चित्रसूत्रम् – श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा

चित्रसूत्रम्

अपां यो अग्रे प्रतिमा बभूव प्रभूः सर्वस्मै पृथिवीव देवी ।
पिता वत्सानां पतिरध्न्यानां साहस्र पोषे अपि नः कृणोतु ॥ अथर्व वेदः 9-4-2 ॥
ब्रह्मा से उपदिष्ट राजा नग्नजित् चित्र का आदिस्रष्टा है । नारायण ने उर्वशी का प्रथम चित्र बनाया था ।

प्रजापालक राजा के राज्य में एक ब्राह्मणकुमार का सर्पदंशन से अकालमृत्यु हो गया । ब्राह्मणने अपने पुत्र का मृतशरीर के साथ राजा के पास पहुँचकर इस अकालमृत्यु के विषयमें न्याय की भिक्षा की । तब राजा ने यमराज को आदेश दिया कि बालक को पुनर्जिवीत कर दे । यमराजने कहा यह असम्भव है, कारण यह सृष्टि के विधान का प्रतिकूल है । तो राजा ने यमलोक जा कर यम से युद्ध करने का निश्चय किया । यमराज के प्रेत सैनिकों से राजा का भीषण संग्राम हुआ । बहुत संख्यामें प्रेत सैनिक मारे जा रहे देखकर यमराजने ब्रह्माजी के शरणमें गये । तब ब्रह्माजीने राजा को युद्धविराम का आदेश दिया । राजा प्रणिपातपूर्वक कहा कि उन्होने ब्राह्मण के दुःख दूर करने का प्रण लिया हुआ है । तब ब्रह्माजीने राजा को चित्र का उपदेश किया । राजा ने ब्राह्मणकुमार का चित्र बना कर ब्राह्मणको समझाया कि मृत व्यक्ति पुनः जीवित नहीं होते । अतः यही चित्र को देख कर मन को प्रवोध दें । उस चित्र को देखकर ब्राह्मण का दुःख लाघव हुआ । प्रेत नग्नहोते हैं । उनको जितने के कारण ब्रह्माजीने राजा का नाम नग्नजित रखा । तभी से चित्र का प्रचलन हुआ । उसी दिन से ब्रह्माजी के वर से मन्दिरों में विद्युतघात से वचानेवाले वज्रवारकाः मूर्तियाँ (electric earthing) नग्न रहने लगे ताकि नग्नजित् का नाम अमर रहे । आधुनिक विज्ञान का चार्ज (electromagnetic charge) को वैदिक विज्ञानमें लिङ्ग कहते हैं । यह सदा युक्त रहते हैं । अकेले (bare charge or bare mass) नहीं रहते । अतः मन्दिरों में मिथुन रूपसे पाये जाते हैं ।

ब्रह्मा के द्वारा उपदिष्ट चित्रसूत्र के षडङ्ग थे –
रूपभेदः प्रमाणानि भावः लावण्ययोजनम् ।
सादृश्यं वर्णिकाभङ्ग इति चित्रं षडङ्गकम् ॥

रूपभेदः –
रुपँऽ वि॒मोह॑ने अथवा आकुलीकरणे अर्थमें रूप धातु से अथवा रु॒ङ् गतिरोष॒णयोः॑ अर्थमें रु धातु से रूप शब्द निष्पन्न हुआ है । चक्षुग्राह्य नीलपीतादि में “यह रूप है” – इस अनुवृत्ति प्रत्ययमें जिस असाधारण रूपत्व जाति का ज्ञान होता है, उस प्रत्यय को रूप कहते हैं । जन्य द्रव्यों में उनके अवयवों में रहनेवाले रूप से यह उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश से इसका विनाश होता है । अतः स्वरूपनिर्णय में अवयवसंस्थान का भेद महत्वपूर्ण है । रूप के प्रत्यय के प्रभाव से मन में विमोहन, आकुलीकरण, चलन (कीर्तन), रोष (रौतीति वा) आदि भाव जात होते हैं ।

