विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 61–70
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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करने--सब - तीनों -: ७ ९ सुन्दर सुन्दर कड़ों नन्द-श्वर, विधे-वर्णन ६२२ चिलीमें वाले ( ५७ )
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूपणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥८० ॥
• ६२४ उदीर्णः - सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ, ६२५ सर्व-तश्चक्षुः- समस्त वस्तुओंको सब दिशाओं में सदा - सर्वदा देखनेकी शक्तिवाले, ६२६ अनीशः - जिनका दूसरा कोई शासक न हो— ऐसे स्वतन्त्र, ६२७ शाश्वतस्थिरः - सदा एकरस स्थिर रहनेवाले, निर्विकार, ६२८ भूशयः - लंका-गमनके लिये मार्ग की याचना करते समय समुद्रतटकी भूमि-पर शयन करनेवाले, ६२ ९ भूषणः - स्वेच्छासे नाना अवतार लेकर अपने चरणचिह्नोंसे भूमिकी शोभा बढ़ानेवाले, ६३० भूतिः - सत्तास्वरूप और समस्त विभूतियोंके आधारस्वरूप, ६३१ विशोकः - सब प्रकारसे शोकरहित, ६३२ शोकनाशनः - स्मृतिमात्रसे भक्तोंके शोकका समूल नाश करनेवाले ॥ ८० ॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भोविशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रयुनोऽविनः ॥८१ ॥
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( ५८ ) ६३३ अर्चिष्मान् -चन्द्र - सूर्य आदि समस्त ज्योतियों- शूर को देदीप्यमान करनेवाली अतिशय प्रकाशमय अनन्त शूर किरणोंसे युक्त, ६३४ अर्चितः - समस्त लोकोंके पूज्य रूपर ब्रह्मादिसे भी पूजे जानेवाले, ६३५ कुम्भः - घटकी भाँति लोक सबके निवासस्थान, ६३६ विशुद्धात्मा - परम शुद्ध निर्मल केश-आत्मस्वरूप, ६३७ विशोधनः - स्मरणमात्रसे समस्त वाल पापों का नाश करके भक्तोंके अन्तःकरणको परम शुद्ध कर संसा देनेवाले, ६३८ अनिरुद्ध: - जिनको कोई बाँधकर नहीं काम रख सके - — ऐसे चतुर्व्यूहमें अनिरुद्धस्वरूप, ६३ ९ अन अप्रतिरथः- प्रतिपक्षसे रहित, ६४० प्रद्युम्नः परमश्रेष्ठ अपार धनसे युक्त चतुर्व्यूहमें प्रद्युम्नस्वरूप, ६४१ अमित- इन विक्रमः - अपार पराक्रमी ॥ ८१ ॥ समस
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । काम त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ८२ ६५३ ६४२ कालनेमिनिहा - कालनेमि नामक असुरको प्रियत मारनेवाले, ६४३ वीरः - परम शूरवीर, ६४४ शौरिः- श्याम चतु प्रत्यक्ष प्रवाश्री ६३४२ कृता
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योतियों-अनन्त पूज्य भाँति निर्मल समस्त शुद्ध कर कर नहीं ६३ ९ - परमश्रेष्ठ अमित-रिः ८२ असुरको शौरिः-( ५ ९ ) शूरजनेश्वरः- अतिशय शूरवीरताके कारण इन्द्रादि शूरवीरोंके भी इष्ट, ६४६ त्रिलोकात्मा - अन्तर्यामी-रूपसे तीनों लोकों के आत्मा, ६४७ त्रिलोकेशः - तीनों लोकों के स्वामी, ६४८ केशवः - सूर्यकी किरणरूप केशवा, ६४ ९ केशिहा - केशी नामके असुरको मारने-वाले, ६५० हरिः - स्मरणमात्र से समस्त पापोंका और समूल संसारका हरण करनेवाले ॥ ८२ ॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥८३ ॥
६५१ कामदेवः- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंको चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओं के अधिष्ठाता परमदेव, ६५२ कामपालः — सकामी भक्तोंकी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले, ६५३ कामी - स्वभावसे ही पूर्णकाम और अपने प्रियतमोंको चाहनेवाले, ६५४ कान्तः परम मनोहर श्यामसुन्दर देह धारण करनेवाले गोपीजनवल्लभ, ६५५ कृतागमः- समस्त वेद और शास्त्रोंको रचनेवाले, ६५६
