श्रीसनातनधर्मालोक १-२ 

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पूर्ण ग्रन्थ यहाँ पढ़ें – प्रथम एवं द्वितीय पुष्प

विषयसूची

Indices of Shree Sanatana Dharmaloka 1 & 2

अब सज्जनगरण उक्त महाग्रन्थकी विषयसूची देखें । इसके बीस उद्योत हैं , साढ़े तीन सौके लगभग किरण हैं । विषय – सूची प्रथम उद्योत — ( क ) समर्पण । ( ख ) मुखबन्ध । – * ‘ आलोक ‘ परिचय E ( ग ) निवेदन । ( घ ) विषयानुक्रमणिका । १ वैदिक मङ्गल । २ मङ्गलके ग्रवसरमें विघ्नशोधन । ३ सना- तनधर्मकी प्राचीनता एवं महत्ता । ४ संक्षिप्त सना- तनधर्मं । ५ अन्य मतोंके ग्रन्थोंमें सनातनधर्मके सिद्धान्त ६ शास्त्रार्थ- परिपाटीके चलानेकी आवश्यकता | ७ सनातनधर्मियोंको सावधानताकी आवश्यकता ! ८ सनातनधर्मका प्रभाव आजकल पूर्वकी भांति क्यों नहीं ? ९ वेदाध्ययन – अध्यापन एवं प्रचारणकी आव- श्यकता । १० क्या वेदमें केवल यौगिकता है ? ११ वेदार्थ – विधानके साधन । १२ वेदके विषय में आजके विद्वानोंका भारी भ्रम । १३ पतंजलि और ‘ शन्नो देवी ‘ मन्त्र | १४ ‘ छन्द ‘ विषयक – भ्रान्तिनिवारण | १५ संक्षिप्त वेद – वेदांगादि- परिचय | १६ वेदस्वरूप- निरूपण ( ११३१ संहिताओंका वेदत्व ) । १७ ब्राह्मण- भागका भी वेदत्व । १८ ब्राह्मणभागकी वेदता और वेद मैं इतिहास । १६ वेदमन्त्रार्थ हत्याका दिग्दर्शन । २० वेदमें द्विजमात्रका अधिकार । २१ वेददोहन- रहस्य । २२ पण्डितोंके प्रति प्रार्थना । २३ आधुनिक जागतिक दुरवस्था । २४ ‘ अन्यैः सह विवादे तु वयं पंचोत्तरं शतम् ‘ । २५ सनातनधर्म – विषयिणी मीमांसा । २६ · क्या सनातनधर्म में परिवर्तन हो सकता है ? २७    ४ * श्री सनातन वर्मालोक ( १-२ ) *

तर्क और प्रमाण में मान्यतर कौन है ? द्वितीय उद्योत – २८ वेदादिमें ब्राह्मणकी श्रेष्ठता । २ ९ वर्ण – व्यवस्था जन्मसे ही है । ३० गुणकर्मसे वर्णं- व्यवस्था में हानि । ३१ कर्मसे वर्णव्यवस्था का प्रति- वाद । ३२ वर्णव्यवस्थाविषयमें अन्यमतनिरास । ३३ वर्णविमर्श । ३४ वर्णव्यवस्थागत भ्रान्तिनिरास । ३५ क्या गुरणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है ? ३६ मृतकश्राद्धसिद्धि | ३७ मृतकश्राद्धगतभ्रान्तिनिरा- करण ३८ वैवस्वतथम और यमदूतोंकी वैदिकता । ३६ परलोककी सिद्धि । ४० स्वर्ग , नरक आदि लोकविशेषों की सिद्धि और यज्ञका उद्देश्य स्वर्गादिको प्राप्ति । ४१ स्वर्गमें गन्धर्व और अप्सराको सत्ता । तृतीय उद्योत – ४२ मूर्तिपूजनमें पूर्वपक्षी और उत्तरपक्षीका संवाद । ४३ मूर्तिपूजा – मीमांसा ( परापूजा- स्तोत्र पर विचार ) ४४ मूर्तिपूजन- विमर्श । ४५ स्वामी दयानन्दजी और शिवरात्रिका मूषक । ४६ पशुबलि – विवेचन । ४७ परमात्माकी साकारताकी सिद्धि । ४८ परमात्माका अवतारनिरूपण । ४ ९ द्वैतवाद एवं अद्वैतवाद में सामंजस्य । ५० विविध वाद । चतुर्थ उद्योत – ५१ गणपतिपूजनकी सिद्धि । ५२ ग्रहोंका प्रभाव और उनका पूजन । ५३ क्या * ‘ आलोक ‘ – परिचय

नक्षत्रादि विचार कल्पित है ? ५४ फलित ज्योतिष पर विचार । ५५ राहु द्वारा सूर्यग्रहण । ५६ पृथिवी

