अन्नसम्बन्ध (स्वधा, स्वाहा, वौषट्, स्वगा, नमः) कासार्वभौम परिभाषा। – 3. CORRELATING MICRO & MACROFUNDAMENTAL INTERACTIONS – 3.

श्री वासुदेव मिश्रशर्म्मा

अन्नसम्बन्ध (स्वधा, स्वाहा, वौषट्, स्वगा, नमः) का
सार्वभौम परिभाषा। – 3.
CORRELATING MICRO & MACRO
FUNDAMENTAL INTERACTIONS – 3.

एकत्रासनसंस्थितिः परिहृता प्रत्युद्गमाद्दूरतः
ताम्बुलाहरणच्छलेन रभसाश्लेषोऽपि संविघ्नितः ।
आलापोऽपि न मिश्रितः परिजनं व्यापारयन्त्यान्तिके
कान्तं प्रत्युपचारतश्चतुरया कोपः कृतार्थीकृतः ॥ अमरुशतकम् ॥
(सम्प्रसादगति – Macro Weak interaction – equivalent to beta decay explained using poetry).
आज दुनिया भर के वैज्ञानिक जिस GRAND UNIFIED THEORY का खोज कर रहे हैँ, यह वही थिओरी है ।

प्रगल्भा नायिका की क्रियाचातुरी – उसने प्रियतम को दूर से आते हुए देखा तो उठकर स्वागत करने के बहाने उसे अपने साथ एक आसन पर बैठने नहीँ दिया । ताम्बुल लाने के बहाने प्रिय के आकुल आलिङ्गन को बिघ्नित कर दिया । प्रिय के कुछ प्रश्न करने पर निकटस्थ सेवकों के दिशा में इङ्गित कर आलाप करने से विरत करा दिया । इसप्रकार प्रिय के प्रति स्वागतोपचार का निर्वाह करते हुए भी उसने अपने कोप का सफल प्रकाश कर दिया (अवहित्था व्यभिचारीभाव से पुष्ट ईर्ष्यामानात्मक विप्रलम्भ शृङ्गार) । यहाँ अन्तर्याम सम्बन्ध जैसा अवग्रह भूमी शून्य नहीँ होता, परन्तु एक अन्य से लगे रहते हुए भी दूरत्व रहता है ।

वहिर्याम सम्बन्धमें (in weak interaction) वामावर्त्त अणुओं (left-handed fermions) का अथवा दक्षिणावर्त्त प्रत्यणुओं (right-handed anti-fermions) का संशर सम्बन्ध (loose or weak interaction) होता है । यहाँ ग्रन्थिबन्धन नहीँ होने से नवीनसृष्टि नहीँ होता – केवल पूर्वसृष्टि का शिथिलीकरण होता है (not transforms, but only transmutes particles) । यह होने पर भी उसका प्रवर्ग्य भाग (beta particle) अधिक दूर नहीँ जाता (has a short range and short life) । सूक्ष्म जगत् में वहिर्याम सम्बन्ध W and Z bosons के द्वारा स्थापित होता है । W bosons लिङ्ग भेद से (positive and negative charge) दो प्रकार के होते हैँ । Z bosons को नपुंसक लिङ्ग (neutral charge) माना जाता है । स्थूल जगत में भी वही होता है । इसे समझने के लिए वस्तुलिङ्ग (particle charge) को समझना पडेगा ।

स्त्रीयः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान्न वि चेतदन्धः ।
कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत यस्ता विजानात् स पितृप्पितासत् ॥ ऋग्वेदः 1-164-16 ॥
आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्त्तं चाऽमूर्त्तं च । तस्मान्मूर्त्तिरेव रयिः ॥ प्रश्नोपनिषत् – 1-5 ॥