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( ६० ) अनिर्देश्यवपुः - जिनके दिव्य स्वरूपका किसी प्रकार भी ६६ वर्णन नहीं किया जा सके-- ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले, ६६ ६५७ विष्णुः - शेषशायी भगवान् विष्णु, ६५८ वीरः - बिना आ ही पैरोंके गमन करने आदि अनेक दिव्य शक्तियोंसे युक्त, वेद ६५ ९ अमन्तः- जिनके स्वरूप, शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य ब्रा और गुणोंका कोई भी पार नहीं पा सकता - ऐसे अविनाशी मान गुण, प्रभाव और शक्तियोंसे युक्त,. ६६० धनञ्जयः- मह अर्जुनरूपसे दिग्विजयके समय बहुत सा धन जीतकर मह लानेवाले ॥ ८३ ॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः । मह ब्रह्मविद्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥८४ ॥ कर्म
६६१ ब्रह्मण्यः - तप, वेद, ब्राह्मण और ज्ञानकी रक्षा तेज करनेवाले, ६६२ ब्रह्मकृत् पूर्वोक्त तप आदिकी रचना - मह वाले, ६६३ ब्रह्मा - ब्रह्मारूपसे जगत् को उत्पन्न करनेवाले, मह ६६४ ब्रह्म- सच्चिदानन्दस्वरूप, ६६५ ब्रह्मविवर्धनः- यजन पूर्वोक्त ब्रह्म शब्दवाची तप आदिकी वृद्धि करनेवाले, करन ६६६ ब्रह्मवित् - वेद और वेदार्थको पूर्णतया जाननेवाले, साध
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कार भी रीवाले, र : - बिना से युक्त, सामर्थ्य अविनाशी नञ्जयः-जीतकर ॥८४ ॥
नकी रक्षा ही रचना-रनेवाले, वर्धनः-करने वाले, ननेवाले, ( ६१ ) ) ६६७ ब्राह्मणः समस्त वस्तुओंको ब्रह्मरूपसे देखनेवाले, ६६८ ब्रह्मी - ब्रह्म - शब्दवाची तपादि समस्त पदार्थोंके अधिष्ठान, ६६ ९ ब्रह्मज्ञः - अपने आत्मस्वरूप ब्रह्मशब्दवाची चेदको पूर्णतया यथार्थ जाननेवाले, ६७० ब्राह्मणप्रियः-ब्राह्मणोंके परम प्रिय और ब्राह्मणों को अतिशय प्रिय माननेवाले || ८४ ॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ८५ ॥
६७१ महाक्रमः -बड़े वेगसे चलनेवाले, ६७२ महाकर्मा - भिन्न - भिन्न अवतारोंमें नाना प्रकारके महान् कर्म करनेवाले, ६७३ महातेजाः - जिसके तेजसे समस्त तेजस्वी देदीप्यमान होते हैं— ऐसे महान तेजस्वी, ६७४ महोरगः - बड़े भारी सर्प यानी वासुकिस्वरूप, ६७५ महाक्रतुः - महान् यज्ञस्वरूप, ६७६ महायज्वा - बड़े यजमान यानी लोकसंग्रहके लिये बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुत्रान करनेवाले, ६७७ महायज्ञः - जपयज्ञ आदि भगवत्प्राप्ति के साधनरूप समस्त यज्ञ जिनकी विभूतियाँ हैं - ऐसे महान्
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( ६२ ) यज्ञस्वरूप, ६७८ महाहविः - ब्रह्मरूप अग्नि में हवन किये जाने योग्य प्रपञ्चरूप हवि जिनका स्वरूप है – ऐसे म • महान् हविःस्वरूप ॥ ८५ ॥ व
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः । त पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥८६ ॥ ६
बी ६७ ९ स्तव्यः - सबके द्वारा स्तुति किये जाने योग्य, ६८० स्तवप्रियः - स्तुतिसे प्रसन्न होनेवाले, ६८१ प्र स्तोत्रम् - जिसके द्वारा भगवान् के गुण- प्रभावका कीर्तन भ - किया जाता है, वह स्तोत्र, ६८२ स्तुतिः - स्तवनक्रिया- वस नि • स्वरूप, ६८३ स्तोता - स्तुति करनेवाले, ६८४ रणप्रियः-नि युद्धसे प्रेम करनेवाले, ६८५ पूर्णः - समस्त ज्ञान, शक्ति, " ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, ६८६ पूरयिता - अपने हव भक्तोंको सब प्रकारसे परिपूर्ण करनेवाले, ६८७ पुण्यः- स स्मरणमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले पुण्यस्वरूप, ६८८ शूर पुण्यकीर्तिः परमपावन े कीर्तिबाले, ६८ ९ अनामयः-आन्तरिक और बाह्य सब प्रकारकी व्याधियोंसे रहित ॥८६ ॥ गव
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हवन - ऐसे
यः ।
॥८६ ॥
योग्य, ६८१ कीर्तन नक्रिया-प्रियः-शक्ति, -- अपने पुण्यः-६८८ मयः-॥८६ ॥
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मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥८७ ॥
६ ९ ० मनोजवः - मनकी भाँति वेगवाले, ६ ९ १ तीर्थकर: - समस्त विद्याओंके रचयिता और उपदेशकर्ता, ६ ९ २ वसुरेताः- हिरण्यमय पुरुष ( प्रथम पुरुष - सृष्टिका बीज ) जिनका वीर्य है — ऐने सुवर्णवीर्य, ६ ९ ३ वसुप्रदः-प्रचुर धन प्रदान करनेवाले, ६ ९ ४ वसुप्रदः - अपने भक्तोंको मोक्षरूप महान् धन देनेवाले, ६ ९ ५ वासुदेवः-वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण, ६ ९ ६ वसुः - सबके अन्तःकरणमें निवास करनेवाले, ६ ९ ७ वसुमनाः - समानभावसे सबमें निवास करनेकी शक्तिसे युक्त मनवाले, ६ ९ ८ हंत्रिः - यज्ञमें हवन किये जाने योग्य हविःस्वरूप ॥ ८७ ॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥८८ ॥
