वेद में अवतार २ – मत्स्य अवतार

नासदीयसूक्त (ऋग्वेद 10-129) के अनुसार सृष्टि से पूर्व सवकुछ अवात अर्थात् प्राणशून्य (अतः क्रियाशून्य) था । उस समय नार (न+अर) सर्वत्र व्याप्त था । निषेधात्मक अ अक्षर के साथ गत्यात्मक र अक्षर युक्त होनेसे अर शव्द का अर्थ गतिराहित्य है । न अक्षर के द्वारा उसका पुनः निषेध करने से नार शव्द का असामान्य अर्थ गति तथा आगति – इन दोनों का राहित्य अर्थात केवल अन्तर्गति है । बाहर से गतिशून्य अथच भीतर से सदा गमनशील होने से इसे जगत् कहते हैं (गच्छतीति – ग॒मॢँऽ गतौ॑) । उस जगत को परिव्याप्त कर के शयन (बहिरिन्द्रिय संयमन) करनेवाला तत्व को विष्णु कहा जाता है (वि॒षॢँ॑ व्या॑प्तौ) । नार उनका अयन (सीमित संयमन स्थान) होने से उनको नारायण कहा जाता है । गतिशून्यता के कारण उष्मता का सर्वथा अभाव होने से उस का वहिर्मण्डल को आपः (आपॢँ लम्भ॑ने – लभन्ति पुनरुत्थानमिति) कहते हैं । शीतलता आपः का लक्षण है । इसीलिये कहा जाता कि जगत् प्रलयजल में मग्न था । अथर्ववेद 4-2-8 तथा गोपथब्राह्मणम् पूर्वभाग 1 प्रपाठक 39 कण्डिका के अनुसार उस तत्त्व को पुरुष कहा जाता है (आपो गर्भं जनयन्तीरित्यपाङ्गर्भः पुरुषः) ।

जब यह आप्य परमाणु (gluons) एवं पार्थिव परमाणु (quarks), उस आपोमय समुद्र (quark-gluon plasma) में ऋतरूप (भातिसिद्ध-अहृदय-अशरीरी – non-physical, non-centralized, not-confined) से इतस्ततः व्याप्त रहते हैं । जब वह किसी बिन्दु (प्रतिष्ठा – center of mass) पर एकत्र होकर शक्तिसाम्य (equilibrium) अवस्था में आ जाते हैं, तब स्थितियुक्त हर्ष का अनुभव करते हैं । इसीलिये इस अवस्था को मत्स्य (माद्यन्तिलोका अनेनेति – मद् + ऋतन्यञ्जीति इति स्यन् – मदँ॒ तृप्तियो॒गे, मदीँ हर्षे॑) कहते हैं । यह प्रजापति का प्रथम मत्स्य अवतार है ।

बहिस्थ इन्द्रियार्थ के साथ अन्तःस्थ मन तथा आत्मा के सन्निकर्ष से वेदनीय ज्ञान उत्पन्न होता है । सृष्टि के आरम्भमें वहिरिन्द्रिय का संयमन होना वाह्यज्ञान का अभाव को दर्शाता है । इसी अवस्था को वेद का आपः (जल का सम्यक उद्रेकस्थान होने से समुद्र) में लुप्त हो जाना कहते हैं । इसका कारण शङ्खासुर है । शमँ॒ऽ आ॒लोच॑ने (अथवा शमो दर्श॑ने [मित्]) धातु से जात कोषस्थ अर्थात् अन्तःस्थ अवस्था को शङ्ख कहते हैं । कहागया है –

कम्बुशङ्खनखाश्चापि शुक्तिशम्वुककर्कटाः । जीवा एवंविधाश्चान्ये कोषस्थाः परिकीर्त्तिताः ।

स्वीकृति अर्थमें सु पूर्वक रा॒ दा॒ने धातु से सुर शब्द निष्पन्न हुआ जो सृष्टि का सहकारीत्व दर्शाता है । तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषा मधः स्वीदासी३दुपरि स्वीदासी३त् (नासदीयसूक्त) के कारण सृष्टिप्रव्रतक रश्मियाँ तरङ्गायित गति करते हैं । उसका निषेध करने से असुर शब्द सुराशक्ति विहीन – अतएव अतरङ्गायित (अतः असुर) होने से सृष्टि का असहकारीत्व प्रदर्शन करता है । इस कारण से उस कोष को शङ्खासुर कहा जाता है । इसी को तैत्तिरीयारण्यकम्प्रथम प्रश्न में “असुरान् परिवृश्चति” (परि सर्वतोभावः, वृशँ वर॑णे) कहागया है । उसी में आगे चल कर कहा गया है – पृथ्विव्यगंशुमती । तामनवस्थितः सम्वत्सरो दिवं च । … अन्योन्यस्मै द्रुह्यताम् । यो द्रुह्यति । भ्रश्यते स्वर्गल्लोकात् । (द्रुह् । द्रुः॒अँ जिघां॒साया॑म्)

