इन्द्र, पुरुष, श्री, शरीर और प्रजापति नामों की व्याख्या – शतपथब्राह्मणम् माध्यन्दिनशाखा
—-
६.१.१.[१]
असद्वा इदमग्र आसीत् । तदाहुः किं तदसदासीदित्यृषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत्तदाहुः के
तऽऋषय इति प्राणा वाऽऋषयस्ते यत्पुरास्मात्सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण
तपसारिषंस्तस्मादृषयः।
हिन्दी – पहले यह असत् ही था। तब पूछा वह असत् क्या था? पहले वह असत् ऋषि ही थे। तब पूछा कौन वह ऋषि थे? प्राण ही वह ऋषि थे जिन्होंने सबसे पहले सृष्टि करना चाहा। उन्होंने श्रम द्वारा, तप द्वारा सबको प्राप्त कर लिया वा सर्वत्र पहुँच गए (ऋषी गतौ) इसलिए उनका नाम ऋषि हुआ।
६.१.१.[२]
स यो यं मध्ये प्राणः । एष एवेन्द्रस्तानेष प्राणान्मध्यत इन्द्रियेणैन्द्ध यदैन्द्ध तस्मादिन्ध इन्धो ह वै तमिन्द्र इत्याचक्षते परोऽक्षं परोऽक्षकामा हि देवास्त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त।
हिन्दी – वह यह जो मध्य में प्राण है। वही इन्द्र है (क्यों इन्द्र कहा?), प्राणों को मध्य से अपने इन्द्रियों से इन्ध (दीप्त) किया, यह जो इन्ध किया उसी कारण इन्ध कहलाया, इन्ध निश्चित ही इन्द्र है, देवता परोक्ष होने से परोक्षकाम ही होते हैं, यही इन्ध (दीप्त) हुए प्राणों ने सप्त नाना (पृथक) पुरुषों की सृष्टि की।
६.१.१.[३]
तेऽब्रुवन् । न वा इत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजनयितुमिमान्त्सप्त पुरुषानेकम्पुरुषं करवामेति त एतान्त्सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन्यदवाङ्नाभेस्तौ द्वौ पक्षः पुरुषः पक्षः पुरुषः प्रतिष्ठैक आसीत्।
हिन्दी – उन्होंने (उन पृथक उत्पन्न हुए पुरुषों ने) कहा। इस प्रकार पृथक रहकर तो हम प्रजनन करने में समर्थ न होंगे, इन सातों को एक पुरुष बना दें इति, उन्होंने इन सातों पुरुषों को एक पुरुष बना दिया, दो को दबाकर नाभि के ऊपर का भाग बना दिया और दो को दबाकर नाभि के नीचे का बनाया। दो को दो पक्ष (पँख) बना दिया और एक को प्रतिष्ठा बनाया। (इस प्रकार सात को एक बनाया।)
६.१.१.[४]
अथ यैतेषां सप्तानां पुरुषाणां श्रीः । यो रस आसीत्तमूर्ध्वं समुदौहस्तदस्य शिरोऽभवद्यच्रियं समुदौहंस्तस्माच्छिरस्तस्मिन्नेतस्मिन्प्राणा अश्रयन्त तस्माद्वेवैतच्छिरोऽथ यत्प्राणा अश्रयन्त तस्मादु प्राणाः श्रियौऽथ यत्सर्वस्मिन्नश्रयन्त तस्मादु शरीरम्।
हिन्दी – इन सात पुरुषों में जो श्री या रस था, उसको ऊपर इकट्ठा करके सिर कर दिया। चूंकि इसमें ‘श्री’ इकट्ठी हुई इसलिए इसका नाम ‘शिर’ हुआ। इसमें प्राणों ने आश्रय लिया (अश्रयन्त), इसलिए भी इसका नाम शिर हुआ। चूंकि प्राणों ने इसमें आश्रय लिया, इसलिए प्राण ‘श्री’ अर्थात् उत्तम हुए। और चूंकि ये सब प्राण इस सबमें फैल गये, इसलिए इसका नाम ‘शरीर’ हुआ ॥४॥
६.१.१.[५]
स एव पुरुषः प्रजापतिरभवत् । स यः स पुरुषः प्रजापतिरभवदयमेव स योऽयमग्निश्चीयते।
हिन्दी – वह पुरुष ही प्रजापति हुआ। यही प्रजापति पुरुष वह अग्नि है जिसका चयन किया जाता है।