विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र — पृष्ठ 71–80
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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रहित ७ सव: -है-किम्-६,७३१ पू - मुमुक्षु परमपद, बाले परम ना किये में उत्पन्न
करने-।
॥९ २ ॥
वर्णवाले, वाले, ७४० ( ६७ ) चन्दनाङ्गदी - चन्दनके लेप और बाजूबंद से सुशोभित, ७४१ वीरहा - राग - द्वेष आदि प्रबल शत्रुओंसे डरकर शरण-में आनेवालों के अन्तःकरण में उनका अभाव कर देनेवाले, ७४२ विषमः - जिनके समान दूसरा कोई नहीं - ऐसे अनुपम, ७४३ शून्यः - समस्त विशेषणोंसे रहित, ७४४ घृताशी: - अपने आश्रित जनोंके लिये कृपासे सने हुए द्रवित सङ्कल्प करनेवाले, ७४५ अचल: - किसी प्रकार भी विचलित न होनेवाले अविचल, ७४६ चलः-वायुरूपसे सर्वत्र गमन करनेवाले ॥ ९ २ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥९ ३ ॥
७४७ अमानी स्वयं मान न चाहनेवाले अभिमान-रहित ७२८ मानदः - दूसरोंको मान देनेवाले, ७४ ९ मान्यः - सब के पूजनेयोग्य माननीय, ७५० लोकस्वामी-चौदह भुवनोंके स्वामी, ७५१ त्रिलोकधृक् - तीनों लोकों-को धारण करनेवाले, ७५२ सुमेधाः - अति उत्तम सुन्दर बुद्धिवाले, ७५३ मेधजः - यज्ञमें प्रकट होनेवाले, ७५४
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( ६८ ) धन्यः - नित्य कृतकृत्य होनेके कारण सर्वथा धन्यवादके पात्र, ७५५ सत्यमेधाः - सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धिवाले, ७५६ धराधरः - अनन्त भगवान् के रूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ९ ३ ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकभृङ्गो गदाग्रजः ॥ ९ ४ ॥
७५७ तेजोवृषः- आदित्यरूपसे तेजकी वर्षा करने-वाले और भक्तोंपर अपने अमृतमय तेजकी वर्षा करनेवाले, ७५८ तिधरः - परम कान्तिको धारण करनेवाले, ७५ ९ सर्वशस्त्रभृतां वरः- समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, ७६० प्रग्रहः- भक्तोंके द्वारा अर्पित पत्र- पुष्पादिको ग्रहण करने-वाले, ७६१ निग्रहः – सबका निग्रह करनेवाले, ७६२ ए व्यग्रः - अपने भक्तों को अभीष्ट फल देनेमें लगे हुए, ७६३ नैकश्टङ्गः – नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप चार स सींगोंको धारण करनेवाले शब्दब्रह्मस्वरूप, ७६४ गदा-ग्रजः -गद से पहले जन्म लेनेवाले ॥ ९ ४ ॥
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न्यवाद के , ७५६ धारण || ९ ४ || करने-रनेवाले, , ७५ ९ 5, ७६० करने-5, ७६२ ८, ७६३ रूप चार गदा-( ६ ९ ) चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः 1 चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥९ ५ ॥ ७६५ चतुर्मूर्तिः– राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, ७६६ चतुर्वाहुः - चार भुजाओंवाले, ७६७ चतुर्व्यूहः- वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - इन चार व्यूहोंसे युक्त, ७६८ चतुर्गतिः-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्यरूप चार परम गति -स्वरूप, ७६ ९ चतुरात्मा- मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, ७७० चतुर्भावः- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों के उत्पत्ति-स्थान, ७७१ चतुर्वेदवित् - चारों वेदोंके अर्थको भली-भाँति जाननेवाले, ७७२ एकपात् - एक पादवाले यानी एक पाद ( अंश ) से समस्त विश्वको व्याप्त करनेवाले ॥९ ५ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गे दुरावासो दुरारिहा ॥९ ६ ॥
७७३ समावर्तः - संसारचक्रको भलीभाँति घुमाने-