शतपथब्राह्मणम् 6-1-1-2 में कहागया है कि – स योऽयं मध्ये प्राणः एष एवेन्द्रः । किसी पिण्ड के मध्यस्थ प्राण, जो सबको सञ्चालित करता है (बलस्य निखिलाकृति – बृहद्देवता), उसे इन्द्र कहते हैं । उस आपोमय समुद्र में जब यह इन्द्र सृष्टिकामना से गति करता है, उसे द्रप्स्यः (घनेतरदधि – वया दइ, निरुक्त में इसे शुक्र कहा गया है) कहते हैं (इन्द्राय सर्वान्कामानभिवहन्ति । स द्रप्सः । तैत्तिरीयारण्यकम् – प्रथम प्रश्न) । अन्तरिक्षमें जब यह इन्द्र आपोमय समुद्र को चलायमान करता है, तब उस गतिद्वारा घर्षण से जात अग्नि को पवमान कहते हैं (पार्थिव अग्नि पावक, आन्तरिक्ष्य अग्नि पवमान, द्वौ लोकाग्नि शूचि – निरुक्त) । इसीको मातरिश्वा कहते हैं (मातरि अन्तरिक्षे श्वयति बर्धते इति) । (At that time, leptons and fermions whizzed through space which such high speeds, that electromagnetic attraction was not strong enough to bind them together. The, space was filled with a hot plasma that gave off thermal radiation. During that time, the universe was opaque to photons. Photons would bump into electron-sea frequently. The scattering of photons results in a mostly non-transparent universe.)

गोपथब्राह्मणम् पूर्वभाग 1 प्रपाठक 2 कण्डिका के अनुसार आगति रूपी (confining) विष्णु ने श्रम किया, तप किया (श्रमुँ तप॑सि), सन्तप्त हुआ (श्रमुँ खे॒दे च॑, खि॒दँ परिघा॒ते)। Confinement leads to generation of opposite pressure (तप), which continues inside the confinement leading to increase in temperature. उससे उस आपोमय समुद्र (quark-gluon plasma) में स्वेद (ष्वि॒दाँ गात्रप्रक्षर॒णे, ञिष्विदाँ॒ स्नेहनमोच॒नयोः॑) धारा (different strands) बहने लगा । उससे 15 प्रकार के अविद्या (कर्म) बल कोष (माया, जाया, धारा, आपः, हृदय, भूति, यज्ञ, सूत्र, सत्य, यक्ष, अभ्व, मोह, वय, वयोनाध, वयुन) तथा 16 वाँ विद्या – यह 16 कला उत्पन्न हुये । यह बलकोष अखण्ड संसार को सखण्ड तथा खण्डाखण्ड कर के गतिशील करने के पश्चात् असुरत्व का नाश हो कर तरङ्गायित गति सृष्टि करने से आलोचन का विकाश हुआ (रजसा उद्घाटितम् – दर्शन के लिये रूपवत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्व तथा महत्त्व अपेक्षित होते हैं) । इसे हि विष्णु के द्वारा शङ्खासुर का वध (ह॒नँ हिंसाग॒त्योः) कहा गया है ।

सृष्टि संसृष्टि है – अर्थात दो वस्तुओँ के संयोग के उपर निर्भर करती है । यह संयोग को यज्ञ कहते हैं (य॒जँ॑ सङ्गतिकरणे) । इसीलिये उसके अनुकुल स्थान (अधिष्ठान) को प्रयाग कहा गया है । गोपथब्राह्मणम् पूर्वभाग 1 प्रपाठक 39 कण्डिका के अनुसार आपः का दो पूरकभाव (complement) भृगु तथा अङ्गिरा से सृष्टि का विकाश हुआ । समष्टि भृगु के व्यष्टि 3 भाग आप-वायु-सोम (three leptons) है तथा समष्टि अङ्गिरा के व्यष्टि 3 भाग अग्नि-यम-आदित्य है (three positively charged quarks – up, charm and top. According to modern science, they have fractional charge of +2/3, while down, strange, and bottom quarks all have a charge of -1/3. According to Vedic science, these are +7/11 and -4/11 respectively, which can be scientifically verified to be more accurate) । इनके कार्य-कारण सम्बन्ध (causality) 13 प्रकार के हैं (हेतुर्निमित्तं प्रकृतिश्च योनिं प्रारव्धमूलै प्रभवोद्भवौ तथा । विवर्त्तसंचारीरसप्रवाहिकप्रकृत्यपूर्वं समवायिका मताः) । इन्हि सम्बन्धों से सृष्टि का समस्त उपादान (building blocks of nature) का निर्माण होता है । आपः का एक अर्थ जल होनेसे 3 नदीयोंके सङ्गमको प्रयाग कहाजाता है । यही प्रयाग में विष्णुके द्वारा शङ्खासुरके वध का रहस्य है ।