हमारी संस्कृति के धरोहर ।
श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्मा
अनन्तं शास्त्रं बहुवेदितव्यं स्वल्पश्चकालो बहवश्च विघ्नाः ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥
सनातन संस्कृति में शास्त्रों की सङ्ख्या अनन्त कहागया है । परन्तु हमारी आयु सीमित है । अतः जैसे हंस पानी में से दुध छान कर पी जाता है, हमें भी शास्त्रों का सार जान लेना चाहिए । हमारे शास्त्रों को १४ अथवा १८ भागोंमें विभक्त करदिया गया है ।
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तर:।
इतिहास पुराणानि (पुराणं धर्मशास्त्रं च) विद्या ह्येताश्चतुर्दश ॥
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
अर्थशास्त्रं चतुर्थन्तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः॥
(शिवमहापुराणे वायवीयसंहितायां प्रथमध्याये २५ तम: श्लोक: ।
तथा विष्णुपुराणे ३ अंशे ६ अध्याये २८,२९ श्लोकद्वये च वर्तते।)
चार वेद (ऋग, यजु:,साम,अथर्व), छह वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष), मीमांसा, न्याय, पुराण और रामायण/महाभारत अथवा धर्मशास्त्र – यह चौदह विद्याएँ है । वेद के चार उपवेद है – अर्थवेद (अर्थशास्त्र), धनुर्वेद, गन्धर्ववेद तथा आयुर्वेद क्रमशः ऋग, यजु:, साम, अथर्व वेद के उपवेद हैं । कुछलोग आयुर्वेदको ऋग्वेद का उपवेद मानते हैं । परन्तु आयुर्वेदके आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि यह अथर्ववेद का उपवेद है । इनमें से प्रथम १० को अपरा विद्या कहते हैं । यह क्षरविज्ञान (material science) है (तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ मुण्डकोपनिषत् ॥ १.१.५ ॥) जो अक्षरविज्ञान है (science of one fundamental energy), उसे पराविद्या कहते हैं । अव्ययविज्ञान (science of consciousness) परात्पर विज्ञान है जो शास्त्र के वहिर्भूत है । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । न तस्य कार्यं करणं च विद्यते । नेति नेति । ब्रह्मसूत्र तथा गीता में अव्ययविज्ञानके सङ्केत मात्र दिया गया है ।
पञ्चशिख के मत में एकमेव दर्शनम् । ख्यातिरेव दर्शनम् । दर्शन वह है, जिसकेद्वारा हम देखते हैं – ज्ञानप्राप्त करते हैं । स्मृतिपूर्वानुभूतार्थविषयं ज्ञानमुच्यते – स्मृतिपूर्वक अनुभूत अर्थ का जो विषय है, उसे ज्ञान कहते हैं । किसी विशेष विषय का ज्ञान को विज्ञान कहते हैं । जो पदार्थ जैसा है, उसे उसके स्वरूप में जानना ही उसका विज्ञान (science – from the Latin word scientia which means knowledge, a knowing, expertness, or experience) है । इसके दो विभाग है । क्षर-अक्षर-अव्यय विज्ञान ब्रह्मविज्ञान है (क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः। गीता) । यह वेद मन्त्रों से जाना जाता है । इसीलिए शतपथ-ब्राह्मण (७.१.१.५) के अनुसार ब्रह्म वै मन्त्रो.. – ब्रह्म शब्द का अर्थ मन्त्र है । क्षर-अक्षर विज्ञान से वस्तुओं का चरित्र (characteristics or properties) जाना जाता है । अतः उसे जान कर उसका प्रयोग यज्ञविज्ञान है (य॒जँ॑ देवपूजासङ्गतिकरणदा॒नेषु॑), जिसे चारित्र्य (technology) कहते हँ । यह वस्तुप्रसूत है ।
यहाँ चौदह विद्याओंके सूची में षड्दर्शन में से केवल मीमांसा और न्याय को लियागया है । न्याय सर्वशास्त्रस्वीकृत प्रमाण पद्धति है । पूर्वमीमांसा ब्राह्मणग्रन्थों में आरोपित विसङ्गतियों का समाधान करता है । यह कर्म्मप्रधान है । । उत्तरमीमांसा उपनिषदग्रन्थों में आरोपित विसङ्गतियों का समाधान करता है । यह ज्ञानप्रधान है । कुछलोग शाण्डिल्य पञ्चरात्र आगम को मध्यमीमांसा कहते हैं । यह भक्तिप्रधान है । भक्ति, ज्ञान एवं कर्म्म के मध्यपतित है । वैशेषिक क्षरविज्ञान होने पर भी वेदत्रयी में अन्तर्भाव होने से उसका भिन्न रूप से नामोल्लेख नहीं किया गया (ऋचा मूर्तिः याजुषी गतिः साममयं तेजः भृग्वङ्गिरसाम् आपः – गोपथब्राह्मणम् पूर्व-२.९) । सांख्य तथा योग अक्षर विज्ञान तथा उसकी प्रक्रिया भाग होनेसे (सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् गीता – ५.४) परा विद्या है । शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैवोपलभ्यते । तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च । शक्तिकी आश्रयमें उसकी सत्ता माननी पडेगी । अतः इसका भी त्रयीमें अन्तर्भाव है ।