अङ्गान्यभूषितान्येव वलयादिविभूषणैः ।
येन भूषितवद्भाति तद्रूपमिति कथ्यते ॥

अलङ्कृत शरीरमें अलङाकारके व्यतिरिक्त जो आभा दिखता है, वह रूप है । यह षोडशविध है । यथा – ह्रस्वम्, दीर्घम्, स्थूलम्, चतुरस्रम्, वृत्तम्, शुक्लम्, कृष्णम्, नीलारुणम्, रक्तम्, पीतम्, कठिनम्, चिक्कणम्, श्लक्ष्णम् (मनोहरम्, अल्पम्), पिच्छिलम् (भक्तमण्डयुक्तम् – रसैला), मृदु, दारुणम् (भय का हेतु) । अवयवों में रहनेवाले इन लक्षणों के भेद से रूपभेद हो जाता है – एक रूप के स्थानपर अन्यरूप आ जाता है । अतः चित्रकर को रूपभेद तथा उसके प्रभाव का ज्ञान होना चाहिए ।

रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय ।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥ ऋग्वेदः¬ 6-47-18 ॥
[वह गुण जिसके कारण किसी आकृति में सौंदर्य अभिव्यक्त होती है उस गुणविशेष को रूप समझा जाता है। रूप को किसी परिधि में नहीं बंधा जा सकता है। वह अनंत होता है। उसे सिर्फ दो माध्यमों, आँख और आत्मा के द्वारा पहचाना जाता है। किसी वस्तु के रंग और आकार को आँखों के द्वारा पहचानते हैं जबकि उसके अंदर निहित गुणों को हम चिंतन-मनन कर आत्मा के द्वारा अनुभव करते हैं। रूप से पहला परिचय आँखों का ही होता है। आत्मिक अनुभूति उसके बाद होती है। किसी भी कलाकृति के बाहरी गुण-दोषों की समीक्षा आँखों से होती है लेकिन उसके आंतरिक गुण-दोषों की समीक्षा आत्मा द्वारा ही संभव होता है।

किसी भी कलाकृति का परीक्षण चाहे बाहरी हो या आंतरिक, हमारे अंदर अभिरूचि का होना बेहद जरूरी है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो उसमें निहित अभिरूचि हमारे अंदर की अभिरूचि से मिलकर ही उसके रूप की सुंदरता या असुंदरता का ज्ञान करवाने में समर्थ होता है। वास्तव में अभिरूचि हमारे मन की चिरंतन दीप्ति होती है जिसके द्वारा ही हम रूप को ‘सु’ और ‘कू’ में बाँटकर देख पाते हैं। इसलिए प्रत्येक वस्तु को अपनी अभिरूचि से देखना और उस वस्तु में अंतर्निहित सौन्दर्य-रूचि को अपने मन में बैठना ‘रूप’ का वास्तविक बोध है।

किसी भी कलाकृति की रूप-रेखा जितनी सुंदर होगी वह कलाकृति उतनी ही उत्कृष्ट होगी। किसी भी कृति के रूप में वह गुण होना चाहिए जिससे भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले मनुष्यों का समान रूप से मनोविनोद हो सके। ऐसा तभी संभव है जब रूप-भेदों की बारीकियों का सम्यक ज्ञान हो। रूप-भेदों की बारीकियों से अनिभिज्ञ होकर कलाकृति की वास्तविकता को नहीं आँका जा सकता है।]

प्रमाणानि –
यहाँ प्रमाण शब्द परिमाण के अर्थमें व्यवहार किया गया है । मान (तौल, नाप) के व्यवहार का असाधारण कारण ही परिमाण है (परिमीयते अनेन)। यह अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व भेद से चतुष्प्रकार होता है । जिसप्रकार ज्ञान अपने ज्ञेय अर्थ का साधक है, उसीप्रकार परिमाण प्रत्यक्ष तथा अनुमान प्रमाण द्वारा कार्यलिङ्ग के मान का साधक है । इस विषयपर एक लोकश्रुति है ।

एक राजाने मन्त्रीको कहा मुझे संसारका सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी नारी का चित्र चाहिए । मन्त्रीने विचार किया कवि ही रसग्राहकशिरोमणि होते हैं । अतः कवियों को निर्देशदिया कि स्त्रीका प्रत्येक अङ्गका भिन्न भिन्न रूपसे श्रेष्ठ उपमा लिखकर दें । तत्पश्चात् श्रेष्ठ चित्रकारों को आदेश दिया कि उन उपमाओं के आधारपर एक चित्र बनाएँ । जब चित्र प्रस्तुत होगया तो राजा को चित्र अनावरण करनेका सन्देश दियागया । राजा चित्र को अनावरण करते ही चित्कार करने लगे । एक राक्षसी का चित्र उनके सम्मुख था । अङ्गसन्निवेशक्रम का उल्लङ्घन उसका कारण था । अङ्गसन्निवेश का उत्तम क्रम (proportionate-ness) – सामान्यतोऽप्रत्यङ्गप्रमाणम् ।