वस्तु के कार्यजनन सामर्थ्य (capacity for doing work) ही उसका लिङ्ग (charge) है । पुंलिङ्ग का लक्षण प्रसव है (atoms are known by their number of protons with positive charge) । स्त्रीलिङ्ग का लक्षण संस्त्यान है (confinement of positive charge) । जो पुरुष है, उसमें भी स्त्रीत्व है (everything has a net negative charge. Proton has a charge of +10/11 – not +1) and neutron has a charge of -1/11 – not 0. The net negative charge, which is directed inwards towards the nucleus, is not experienced from outside. It sustains the universe with confinement – संस्त्यान) । स्त्री ही प्रथम सत्तावान् होने से सत्य है – पदार्थों का मूलस्वरूप है । पुरुष स्त्री सत्ता से ही सत्तावान् होता है (All weak interactions violate parity conservation P and charge conjugation invariance C. This violation is universal) । जो देख सकते हैँ, वह ऐसे ही जानते हैँ (there are no bare mass or bare charge. Dirac was wrong. Modern values of the electric charge of quarks contain an error element of 3%. It is +7/11 and -4/11 and not +2/3 and -1/3) । जो ऐसे नहीँ जानता वह अन्धा है (research findings on this has been suppressed by the scientific community) । केवल समर्थव्यक्ति ही इस तथ्यको जानते हैँ । जो इसे जानता है वह सूक्ष्मपदार्थ विज्ञान जानता है (one who understands this, knows the quantum world). ।

जो कुछ भी मूर्त्तिमान अथवा अमूर्त्त द्रव्य है, वह सब इसी नियम से रयि-प्राण दो भागों के मिथुन में विभक्त है (Every object has both confining leptons and fermions that are confined energy) । ऋत का भातिसिद्ध (अभूत्वा भाति – जो है नहीँ, परन्तु व्यवहार में आता है, जैसे वस्तु से भिन्न काल, देश, परिमाण, आदि), अहृदय (क्षेत्र – field – जिसका आत्मा-प्राण-पशु अथवा उक्थ-अर्क-अशीति विभाग नहीँ है – like the electron sea, अथवा प्रजापति – शतपथ ब्राह्मणम् 14-8-4-1 & 14-8-5-1), अशरीरी (without a physical form) पदार्थ को रयि कहाजाता है (अप … रयिरात्मा वैश्वानरो – छान्दोग्योपनिषत् 5-16-1) । उसके विपरीत सत्तासिद्ध, सहृदय, सशरीरी पदार्थ को सत्यम् (स+ती+यम् – छान्दोग्योपनिषत् 8-3-5) कहा जाता है । ऋत के शक्ति भाग को ही रयि कहाजाता है, जो आगे चल कर सत्यम् सृष्टि करता है । यह प्रक्रिया अहरह चलता रहता है (तत्रैव) । ऋत में सत्यम् है । सत्यम् विहीन ऋत को अनृत कहते हैँ । इसीलिए कहागया है कि –
ऋतमेव परमेष्ठी ऋतं नात्येति किञ्चन ।
ऋते समुद्र आहितः ऋते भूमिरियं श्रिता ॥ तैत्तिरीयब्राह्मणम् – 1-5-5-1॥

यह रयि-प्राण (leptons-hadrons) एक मिथुन है । वही सब सृष्टि करते हैँ (प्रजापतिः … मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्राण चेति – प्रश्नोपनिषत् – 1-4) । समस्त क्रिया, शक्ति के द्वारा सम्भव है । शक्ति का सुप्त रूप (conserved or potential energy) – कार्यान्वित होने का पूर्वावस्था – को बल (force) कहते हैँ । बल के निखिलाकृति मध्यप्राणरूपी इन्द्र का कार्य है (नेंन्द्रात् ऋते पवते धाम किञ्चन) । उसका अन्य दो कार्य है रसादानम् (गति का उत्पन्न करना, जैसै मेघ में स्थित जल में गति उत्पन्न कर वृष्टि करवाना) और वृत्रस्य निबर्हणम् है (वृत्रासुर वध – neutron-proton conversion chain – रसादानं तु कर्म्मास्य वृत्रस्य च निबर्हणम् । स्तुते प्रभुत्व सर्वस्य बलस्य निखिलाकृति – बृहद्देवता – 2-6) । जब शक्ति सूर्य (आदित्य) और चन्द्रमा के मध्य में रहता है, तब बन्धन होता है (चन्द्रार्कमध्यस्था शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम् – योगकुण्डलिन्युपनिषद् – 3/7 – when force is between fermions and leptons, it creates binding energy) । वहिर्याम सम्बन्ध (weak interaction) वृत्रस्य निबर्हणम् से सम्बन्ध रखता है ।

