आधुनिक नव्यन्याय एक वैशेषिक विरोधी अज्ञान/चक्रान्त है ।

आधुनिक नव्यन्याय एक वैशेषिक विरोधी अज्ञान/चक्रान्त है ।

श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा

एकमेव दर्शनम् । ख्यातिरेव दर्शनम् । पञ्चशिखाचार्य ।

भारतीय आस्तिक दर्शन एक ही है । वह समस्त वस्तुओं के सम्पूर्ण ख्याति (प्रसिद्धिः, ख्या॒ प्र॒कथ॑ने) अर्थात सम्पूर्ण ज्ञान है । किसी वस्तु अथवा विषय के विशेष ज्ञान विज्ञान है । अतः विज्ञान दर्शन के एक भाग है । दर्शन फिलोसफी नहीँ है ।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ भगवद्गीता १५.१६ ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।१५.१७।।

दर्शन के तीन विभाग है । सदा क्षरणशील क्षर का भौतिक विज्ञान वैशेषिक में है । इसका प्रक्रियाभाग न्यायदर्शन है, जो सर्वमान्य है । कभी क्षरित न होनेवाला, परन्तु सदा परिवर्तित होनेवाला अक्षर का शक्तिविज्ञान सांख्य (सम्यक् ख्यानम्) में है । इसका प्रक्रियाभाग योगदर्शन है । कभी क्षरित अथवा परिवर्तित न होनेवाला अव्यय का चेतनविज्ञान उत्तरमीमांसा में है । इसका प्रक्रियाभाग पूर्वमीमांसादर्शन है ।

प्रत्येक दर्शन अपने अपने विषय में सीमित रहते हैँ । अनावश्यक कुछ भी नहीँ लिखते । इसीसे कुछ अल्पशिक्षित लोगों को भ्रान्ति होने लगा कि यह दर्शन एक अपर का विरोध करते हैँ । यह कोई नया प्रचार नहीँ है । ऋग्वेदः सूक्तं १०.७२ में कहते हैँ – देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सदजायत ॥२॥ देवताओं के पूर्वयुग में असत् से सत् जन्म हुआ । सामवेद के छान्दोग्योपनिषत् के अध्यायः ६ द्वितीयः खण्डः में कहते हैँ – कथमसतः सज्जायेतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥ असत् से सत् कैसे जन्म हो सकता है । पहले एक अद्वितीय सत् ही था । उसने इच्छाकिया कि में बहुत हो जाउँ । उसी से सबकुछ जात हुआ । यहाँ जो विरोधाभास दिखता है, वह वास्तविक में है ही नहीँ । ऋग्वेद मूर्तीविज्ञान है । मूर्ती मूर्च्छना से बनती है । उससे पहले कुछ दृश्य नहीँ था । केवल आकाश और वायु थे । अतः असत् से सत् बना ।  परन्तु सामवेद महिमाविज्ञान है । मूर्ती होगी तभी महिमा आयेगी । इसलिए सत् से सत् बना । यह विऱोध नहीँ है । ब्राह्मणग्रन्थों में दिखनेवाली विरधाभास का निराकरण पूर्वमीमांसा में किया गया है । तभी उसे मीमांसा कहते हैँ । उपनिषदों में दिखनेवाली विरधाभास का निराकरण उत्तरमीमांसा में किया गया है । तभी उसके प्रथम दो अध्यायों के नाम अविरोध और समन्वय है ।

उन अल्पशिक्षित लोगों का भ्रान्ति का निराकरण करने के लिए वाचस्पति मिश्रने सब दर्शनों का सामञ्जस्य दिखाया था । परन्तु उनके पश्चात् बहुत सारे एकदेशीय आचार्य हुए, जो किसा अंश (सीमित विषय) पर विस्तार से आलोचना किए, जिससे विकृतियाँ आ गयी ।

