विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 41–50
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50
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॥५२ ॥
-शरीरों को : - जिससे समभाव-हविर्भाग -करने-लक्षित क्ष्मीजीको - संग्राम-॥५३ ॥
: - मत्स्य-( ३७ ) संसारके निमित्त और उपादान कारण, ३६७ दामोदरः-यशोदाजीद्वारा रस्स से बँधे हुए उदरवाले, ३६८ सहः-भक्तजनोंके अपराधों को सहन करनेवाले, ३६ ९ महीधरः-पर्वतरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले, ३७० महाभाग: -महान् भाग्यशाली, ३७१ वेगवान् - तीव्रगतिवाले, ३७२ अमिताशनः - सारे विश्वको भक्षण करनेवाले ॥ ५३ ॥
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥५४ ॥
३७३ उद्भवः - जगत्की उत्पत्तिके उपादानकारण, ३७४ क्षोभणः - जगत्की उत्पत्तिके समय प्रकृति और पुरुषमें प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करनेवाले, ३७५ देवः-प्रकाशस्वरूप, ३७६ श्रीगर्भः सम्पूर्ण ऐश्वर्य को अपने उदरगर्भमें रखनेवाले, ३७७ परमेश्वरः - सर्वश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ३७८ करणम् - संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन, ३७ ९ कारणम् - जगत् के उपादान और निमित्त. , ३६५ कारण, ३८० कर्ता- सब प्रकारसे स्वतन्त्र, ३८१ = हेतुः - विकर्ता - विचित्र भुवनोंकी रचना करनेवाले, ३८२
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( ३८ ) गहनः - अपने विलक्षण स्वरूप, सामर्थ्य और लीलादिके कारण पहचाने न जा सकनेवाले, ३८३ गुहः- मायासे नित्य अपने स्वरूपको ढक लेनेवाले ॥ ५४ ॥ प्राण
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । रजो परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥५५ ॥ मुमु
३८४ व्यवसाय: - ज्ञानमात्रस्वरूप, ३८५ उत्त व्यवस्थानः - लोकपालादिकोंको, समस्त जीवोंको, चारों नियम वर्णाश्रमोंको एवं उनके धर्मोंको व्यवस्थापूर्वक रचनेवाले, परा ३८६ संस्थानः - प्रलयके सम्यक् स्थान, ३८७ स्थानदः- अत ध्रुवादि भक्तों को स्थान देनेवाले, ३८८ ध्रुवः - अविनाशी, ४०१ ३८ ९ परर्द्धिः - श्रेष्ठ विभूतिवाले ज्ञानस्वरूप होनेसे परम स्पष्टरूप सामने प्रत्यक्ष प्रकट होनेवाले, परमानन्दस्वरूप, ३ ९ २ पुष्टः शुभेक्षणः - दर्शनमात्रसे कल्याण रामो विरामो विरजो मार्गो वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो , ३ ९ ० परमस्पष्टः- वैकु , अवतार विग्रहमें सबके हिर ३ ९ १ तुष्टः- एकमात्र सर्वत्र परिपूर्ण, ३ ९ ३ करनेवाले ॥ ५५ ॥ विश्व
नेयो नयोऽनयः । वाय धर्मविदुत्तमः ॥५६ ॥ जाग
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लादिके - मायासे
वः ।
॥५५ ॥
३८५ , चारों चनेवाले, धानदः-विनाशी, स्पष्टः-हमें सबके - एकमात्र , ३ ९ ३ ५ ॥ ( ३ ९ ) ३ ९ ४ रामः - योगीजनोंके रंमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप, ३ ९ ५ विरामः - प्रलयके समय प्राणियोंको अपने में विराम देनेवाले, ३ ९ ६ विरजः-रजोगुण तथा तमोगुणसे सर्वथा शून्य, ३ ९ ७ मार्ग: -मुमुक्षुजनोंके अमर होनेके साधनस्वरूप, ३ ९ ८ नेयः-उत्तम ज्ञानसे ग्रहण करनेयोग्य, ३ ९९ नयः - सबको नियममें रखनेवाले, ४०० अनयः - स्वतन्त्र, ४०१ वीरः-पराक्रमशाली, ४०२ शक्तिमतां श्रेष्ठ: - शक्तिमानों में भी अतिशय शक्तिमान्, ४०३ धर्मः - श्रुति स्मृतिरूप धर्म, ४०४ धर्मविदुत्तमः - समस्त धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ॥५६ ॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥५७ ॥
४०५ वैकुण्ठः- परमधामस्वरूप, ४०६ पुरुषः-विश्वरूप शरीरमें शयन करनेवाले, ४०७ प्राणः प्राण-यः । - वायुरूपसे वेष्टा करनेवाले, ४०८ प्राणदः - सर्गके. आदिमें ॥५६ ॥ बाग प्रशन करतेयाने ५०१ जना जिसकी
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( ४० ) भी प्रणाम करते हैं, वे भगवान्, ४१० पृथुः- विश्राम विराट्रूपसे विस्तृत होनेवाले, ४११ हिरण्यगर्भः- विश्व ब्रह्मारूपसे प्रकट होनेवाले, ४१२ शत्रुघ्रः - शत्रुओंको रूपमें मारनेवाले, ४१३ व्याप्तः – कारणरूपसे सब कार्योंको व्याप्त विस्त करनेवाले, ४१४ वायुः - पत्रनरूप, ४१५ अधोक्षजः- अर्थोऽ अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले ॥ ५७ ॥
४ ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । ४२७ उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥ आदि
४२८ = ४१६ ऋतुः - कालरूपसे लक्षित होनेवाले, ४१७ रूप, सुदर्शनः - भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले, ४३०३ ४१८ कालः - सबकी गणना करनेवाले, ४१ ९ परमेष्ठी- ४३१ अपनी प्रकृष्ट महिमा में स्थित रहनेके स्वभाववाले, ४२० ४३२ म परिग्रहः - शरणार्थियोंके द्वारा सत्र ओरसे / ग्रहण किये सुखरूप जानेवाले, ४२१ उग्रः – सूर्यादिके भी भयके कारण, ४२२ अतिशय संवत्सरः – सम्पूर्ण भूतकै बासस्थान, ४२३ दक्षः - सब अनिर्वि कार्यों को बड़ी कुशलता करनेवाले, ४२४ विश्रामः नक्षत्रन
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• पृथुः-_ण्यगर्भः-- शत्रुओंको योंको व्याप्त धोक्षजः-: । ( ४१ ) विश्रामकी इच्छावाले मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले, ४२५ विश्वदक्षिणः - बलि के यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणा-रूपमें प्राप्त करनेवाले ॥ ५८ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्
।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥५ ९ ॥
४२६ विस्तार: - समस्त लोकोंके विस्तारके कारण, ४२७ स्थावरस्थाणुः - स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी : ॥५८ ॥ ५८ ॥ ॥ आदि स्थितिशील पदार्थोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले,
४२८ प्रमाणम् - ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाण-, ४१७ रूप, ४२ ९ वीजमव्ययम् - संसारके अविनाशी कारण, देनेवाले ४३० अर्थः- सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय, परमेष्ठी - ४३१ अनर्थः - पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित, चाले, ४२० ४३२ महाकोश: -बड़े खजानेवाले, ४३३ महाभोगः-- ग्रहण किये सुखरूप महान् भोगवाले, ४३४ महाधनः- यथार्थ और रण, ४२२ अतिशय धनस्वरूप ॥ ५ ९ ॥
दक्षः- सब अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
विश्रामः- नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥६० ॥
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( ४२ ) ४३५ अनिर्विण्णः - उकताहटरूप विकारसे रहित, ब-४३६ स्थविष्ठः - विराट्रूपसे स्थित, ४३७ अभूः - अजन्मा, व ४३८ धर्मयूपः- धर्मके स्तम्भरूप, ४३ ९ महामखः-अर्पित किये हुए यज्ञोंको निर्वाणरूप महान् फलदायक बना स देनेवाले, ४४० नक्षत्रनेमिः - समस्त नक्षत्रोंके केन्द्र- म स्वरूप, ४४१ नक्षत्री - चन्द्ररूप, ४४२ क्षमः- समस्त कार्यों में समर्थ, ४४३ क्षामः- समस्त विकारोंके क्षीण हो जानेपर परमात्मभावसे स्थित, ४४४ समीहनः - सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले ॥ ६० ॥ अ
वा यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । प्र सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥६१ ॥ अ
४४५ यज्ञः - भगवान् विष्णु, ४४६ इज्य: - पूजनीय, अ ४४७ महेज्यः - सबसे अधिक उपासनीय, ४४८ ऋतुः- हर यूपसंयुक्त यज्ञस्वरूप, ४४ ९ संत्रम् -सत्पुरुषोंकी रक्षा अ करनेवाले, ४५० सतां गतिः- सत्पुरुषों के परम प्रापणीय भी स्थान, ४५१ सर्वदर्शी - समस्त प्राणियोंको और उनके पर कार्योंको देखनेवाले, ४५२ विमुक्तात्मा- सांसारिक अ
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रहित, अजन्मा, मख : -क बना केन्द्र-- समस्त क्षीण हो : - सृष्टि 1
।
॥६ ९ ॥
पूजनीय, क्रतुः-की रक्षा प्रापणीय र उनके सांसारिक ( ४३ ) बन्धनसे रहित आत्मस्वरूप, ४५३ सर्वशः- सबको जानने-वाले, ४५४ ज्ञानमुत्तमम् - सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप ॥ ६१ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥६२ ॥
