गीता में कर्म की परिभाषा

सृष्टि के तीन स्तर हैं – भावसृष्टि, गुणसृष्टि, मैथुनीसृष्टि। यह अव्यय, अक्षर तथा क्षर प्रधान होते हैं, जो मन, प्राण, वाक् प्रधान हैं । अक्षर के प्राणभाग के अनुग्रह से गुणसृष्टि होता है। वही मैथुनीसृष्टि का मूल है। आजकल जिसे DNA Coding कहते हैं, वह गुणसृष्टि है।

प्राण के अनुग्रहसे वाक् में जो कम्पन होता है, वही कर्म है। उसके परिणाम क्रिया है। कर्म के तीन विभाग है। 

  1. सत्त्वगुण प्रधान शास्त्रविहित कर्म को कर्म कहते हैं। 
  2. तमोगुण प्रधान प्रतिषिद्ध कर्म को विकर्म कहते हैं। 
  3. रजोगुण प्रधान न शास्त्रविहित न शास्त्रप्रतिषिद्ध अन्यथा लक्ष्यहीन कर्मको अकर्म कहते हैं।

कर्म साकाङ्क्ष्य होने से संस्कार जात कर बन्धन का कारण बनता है। 

  1. निष्काम कर्म के फल स्वर्ग लाभ है। 
  2. विकर्म का फल नर्क है।
  3. अकर्म का फल असूर्यलोक प्राप्ति है। 

अव्ययपुरुष का आनन्द-विज्ञान-मन कला को विद्या कहते हैं। मन-प्राण-वाक् कला को कर्म कहते हैं। ब्रह्म में विद्या-कर्म दो बिभाग है। वही विभाग जीव तथा ईश्वर दोनों में है। 

  1. ईश्वर के विद्याभाग के साथ जीव का विद्याभाग को जोडना ज्ञानयोग है। इससे परामुक्ति होता है।
  2. ईश्वर के कर्मभाग से जीव का कर्मभाग जोडना कर्मयोग है, जिसका फल कहा जा चुका है। 

दोनों का समाहार उपासना अथवा भक्तियोग कहलाता है। इससे अपरामुक्ति मिलती है। इसीका बिभाग सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य आदि है।

Vyasa Sewaka
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