विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 51–60
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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: - समस्त शेषरूप से 1 ॥६६ ॥
और की रक्षा न और जानने में ले सबके शरीर के ३, ५०० - ५०१ क्षिणः-दक्षिणा ( ४७ ) सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः । विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ६७ ५०३ सोमपः - यज्ञों में देवरूपसे और यजमानरूपसे सोमरसका पान करनेवाले, ५०४ अमृतपः - समुद्रमन्थनसे निकाला हुआ अमृत देवोंको पिलाकर स्वयं पीनेवाले, ५०५ सोमः - ओषधियों का पोषण करनेवाले चन्द्रमारूप, ५०६ पुरुजित् - बहुतों पर विजय लाभ करनेवाले, ५०७ पुरु-सत्तमः - विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ, ५०८ विनयः- दुष्टों-को दण्ड देनेवाले, ५० ९ जयः सबपर विजय प्राप्त करने-वाले, ५१० सत्यसन्धः - सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, ५११ दाशार्ह: - दाशार्हकुलमें प्रकट होनेवाले, ५१२ सात्वतां पतिः- यादवोंके और अपने भक्तोंके स्वामी यानी उनका योगक्षेम चलानेवाले ॥ ६७ ॥
जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः । ६८ । ५१३ जीवः - क्षेत्रशरूपसे प्राणोंको धारण करनेवाले,
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( ४८ ) ५१४ विनयितासाक्षी - अपने शरणापत्र भक्तोंके विनय- ५२० भावको तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले, ५१५ मुकुन्दः- धर्मश मुक्तिदाता, ५१६ अमितविक्रमः - वामनावतारमें पृथ्वी डगम नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखनेवाले, ५१७ मह अम्भोनिधिः- जलके निधान समुद्रस्वरूप, ५१८ त्रिप अनन्तात्मा - अनन्तमूर्ति, ५१ ९ महोदधिशयः -प्रलय-कालके महान् समुद्रमें शयन करनेवाले, ५२० अन्तकः-प्राणियोंका संहार करनेवाले मृत्युस्वरूप ॥ ६८ ॥ भगव
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । वाले उनक आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ६ ९ स्वाम ५२१ अजः - अकार भगवान् विष्णुका वाचक है, ५३५ उससे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा, ५२२ महाई: -महा पूजनीय, ५२३ स्वाभाव्यः - नित्य सिद्ध होने के कारण ५३७ स्वभाव से ही उत्पन्न न होनेवाले, ५२४ जितामित्रः - रावण-अन्त शिशुपालादि शत्रुओंको जीतनेवाले, ५२५ प्रमोदनः -स्मरणमात्रसे नित्य प्रमुदित करनेवाले, ५२६ आनन्दः- महा आनन्दस्वरूप, ५२७ नन्दनः- सबको प्रसन्न करनेवाले, गुह्यो
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विनय-कुन्द: -पृथ्वी ५१७ ५१८ -प्रलय-न्तकः-नः । नः ६ ९ चक है, हाई: -कारण -रावण-दिनः-नन्द : -नेवाले, ( ( ४ ४ ४ ९ ९ ) ) ५२८ नन्दः- सम्पूर्ण ऐश्वयोंसे सम्पन्न, ५२ ९ सत्यधर्मा-धर्मज्ञानादि सब गुणों से युक्त, ५३० त्रिविक्रमः -तीन sa में तीनों लोकों को नापनेवाले ॥ ६ ९ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाभृङ्गः कृतान्तकृत् ॥७० ॥
