कर्म हि जगत् के प्रतिष्ठा का कारण है (न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् – गीता 3-5) । सततचलन रूपी कर्म के कारण इसे जगत् कहा जाता है (गच्छतीति जगत्) । अपेक्षाबुद्धि (इच्छित फल लाभ करने की आशा) से जो कर्म किया जाता है, उसमें प्रतियत्न रूपी संस्कार (inertia) का उदय होता है । उपेक्षाबुद्धि से जो कर्म किया जाता है, उसमें संस्कार (inertia) उत्पन्न नहीं होता । संस्कारजात कर्मों का दो भेद है – प्रक्रम तथा अभिक्रम । क्रत्वर्थकर्म (किसी विशेष आवश्यकता के पूर्त्ति के लिये किया गया प्रारम्भिक कर्मसमूह) प्रक्रम है । पुरुषार्थ कर्म (अन्तिम फल लाभ के लिये किया गया सम्मिलित कर्म) अभिक्रम है । अनेक प्रक्रम (यथा भोजन वनाने के लिये अनाज, सब्जि, तेल, जल, हाण्डी, चुल्हा, इन्धन आदि इकट्ठा करना) से एक अभिक्रम (रन्धन क्रिया) होता है । अनेक अभिक्रम (भोजन क्रिया, शयन क्रिया, अध्ययन क्रिया, अर्थोपार्जन क्रिया, आदि) से एक कर्मव्युह (यथा जन्म-मृत्यु चक्र) होता है ।
कर्मव्युह से छन्दित जीवों को परवश हो कर (एकमूल से अनेकरूप में विकशित होने के कारण) अपने लव्ध गुण के अनुसार कार्य करते रहने से (कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः – गीता 3-5) साधारण आश्वत्थिकजीव कहते हैं । अन्य मुक्तजीवों को (जो कर्मव्युह से छन्दित नहीँ है) आधिकारिक आश्वत्थिकजीव कहते हैं । आधिकारिक आश्वत्थिकजीवों का ब्राह्मआश्वत्थिक तथा नियतकर्मआश्वत्थिक दो भेद है । ब्राह्मआश्वत्थिक जीव जड है, जैसे सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, पृथिवी, आदि । सृष्टिकार्य के प्रतिष्ठा हेतु (इन से ही सृष्टि सम्भव होने से, यह ब्रह्मपदवाच्य है (ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा) । नियतकर्मआश्वत्थिक जीव चेतन होते हैं, जैसे ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्र, वरुण, कुवेर, आदि । इनका नित्य तथा नैमित्तिक दो भेद है । नित्य आधिकारिक नियतकर्म आश्वत्थिकजीव ही प्रयोजन विशेषे नैमित्तिक रूप में अवतरित होते हैं । यह नैमित्तिक अवतार, प्रयोजन विशेषे पूर्ण-अंश-आवेश-विशेष-अविशेष आदि होते हैं ।
प्राकृतिक नियम से प्रज्ञापराध से जव मनुष्यसमाज में अस्वाभाविक परिवर्तन होता है, तव प्रकृति क्षुब्ध हो जाता है (condition of maximum entropy) । उसी क्षोभ के आघात से तत्सम्बन्धीय नित्य एवं व्यापक चिदात्मा का एक अंश क्षुब्ध वातावरण को शान्तकरने के लिये प्रवर्ग्य रूप से (टुट कर अलग हो कर – अग्नि का विस्फुलिङ्ग जैसा) अधिकृत होकर जीव रूप से अवतरण करता है । उसी आधिकारीक जीव को अवतार कहते हैं । प्रकृति देवसंघभेद से विभक्त है । जिस विषय में क्षोभ होता है, तत्प्रधान अवतार होता हैं । प्राकृतिक नियमसंघ ही जगत् को धारण करने से प्राकृतिक सनातन धर्म है । मानवकृत नीति-नियम विकृत जीवनादर्श (religion) है । धर्मविप्लव (जब धर्म का धारकशक्ति क्षीण हो कर अनस्था – विप्लवते – जलपर्योवस्थितः – हो जाता है, धर्म का ग्लानि – बलदीनता – आ जाता है) तथा अधर्म का अभ्युत्थान हीं अवतार का कारण है । अतः प्रत्येक चतुर्युगी में दश अवतार प्रकट नहीं होते । आवश्यकता के अनुसार रुप परिग्रह करते हैं । योगवाशिष्ठ के काकभुषण्ड उपाख्यान में इसका विशेष विवरण है ।
जिस धर्मविप्लव से रक्षा के लिये अवतार होते हैं, उस उद्देश्य के चरितार्थ होने के पश्चात् अवतारपुरुष लीलासम्बरण करते हैं । विकारः प्रकृतेर्जातः पुनस्तत्रैव लीयते – समस्त विकार प्रकृति से जन्म ले कर पुन- उसीमें लयप्राप्त होते हैं । अवतार जात एवं लयशील होने से वैकारिक हैं । अतः अविकारी ब्रह्म का अवतार नहीं हो सकता । सर्वपूर्णता हेतु से ब्रह्म के सम्बन्ध में प्रवर्ग्य (विच्छिन्न अंश) अथवा अव (स्वस्थान से भिन्न प्रदेश में जाना) शव्द का व्यवहार नहीं हो सकता (प्रवर्ग्य, अव, अंश आदि का स्वतन्त्र भिन्न अवस्थान होता है, जो सर्वव्यापी के क्षेत्र में सम्भव नहीं है) । अतः ब्रह्म का षोलहकला विशिष्ट पूर्णावतार सम्भव नहीं है । अष्टकला से ऊर्द्ध्व सम्बलित जीव देवयोनि होते हैं । अवतार नवम से चतुर्दश कला सम्बलित जीव होते हैं । द्वादश से ऊर्द्ध्व कला सम्बलित जीव को पूर्णावतार कहते हैं ।
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