देहः स्वैरङ्गुलैरेषु यथावदनुकीर्त्तितः ।
युक्तप्रमाणेनानेन पुमान् वा यदि वाऽङ्गना ॥

चित्र के अङ्गुलि प्रमाण में पुरुषाकृति का उच्चता 120 अङ्गुल तथा स्त्री की उच्चता 108 अङ्गुल श्रेष्ठतम है । अपनी अङ्गुलि से पद का अङ्गुष्ठ एवं प्रदेशिनी दो अङ्गुल लम्बी हो । मध्यमा, अनामिका एवं कनिष्ठिका क्रमशः प्रदेशिनी से 1/5 भाग छोटी होती जाय । प्रपद और पादतल में से प्रत्येक 4 अङ्गुल लम्बा और 5 अङ्गुल चौडा हो । एडी 5 अङ्गुल लम्बी और 4 अङ्गुल चौडी हो । 14 अङ्गुल लम्बा पैर हो । पैर, गुल्फ, जङ्घा, जानु में से प्रत्येक के मध्यभाग का घेरा 14 अङ्गुल हो । जङ्घा 18 अङ्गुल लम्बी हो । जानु के उपर (ऊरु) 32 अङ्गुल लम्बा हो । इसप्रकार पददेश 50 अङ्गुल लम्बा हो । जङ्घा के आयाम के समान ऊरु हो । दोनों अण्डकोषों के मध्य की दूरी अधोहन्वस्थि (दाढी), उपरी और निचले दन्तपङ्क्ति, नासापुट, कर्णमूल और आँखों की सीमा के मध्यभाग 2 अङ्गुल हो । लिङ्ग, मुख की लम्बाई, नासिका, कान, ललाट, ग्रीवा की उँचाई एवं दोनों दृष्टियों के मध्य की दूरी 4 अङ्गुल हो । भग का विस्तार, लिङ्ग और नाभि, नाभि और हृदय, हृदय और ग्रीवा और दोनों स्तनों के मध्य का अन्तर, मुख की लम्बाई, मणिबन्ध और प्रकोष्ठ की मोटाई 12 अङ्गुल हो ।

इन्द्रवस्ति का घेरा, कन्धा की लम्बाई, और कूर्पर (केहुनी) की गोलाई, मणिबन्ध और कूर्पर का अन्तर 16 अङ्गुल हो । हाथ 24 अङ्गुल हो । दोनों भुजाएँ तथा ऊरु की गोलाई 32 अङ्गुल हो । हाथ के तलवे 10 अङ्गुल हो । अङ्गुष्ठमूल और प्रदेशिनीमूल का अन्तर, कर्ण और अपाङ्ग (आँख की कोर) का अन्तर, मध्यमा अङ्गुली की लम्बाई 5 अङ्गुल हो । प्रदेशिनी और अनामिका 4 ½ अङ्गुल लम्बी हो । कनिष्ठा और अङ्गुष्ठ 3 ½ अङ्गुल लम्बे हों । मुख और ग्रीवा का घेरा 24 अङ्गुल हो । ½ अङ्गुल चौडी नासापुट की सीमा हो । नेत्र की लम्बाई का ½ तारा का घेरा हो । तारक का नवाँ अंश दृष्टि हो । केशान्त और मस्तक का 11 अङ्गुल हो । कान और अवटु (ग्रीवा पश्चाद्भाग) का अन्तर 14 अङ्गुल हो । पुरुष की उर (छाती) के समान स्त्री की श्रोणी (कटी) की चौडाई 18 अङ्गुल हो । उतना ही विस्तृत पुरुष का कटी भी हो । अन्य धातु-मूल-जीव के विषयमें भी अवयवसन्निवेश क्रम उसीप्रकार करना चाहिए ।