५३१ महर्षिः कपिलाचार्य: - सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, ५३२ कृतज्ञः - किये हुएको जानने-वाले यांनी अपने भक्तों की सेवाको बहुत मानकर अपनेको उनका ऋणी समझनेवाले, ५३३ मेदिनीपतिः - पृथ्वीके स्वामी, ५३४ त्रिपदः - त्रिलोकीरूप तीन पैरोंवाले विश्वरूप, ५३५ त्रिदशाध्यक्षः - देवताओंके स्वामी, ५३६ महाभ्टङ्गः- मत्स्यावतारमें महान् सींग धारण करनेवाले, ५३७ कृतान्तकृत् - स्मरण करनेवालोंके समस्त कर्मोंका अन्त करनेवाले ॥ ७० ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तचक्रगदाधरः ॥७१ ॥
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( ५० ) ५३८ महावराहः - हिरण्याक्षका वध करनेके लिये भी महावराहरूप धारण करनेवाले, ५३ ९ गोविन्दः - नष्ट हुई का पृथ्वीको पुनः प्राप्त कर लेनेवाले, ५४० सुषेणः- पार्षदोंके क समुदायरूप सुन्दर सेनासे सुसजित, ५४१ कनकाङ्गदी-५८ सुवर्णका बाजूबंद धारण करनेवाले, ५४२ गुह्यः-वस हृदयाकाशमें छिपे रहनेवाले, ५४३ गभीरः - अतिशय ५ ९ गम्भीर स्वभाववाले, ५४४ गहनः - जिनके स्वरूपमें प्रविष्ट हो होना अत्यन्त कठिन हो — ऐसे, ५४५ गुप्तः - वाणी और मनसे जाननेमें न आनेवाले, ५४६ चक्रगदाधरः-भक्तोंकी रक्षाके लिये चक्र और गदा आदि दिव्य भ आयुघोंको धारण करनेवाले ॥ ७१ ॥ आ
वेधाः खाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः । वरुणोवारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥७२ ॥ जा
श्वर ५४७ वेधाः - सब कुछ विधान करनेवाले, ५४८ प्रेम स्वाङ्गः - कार्य करनेमें स्वयं ही सहकारी, ५४ ९ अजितः-किसीके द्वारा न जीते जानेवाले, ५५० कृष्णः -श्यामसुन्दर प्रल आ श्रीकृष्ण, ५५१ दृढः - अपने स्वरूप और सामर्थ्य से कभी वन
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के लिये - नष्ट हुई पार्षदों के ङ्गदी-गुह्यः-अतिशय में प्रविष्ट धरः-द दिव्य
च्युतः ।
॥७२ ॥
५४८ जितः-मसुन्दर से कभी ( ५१ ) भी च्युत न होनेवाले, ५५२ सङ्कर्षणोऽच्युतः -- प्रलय-कालमें एक साथ सबका संहार करनेवाले और जिनका कभी किसी भी कारणसे पतन न हो सके - ऐसे अविनाशी, ५५३ वरुणः - जलके स्वामी वरुणदेवता, ५५४ वारुणः-वरुणके पुत्र वशिष्ठस्वरूप, ५५५ वृक्षः - अश्वत्थवृक्षरूप, ५५६ पुष्कराक्षः - हृदय - कमलमें चिन्तन करनेसे प्रत्यक्ष होनेवाले, ५५७ महामनाः - सङ्कल्पमात्रसे उत्पत्ति, पालन और संहार आदि समस्त लीला करनेकी शक्तिवाले ॥७२ ॥
भगवान् भगहानन्दी वनमाली हलायुधः । आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ७३ ५५८ भगवान् - उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जाननेवाले एवं सर्वै-श्वर्यादि छहों भगोंसे युक्त, ५५ ९ भगहा- अपने भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये उनके ऐश्वर्यका हरण करनेवाले और प्रलय - कालमें सबके ऐश्वर्यको नष्ट करनेवाले, ५६० आनन्दी - परमसुखस्वरूप, ५६१ वनमाली - वैजयन्ती वनमाला धारण करनेवाले, ५६२ हलायुधः - हलरूप
