वैदिक अवतारवाद का वैज्ञानिक विश्लेषण

भगवद्गीता 4.7 में श्रीकृष्ण जी ने कहा है –

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।”

जब जब धर्म का ग्लानिः (बल का नाश, रोग) होता है, अधर्म का अभ्युत्थान (वृद्धि) होता है,  तब तब मैं ही अपने को (साकार रूप से) सृजन (सृ॒जँ॒ विस॒र्गे – प्रकट) करता हुँ (पृथ्वी पर अवतार लेता हुं)। निराकार का यही प्रकटीकरण को अवतरण कहते हैं ।

अवतार शब्द अव उपसर्ग पूर्वक तॄ प्लवनतर॒णयोः॑ धातु से करणे घञ् प्रयोग से वना है, जिसका सामान्य अर्थ अवतरण कहा जाता है । अवतरण शव्द का अर्थ सोपानपद्धति, प्रस्तावना, आभास, उपक्रमणिका आदि है – यथा शान्तिशतक में कहा गया है – दूरे गुरुप्रथितवस्तुकथावतारः । देवताओं का, विशेषरूपसे विष्णु का, मूलरूपसे भिन्नरूप में पृथिवी में अवतरणको भी अवतार कहाजाता है । यह उस निराकार विष्णुतत्त्व का आंशिकसाकार प्रकटीकरण है । अवतार अवतरण करनेवाला चैतन्य का साकार रूप । जो साकारचैतन्य चरमअशान्त प्राकृतिक परिवेष को, तथा उसी कारण से सन्तापित दुःखीजनों को, तारण करने के लिये जनलोक (galaxy) से पृथ्वीलोकपर अवतरित होते हैं, उन्हे अवतार कहते हैं । अवतार शव्द अनुगम सम्बन्धी है – अनेकार्थवाची है, जैसा कि निम्न उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा ।

वैदिकमन्त्र के अभाव से पाञ्चरात्र पद्धति में पुजा किया जाता है – जामदग्न्यस्मृतिः । पाञ्चरात्र मत में सकलकल्याणगुण सम्पन्न परमकारुणिक भक्तवत्सल ब्रह्मस्वरूप जीवनियन्ता पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव उपासकों के योग्यतानुसार फलदान के लिये लीलावश में अर्च्चा, विभव, व्यूह, सूक्ष्म तथा अन्तर्यामी भेद से पञ्चस्वरूप में अवतरित होते हैं । 

  1. प्रतिमादि देवतास्वरूप अर्च्चा है । साधारण मनुष्यों के प्रति करुणापरवश हो कर सच्चिदानन्दब्रह्म प्रतिमा रूपमें अवतरित हो कर अर्च्चाग्रहणपूर्वक भक्तों का कल्याण करते हैं । 
  2. राम, कृष्ण आदि अवतार विभव संज्ञक है । वह स्वशक्तिविभव से दुष्टदमन तथा शिष्टपालन करते हैं । 
  3. व्युहाकारे विच्छुरित उन अवतारों के कला व्युहसंज्ञक । शाङ्ख्यायनब्राह्मणम् के चतुष्टयं वा इदं सर्वं के अनुसार वासुदेव (ईश्वरपुरुष) से शङ्कर्षण (जीव), उनसे प्रद्युम्न (मन), उनसे अनिरुद्ध (अहङ्कार) क्रम से वासुदेवका चतुर्व्युह है । अन्य देवताओं का भी तद्रूप है । 
  4. सम्पूर्ण सर्वगुणसम्पन्न परम्ब्रह्म सूक्ष्म नामधेय । सभी जीवों के अन्तरमें रहने वाला प्रेरकब्रह्मको अन्तर्यामी कहते हैं ।

दशावतार का अन्य एक अर्थ है जीवों का क्रमविकाश । कूटस्थचैतन्य का क्रमिकविकाश को उनका अवतरण कहा जाता है । पुरुषसूक्त के अनुसार विराट् पुरुष से सम्पूर्ण सृष्टि का उत्पत्ति हुआ है । “दशाक्षरा वै विराट्” – इस श्रुतिवाक्य के अनुसार विराट् दश संख्या का वाचक है । जीवों के क्रमविकाश दश पर्याय में होता है । अतः मृत्यु को दशमदशा कहते हैं । “वनजौ (जलजौ) वनजौ खर्वः त्रिरामाः सकृपऽकृपः” के अनुसार दो जलज (मत्स्य, कूर्म), दो वनज (वराह, नृसिंह), वामन, तीन राम (पर्शुराम, राम, वलराम), कृपाशील कृष्ण तथा अकृपाशील (दुष्टविनाशक) कल्की, यह दश अवतार प्रसिद्ध हैं । शतपथब्राह्मणम् का विकर्षण विज्ञान (theory of evolution) के मत में प्राणीमण्डल का विकाश अवका-वेतस-मण्डुक भेद से जल में आरम्भ हुआ था । 

  1. जल से अवाञ्छित द्रव्यों को दूर कर के उसका शुद्धता रक्षा करनेवाला मत्स्य प्रथमअवतार है । 
  2. जो स्थल में भी रहसकता है, परन्तु जलजउद्भिद का आहार कर उसका सन्तुलन रक्षाकरता है, ऐसा जलचरप्राणी कूर्म द्वितीय अवतार है । 
  3. जल के समीप रहनेवाला स्थलचर वन्यप्राणी वराह तृतीय अवतार है । 
  4. हिंस्र वन्यप्राणी रूपी नृसिंह चतुर्थ अवतार है । 
  5. मानव के प्रथमविकाश के परिचायक वामन पञ्चम अवतार है । 
  6. हिंस्र समाजगठन के परिचायक पर्शुराम षष्ठ अवतार है । 
  7. सभ्य समाजगठन के परिचायक राम सप्तम अवतार है । 
  8. कृषिमूलक समाक के प्रतिष्ठाता बलराम अष्टम अवतार है । 
  9. सम्पन्न एवं तुष्ट समाज के स्वाभाविक विशृङ्खला को अपने बुद्धिबल से शृङ्खलित करने वाले कृष्ण नवम अवतार है । 
  10. दुष्टदमन शिष्टपालन करनेवाले कल्की दशम अवतार है ।

उपरोक्त वर्णना साधारण मनुष्यों के वोधगम्य होने के लिये पुराणों में सरलभाषा में गल्पाकार में कहागया है । परन्तु ब्राह्मणम् ग्रन्थों में इसका अन्तर्निहित गूढ वैज्ञानिक अर्थों का व्याख्या कियागया है । दशावतार में से प्रथम पाँच उत्सर्पिणी काल में तथा अन्य पाँच अवसर्पिणी काल में अवतरित होते हैं । अतः प्रथम पाँच अवतार सृष्टि सम्बन्धिनी तथा शेष पाँच अवतार में से चार द्वि-द्वि क्रम से वृद्धि तथा विपरिणाम एवं अन्त में संहार के परिचायक होते हैं । इस रूप से यह काल के विवर्त के परिचायक हैं । कालविभाग के अनुसार सत्ययुगमें 4, त्रेता में 3, द्वापर में दो तथा कलीयुग में एक कल्की अवतार होते हैं ।