[साधारण अर्थों में प्रमाण, मान, सीमा, वस्तु की विवरणात्मक स्थिति को समझा जाता है । चित्रकला में भी प्रमाण से चित्र की विवरणात्मक स्थिति का ही भान होता है। उचित प्रमाण होने से ही चित्र द्वारा मूल वस्तु की यथार्थता का ज्ञान होता है । चित्र द्वारा यथार्थबोध हो इसके लिए चित्रकार में उचित प्रमाण-शक्ति होना आवश्यक है। वास्तव में उचित प्रमाण के द्वारा चित्रकार मूल वस्तु और चित्र का अनुपात, जिस आधार पर चित्र बनाता है, उसके सापेक्ष स्थिर करता है। उचित प्रमाण के आभाव में चित्र सौंदर्यहीन हो जाता है । आँखों के सामने फैले विशाल दृश्य को एक कागज पर चित्र रूप में समेट देना और उस चित्र द्वारा उस विशाल दृश्य का भान प्रमाण के द्वारा ही संभव होता है। किसी कागज को सिर्फ नीले रंग से रंगकर उसके द्वारा समुद्र का आभास करवा देना कतई संभव नहीं हो सकता है। कागज पर समुद्र तभी प्रतीत होगा जब नीला रंग ऐसा हो जो समुद्र की धीर गंभीरता को दिखाने में सक्षम हो और आकाश की नीलिमा से भिन्न हो; रेखाओं के द्वारा उचित आकार प्रदान किया गया हो। यह सब प्रमाण के द्वारा ही संभव हो पाता है। प्रमाण के द्वारा ही हम विभिन्न वस्तुओं जीव-जंतुओं, स्त्री-पुरुषों, देवता-दानव आदि के भेदोपभेद को समझ पाते हैं। प्रमाण कलाकार के अन्तःकरण का ऐसा मानदंड होता है जिसके द्वारा वह सीमित और अनंत दोनों प्रकार के वस्तुओं को माप सकता है।]

भावः –
रूपस्य भावो मुख्यम् । रूपात् क्रमेण प्रतिमायास्तत्त्वबोधो जायते । तत्त्वबोधात् धारणेति । धारणाया गाथा । गाथानुप्रासे लक्षणं व्यक्तं भवति । कथा प्रसरति लोके ।

रूप का भाव ही मुख्य है । रूप से ही चित्र का तत्त्ववोध होता है । तत्त्ववोध से धारणा । धारणा से गाथा । गाथा अनुप्रास से लक्षण व्यक्त होता है । उससे संसार में कथा का प्रचलन होता है । ।

निर्विकारात्मके चित्ते भावः प्रथमविक्रिया ॥
चित्तस्याविकृतिः सत्त्वं विकृतेः कारणे सति ।
तत्राद्या विक्रिया भावो बीजस्यादिविकारवत् ॥

निर्विकार चित्तमें भाव ही प्रथम विशिष्ट क्रिया सृष्टि करता है । उससे अविकृत चित्त में विकार सृष्टि होता है, जैसे बीजारोपण से प्रथम अङ्कुर जात हो कर पश्चात् महावृक्षमें परिणत होता है ।

मनुष्याणां वृत्तिर्मुख्येति । वृत्तेर्निष्कल-सकल-भावा उपजायन्त इति मार्गः क्रियायाः परिणाम इति । तदर्थं शिल्पज्ञानाद्रूपं ध्यायन्ति । सङ्कल्पाद् विकल्पः । विकल्पभावात् श्रद्धाः । श्रद्धायाः सत्ताभावः । सत्ताभावाद् भावयजनं प्रसरति । तद्भावेन रूपं रूपं प्रतिरूपाणि जायन्ते । लक्षणाद्रूपम् । रूपाद् भावः ।

चित्रमें भाव का इतना महत्त्व क्यों है । कारण मनुष्यों में वृत्ति ही मुख्य है । क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र, समाधि भेद से चित्तमें एक के पश्चात् अन्य वृत्ति उठते रहते हैं । वस्तु की ज्ञान से ही उसकी प्राप्ति की इच्छा होती है । इच्छा के कारण हम इच्छित वस्तु की प्राप्ति का प्रयत्न करते हैं । चित्र के ज्ञान से रूप का ज्ञान होता है । उसके विषयमें चिन्ता करने से अन्य वैकल्पिक भाव मन में उठते हैं । उससे श्रद्धा तथा उससे उस विषयक सत्ताभाव मनमें उदित होता है । तब उस भाव के प्रति हमारा आकर्षण वढ जाता है । भाव ही शरीर, इंद्रिय और मन के धर्मों में विकार उत्पन्न करता है । निर्विकार चित्त में भाव विभिन्न प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करता है । भाव अनुभव का विषय है । रूप प्रत्यक्ष भाव है । उससे हम अपने अनुभव से एक से अनेक अप्रत्क्ष रूप कल्पना करते हैं । उन विविध रूपों के विषयमें कल्पना करते हुए हमें विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव का आभास होता है । भावना संस्कार और स्मृति के समन्वय से भाव का संबंध अनेक विभावों से होता है । चञ्चल मन को वश करने के लिए, यदि उसमें अनुभाव और व्यभिचारी भाव मिलजाए, तो वह मन को आकर्षित करता है ।