की स्थिरता और सूर्य की गति । ५७ सूर्यग्रहण और देवपूजादिविषय में वेदादिशास्त्रों को मत । ५८ ग्रहण- विज्ञान और उसका अशौचविज्ञान । ५६ ‘ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ‘ । ६० सूर्य आत्मा । पंचम उद्योत – ६१ स्त्रियोंको सन्ध्या , उपनयन , वेदादिके अधिकार एवं अनधिकार पर विचार । ६२ स्त्रियोंका वेदादि – अधिकारविषय निरास । ६३ प्राचीन साहित्य में स्त्रियों का स्थान । ६४ स्त्रियोंका वेदानधिकार विमर्श । ६५ स्त्रियोंके वेदानधिकारविषय में प्राक्षेप- परिहार | ६६ स्त्रियोंके वेद – उपनयनविषयमें नवीन- प्रमाणों की समीक्षा । ६७ नारियों के उपनयनाधिकार पर विचार | ६८ नारियोंके उपनयनाधिकार पर प्रक्षेप- परिहार । ६६ स्त्रियोंके उपनयन – वेदादिविषय में भ्रांति – निवारण । ७० स्त्री – शूद्रोंके वेदादिके अनधि कार विषय में पूर्वपक्ष एवं उत्तरपक्ष । ७१ पूर्वका परिशिष्ट ( ७२ ‘ ढोल , गंवार , शूद्र , पशु , नारी । ‘

षष्ठ उद्योत- – ७३ स्त्रियोंकी आवरण ( पर्दा ) – प्रथामें वेदादि शास्त्रों का मत । ७४ स्त्रियों के

प्राचीनतानुसरण से ही शान्ति । ७५ स्वयंवर में क्षत्रियों   ६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) से भिन्न वर्गोंका अधिकार नहीं । ७६ पुराण – इतिहास में स्वयंवर के सम्बन्धमें सम्मति है वा विमति ? ७७ बाल्यविवाहपर विचार । ७८ युवति – विवाह के दुष्परिणाम की कथा । ७ ९ श्रीसीता रामके विवाहकी अवस्था । सप्तम उद्योत -८० विवाहवयोविचार । ८१ कन्या- विवाहपर विमर्श । ८२-८३ कन्या विवाह – वयपर विवे- चना । ( १ ) ( २ ) । ८४-८५-८६-८७ कन्याविवाह- वयोविवेक ( क ) ( ख ) ( ग ) ( घ ) । ८८ कन्याविवाह- वयोनिर्णय । अष्टम उद्योत- – ८ ९ विधवाविवाहकी युक्तता वा अयुक्ततापर विमर्श । ६० पति एक और स्त्रियां बहुत । ६१ विधवाविवाहकी हानियां । ६२ विवाहविच्छेद की हानियां । ६३ कन्याओंोंके दायाद्य करनेमें हानियां ६४ विधवाविवाहविषयक -युक्तिविवेक । ९ ५ नियोग और और मैथुन ( एक दृष्टि कोण ) ६६ विधवा- विवाह , नियोगादिविषयक प्रमाणों की समीक्षा । ६७ नियोग और मैथुनं ( दूसरा दृष्टिकोण ) ६८ स्वामी दयानन्दजीके नियोगका समीक्षण | && श्रीपराशर और मत्स्यगन्धाका समागम । १०० दमयन्ती आदियोंके पुनर्विवाहपर विचार । १०१ ● ‘ प्रालोक – परिचय