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( ७० ) वाले, ७७४ अनिवृत्तात्मा सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहीं से भी ( हटा हुआ ) नहीं है, ऐसे, ७७५ दुर्जयः - किसीसे भी जीतनेमें न आनेवाले, ७७६ दुरतिक्रमः - जिनकी आज्ञाका कोई उल्लङ्घन नहीं कर सके, ऐसे, ७७७ दुर्लभः - बिना भक्तिके प्राप्त न होनेवाले, ७७८ दुर्गमः - कठिनतासे जानने में आनेवाले, ७७ ९ दुर्गः – कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, ७८० दुरावासः - बड़ी कठिनतासे योगीजनों द्वारा हृदय में बसाये जानेवाले, ७८१ दुरारिहा दुष्ट मार्गमें चलनेवाले दैत्योंका वध करनेवाले ॥ ९ ६ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तु स्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥९ ७ ॥
७८२ शुभाङ्गः– कल्याणकारक सम्बोधन ( नाम ) वाले, ७८३ लोकसारङ्गः - लोकोंके सारको ग्रहण करनेवाले, ७८४ सुतन्तुः - सुन्दर विस्तृत जगत्रूप तन्तुवाले, ७८५ तन्तुवर्धनः- पूर्वोक्त जगत् - तन्तुको बढ़ानेवाले, ७८६ इन्द्रकर्मा - इन्द्रके समान कर्मवाले, ७८७ महाकर्मा- म इ य
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के कारण ) नहीं कोई -भक्तिके जानने में 5, ७८० में बसाये लनेवाले १ ९ ७ ॥ 7 ) वाले, नेवाले, -७८५ ७८६ कर्मा-( ७१ ) बड़े - बड़े कर्म करनेवाले, ७८८ कृतकर्मा - जो समस्त कर्तव्य कर्म कर चुके हों, जिनका कोई कर्तव्य शेष न रहा हो - ऐसे कृतकृत्य, ७८ ९ कृतागमः - स्वोचित अनेक कार्योंको पूर्ण करनेके लिये अवतार धारण करके आने-वाले ॥ ९ ७ ॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननामः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविजयी ॥९ ८ ॥
७ ९ ० उद्भवः – स्वेच्छासे श्रेष्ठ जन्म धारण करनेवाले, ७ ९ १ सुन्दरः- सबसे अधिक भाग्यशाली होनेके कारण परम सुन्दर, ७ ९ २ सुन्दः - परम करुणाशील, ७ ९ ३ रत्ननाभः - रत्नके समान सुन्दर नामिवाले, ७ ९ ४ सुलोचनः- सुन्दर नेत्रोंवाले, ७ ९ ५ अर्क: - ब्रह्मादि पूज्य पुरुषोंके भी पूजनीय, ७ ९ ६ वाजसनः - याचकों को अन्न प्रदान करनेवाले, ७ ९ ७ शृङ्गी - प्रलयकालमें सींगयुक्त मत्स्यविशेषका रूप धारण करनेवाले, ७ ९ ८ जयन्तः-शत्रुओं को पूर्णतया जीतनेवाले, ७ ९९ सर्वविज्जयी - सर्वश यानी सब कुछ जाननेवाले और सबको जीतनेवाले ॥९ ८ ॥
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( ७२ )
सुवर्णविन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ९९ ॥
८०० सुवर्णविन्दुः- सुन्दर अक्षर और बिन्दुसे युक्त ओंकारस्वरूप नाम ब्रह्म, ८०१ अक्षोभ्यः - किमीके - द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकनेवाले, ८०२ सर्व. वामीश्वरेश्वर: - समस्त वाणीपतियोंके यानी ब्रह्मादिके भी स्वामी, ८०३ महाहृदः - ध्यान करनेवाले जिसमें गोता लगाकर आनन्द में मन होते हैं, ऐसे परमानन्दके महान् सरोवर, ८०४ महागर्त: - मायारूप महान् गर्तवाले, ८०५ महाभूतः - त्रिकालमें कभी नष्ट न होने-वाले महाभूतस्वरूप, ८०६ महानिधिः --सबके महान् निवास - स्थान ॥ ९९ ॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ १०० ॥
८०७ कुमुदः - कु अर्थात् पृथ्वीको उसका भार उतारकर प्रसन्न करनेवाले, ८०८ कुन्दरः - हिरण्याक्षको स
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९९ ॥ बिन्दुसे कमी के सर्व-. सादिके जिसमें नन्दके महान् हो महान् । - भार oll को ( ७३ ७३ ) ) मारनेके लिये पृथ्वीको विदीर्ण करनेवाले, ८० ९ कुन्दः-कश्यपजीको पृथ्वी प्रदान करनेवाले, ८१० पर्जन्य: -बादलकी भाँति समस्त इष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, ८११ पावनः - स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले, ८१२ अनिलः -सदा प्रबुद्ध रहनेवाले, ८१३ अमृताशः-जिनकी आशा कभी विफल न हो - ऐसे अमोघसङ्कल्प, ८१४ अमृतवपुः - जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो - ऐसे नित्य - विग्रह, ८१५ सर्वज्ञः - सदा - सर्वदा सब कुछ जानने-वाले, ८१६ सर्वतोमुखः - सब ओर मुखबाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त भक्तिपूर्वक पत्र - पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करनेवाले ॥ १०० ॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्धनिषूदनः । १०१ । ८१७ सुलभः - नित्य निरन्तर चिन्तन करनेवालेको और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको बिना ही परिश्रमके सुगमता से प्राप्त होनेवाले, ८१८ सुव्रतः - सुन्दर भोजन करनेवाले यानी अपने भक्तोंद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पण किये