आकारैरिङ्गितैः गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्र वक्त्र विकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥

भाव एक मानसिक प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति शारीरिक धर्मों द्वारा लक्षित होती है । मन में जिस भाव का उत्पन्न होता है शरीर में उसी के अनुकूल लक्षण प्रकट होने लगते हैं । न केवल मनुष्य का शरीर परन्तु संसार का कोई भी व्यापार भाव निरपेक्ष नहीं होता है । उन अप्रत्यक्ष भावों को हम साकार – प्रत्यक्ष करने का प्रयास करते हैं । भाव से आरम्भ – भाव से अन्त होने से एकरूपवृत्ति सम्पन्न चित्र हमें आकर्षित करता है । अतः रूप का भाव ही मुख्य है ।

चित्रके द्वारा सांसारिक घटना ही दिखाई देती है । उससे कल्पना युक्त हो कर विचित्र भावों का सृष्टि होता है । इसलिए चित्र-रचना में भावाभिव्यंजना को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है । भिन्न-भिन्न भावों की अभिव्यंजना से कलाकृति में भिन्न-भिन्न विकारों का समावेश होता है । चित्र में भाव, आकृति की भंगिमा और व्यंगात्मक प्रक्रिया से व्यक्त होता है । यह प्रत्यक्ष अथवा प्रच्छन्न हो सकता है । प्रत्यक्ष आलम्बन विभावरूप है – वह जो हम आँखों से देख पाते हैं । प्रच्छन्न अप्रत्यक्ष भावरूप होता है और उसका अनुभव उद्दीपन विभाव से व्यंजना के द्वारा होता है । प्रत्यक्ष रूप के द्वारा अप्रत्यक्ष भावों को दर्शाना कलाकार की निपुणता का परिचायक होता है । उसीके वैशिष्ट्य से ही कलाकार का निपुणता का परिचय मिलता है । उदाहरण के लिए राधाकृष्ण के चित्र में एक स्त्री-पुरुष का युगलमूर्ती दिखाइ देती है, जो प्रेमरस का आलम्बन है । परन्तु उस चित्र को देखने के पश्चात यदि मन में उनका रूपसौष्ठव से अधिक सात्त्विक प्रेमरस जागरित होता है, तो उस अभिव्यंजना युक्त चित्र ही कलाकार की निपुणता का परिचायक होता है ।

लावण्ययोजनम् –
मुक्ताफलेषु छायायास्तरलत्वमिवान्तरा ।
प्रतिभाति यदङ्गेषु लावण्यं तदिहोच्यते ॥
छायायाः कान्तेस्तरलत्वं तरङ्गायमानत्वम् । यथा तथा यदन्तरा मध्ये एवाङ्गेषु प्रतिभाति प्रतिमानं भवेदित्यर्थः ।

रूप की संगति, परिमिति और नयनाभिरामता ही लावण्य पदवाच्य हैं । भाव अन्तर्निहित सौन्दर्य का बोधक है । लावण्य बाह्यसौन्दर्य को अभिव्यंजित करता है । चित्र में बाह्य अलङ्कृति, कान्ति और छाया का समावेश लावण्ययोजन के द्वारा ही सम्भव हो सकता है । लावण्ययोजन ही निर्जीव प्रतिकृति में सजीवता ला सकती है । लावण्य ही भावों का पोषण और सम्बर्द्धन कर उसकी सौंदर्यानुभूति में बृद्धि करता है । समुचित रूप, प्रमाण तथा भावों के रहते भी लावण्यहीनता के कारण चित्रों में सौन्दर्य एवं सौम्यता का समावेश नहीं हो पाता -जैसे विना लवण के व्यञ्जन नीरस होता है । लावण्ययोजन भी सन्तुलित होनी चाहिए । लावण्य की कमी अथवा आतिशय्य चित्रका सौन्दर्यको नष्ट कर देता है ।