यह कोई नई घटना नहीँ थी । पूर्व में भी विशालाक्षकृत आन्वीक्षिकी-त्रयी-वार्त्ता-दण्डनीति सम्बलित अर्थशास्त्र को इन्द्र ने त्रयीप्रधान बाहुदन्त नामक ग्रन्थ में सङ्कलित किया । वृहष्पति ने वार्त्ताप्रधान वाहर्षत्य अर्थशास्त्रम् लिखा । शुक्रने दण्डनीतिप्रधान शुक्रनीति लिखा । तब कौटिल्य ने वृहष्पति तथा शुक्र के मत को प्रधान मान कर अपना अर्थशास्त्रम् लिखा । उसीप्रकार नन्दीकेश्वरकृत एक हजार अध्याय के आदि कामसूत्रम् को श्वेतकेतु औदालकी ने पञ्चशत अध्याय में संक्षिप्त किया । बाभ्रव्य पाञ्चाल ने उसको संक्षिप्त कर एकशत पञ्चविंशति अध्याय तथा सप्त अधिकरण में संक्षिप्त किया । उनके पश्चात् बहुत एकदेशीय आचार्य आ गए । दत्तक वैश्याधिकरण के उपर, चारायण साधारण अधिकरण के उपर, सुवर्णनाभ साम्प्रयोगिक अधिकरण के उपर, घोटकमुख कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण के उपर, गोनर्दीय भार्याधिकारिक अधिकरण के उपर, गोणिकापुत्र पारदारिक अधिकरण के उपर, तथा कुचुमार औपनिषदिक अधिकरण के उपर एकदेशीय शास्त्र लिखे । जब शास्त्र मूल रूप से लुप्त होने लगा, तब वात्सायन ने सबको संकलित कर बाभ्रव्य पाञ्चाल के शास्त्र को संक्षिप्त कर अपना कामशास्त्र रचना किया ।

परन्तु दर्शन के क्षेत्रमें कुछ और हुआ । श्रीहर्ष ने अद्वैत वेदान्त का समर्थन एवं न्याय दर्शन के कतिपय सिद्धान्तों का खण्डन कर खण्डनखण्डखाद्यम् नामक पुस्तक लिखा । गङ्गेश उपाध्याय ने खण्डनखण्डखाद्यम् के विचारों के विरोध कर तत्वचिन्तामणि नामक पुस्तक की रचना की । इसमें पुराने न्याय दर्शन को ही आगे बढ़ाया गया है । परन्तु उन्होंने इस ग्रंथ में गौतम के मात्र एक सूत्र ‘प्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दाः प्रमाणाति’ की व्याख्या की । न्याय के सम्पुर्ण १६ तत्त्वों का विचार नहीं किया । उनका नव्यन्याय ग्रन्थ चार खण्डों में विभाजित है – प्रत्यक्षखण्ड, अनुमानखण्ड, उपमानखण्ड और शब्दखण्ड । इसमें उन्होंने अवच्छेद्य-अवच्छेदक, निरूप्य-निरूपक, अनुयोगी-प्रतियोगी आदि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग कर एक नवीन लेखन शैली को जन्म दिया, जिसका अनुसरण परवर्ती दार्शनिकों ने किया । इसकी पहले टीका पक्षधर मिश्र ने की; तदनन्तर वर्धमान उपाध्याय, रुद्रदत्त, वासुदेव सार्वभौम, रघुनाथ शिरोमणि, गङ्गाधर, जगदीश, मथुरानाथ, गोकुलनाथ, भवानन्द, शशधर, शितिकण्ठ, हरिदास, प्रगल्भ, विश्वनाथ, विष्णुपति, रघुदेव, प्रकाशधर, चन्द्रनारायण, महेश्वर, गदाधर भट्ट, हनुमान, अन्नंभट्ट आदि इस मत को आगे बढाया ।

तब साधारण लोगों को भ्रमित करने तथा वैशेषिकशास्त्र, जिससे चुराकर न्युटन से आरम्भ कर अन्य अंग्रेजों ने भी अपने नाम से लिखा है, तथा जो आधुनिक विज्ञान के दोष का निराकरण कर उसे शुद्ध करने की क्षमता रखता है, ऐसे शास्त्र – को पढने से हमारे लोगों को विमुख करने के लिए, अंग्रेजों ने कुछ मीर जाफर (सिराजुद्दौला के मुख्य सेनापति) अथवा राम मोहन राय तैयार किया । वह लोग अपने को कणाद से भी बडा कह कर तथा वैशेषिक के मूल विषय को छोडकर एक सरल नव्यन्याय बनाया, जिसका प्रचार आज भी हो रहा है । भारतीय ज्ञान के अधिकांश अध्यापक नव्यन्याय पढकर भ्रमित हैँ तथा सबको भ्रमित कर रहे हैँ । इसे प्रमाणित कर रहा हुँ ।

पदार्थ क्या है ?

