कुछ मित्रों का प्रश्न है कि क्या वेद में भी अवतार का वर्णन अथवा प्रतिषेध है । इस प्रसङ्गमें यजुर्वेद 34-53 (अजः एकपात्) तथा यजुर्वेद 40-8 (स पर्य्यगाच्छुक्रमकायम्) मन्त्रों का उद्धरण किया जाता है । अब हम इन दो उद्धरणों का अनुशीलन करेंगे । वेद पूर्ण एवं सर्वस्वतन्त्र होने से, उसमें इन समस्त अर्थों का समाहार रूप दिखता है । आंशिक अर्थ करने से भ्रान्ति अवश्यम्भावी है ।
यजुर्वेद 34-53 मन्त्र का ऋषि ऋजिष्वं, लिङ्गोक्ता देवता, भुरिक् पङ्क्ति छन्द है । अथवा त्रिष्टुप् छन्द है, जो मन्त्रके द्वितीयार्द्ध में दिखता है । इसका रक्षाकर्म में विनियोग होता है । मन्त्र का पदपाठ है – “उत । नः । अहिः । बुध्न्यः । शृणोतु । अजः । एकपादित्येकऽपात् । पृथिवी । समुद्रः । विश्वे । देवाः । ऋतावृद्धः । ऋतवृद्धऽइत्युतऽवृद्धः । हुवानाः । स्तुताः । मन्त्राः । कविशस्ताऽइति कविऽशस्ताः । अवन्तु ।“ इसका साधारणतया अर्थ किया जाता है – अन्तरिक्षमें होनेवाला मेघ के तुल्य, अथवा पृथिवी तथा समुद्र के तुल्य, एक प्रकार के निश्चल अव्यभिचारी वोध वाला, जो कभी उत्पन्न नहीं होता, वह हमारे वचन को सुने तथा ऋत को वढानेवाले स्पर्धा करते हुये विश्वेदेवा, जो सर्वज्ञ, सर्वत्रगति, सर्ववर्णनकर्ता (कवि), एवं कल्याणकारी (शस्ताः) हैं, वे स्तुति के प्रकाशक (स्तुताः), विचार के साधक (मन्त्राः) हमारी रक्षा करे । यहाँ स्तुति का अर्थ “स्तुतिस्तु नाम्ना रूपेण कर्मणा बान्धवेन च” (बृहद्देवता) है – स्तुति वह है जिससे विभागपूर्वक नाम, वर्णनीय इन्द्रियग्राह्य रूप, सामर्थ्यप्रकाशक कार्य (भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः – गीता 8-3), तथा सम्पर्कसूत्रयुक्त बन्धु का उल्लेख किया जाता है । अतः यहाँ आक्षरिक अर्थ से परे उनका गुण-कर्म का समीक्षा करना चाहिये । तभी मन्त्र अर्थपूर्ण तथा फलप्रसू होगा ।
यहाँ “अजः एकपात्” शब्द का अर्थ एकादश रुद्रों में से रूद्रविशेष अथवा प्राणविशेष अर्थमें किया गया है । “न जायते सः” अर्थमें अजः का अर्थ अजन्मा है । जो अजन्मा है, उसका अवतरण नहीं हो सकता । “एकः पादो यस्य सः अर्थमें एकपात्” का अर्थ विश्व है (पादोऽस्य विश्वाभूतानि) । विश्व का भी अवतरण नहीं हो सकता । कारण “चरणसंचारयोग्य” भूमि का लक्षण है । बुध्न्यः शब्द वृक्षमूल तथा अग्रभाग – दोनों अर्थमें व्यवहार होता है, जैसे कि अथर्ववेद 2-14-4 में मिलता है । अहि शब्द आहन्तीति अर्थमें वृत्रासुर, सर्प, सूर्य, आदि के लिये व्यवहार होता है । अतः अहिबुध्न्य शव्द का अर्थ संलग्न तथा भेदनशील होता है । जो अजन्मा है, उसका संलग्न तथा भेदनशील होना सम्भव नहीं है । इसीलिये केवल “अजः एकपात्” शव्द को ले कर यह मन्त्र का अर्थ करना भ्रमात्मक होगा ।
अजैकपात् तथा अहिर्बुध्न्य एकादश रुद्रों में से दो का नाम है । मन्त्र का त्रिष्टुप छन्द तथा लिङ्गोक्ता देवता भी इसी दिशा को निर्देश कर रहे हैं । जहाँ अथर्वशिरोपनिषत् में कहागया है कि “एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्मै”, वहीँ, यजुर्वेद रुद्राध्याय में कहा गया है कि “सहस्राणि सहस्रसो ये रुद्रा अधि भूम्याम्”, तथा “नमो रुद्रेभ्यो ये पृथीव्यां येऽन्तरिक्षे ये दिवि .…” आदि । यह विरोधाभास नहीं है, परन्तु एक ही रुद्र का समष्टि तथा व्यष्टि भेद से वर्णन है । बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है “ते यदाऽस्माच्छरीरानमर्त्यादुत्क्रामयन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति” । उनका अवान्तर विभाग ही उस “एको रुद्रो” ( निराकार रुद्रतत्त्व) का (साकार रूप से) सृजन (सृ॒जँ॒ विस॒र्गे – प्रकट) अथवा प्रकटीकरण (अवतरण) है । इसीलिये यहाँ अवतार का निषेध नहीं – वर्णन है ।
यजुर्वेद 40-8 का विश्लेषण किया जाता है । यह मन्त्र है –
“स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात्शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।”
