परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः।
यह देवता परोक्षप्रिय ही होते हैं, प्रत्यक्षद्वेषी।
दिवति भासति इति देवम् । दृश्यमान मूल पदार्थ (stable fundamental particles) ही देव है । देव एव देवता (स्वार्थे तल्)। वही देवता हैं। सदारा विबुधाः सर्वे स्वानां स्वानां गणैः सह । यह देवता stable होने के लिए अग्निषोमात्मक (योषा-वृषा) लिङ्ग होना चाहिए । योषा सौम्या होने पर भी उसका शोणित आग्नेय है । वृषा आग्नेय होने पर भी उसका रेत सौम्य है । उपर से यो दिखता है, वह भीतर से भिन्न है । यदि हम भीतर से देखना चाहेंगे, तो उनका विष्फोरण (fission reaction) हो जाएगा । इसीलिए कहा गया है – यह देवता परोक्षप्रिय ही होते हैं, प्रत्यक्षद्वेषी।