उदाहरण के लिए एक मुक्ता और एक समपरिमाण लोहे का गोला लिजिए । आकार में साम्यता रहते हुए भी नयनाभिरामता का दोनों में अन्तर है । चित्रकार दोनों को समानरूप से अङ्कन करता है । परन्तु गोलक का जो अङ्गसौष्ठव मुक्ता के उज्ज्वलता में परिभाषित होता है, वह लोहे में नहीं होता । एक ही गोलक को लावण्ययुक्त मुक्ता में परिवर्तन करना ही लावण्ययोजन है ।

चित्रसूत्रम् –भाग 3

सादृश्यम् ।
सदृशः समान इव दृश्यतेऽसौ । सादृश्यम् सदृश होने का भाव – समानता – एकरूपता – तुलना – समान धर्म – प्रतिमूर्ति – प्रतिबिम्ब ।

आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः ।
आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥

तस्य आकृतिः महती, धीरपि महती, विद्यापि महती, क्रियापि महती, कार्यसिद्धिरपि महती, एव सर्वप्रकारेण तस्मिन् भूपतौ महत्त्वं स्थितम्। सर्वमाहात्म्यसागर इति भावः ॥ सुन्दरमुख के समान (सुन्दर अथवा प्रखर) बुद्धि वाला, बुद्धि के समान शास्त्र का (कठिन) अभ्यास करने वाला, शास्त्र अभ्यास के समान (निपुण) प्रयोग करने वाला, आरम्भ (प्रयत्न) की समान उदय (कार्यसिद्धि) वाला ॥

सादृश्य अथवा अनुरूपता एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है जिसमें एक विषय के ज्ञान अथवा सूचना को दूसरे विषय में स्थानान्तरित किया जाता है । प्रतिकृति का जिस गुण के कारण मूल वस्तु के साथ उसकी समानता स्थापित होती है तथा सम आकारयुक्त पदार्थ से उसका वैलक्षण प्रतीत होता है, उसे सादृश्य कहते हैं । इसका उद्देश्य भिन्न वस्तुओं का रूपसाम्य तथा उनमें अन्तर्निहित भावों के सम्बन्धों का विश्लेषण कर परीक्षण करना होता है । सङ्केतों के प्रयोग द्वारा किसी मूल वस्तु के बाह्य वर्ण-आकार की तुलना से उसके स्वभाव अथवा धर्म को अन्य रूप की सहायता से स्थापित किया जाना ही चित्र में सादृश्य है ।

कमले कमलोत्पत्तिः श्रूयते न तु दृश्यते ।
बाले! तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम् ॥
कमला (लक्ष्मी) का कमल (पद्म) से जन्म (अथवा पुष्पसे पुष्पका जन्म) सुना तो था, परन्तु कभी देखा नहीं था । हे प्रिये ! तुम्हारे मुखकमल में (कमल जैसे मुखमें) यह दो इन्दीवर (नीलकमल जैसे आँखें अथवा blue lily like eyes) कैसे उत्पन्न हुए दिखाइ देरहे हैं ।

सादृश्य से सादृश्यानुमान होता है । इस प्रकार अनुपातो की समानता अथवा समानुपात ही सादृश्य है । अतः समानता अथवा सादृश्य के आधार पर अनुमान की प्रक्रिया सादृश्यानुमान अथवा साम्यानुमान कहलाती है । इस प्रकार सादृश्यानुमान एक सम्भाव्य अनुमान है जिसमे दो तथ्यो घटनाओ अथवा क्रियाओ में गुणों की समानता के आधार पर एक संभावित निष्कर्ष निकाला जा सकता है । उदाहरण के लिए पृथ्वी और मङ्गल ग्रह के कुछ विशेष समानताके आधारपर मङ्गलको भूमिपुत्र कहाजाता है तथा अनुमान लगायाजाता है कि सम्भवतः मङ्गलपर जीवन होगा । उसीप्रकार प्रिया का मुख और चन्द्र, पद्म, आदि के सादृश्य कहा जाता है ।