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( ५२ ) शस्त्रको धारण करनेवाले वलभद्रस्वरूप, ५६३ आदित्यः- त्रिसा अदितिपुत्र वामन भगवान्, _ ५६४: ज्योतिरादित्यः- संन्य सूर्यमण्डलमें विराजमान ज्योतिःस्वरूप, ५६५ सहिष्णु: -. समस्त द्वन्द्वोंको सहन करने में समर्थ, ५६६ गतिसत्तमः-सत्पुरुषों के परम गन्तव्य और सर्वश्रेष्ठ ॥ ७३ ॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ५६७ सुधन्वा - अतिशय सुन्दर शार्ङ्गधनुष करनेवाले, ५६८ खण्डपरशुः - शत्रुओंका खण्डन वाले फरसेको धारण करनेवाले परशुरामस्वरूप, दारुणः – सन्मार्गविरोधियोंके लिये महान् भयंकर, द्रविणप्रदः - अर्थार्थी भक्तोंको धन - सम्पत्ति प्रदान वाले, ५७१ दिविस्पृक - स्वर्गलोकतक व्याप्त, द्वारा साम । वेदस्व | ७४ | परमान धारण ५७ ९ करने- उपदेश ५६ ९ कृत्-५७० करनेव करने- ५८२ स्थिति ५७२ सर्वदृग्व्यासः - सबके द्रष्टा एवं वेदका विभाग करनेवाले शान्ति श्रीकृष्णद्वैपायनस्वरूप, ५७३ वाचस्पतिरयोनिजः- प्राप्यस विद्याके. स्वामी तथा बिना योनिके स्वयं ही प्रकट शुभाङ होनेवाले ॥ ७४ ॥ गोहि
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दित्यः--दित्यः-हिष्णु: -. सत्तमः-: | 81७४ | धारण न करने-५६ ९ र, ५७० ( ५३ )
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥
५७४ त्रिसामा - देवत्रत आदि तीन साम श्रुतियों-द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है - ऐसे परमेश्वर, ५७५ सामगः - सामवेदका गान करनेवाले, ५७६ साम- साम-वेदस्वरूप, ५७७ निर्वाणम्- परम शान्तिके निधान परमानन्दस्वरूप, ५७८ भेषजम् - संसाररोगकी ओषधि, ५७ ९ भिषक् – संसाररोगका नाश करनेके लिये गीतारूप उपदेशामृतका पान करानेवाले -- परमवैद्य, ५८० संन्यास-कृत् - मोक्ष के लिये संन्यासाश्रम और संन्यास- योगका निर्माण करनेवाले, ५८१ शमः - उपशमताका उपदेश देनेवाले, न करने- ५८२ शान्तः - परमशान्ताकृति, ५८३ निष्ठा - सबकी स्थिति के आधार अधिष्ठानस्वरूप, ५८४ शान्तिः - परम ५७२ शान्तिस्वरूप, ५८५ परायणम् - मुमुक्षु पुरुषोंके परम करनेवाले प्राप्यस्थान ॥ ७५ ॥
निजः-शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । ही प्रकट गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ७६ ॥
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( ५४ ) ५८६ शुभाङ्गः - अति मनोहर परम सुन्दर अङ्गोंवाले, जग ५८७ शान्तिदः - परम शान्ति देनेवाले, ५८८ स्रष्टा - सर्गके ५ ९ आदिमें सबकी रचना करनेवाले, ५८ ९ कुमुदः - पृथ्वीपर शि • प्रसन्नतापूर्वक लीला करनेवाले, ५ ९ ० कुवलेशयः - जलमें श्री शेषनागकी शय्या पर शयन करनेवाले, ५ ९ १ गोहितः- कर गोपालरूपसे गायोंका और अवतार धारण करके भार ६० उतारकर पृथ्वीका हित करनेवाले, ५ ९ २ गोपतिः - पृथ्वीके ६० और गायोंके स्वामी, ५ ९ ३ गोप्ता - अवतार धारण करके युक्त सबके सम्मुख प्रकट होते समय अपनी मायासे अपने स्वरूप- श्री-को आच्छादित करनेवाले, ५ ९ ४ वृषभाक्षः- समस्त श्री कामनाओंकी वर्षा करनेवाली कृपादृष्टिसे युक्त, ५ ९ ५ वृष-प्रियः - धर्मसे प्यार करनेवाले ॥ ७६ ॥ थी