४५५ सुव्रतः- प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले, ४५६ सुमुख: - सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले, ४५७ सूक्ष्मः-अणुसे भी अणु, ४५८ सुघोषः - सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलनेवाले, ४५ ९ सुखदः - अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले, ४६० सुहृत् - प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र, ४६१ मनोहरः-अपने रूप लावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले, ४६३. जितक्रोधः - क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवाले पर भी क्रोध न करनेवाले, ४६३ वीरवाहुः - अत्यन्त पराक्रमशील भुजाओंसे युक्त, ४६४ विदारणः-अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले ॥ ६२ ॥
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( ४४ )
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
४६५ स्वापनः - प्रलयकाल में समस्त प्राणियों को अशान निद्रा में शयन करानेवाले, ४६६ स्ववशः - स्वतन्त्र, ४६७ व्यापी - आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, ४६८ नैकात्मा - प्रत्येक युगमै लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले, ४६ ९ नैककर्मकृत् - जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न - भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले, ४७० वत्सरः - सबके निवास स्थान, ४७१ वत्सलः- भक्तों के परम स्नेही, ४७२ वत्सी - वृन्दावनमें बछड़ोंका पालन करनेवाले, ४७३ रत्नगर्भः - रत्नोंको अपने गर्भ में धारण करनेवाले समुद्ररूप, ४७४ धनेश्वरः- सब प्रकारकै धनोंके नांमी ॥ ६३ ॥
धर्मगुञ्धर्मकृद्धम सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
४७५ धर्मगुप् - धर्मकी रक्षा करनेवाले, ४७६ धम कर सत क्षर अि विल किर प्रका आि गभ आ स्थित अन्त लिये सम्प आि
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६३ ॥ योंको तन्त्र, ४६८ - रूप त्पत्ति, नोहर - सबके -४७३ द्ररूप, ३ ॥ ६४ ॥ ४७६ ( ४५ ) धर्मकृत् - धर्मकी स्थापना के लिये स्वयं धर्मका आचरण करनेवाले, ४७७ धर्मी - सम्पूर्ण धर्मों के आधार, ४७८ सत् - सत्यस्वरूप, ४७ ९ असत् - स्थूल जगत्स्वरूप, ४८० क्षरम् - सर्वभूतमय, ४८१ अक्षरम् - अविनाशी, ४८२ अविज्ञाता - क्षेत्रज्ञ जीवात्माको विज्ञाता कहते हैं, उनसे विलक्षण भगवान् विष्णु, ४८३ सहस्रांशुः - हजारों किरणोंवाले सूर्यस्वरूप, ४८४ विधाता - सबको अच्छी प्रकार धारण करनेवाले, ४८५ कृतलक्षणः- श्रीवत्स आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥६५ ॥
४८६ गभस्तिनेमिः - किरणोंके बीचमें सूर्यरूपसे स्थित, ४८७ सत्त्वस्थः - अन्तर्यामीरूपसे समस्त प्राणियों के अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाले, ४८८ सिंहः - भक्त प्रह्लाद के लिये नृसिंहरूप धारण करनेवाले, ४८ ९ भूतमहेश्वरः-सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वर, ४ ९ ० आदिदेवः - सबके आदि कारण और दिव्य स्वरूप, ४ ९ १ महादेवः - ज्ञानयोग
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( y ४६ & ) ) और ऐश्वर्य आदि महिमाओंसे युक्त, ४ ९ २ देवेशः- समस्त सोम ' देवके स्वामी, ४ ९ ३ देवभृद्गुरुः- देवका विशेषरूपसे विन भरण - पोषण करनेवाले उनके परम गुरु ॥ ६५ ॥
सोम-उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । निक शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥६६ ॥ सोम
४ ९ ४ उत्तरः – संसार - समुद्रसे उद्धार करनेवाले और पुर सर्वश्रेष्ठ, ४ ९ ५ गोपतिः - गोपालरूपसे गायों की रक्षा सन्त करनेवाले, ४ ९ ६ गोप्ता - समस्त प्राणियोंका पालन और को रक्षा करनेवाले, ४ ९ ७ ज्ञानगम्यः - ज्ञानके द्वारा जाननेमें वाले आनेवाले, ४ ९ ८ पुरातनः - सदा एकरस रहनेवाले सबके दार आदि पुराणपुरुष, ४ ९९ शरीरभूतभृत् - शरीरके सात उत्पादक पञ्चभूतोंका प्राणरूपसे पालन करनेवाले, ५०० उनक भोक्ता- निरतिशय आनन्दपुञ्जको भोगनेवाले, ५०१ जीव कपीन्द्रः – बंदरोंके स्वामी श्रीराम, ५०२ भूरिदक्षिणः- अम श्रीरामादि अवतारोंमें यज्ञ करते समय बहुत - सी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ॥ ६६ ॥