इसका साधारणतया अर्थ किया जाता है – “कार्यरहित, व्रणरहित, स्नायुरहित, अतएव अकाय-अव्रण-अस्नाविर नाम से प्रसिद्ध, अतएव शुद्ध, पाप्मा से अविद्ध शुक्र के चारों और वह व्याप्त हो गया – शुक्र को चारों और से घेर लिया । इसप्रकार कवि-मनीषी-परिभू-स्वयम्भू इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध उस तत्त्व ने शुक्र के द्वारा यथा तथा रूप से सदा के लिये पदार्थों का निर्माण करदिया ।“ सर्वप्रथम वह तत्त्व शुक्र को वेष्टित करता है, एवं वेष्टित शुक्र से विश्व का निर्माण करता है । यह मन्त्र में आत्मा का स्वरूप निरूपण हुआ है । आत्मा परितः – व्याप्त – आकाशवत् सर्वव्यापी है । वह शुद्ध शुक्र रूप है । ज्योतिष्मान है । दीप्ति (प्रकाश) स्वरूप है । अकाय (अशरीरी) है – लिङ्गशरीर से वर्जित है । अक्षत है । शिराशून्य होने से अस्नाविर है । अव्रण तथा अस्नाविर – इन दो शव्दों से स्थूल शरीर का निषेध किया गया है । धर्माधर्मादि पापों से विवर्जित होता हुआ वह अपापविद्ध है । यहाँ स पर्य्यगात् इत्यादि रूप पुंस्त्वभाव से उपक्रम कर कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः इत्यादि रूप से पुंस्त्वभाव पर हि उपसंहार करने से इस वाक्य की पुंस्त्वप्रधानता सिद्ध हो जाती है । प्रसव ही पुंस्त्व का लक्षण होने से यह मन्त्र विश्वनिर्माण प्रक्रिया को इङ्गित करता है ।
इस मन्त्र के पूर्व “अनेजदेक” मन्त्र से श्रुति ने यज्जु (यत् + जु) रूपी द्विब्रह्म में मातरिश्वा द्वारा सुब्रह्म अथवा गोपथ ब्राह्ण वर्णित स्वेदब्रह्म (आप-वायु-सोम-अग्नि-यम-आदित्य रूपी षड्ब्रह्म) का आधान करने का प्रक्रिया बतलाया था (इसको जानने के लिये कामप्र, दर्श, पूर्णमास, प्रतिपत्, अनुचर आदि को समझना पडेगा) । उसी मातरिश्वा को लक्ष्य में रखकर यहाँ शुक्र का निरूपण किया गया है । उस मातरिश्वा ने आप को उस अनेजदेजत् तत्त्व में आहुति दी । इस से शुक्र का स्वरूप निष्पन्न हुआ । उस शुक्र के चारों ओर वह मातरिश्वा व्याप्त हो गया । इस प्रकार वह मातरिश्वा, जो कि तत्तद्विशेषधर्मों के कारण कवि-मनीषी-परिभू-स्वयम्भू इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध है, उस अकाय-अव्रण-अस्नाविर, शुद्ध, अपापविद्ध शुक्र के चारों ओर व्याप्त हो कर सृष्टिनिर्माण में समर्थ हुआ, जो सृष्टिप्रवाह सदा के लिये एक सा चला आ रहा है । मुण्डकोपनिषद 3-2-1 में भी यही प्रतिपादन किया गया है ।
सृष्टि के लिये रेत-योनि-रेतोधा तीन तत्त्व अपेक्षित है । इनमें योनि में रेत का आधान करनेवाला रेतोधा कहलाता है । प्रजापति के पास केवल अपने आपको (ब्रह्माग्निरूप यजुर्ब्रह्म को) छोडकर अन्यवस्तु का अभाव है । इस अभाव के पूर्ति के लिये वह अपने को द्विधाकृत करता है (प्रजापति अकामयत) । एक भाग से वह ब्रह्म (यजुर्ब्रह्म) बन कर सबका प्रतिष्ठा वनता है (ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा) । अन्य भाग सुब्रह्म अथवा स्वेदब्रह्म (आप) बनता है । यजुः अग्नि है – योनि है । आप सोम है – रेत है । मातरिश्वा रेतोधा है ।
पृथिवी को माता कहाजाता है । पृथिवी पिण्ड का उपलक्षण है । पिण्ड आग्नेय है । इसीलिये अणु से लेकर नीहारिका पर्यन्त सवके भीतर अग्नि है । इनका चित्य-चितेनिधेय दो भेद है । चित्य आभ्यन्तर मूल पिण्ड (s-orbital of nucleus, also the quarks) है । चितेनिधेय वाह्य महिमामण्डल (intra-nucleic field, also gluons) है । आङ्गीरस यम वायु (fermions that follow exclusion principle) सृष्टि का निवर्त्तक – विच्छेदक है (यमो वै अवसानस्येष्टे – शतपथब्राह्मणम् – 7-1-1-3) । भार्गव शिववायु (leptons and bosons) सृष्टिका प्रवर्त्तक है । गोपथब्राह्मणम् में इसका प्राण, पवमान, मातरिश्वा, सविता – यह चार अवस्था (four quantum numbers) कहागया है । इनमें से प्राण, पवमान, सविता (p, d, f, orbitals) – यह महिमामण्डल (intra-nucleic field) से सम्बन्धित है । इनका विकास चित्य पिण्ड के उपर निर्भर करता है । मातरिश्वा (s-orbital) इनको रूप देता है । पिण्ड निर्माण करना तथा निर्मित पिण्ड को स्व स्वरूप में प्रतिष्ठित करना, यह दो कार्य (two spin functions – the first function has two spin states), मातरिश्वा वायु के है । आग्नेय वायु के प्रवेश से आपोमय समुद्र (quark-gluon plasma) में घनता आ जाती है । इसे ही अपांशर (super-fluid) कहाजाता है । इसी के लिये अद्भ्यः पृथिवी कहा जाता है ।