कश्य शब्द का अर्थ मद्य है (कशँ॒ गतिशास॒नयोः॑ + बाहुलकात् करणे यत्) । मद्य पान के कारण जैसे तिरश्चीन गति (wave motion) से कभी उपर कभी नीचे (अधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त् – नासदीयसूक्त – spin up and spin down) जाते हैँ, उसी प्रकार गति करने वाले को कश्यप कहते हैँ (कश्य पानात् स कश्यपः – मार्कण्डेय पुराण 104-3) । उसप्रकार गतिमान पदार्थ यदि अभिष्टप्राप्ति को सुगम करता है (सुष्ठु राति ददात्यभिष्टमिति अर्थ में – षु॒ प्रसवैश्व॒र्ययोः॑ अथवा षु॒ञ् अभिष॒वे), तब उसे सुर (self-radiating particles or objects) कहते हैँ । कश्यप के अन्य भाग, जो उसके विपरीत पदार्थ है, उसे असुर (कश्यपः पश्यको भवति – अरुणप्रश्नः 33 – non-radiating particles or objects like black holes) कहते हैँ । सबमें प्राण सञ्चार करनेवाला सूर्य है (प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः- प्रश्नोपनिषत् – 1-8 – protons or their macro equivalents like stars and galaxies release energy that are confined by leptons or their macro equivalents of magnetic fields to sustains life forms) ।

दिव्यत्यनेनेति अर्थ में (दिवुँ क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिग॒तिषु॑), द्योतमान सुरों का व्यवहार विशेष से 33 विभाग है (त्रयस्त्रिंशद् वै सर्वे देवाः – कौषीतकिब्राह्मणम् 10-3, त्रयस्त्रिंशद्वै सर्वा देवताः- शतपथब्राह्मणम् 12-8-3-13) । यही 33 कोटी (प्रकार) के देवता है (33 types of quantum particles against 17 types of the Standard Model) । इसके विपरीत दैत्यों (असुरों) का 99 विभाग है (इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कृतः । जघान नवतिर्नव – ऋग्वेदः 1-84-13 – 99 types of anti-particles) । इन का परष्पर में अहरह आहुति होता रहता है, जिसे सर्वहुत यज्ञ कहा जाता है । उसीसे सबकुछ सृष्ट हुआ है (ऋग्वेदः 10-90-8, 9) ।

अग्नि में सोमाहुति यज्ञ (chemical reaction) है । हुत द्रव्य को अन्न कहते हैँ । उसका ब्रह्मौदन तथा प्रवर्ग्य दो विभाग है । जो यज्ञ का स्वरूप रक्षा करता है, उसे ब्रह्मौदन (literally food for retaining the central structure – like the electronic configuration that retains the form of an atom, with or without changing the atomic number) कहते हैँ । जिससे विश्वप्रजा का निर्माण होता है, उसे प्रवर्ग्य कहते हैँ (शिर उत्पिपेष । स प्रवर्ग्योऽभवत् – अरुणप्रश्नः 16) । भोजन करने के समय जो छिटक जाता है, उसे उच्छिष्ट कहते हैँ । उसीप्रकार प्रवर्ग्य को उच्छिष्ट कहते हैँ (उच्छिष्ठात् जज्ञिरे सर्वम् – अथर्ववेद – 11-9-11 – the emission that changes others to sustain the reaction) ।

यह उच्छिष्ट पशु है । पशु अन्न है । परन्तु यह साधारण अन्न जैसा नहीँ है (अहमन्नमन्नमदन्तमद्मि – ऐतरेय आरण्यक – the neutrino that strays close to a neutron turn the neutron into a proton, while itself becoming an electron) । इसी प्रक्रियाको आधुनिक विज्ञानमें β-decay कहा गया है । अत्ता (खाने वाला) और अन्न का आधार-आधेय सम्बन्ध है, जो भावसृष्टि (color charge) में परिवर्त्तन करता है । इसीलिए यहाँ एक down quark एक up quark में परिवर्त्तित हो जाता है (In modern physics language, the object that couples to the up quark via charged-current weak interaction is a superposition of down-type quarks) ।