वास्तविक कृति वाच्य होने केलिए चित्रमें मूलवस्तु के गुण-दोषों का समावेश करना पडता है । अन्यथा वह हमारे मनमें मूलवस्तु से संबन्धित भावोंको उत्तपन्न करनेमें सक्षम नहीं होगी । उदाहरण केलिए कृष्ण का छबि हमारे मनमें श्यामवर्ण, त्रिभङ्ग, मयुरपक्ष, तथा वंशीवादन आदिके साथ जुडाहुआ है । यदि चित्रमें कृष्णको शिव जैसे जटा-जूट अथवा राम जैसे धनुषवाण के साथ दिखाया जायेगा, तो वह चित्र जनमानसमें कृष्णका चित्र माना नहीं जायेगा । यदि सादृश्यकी योजना होगी तभी चित्र ग्रहणीय माना जाएगा । यह स्थूल सादृश्य है । सूक्ष्म सादृश्य आकृतिपरक न होकर प्रकृति, स्वभाव अथवा धर्मकी समानता दिखाता है । वास्तविक हो अथवा कल्पनाप्रसूत, चित्र यदि ग्रहणसुलभ होती है तो वह शुद्ध माना जाता है । शुद्ध चित्र ही उत्तम चित्र होता है । सादृश्ययोजन ही चित्रको शुद्ध बनाता है ।

वर्णिकाभङ्ग ।
वर्णिकाभङ्ग चित्रकला का षडङ्गों में से अन्तिम अङ्ग है । चित्र में विभिन्न वर्णों के संयोग से उनसे भिन्न जो अपरूप भङ्गिमा उत्पन्न होती है उसी को वर्णिकाभङ्ग कहते हैं । यह चित्रको वर्णयोजनासे अलङ्कृत करता है । अलङ्करोति इति अलङ्कारः । अलँ भूषणपर्याप्तिवा॒रणेषु॑ अर्थमें जिस वस्तु तथा क्रिया के द्वारा कोइ वस्तु विभुषित होती है, उसे अलङ्कार कहते हैं । वर्णिकाभङ्ग के विचार से चित्र में कहाँ किस वर्ण की योजना की जानी चाहिए उसका निर्णय होता है । किस वर्ण के समीप कौन सा वर्ण होने पर चित्र मनोहारी दिखता है, तथा कौन सा वर्ण किस वर्ण के समीप रहने से दृष्टिकटु होता है, उसका निर्णय ही वर्णिकाभङ्ग है ।

चित्र में उचित वर्णों की योजना से विश्वसनीयता तो आती ही है साथ-ही-साथ एक दूसरे से उनकी समीपता और दूरी उसमें विशिष्ट प्रभाव भी उत्तपन्न करते हैं। इसका कारण यह है कि विभिन्न वर्ण हमारे विभिन्न मनःस्थितियों से जुड़े होते हैं। इसलिए अगर चित्र में वर्णों का उचित संयोजन नहीं हो पाता है तो अन्य अंगो की सम्यक योजना भी निष्फल हो जाती है।

वर्णिकाभंग चित्रकर्म साधना का चरम बिन्दु होता है इसलिए इसे षडगों में अंतिम अंग कहा जाता है। अन्य अंगों की अपेक्षा इसकी साधना समय एवं श्रमसाध्य होती है। इसके लिए लंबे समय तक हाथ में तूलिका लेकर अभ्यास करना होता है। साथ ही वर्णों का ज्ञान भी अपेक्षित होता है।
चित्रकला में प्रमुख वर्ण पाँच माने जाते हैं: उजाला, पीला, लाल, काला और नीला । इन्हीं प्रमुख वर्णों के संयोग से सैंकड़ों उपवर्ण बनाए जाते हैं। किसी भी चित्र में इन्हीं वर्ण-उपवर्णों में से उत्तम वर्णों का चुनाव किया जाता है और हाथ के गंभीर कौशल से उसे संयोजित किया जाता है।
वर्णिकाभंग भंग के लिए लघुता और क्षिप्रता के साथ-साथ हस्तलाघव की भी आवश्यकता होती है। चित्रों में अति सूक्ष्म कार्य जैसे- मांसल सौंदर्य को उभारना, फूलों के सौन्दर्य के साथ उसके सौरभ का आभास करवाना, दिन के विभिन्न प्रहारों में सूर्य के उत्ताप को दिखाना आदि इसी के द्वारा संभव होता है। वर्णिकाभंग में हस्तकौशल की थोड़ी भी विकृति चित्र के सौंदर्य और प्रभाव को नष्ट कर सकता है। इसलिए चित्रकला में वर्णिकाभंग की साधना अतिआवश्यक और कठिनतर मानी जाती है।]