३२ वासुदेव: - समस्त पद्मन प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा सब भूतोंमें सर्वात्मा । रूपसे बसनेवाले, दिव्यस्वरूप, ३३३ बृहद्भानु: - महान् महर्द्ध किरणोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करनेवाले, ३३४ आदिदेवः - सबके आदि कारण देव, ३३५ वाले, पुरन्दरः - असुरोंके नगरोंका ध्वंस करनेवाले ॥ ४ ९ ॥ ३४८ ३४ ९ = अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । करनेवा अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः || ५० ॥ ऋद्धः-१३६ अशोकः - सब प्रकारके शोकसे रहित, ३३७ आत्मव सादवाः - संसारसागर से सारनेवावे. ३,३८ तारा जब ज्ञा गरुडध
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३॥४ ९ ॥ ३२८ ९ धुर्यः-बाले, ३३० हनः - सारे ( ३५ ) मृत्युरूप भयसे तारनेवाले, ३३ ९ शूरः- पराक्रमी, ३४० शौरिः - शूरवीर श्रीवसुदेवजीके पुत्र, ३४१ जनेश्वरः-समस्त जीवोंके स्वामी, ३४२ अनुकूलः - आत्मारूप होनेसे सबके अनुकूल, ३४३ शतावर्तः- धर्मरक्षाके लिये सैकड़ों अवतार लेनेवाले, ३४४ पद्मी - अपने हाथमें कमल धारण करनेवाले, ३४५ पद्मनिभेक्षणः- कमलके समान कोमल दृष्टिवाले ॥ ५० ॥
-चः- समस्त पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । सर्वात्मा महर्द्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः तु: - महान् ॥५१ ॥
करनेवाले, ३४६ पद्मनाभः - हृदय - कमलके मध्य निवास करने -वाले, ३४७ अरविन्दाक्षः - कमलके समान आँखोंवाले, देव, ३३५ ३४८ पद्मगर्भः- हृदयकमलमें । ४ ९ ॥ ध्यान करने योग्य, ३४ ९ शरीरभृत् - अन्नरूपसे सबके शरीरोंका भरण ३ । करनेवाले, ३५० महर्द्धिः - महान् विभूतिवाले, ३५१ ३ ॥५० ॥ ऋद्धः - सबमें बढ़े- चढ़े, ३५२ वृद्धात्मा - पुरातन
हेत, ३३७ आत्मवान्, ३५३ महाक्षः - विशाल नेत्रोंवाले, ३५४ गरुडध्वजः- गरुडके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले ॥ ५१ ॥
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( ३६ ) अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । संस सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः ॥५२ ॥ यशश
३५५ अतुलः - तुलनारहित, ३५६ शरभः - शरीरोंको भक्त प्रत्यगात्मरूपसे प्रकाशित करनेवाले, ३५७ भीमः - जिससे पर्वत पापियोंको भय हो ऐसे भयानक, ३५८ समयज्ञः - समभाव- महा रूप यज्ञसे प्राप्त होनेवाले, ३५ ९ हविर्हरिः- यज्ञों में हविर्भाग- अभ को और अपना स्मरण करनेवालों के पापों को हरण करने- उद्घ बाले, ३६० सर्वलक्षणलक्षण्यः- समस्त लक्षणोंसे लक्षित करण होनेवाले, ३६१ लक्ष्मीवान्- अपने वक्षःस्थलमें लक्ष्मीजी को सदा बसानेवाले, ३६२ समितिञ्जयः - संग्राम- ३७४ विजयी ॥ ५२ ॥
पुरुष चिक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः । प्रकार महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥५३ ॥ उदर
करनेव ३६३ विक्षरः - नाशरहित, ३६४ रोहितः - मत्स्य-विशेषका स्वरूप धारण करके अवतार लेनेवाले, ३६५ साधन कारण मार्गः - परमानन्द प्रासिके साधनस्वरूप, ३६६ हेतुः- विक