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकुच्छिवः । अन श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।७७ । सम ५ ९ ६ अनिवर्ती - रणभूमिमें और धर्मपालनमें पीछे के न हटनेवाले, ५ ९ ७ निवृत्तात्मा - स्वभावसे ही विषय - कर वासनारहित नित्य शुद्ध मनवाले, ५ ९ ८ संक्षेप्ता - विस्तृत धार
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अङ्गवाले, सर्ग - पृथ्वीपर यः - जलमें गोहितः-करके भार - पृथ्वीके | रण करके ने स्वरूप-: - समस्त २५ वृष-ः । नरः ।७७ | नमें पीछे विषय-- विस्तृत ( ५५ ) जगत्को क्षणभरमें संक्षिप्त यानी सूक्ष्मरूपमें करनेवाले, ५ ९९ क्षेमकृत् - शरणागतकी रक्षा करनेवाले, ६०० शिवः - स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले कल्याणस्वरूप, ६०१ श्रीवत्सवक्षाः- श्रीवत्स नामक चिह्नको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६०२ श्रीवासः -श्रीलक्ष्मीजीके वासस्थान, ६०३ श्रीपतिः - परमशक्तिरूपा श्रीलक्ष्मीजीके स्वामी, ६०४ श्रीमतां वरः - सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यसे युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालों से श्रेष्ठ ॥ ७७ ॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः । ७८ । ६०५ श्रीदः - भक्तोंको श्री प्रदान करनेवाले, ६०६ श्रीशः - लक्ष्मीके नाथ, ६०७ श्रीनिवासः -श्रीलक्ष्मीजीके अन्तःकरणमें नित्य - निवास करनेवाले, ६०८ श्रीनिधिः-समस्त श्रियोंके आधार, ६० ९ श्रीविभावनः - सब मनुष्यों-के लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, ६१० श्रीधरः - जगजननी श्रीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६११ श्रीकरः- स्मरण, स्तवन और
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( ५६ ) अर्चन आदि करनेवाले भक्तोंके लिये श्रीका विस्तार करने-वाले, ६१२ श्रेयः- कल्याणस्वरूप, ६१३ श्रीमान - सब प्रकारकी श्रियोंसे युक्त, ६१४ लोकत्रयाशयः - तीनों लोकोंके आधार || ७८ ॥ स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिज्योतिर्गणेश्वरः । उ ३ त विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिच्छिन्नसंशयः ७ ९ द ६१५ स्वक्षः - मनोहर कृपाकटाक्षसे युक्त परम सुन्दर आँखोंवाले, ६१६ स्वङ्गः - अतिशय कोमल परम सुन्दर मनोहर अङ्गवाले, ' ६१७ शतानन्दः - लीलाभेदसे सैकड़ों विभागोंमें विभक्त आनन्दस्वरूप, ६१८ नन्दिः - परमानन्द-विग्रह, ६१ ९ ज्योतिर्गणेश्वरः - नक्षत्रसमुदायों के ईश्वर, ६२० विजितात्मा - जीते हुए मनवाले, ६२१ अविधे-यात्मा - जिनके असली स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके- ऐसे अनिर्वचनीयस्वरूप, ६२२ सत्कीर्तिः - सच्ची कीर्तिवाले, ६२३ छिन्नसंशयः- हथेलीमें रखखे हुए बेरके समान सम्पूर्ण विश्वको प्रत्यक्ष देखनेवाले होनेसे सब प्रकारके संशयोंसे रहित ॥ ७ ९ ॥ श ए ग प ल ६ अ ना आ