शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-1 में कहा गया है – “कूर्ममुपदधाति । रसो वै कूर्मः । रसमेवैतदुपदधाति । यो वै स एषां लोकानामप्सु प्रविद्धानां पराङ्रसोऽत्यक्षरत् स एष कूर्मः । तमेवैतदुपदधाति । यावानु वै रसः तावानात्मा । स एष इम एव लोकाः ।“ विश्व में परिव्याप्त रसः (quark-gluon plasma) ही विश्व का मूल प्रतिष्ठा है (यावानु वै रसः तावानात्मा) । एषां पृथिव्यादीनां लोकानाम् (quark) अप्सु (gluon) प्रविद्धानां मग्नानां (plasma) सः रसः अत्यक्षरत् अस्रवत् । “कुत्सितः ईषद् वा ऊर्मी वेगो अस्य” अथवा “के जले ऊर्मीयस्येति वा” अर्थमें इस धनीभूत – इसीलिये पूर्वापेक्षा स्वल्पगतियुक्त तत्त्व को कूर्म कहते हैं (This is opposite of inflation. Modern science believes that after the big bang, there was a period of rapid acceleration. Vedic science says, after the initial expansion through the static background was brought to zero due to bow-shock effect (धर्मचक्र के नेमी निषीर्ण होने से जिसे नैमिषारण्य नाम से जाना जाता है – समुह को ग्राम तथा एकक को अरण्य कहते हैं । वह अपने स्वरूप में एक होने से उसे अरण्य कहते हैं), the back reaction started to and fro slowing down with time. This implies, the velocity of light is decreasing with time.)। उस पार्थिव एवं आप्य (जलीय) परमाणुओं का सम्मिस्रण से जो तत्त्व का उत्पन्न हुआ (quark-gluon plasma), उसी से हि विश्व का सृजन हुआ । दुः॒अँ॑ प्र॒पूर॑णे इति दुह् धातु से दुह्यतेऽस्मेति अर्थ में विश्व को पूरण करनेवाला उस मूल तत्त्व को दूध कहा जा सकता है । दूध का स्वगुण परिवर्तन हो कर घनीभूत हो जाना ही दधि है । दधातीति दधि । इसीलिये उस मिश्रित घनीभूत रस को दधि कहा जाता है ।
वह रस क्या था ? दधिरूप रस का यह आवर्तन किसी अधिष्ठान का अपेक्षा रखता है । उसका अधिष्ठान क्या था ? शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-3 में कहा गया है – “दधि हैवास्यलोकस्य रुपम्, धृतमन्तरिक्षस्य मध्वमुष्य । स्वेनैवैनमेतद्रूपेण समर्धयति । अथो दधि हैवास्यलोकस्य रसः, धृतमन्तरिक्षस्य मध्वमुष्य । स्वेनैवैनमेतद्रसेन समर्धयति ।“पार्थिव परमाणुओं का चयन (एक ही बिन्दु पर बार बार संघात) आपोमय समुद्र को घनीभूत करता है । इससे अन्ततोगत्वा द्यौ लोक का रस मधु (not honey – मन्यन्ते – विशेषेण जानन्ति जना यस्मिन्) का निर्माण होता है (पवमानः सन्तनिः प्रघ्नतामिव मधुमान् द्रप्स्यः परिवारमर्षति – ऋग्वेद 9-69-2)। उसीमें सदा घूर्णनशील सम्वत्सर तथा द्यौः लोक (radiating discs and galactic clouds) का निर्माण हुआ (तामन्ववस्थितः संवत्सरो दिवं च – तैत्तिरीयारण्यकम् – प्रथम प्रश्न) ।
दधि का आवर्त होनेसे धृत निकलता है (आवर्तमिन्द्रः शच्या धमन्तम् – तैत्तिरीयारण्यकम् – प्रथम प्रश्न), जो आग्नेय होता है (अवद्रप्सो अगंशुमतीमतिष्ठत् – तत्रैव) । यह अग्निषोमात्मक मण्डल (electromagnetic field) का निर्माण करता है । वह मिथुन का उत्पादन करता है । इसीसे वस्तुमें परिच्छिन्नता रूपी परिमाण आने से वस्तुओं का विभिन्न स्वरूप का अवबोधन होता है (प्रजायते)। इसीलिये इसे मधु (मानँ॒ स्त॒म्भे, मनुँ॒ अव॒बोध॑ने, म॒नँ॒ ज्ञाने॑) तथा शची (शचँ॒ व्य॑क्तायां वा॒चि) भी कहते हैं । स्वरूप अवबोधन अस्तित्व के साथ साथ ज्ञेयत्व तथा अभिधेयत्व का अपेक्षा रखता है । शब्द का चुम्बकीयशक्ति के साथ सम्बन्ध विज्ञान प्रतिपादित है । इसीलिये कहागया है “वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वा पशवो मनुष्याः। वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी” (तैत्तिरीयब्राह्मणम् २/८/८/४)। इन्द्रद्वारा व्यक्तवाक् का निर्माणहोनेसे वाक् को इन्द्रपत्नी कहागया । गन्धर्वः सोमरक्षकः रश्मीनां धारकः ।
शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-5 में कहा गया है – “स यत् कूर्मो नाम । एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा ऽअसृजत । यदसृजत अकरोत् तत् । यदकरोत् तस्मात्कूर्मः । कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्य इति ।” घनीभूत उस मूल तत्त्व पूर्वापेक्षा स्वल्पगतियुक्त हो कर कूर्म नाम से सृष्टि का आरम्भ किया । उसका वह मूल रूप कश्यप था । कशँ॒ गतिशास॒नयोः॑ अर्थमें कश् धातु से पा॒ पाने॑ अथवा पा॒ रक्ष॑णे योग से कश्यप शब्द निष्पन्न होता है, जो नीहारिकाकेन्द्र (Galactic center) का द्योतक है । इसीलिये शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-6 में कहा गया है – “स यः स कूर्म्मोऽसौ सऽआदित्यः । अमुमेवैतदादित्यमुपदधाति । तं पुरस्तात्प्रत्यञ्चमुपदधात्यमुं तदादित्यं पुरस्तात्प्रत्यञ्चं दधाति । तस्मादसावादित्यः (आदित्यः आददानां यान्ति । दो॒ अव॒खण्ड॑ने । तन्निषेधः ।) । आगे चलकर श्रुति विश्वप्रक्रिया का वर्णन करती है, जो यहाँ विचार नहीं किया जा रहा है ।
नीहारिकायें (Galaxies) एक जैसी नहीं होती । इन का 7 अवान्तर विभाग होते हैं (seven different types of galaxies, such as) – आरोगो भ्राजः पटरः पतङ्गः । स्वर्णरो ज्योतिषीमान् विभासः । ते अस्मै सर्वे दिवमातपन्ति (तैत्तिरीयारण्यकम् – प्रथम प्रश्न) । परन्तु इनसे अलग अष्टम ही कश्यप है (कश्यपोऽष्टमः । तत्रैव) । कश्यप ही आरोगादि सप्त का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण है (ते अस्मै सर्वे कश्यपाज्ज्योतिर्लभन्ते । तत्रैव) । कश्यप से ही सव सृष्टि कर्म होता है (यत्ते शिल्पंकश्यप रोचनावत् । तत्रैव) । उसी से ही इन्द्र (मूलप्राण) का अनुमापक (गत्यात्मक) चतुष्टयात्मिका पुष्टि (four quantum numbers) का सृजन होता है (इन्द्रियावत्पुष्कलं चित्रभानु । तत्रैव । इन्द्रियम् इन्द्रस्य आत्मनोलिङ्गम् – अनुमापकम् । पुष्कलम् – पुष्यति चतुष्टयात्मक पुष्टिं गच्छत्यनेनेति । पुष्कलं हन्तकारन्तु तच्चतुर्गुणमुच्यते – कौर्मे) । इनका उपादानभेद से सप्तविभाग (seven types of galaxies) हो जाता है (यस्मिन्त्सूर्या अर्पितास्सप्त साकम् । तत्रैव । उपादानविकल्पाश्च लिङ्गानां सप्त वर्णिताः) ।
कश्यप ही विश्व का मूल केन्द्र है । उसका गति सर्वतो गति है । विश्व में गति (relative motion between inertial frames of reference) 3 प्रकार का है । अवयवगति, अवयवीगति, उभयगति ।
- कुलालचक्र का गति अवयवगति है । चक्र के अङ्ग अङ्ग (अवयव) घुम रहे हैं । परन्तु चक्र (अवयवी) स्वयं (सूर्य) अवयव के अपेक्षा से एक ही स्थान पर स्थित है (जैसे कि सूर्य के अपेक्षा में सौरमण्डल) ।
- किसी यान का गति अवयवीगति है । यान के अङ्ग अङ्ग (अवयव) यान के अपेक्षा से स्थिर है, परन्तु यान गतिशील है (जैसे कि आकाशगङ्गा के अपेक्षा में सूर्य तथा सौरमण्डल) ।
- किसी यान पर वैठ कर मनुष्य का जाना उभयगति है । कारण केवल चेतन मनुष्य ही समस्त गतितत्त्व का ज्ञाता हो सकता है । इसी तथ्य को सामने रखते हुये श्रुति कहती है कि “स महामेरुं न जहाति” (तत्रैव । जहातीति हा । हा ओँहा॒ङ् गतौ॑ आत्मनेपदी । हा ओँहा॒क् त्या॒गे परस्मैपदी) । उपादानों का क्रिया से उसमें आपेक्षिक उन्मेष-संकोच क्रिया (pulsating like pulsars) का आरम्भ हो जाता है (भ्रस्ताकर्मकृदिवैवम् । तत्रैव । This appears as the expanding universe) । उसीसे समस्त चित्-अचित् क्रिया (sentient and inert efforts/operations) का आरम्भ होता है (प्राणो जीवानीन्द्रियजीवानि । तत्रैव) ।
इसी विज्ञान को सम्मुख रखते हुये श्रुति कहती है – “प्राणो वै कूर्मः । प्राणो हीमाः सर्वाः प्रजाः करोति । प्राणमेवैतदुपदधाति” (शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-7) । (The thermal radiation of the plasma in the recombination era was emitted into all directions and from all points in space. Since the plasma was very hot at that time, and the black body radiation at that temperature is अरुणवर्णः (orangey), the whole universe was filled with orange light (रोहित). The universe during this time saw the first stars being formed, but the only radiation emitted was the hydrogen line. The rest was to follow in वराह अवतार ।)
मरीचि (primordial radiation) से उत्पन्न, अतः मारीच, कश्यप से उत्पन्न पार्थिव पिण्ड कूर्माकार है । कूर्म का बुध्न (मूलदेश – जैसा कि अथर्वणे 2-14-4) समधरातल युक्त है । उपर का भाग वर्त्तुल (cycle) द्यौ जैसा है । मध्य में अन्तरिक्ष कूर्म का उदर है । कूर्म और कश्यप का आकार एक है । वह अप् तत्त्व का केन्द्र में – जहाँ उसका गहराइ का पराकाष्ठा है, वहीं पर प्रतिष्ठित है । यह है कूर्म अवतार का रहस्य ।