पृथ्वी से बाहर जाती हुइ वस्तु को स्वाश्रयत्याग (विभाग) के कारण अधिक प्रयत्न करना पडता है । प्राप्ति के पश्चात् उत्पन्न अप्राप्ति का नाम विभाग है । यह अन्यतरकर्मज, उभयकर्मज अथवा विभागज हो सकता है । अन्यतरकर्मज तथा उभयकर्मज विभाग, संयोग जैसा है, जिसका चर्चा किया जा चुका है । विभागज विभाग दो प्रकार का है – केवल कारणों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला, तथा कारण एवं अकारण इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला । कार्य से सम्बन्ध अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय अपने आश्रयरूप अवयव द्रव्य में अन्य अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है (क्रियात् विभागः), उससमय विभक्त अवयवों में आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न नहीँ करती । जिस समय वही क्रिया अवयवों में आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न करती है, उससमय एक अवयव में अन्य अवयव से विभागको उत्पन्न नहीँ करती । इसके पश्चात् अवयवी द्रव्यके उत्पादक संयोगका नाश होता है (विभागात् पूर्वसंयोगः नाशः) । उसके विनष्ट हो जाने पर असमवायीकारण के अभाव से अवयवीद्रव्य रूप कार्य का नाश होता है । उस समय, विभाग के आश्रय तथा विभाग के अवधि रूप दोनों अवयवों में विद्यमान क्रिया, कार्य से संयुक्त आकाशादि देशों के साथ क्रिया से युक्त अवयवों के ही विभाग को उत्पन्न करती है (ततो उत्तरसंयोगः) । उसे इस विभाग के उत्पादन में कार्य के नाश से युक्त काल अथवा आश्रयीभूत अवयव के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है ।

निष्क्रिय अवयवों में वह क्रिया विभागों को उत्पन्न नहीँ कर सकती । कारणके नहीँ रहनेसे उत्तरदेशके साथ संयोगकी उत्पत्ति नहीँ होगी, जिससे विभाग की उत्पत्ति अनुपभोग्य (निष्प्रयोजन) हो जाएगी । अवयव की क्रिया आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न नहीँ करती, कारण उसके उत्पादन के काल ही विगत हो गया होता है । परन्तु अन्य प्रदेशों के साथ संयोग अवश्य उत्पन्न करती है । कारण संयोग को उत्पन्न करनेवाली क्रिया का काल तब तक उपस्थित रहता है, जव तक की वह संयोग को उत्पन्न न कर दे (“weak neutral current”, mediated by an uncharged partner of the W bosons, is called the Z boson. The self-interaction of one weak charged current involves leptonic and hadronic terms. The hadronic part of the current is expressed through the corresponding quark current. The “weak neutral current”, mediated by an uncharged partner of the W bosons, is called the Z boson. Neutrinos are particles that interact only via the weak interaction) ।

जो कर्म शरीर के अवयव तथा उनसे संयुक्त द्रव्यों का उपर के देश के साथ विभाग तथा निम्नप्रदेश के साथ संयोग का अन्य निरपेक्ष कारण हो, एवं गुरुत्व, प्रयत्न तथा संयोग से उत्पन्न हो, उसे अपक्षेपण कहते हैँ । वहिर्याम सम्बन्ध अपक्षेपण है । यह सम्प्रसादगति उत्पन्न करता है (it involves quarks changing into other quarks, such as in Beta-plus decay, Beta-minus decay, Electron capture and Double Beta decay) ।

स्थुल जगत में यह प्रगल्भा नायिका की क्रियाचातुरी (प्रिय के प्रति स्वागतोपचार का निर्वाह करते हुए भी उसने अपने कोप का सफल प्रकाश) के द्वारा प्रकाशित हो रहा है । कुपिता नायिका अवग्रह भूमी में दूरत्व रखते हुए भी दूर नहीँ होती – समीप ही रहती है । नायक चाटुकार वन जाता है । अथवा माता-पिता के पास सन्तान – अवग्रह भूमी में दूरत्व रखते हुए भी दूर नहीँ होते ।

अणुओं में यह अन्न सम्बन्ध व्याप्त हो कर सीमित परिधी में देवों का सम्प्रसादगति उत्पन्न करता है । अतः इसे स्वाहा कहा जाता है (स्वाहा – स्वम् अन्होति – अहँ व्या॑प्तौ – अथवा अञ्जूँ व्यक्तिम्रक्षणकान्तिग॒तिषु॑ अथवा व्यक्तिमर्षणकान्तिग॒तिषु॑) ।

(क्रमशः)