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥
अर्थप्रवृत्तितत्त्वानां शब्दा एव निबन्धनम् ।
तत्त्वावबोधः शब्दानां नास्ति व्याकरणादृते ॥ वाक्यपदीयम् ॥

ब्रह्म के दो विवर्त्त है – शब्दब्रह्म तथा परम्ब्रह्म । अतात्त्विक अन्यथाभाव को विवर्त्त कहते हैँ । परम्ब्रह्म ही अर्थ के रूप में विवर्त्तित हो कर जगत् के समस्त प्रक्रिया को जन्म देते हैँ । शब्दब्रह्म उस को निर्देशित करते हैँ । अर्थ का प्रवृत्ति योग्य शब्द (पद) के द्वारा तत्त्वों का विवक्षा है – वस्तु का भाव-अभाव निरुपण करना नहीँ । उसी से  तत्त्वावबोध होता है । शब्दस्य तत्त्वमवैकल्यम् – शब्द का अविकृत अर्थ व्याकरण से जाना जाता है ।

पतञ्जलि ने महाभाष्य में लिखा है –

अथ गौरित्यत्र कः शब्दः ? किं यत्तत्सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाण्यर्थरूपं स शब्दः ? नेत्याह। द्रव्यं नाम तत् ।।
यत्तर्हि तदिङ्गितं चेष्टितं निमिषितमिति, स शब्दः? नेत्याह। क्रिया नाम सा ।।
यत्तर्हि तच्छुक्लो नीलः कपिलः कपोत इति स शब्दः? नेत्याह। गुणो नाम सः ।।
यत्तर्हि तद्भिन्नेष्वभिन्नं छिन्नेष्वच्छिन्नं सामान्यभूतं स शब्दः? नेत्याह। आकृतिर्नाम सा ।।
कस्तर्हि शब्दः? येनोच्चारितेन सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाणिनां सम्प्रत्ययो भवति स शब्दः ।।
अथ वा प्रतीतपदार्थको लोके ध्वनिः शब्द इत्युच्यते। तद्यथा- शब्दं कुरु, मा शब्दं कार्षीः, शब्दकारी अयं माणवक इति ध्वनिं कुर्वन्नेवमुच्यते। तस्माद् ध्वनिः शब्दः ।।

येनोच्चारितेन (पद) सम्प्रत्ययो भवति (अर्थ – भावकर्म्मादौ ययायथम् अच् । अभिधेये । शब्दशक्त्या वोध्येपदार्थे च । स च अर्थस्त्रिविधः वाच्यो लक्ष्योव्यङ्ग्यश्चेति भेदात् ।) स शब्दः । अर्थात् मनस्थ भाव (भावयति ज्ञापयति हृदयगतम् भू + णिच् + अच् । भू सत्ता॑याम्, भू प्राप्तौ, मिश्री॒कर॑ण॒ इत्येके॑) उच्चारण (पद) द्वारा प्रकाश करने पर जिस कर्म (कृत अथवा सृष्ट वस्तु) से उसका साम्य प्रतीति होता है (अर्थ – अभिधेय – शब्दशक्त्या वोध्यपदार्थ च), वही पद का वही अर्थ (पदार्थ) होता है ।

अभाव पदार्थ नहीँ हो सकता ।

कणाद के मत में पदार्थ छह प्रकार के हैँ – द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय ।
धर्मविशेष प्रसूतात् द्रव्यगुणकर्मसामान्य विशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् । वैशेषिक-१,१.४ ।
द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां षण्णां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यतत्वज्ञानं निःश्रेयसहेतुः । प्रशस्तपादभाष्यम् ।

परन्तु नव्यन्याय अधिक पदार्थ कहते हैँ । उनका सप्तम पदार्थ अभाव है ।

“न वयं षट्पदार्थवादिनः” इस सांख्यसूत्र को दिखाकर कुछ लोग पदार्थ नहीँ है – यह भूल अर्थ करते हैँ । सांख्य अक्षरविज्ञान है । उसका अन्तिम तत्त्व महाभूत पर्यन्त है । षट्पदार्थ स्थूल भूतों के सम्बन्ध में है, जो वैशेषिक का विषय है । अतः इसमें वैशेषिक का षट्पदार्थ का निषेध नहीँ है ।

अभाव न भावः ।  भावभिन्नत्वमभावत्वमिति ।  घटकर्तृकसत्ताप्रतियोगिकोऽभाव । सामान्यतः किसी काल में अथवा किसी स्थान पर किसी वस्तु का न होना वहाँ उसका अभाव कहा जाता है । उदाहरण के लिए प्रकाश का अभाव ही अंधकार है । अन्नंभट्ट आदि के मत से –अभावः प्रतियोगिज्ञानाधीनविषयत्वम् । अर्थात जिसका ज्ञान उसके प्रतियोगी पदार्थ के ज्ञान पर जो आधारित हो, उसे अभाव कहा जाता है । अन्धकार का ज्ञान उसके प्रतियोगी आलोक के उपर आधारित है । यह मत भ्रामक है ।