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( ७४ ) हुए पत्र - पुष्पादि मामूली भोजनको भी परम श्रेष्ठ मानकर खानेवाले, ८१ ९ सिद्धः - स्वभावसे ही समस्त सिद्धियों से युक्त, ८२० शत्रुजित् - देवता और सत्पुरुषोंके शत्रुओंको अपने शत्रु मानकर जीतनेवाले, ८२१ शत्रुतापनः -शत्रुओंको तपानेवाले, ८२२ म्यग्रोधः - वटवृक्षरूप, ८२३ उदुम्बरः -- कारणरूपसे आकाश के भी ऊपर रहने-वाले, ८२४ अश्वत्थः - पीपल वृक्षस्वरूप, ८२५ चाणूरान्धनिषूदनः- चाणूर नामक अन्ध्रजातिके वीर मल्लको मारनेवाले ॥ १०१ ॥
सहस्रार्चिः सप्तजिह्नः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ।१०२ । ८२६ सहस्राचिः - अनन्त. किरणोंवाले, ८२७ सप्तजिह्वः - काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्र-वर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरचि - इन सात जिह्वावाले अग्निस्वरूप, ८२८ सप्तैधा: - सात दीप्तिवाले अग्निस्वरूप, ८२ ९ सप्तवाहनः- सात घोड़ोंशले सूर्यरूप, ८३० अमूर्ति: - मूर्तिरहित निराकार, ८३१ अनघः- सब प्र चि भ वा अ अ बड स्थ सम रज गुण का भी स्व स्थि जि
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नकर योंसे ओंको नः-रूप, -८२५ वीर २ । २७ म्र-ले 9, ( ७५ ) प्रकार से निष्पाप, ८३२ अचिन्त्यः- किसी प्रकार भी चिन्तन करनेमें न आनेवाले, ८३३ भयकृत् - दुष्टों को भयभीत करनेवाले, ८३४ भयनाशनः स्मरण करने-वार्लोके और सत्पुरुषोंके भयका नाश करनेवाले ॥१०२ ॥
अणुर्बृहत्कुशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् । अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः । १०३ । ८३५ अणुः - अत्यन्त सूक्ष्म, ८३६ वृहत् - सबसे बड़े, ८३७ कृशः -- अत्यन्त पतले और हलके, ८३८ स्थूलः - अत्यन्त मोटे और भारी, ८३ ९ गुणभृत्-समस्त गुणों को धारण करनेवाले, ८४० निर्गुणः - सत्त्व, रज और तम -- इन तीनों गुणोंसे रहित, ८४१ महान् -गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदिकी अतिशयता के कारण परम महत्त्वसम्पन्न, ८४२ अधृतः - जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता - ऐसे निराधार, ८४३ स्वधृतः - अपने आपसे धारित यानी अपनी ही महिमा में . स्थित, ८४४ स्वास्यः - सुन्दर मुखवाले, ८४५ प्राग्वंशः-जिनसे समस्त वंशपरम्परा आरम्भ हुई है - ऐसे समस्त
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( ७६ ) पूर्वजोंके मी पूर्वज आदिपुरुष, ८४६ वंशवर्धनः- जगत्-प्रपञ्चरूप वंशको और यादव वंशको बढ़ानेवाले ॥ १०३ ॥
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः । १०४ । ८४७ भारभृत् शेषनाग आदिके रूपमें पृथ्वीका -भार उठानेवाले और अपने भक्तोंके योगक्षेमरूप भारको वहन करनेवाले, ८४८ कथितः- वेद - शास्त्र और महा-पुरुषोंद्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित, ८४ ९ योगी - नित्य समाधियुक्त, ८५० योगीशः- समस्त योगियोंके स्वामी, ८५१ सर्वकामदः- समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, ८५२ आश्रमः - सबको विश्राम देनेवाले, ८५३ श्रमणः - दुष्टों को संतप्त करनेवाले, ८५४ क्षामः-प्रलयकालमें सब प्रजाका क्षय करनेवाले, ८५५ सुपर्णः-. वेदरूप सुन्दर पत्तोंवाळे ( संसारवृक्षस्वरूप ), ८५६ वायु-वाहनः - वायुको गमन करने के लिये शक्ति देनेवाले ॥ १०४ ॥
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