६ ९९ सद्गतिः -- सत्पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य गतिखदप, ७०० स्कृति जारकी रक्षा भावि कार्य
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( ६४ ) निव करनेवाले, ७०१ सत्ता - सदा - सर्वदा विद्यमान सत्तास्वरूप, धा ७०२ सद्भूतिः - बहुत प्रकारसे बहुत रूपों में भासित होने- अथ वाले, ७०३ सत्परायणः - सत्पुरुषों के परम प्रापणीय स्थान, वि ७०४ शूरसेनः - हनुमानादि श्रेष्ठ शूरवीर योधाओंसे युक्त सेनावाले, ' ७०५ यदुश्रेष्ठः - यदुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ ७०६ अ सन्निवासः - सत्पुरुषों के आश्रय, ७०७ सुयामुनः - जिन- Th के परिकर यमुनातटनिवासी गोपालवाल आदि अति सुन्दर है-हैं, ऐसे श्रीकृष्ण ॥ ८८ ॥ ७१
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः । स्वस नह दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥८ ९ ॥ में ७०८ भूतावासः - समस्त प्राणियोंके मुख्य निवास- धार स्थान,. ७० ९ वासुदेवः - अपनी मायासे जगत्को भी । आच्छादित करनेवाले परमदेव, ७१० सर्वासुनिलयः- ऐसे समस्त प्राणियोंके आधार, ७११ अनलः- अपार शक्ति वाल और सम्पत्तिसे युक्त, ७१२ दर्पहा - धर्मविरुद्ध मार्ग में एक चलनेवार्लोके घमण्डको नष्ट करनेवाले, ७१३ दर्पदः- लोक अपने भक्तोंको विशुद्ध गौरव देनेवाले ७१४ -
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उत्तास्वरूप, सित होने य स्थान, ओंसे युक्त ४, ७०६ नः- जिन-ति सुन्दर -॥८ ९ ॥ निवास-त् निलयः-शक्ति मार्ग में दर्पदः -३ हप्ता-( ६५ ) नित्यानन्दमन, ७१५ दुर्धरः- बड़ी कठिनतासे हृदय में धारित होनेवाले, ७१६ अपराजितः - दूसरोंसे अजित अर्थात् भक्तपरवश ॥ ८ ९ ॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिर मूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥९ ० ॥
७१७ विश्वमूर्तिः - समस्त विश्व ही जिनकी मूर्ति है — ऐसे विराट्स्वरूप, ७१८ महामूर्तिः - बड़े रूपवाले, ७१ ९ दीप्तमूर्तिः - स्वेच्छासे धारण किये हुए देदीप्यमान स्वरूपसे युक्त, ७२० अमूर्तिमान् - जिनकी कोई मूर्ति नहीं - – ऐसे निराकार, ७२१ अनेकमूर्तिः- नाना अवतारों-में स्वेच्छासे लोगों का उपकार करनेके लिये बहुत मूर्तियोंको धारण करनेवाले, ७२२ अव्यक्तः - अनेक मूर्ति होते हुए भी जिनका स्वरूप किसी प्रकार व्यक्त न किया जा सके-ऐसे अप्रकटस्वरूप, ७२३ शतमूर्तिः - सैकड़ों मूर्तियों-वाले, ७२४ शताननः-- सैकड़ों मुखोंवाले ॥ ९ ० ॥
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥९ १ ॥
घि ० स ० ३–
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( ६६ ) ७२५ एकः - सब प्रकारके भेद - भावोंसे रहित अद्वितीय, ७२६ नैकः – उपाधिभेइसे अनेक, ७२७ सवः-जिसमें सोमनामकी ओषधिका रस निकाला जाता है— ऐसे यज्ञस्वरूप, ७२८ कः - सुखस्वरूप, ७२ ९ किम्-विचारणीय ब्रह्मस्वरूप, ७३० यत् - स्वतः सिद्ध, ७३१ तत् - विस्तार करनेवाले, ७३२ पदमनुत्तमम् - मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य अत्युत्तम परमपद, ७३३ लोकबन्धुः- समस्त प्राणियों के हित करनेवाले परम मित्र, ७३४ लोकनाथः - सबके द्वारा याचना किये आनेयोग्य लोकस्वामी, ७३५ माधवः - मधुकुलमें उत्पन्न ३ होनेवाले, ७३६ भक्तवत्सलः - भक्तोंसे प्रेम करने- स वाले ॥ ९ १ ॥ सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । र वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥९ २ ॥ ७३७ सुवर्णवर्णः - सोनेके समान पीतवर्णवाले, ७३८ हेमाङ्गः - सोनेके समान सुडौल चमकीले अङ्गवाले, ७३ ९ वराङ्गः - परम श्रेष्ठ अङ्ग - प्रत्यङ्गोंवाले, ७४० ब