वेदः ।
जिसमें समस्त शाश्वत ज्ञान निहित है (विदँ ज्ञाने॑), अथवा जिसमें समस्त सत्तावानवस्तु के विज्ञान है (वि॒दँ॒ सत्ता॑याम्), अथवा उसका विवेचना किया गया है (वि॒दँ॒ वि॒चार॑णे), अथवा जिसका विवेचना करने से हम इच्छितवस्तु को सुगमता से प्राप्त कर सकते हैं (विदॢँ॑ ला॒भे),अथवा जिसमें जाननेयोग्य सबकुछ है (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑), उसे वेद कहते हैं । भरत ने कहा है कि –
न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो न तत् कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ नाट्यशास्त्र ॥१-११६ ॥
नाट्यशास्त्रको पञ्चमवेद इसीलिए कहा जाता है कि विश्व में ऐसा कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग तथा कर्म नहीं है, जो इस शास्त्रमें नहीं है ।
सादि-सान्त प्रकृतिवेद, प्राकृतवेद, विश्ववेद, छन्दोवेद, वितानवेद, रसोवेद रूप में तत् तत् प्राकृतिक विशेषताओं के भेद से ऋक्-यजुष्-साम-अथर्व नामों से व्यवस्थित किया गया है । बृहज्जाबालोपनिषत् में कहा गया अग्निषोमात्मकं जगत् इसीके लिये है । ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रूप हृदयात्मक सत्यप्रजापति गर्भित अग्नि-सोम का समन्वय ही विश्व का स्वरूप व्याख्या है । अग्नि ब्रह्माग्नि, देवाग्नि, भूताग्नि रूपमें त्रेधा विभक्त है । ये ही एकता-द्विता-त्रिता नामसे जाने जाते हैं । इन्हे ही आङ्गीरस आप्त्यादेवता, अग्निभ्रातरः तथा त्रेताग्नि कहा जाता है । भार्गव ब्रह्मणपति पवमान सोम तथा वृत्रात्मक अन्नसोम भेद से सोम का दो विभाग है । तीन अग्नि और दो सोम मिलकर 5 होते हैं । इनके पञ्चीकरण से जगत् सर्जना कि जाती है । ये ही ब्रह्मनिःश्वसित वेद है । चेतन-आख्यान-निवास का वोधक होते हुये (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑) वही वेदशव्द विश्व का वेद है ।
सृष्टिका आरम्भ ब्रह्मके उन्मेषशक्ति से हुआ । उससमय शक्ति वायु रूपसे (यत् – योऽयं पवते) आकाश (जू) में प्रबल वेग से प्रवाहित होने लगा (so-called big bang)। इसीलिए उसका तथा उसका परवर्ती विवर्त तथा निर्माण के विज्ञान को यज्जुर्वेद कहते हैं (अयं वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्नेवेदं सर्वं जनयति । एत यन्तमिदमनुप्रजायते । तस्माद्वायुरेव यजुः । अयमेवाकाशो जूः यदिदमन्तरिक्षम् । एतं ह्याकाशमनु जवते । तदेतद्यजुर्वायुश्च अन्तरिक्षं च यच्च जुश्च तस्माद्यजुः – शतपथब्राह्मणम् – १०.३.५.१-२) । वही प्रथमवेद है । व्यासदेवने एक यज्जुर्वेद को चारभागमें विभक्त किया । वायु के अवान्तरविभाग एक अन्यसे धक्का खा कर मूर्च्छित हो कर मूर्ती बनते हैं । प्रत्येक वस्तुपिण्ड मूर्त्ती है । उसका विज्ञान ऋग्वेद बना (ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् – तैत्तीरियब्राह्मणम् ३/१२/९/३)।
याज्ञिकप्रक्रियामें (electronic interaction of atoms) पञ्च प्रकारके वस्तुधर्म (quantum number) है, जिन्हे आश्रयभावः, प्रयोजकभावः, स्थायीभावः, व्यञ्जकभाव तथा सञ्चारीभाव कहते हैं । आश्रयभावः (principal quantum number) ७ है । इनका प्रत्येक का ३ भाग है । उसे अहर्गण कहते हैं । २१ अहर्गण पर्यन्त पृथ्वीलोक (प्रथति विस्तारयातीति – चरणसंचारयोग्य – nucleus or core to mantle) कहते हैं । यह आग्नेय है । इसलिए ऋग्वेद का २१ शाखाएँ है । प्रत्येक वस्तुके पिण्ड से वाहर एक महिमामण्डल रहता है (radiative zone) । ३३ अहर्गण पर्यन्त द्यौलोक (electron subshells – s subshell has two electrons, p subshell has six electrons, d subshell has ten electrons and f subshell has fourteen electrons, total 32. Including nucleus, 33) रहता है । उसका विज्ञान सामवेद है ।