अभाव के चार भेद कहे गए हैँ – 
1. प्रागभावः – अनादिसाऽन्तः प्रागभावः। उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य प्राग् अर्थात पूर्ववर्त्ती अभावः । वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व उस वस्तु का अभाव होने को  अर्थात उत्पत्ति के पूर्व (जिसका उपस्थिति हुआ ही नहीं) जो वस्तु का अभाव है, परन्तु उसका अन्त (अभाव) होना निश्चित है, ऐसे अभाव को प्रागभाव कहते हैं । घट आदि कार्य की प्रागभाव अपने प्रतियोगी कार्य के समवायि कारण के रूप में रहता है । प्रागभाव कारण रूप से अनादि नहीँ है, कारण उसका समवायीकारण उत्पत्ति से पूर्व तथा विनाश के पश्चात् विद्यमान है (नाशः कारणे लयः) । यह केवल कार्य रूप से अनादि है । यहाँ घटका देशिक-कालिक अभाव है – सार्वत्रिक सर्वकालिक अभाव नहीँ है । अतः यहाँ अभाव देशकाल निबन्धन है – तत्त्व रूप से नहीँ ।

2. प्रध्वंसाऽभावः -.सादिरन्तः प्रध्वंसः, उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य नाशः । जिसका आदि (जन्म) तो है परन्तु उसी रूप से उसका अन्त भी है – उसके स्थान पर नूतन निर्माण हो सकता है, परन्तु वही पुरातन वस्तु मिल नहीँ सकता – वह अभाव प्रध्वंसाभाव है । अर्थात जिसकी उत्पत्ति है पर जो नष्ट होने पर नहीँ मिलता, वह प्रध्वंसाऽभाव है । जैसे एक घट टुटने पर वही घट दोवारा नहीँ मिलता । यहाँ घटका देशिक-कालिक अभाव है । अतः यहाँ भी अभाव देशकाल निबन्धन है – तत्त्व रूप से नहीँ ।

3. अन्योन्याऽभावः – तादात्म्य सम्बन्धाभावः अन्योन्याऽभावः – तादात्म्य संबन्ध से युक्त प्रतियोगिता वाले अभाव को अन्योन्याऽभाव कहते हैं । अर्थात एक वस्तु का अन्य वस्तु में अभाव होना अथवा जब एक वस्तु का उपस्थिति में दूसरी वस्तु का न पाया जाना अन्योन्याऽभाव है । जैसे घट, पट नहीं है (पट में घट नहीं है) । अर्थात घट का तादात्म्य घट में ही है पट में नहीं है । जहाँ आलोक है, वहाँ अन्धकार का अभाव है । परन्तु भिन्न रूप से किसीका अभाव नहीँ है । यहाँ भी अभाव देशकाल निबन्धन है – तत्त्व रूप से नहीँ है ।

4.. अत्यन्ताऽभावः – तादात्म्येतर सम्बन्धाभावः अत्यन्ताऽभावः – त्रैकालिक अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों काल में होने वाले तथा संसर्ग – संबन्ध से युक्त प्रतियोगिता जिसमें है, उस अभाव को अत्यन्ताभाव कहा गया है । अर्थात जिस में सम्बन्ध का अभाव सर्वदा हो । जैसे – आकाश कुसुम । शशशृङ्गधनुर्धरः । वन्ध्यासुतः । बन्ध्यासुतादीनां बाह्यार्थशून्यत्वेऽपि बुद्विपरिकल्पितं –  वन्ध्यासुतशब्दवाच्यार्थमादायार्थवत्वात्प्रातिपदिकत्वम् । वन्ध्या नारी भी है । सुत भी है । परन्तु उनका सहावस्थान नहीँ है । यहाँ अधिकरण स्वरूप दो वस्तुओं का अपने स्वरूप में अभाव नहीँ है । केवल उनका एक ही देशकालमें एकत्र सहावस्थान सम्बन्ध का ही अभाव है ।

कुछ लोग प्रभाकर के मत का उद्धरण कर अनुपलब्धि को अभाव कहते हैँ । अनुपलब्धि रूपादि भावों का इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का अभाव है । यदि अन्धे को रूप का अनुपलब्धि है, यह उस बस्तुका अभाव नहीँ दर्शाता । रूप का अनुपलब्धि होते हुए भी अन्धा उस वस्तु का उपभोग कर सकता है । उसमें अभाव नहीँ है ।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसङ्‍ग्रह: ॥ भगवद्गीता १८.१८ ॥

किसी भी कर्म के लिए ज्ञान, ज्ञेय, परिज्ञाता तीनों आवश्यक है । यदि ज्ञेय का अभाव होगा, तो किसका ज्ञान होगा । अर्थात् अभाव का ज्ञान नहीँ हो सकता । तो अभाव पद का अर्थ अज्ञात है । ऐसे में अभाव पदार्थ हो नहीँ सकता ।