द्रौपदीके पञ्चपतित्वपर विचार । १०२ द्रौपदी – पंच- पतित्वविषयक ग्राक्ष पोंका परिहार , १०३ द्रौपदीके पञ्चपतित्वकी प्रवृत्ति , १०४ ‘ पंचकन्याचरित्र ‘ समीक्षा | नवम उद्योत – १०५ त्रिकालमें सन्ध्याकी वैदि- कता , १०६ गायत्रीमन्त्रकी महत्ताका रहस्य , १०७ चन्दनादि का अनुलेपन , १०८ देवपूजा प्राचीन है । १०६ सनातनधर्ममें यज्ञका स्थान तथा प्रयोजन , ११० क्या विद्वान् मनुष्यही देव हैं ? १११ देवताओंकी मनुष्यों से भिन्नता में वेदादिप्रमाणोंका उपन्यास , ११२ क्या वेदमें देवताओंके नाम परमात्माका अर्थ रखते हैं ? ११३ देवतावादके विषय में श्रीसातवलेकरके मतकी आलोचना , ११४ मरुतोंके देवत्वका विचार , ११५ देवताओंकी अमानुषिकशक्ति और देवस्वरूप- निरूपण , ११६ इन्द्र देवराज और स्वर्गलोकके शासक , ११७ देवताओंके भेद और दिशाएं , ११५ देवताओं की उत्पत्ति , ११ ९ देवताओंके पौराणिक नाम वेदमें , १२० देवताओंकी पत्नियां , १२१ देवासुर – युद्ध , १२२ आसुरी माया , १२३ मायावियों के साथ माया करने में वैदिकता , १२४ भूतप्र  ेतपिशाच आदियोंकी वेद एवं आयुर्वेदमें सत्ता ।    5 * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * दशम उद्योत – १२५ ‘ नमस्ते ‘ का युक्तायुक्तत्व- विचार , १२६ नमस्ते अथवा हठवाद , १२७ ‘ नमस्ते- विधान ‘ का प्रतिविधान , १२८ क्या नमस्ते एक पद है ? ( नमस्ते – प्रदीपकी समीक्षा ) , १२६ ‘ नमस्ते व्याख्या ‘ का निरीक्षण , १३० ‘ नमस्ते प्रचार ‘ समीक्षा , १३१ हिन्दुशब्दको प्राचीनता एवं वैदिकता , १३२ हिन्दुओंका आदिनिवासस्थान भारतवर्ष , १३३ क्या एतेरय महिदास शूद्र थे ? १३४ क्या ऐलूषकवष शूद्र थे ? १३५ क्या पौराणिक सूत प्रतिलोम – सङ्कर थे ? १३६ क्या कक्षीवान् और जानश्रुति शूद्र थे ? १३७ क्या शबरी शूद्रा थी ? १३८ क्या वाल्मीकि चाण्डाल थे ? १३६ क्या प्रह्लाद ऐतिहासिक व्यक्ति न था ? १४० ‘ पोप ‘ शब्दकी समीक्षा , १४१ ऋषित्वविचार , १४२ मुक्तिमें अपुनरावृत्तिकी सिद्धि , १४३ पाप और उसके फलका दूर होना , १४४ वेद हमारे शत्रुओंका शत्रु , १४५ आत्मा कर्म में भी परतन्त्र , १४६ कर्म- रहस्य , १४७ मानवीय साम्यवाद ? १४८ चातुर्वर्ण्य की अनादि – सिद्धता , १४६ शूद्रादि अनार्य , १५० अस्पृश्योद्धार – मीमांसा , १५१ वरशापप्रदानमें उपपत्ति । एकादश उद्योत -१५२ हिदुत्रोंकी संख्यामें ह्रास क्यों ? १५३ क्षण तक जलना अच्छा ; देर तक धुआं * ‘ आलोक ‘ – परिचय

अच्छा नहीं ; १५४ आज समर्पता मैं भी अशान्तिका

साम्राज्य क्यों ? १.५५ स्वराज्यशब्दकी परिभाषा ,

१५६ क्या हम अस्पृश्योंके विरोधी हैं ? १५७ जनता की अन्ध परम्परा , १५८ भारतदुर्गके भङ्गका प्रसंग , १५ ९ धर्मदुर्गत्रारणार्थ हमारे पूर्वजोंकी दूरदर्शिता ,

१६० सांम्यवादविषयक संवाद , १६१ चांडाल – आदियों

की अस्पृश्यतामें प्रमाण और उपपत्तियां .१६२ अन्त्यजोंके देवमन्दिर में प्रवेश और अस्पृश्यतापर विचार , १६३ स्पृश्य एवं अस्पृश्यका संवाद १६४ अस्पृश्योद्धारका आदर्श , १६५ अस्पृश्योद्धार के प्रकार का विचार , १६६ साम्यवादके प्रमारणों की परीक्षा , १६७ साम्यवाद और अन्त्यजोंके प्रत्यालोचना , १६८ अन्त्यजोंके विचार , १६ε ‘ भारतीय १७० अस्पृश्यता- विज्ञान | देवमन्दिर प्रवेशकी देवमन्दिर प्रवेशपर धर्मशास्त्र ‘ की समीक्षा ,

द्वादश उद्योत – १७१ रामायणविषयक प्रक्षेप का परिहार । १७२ क्या रामायण महाभारतसे अर्वा- चीन है ? १७३ क्या उत्तरकाण्ड रामायणका अङ्ग नहीं है ? १७४ क्या आदिम चार सर्ग रामायण के अङ्ग नहीं हैं ? १७५ उत्तरकाण्डके रामायणके प्रङ्गत्व में उपपत्तियां । १७६ मूलरामायण और उत्तरकाण्ड   १० * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) कं विरोधका परिहार । १७७ आद्य चार सर्ग और उत्तरकाण्डमें विरोधका परिहार । १७८ पहिलेके चार सर्गके विषय में विरोधपरिहार । १७६ अरण्यकाण्ड और उत्तराकांडका विरोध परिहार । १८० उत्तरकांडे- विषयक प्रक्षेपों का परिहार । १८१ आदिम छः काण्डों के आक्षेपोंका परिहार । १८२ क्या रामायण बुद्धकाल में हुई ? १८३ वाल्मीकिरामायणका रामाव- तारसे पूर्व निर्माण कैसे ? १८४ सीताकी उत्पत्ति पर विमर्श १८५ क्या हनुमानादि मनुष्य थे ? १८६ पशु- पक्षियोंके भाषण की सिद्धि | त्रयोदश उद्योत- – १८७ क्या महाभारतके एक लाख श्लोक नहीं और कर्ता एक नहीं ? १८८ पुराणों का कर्ता एक है । १८६ व्यास एक हैं या दो ? १६० पौराणिक वस्तुओं की गवेषणा । १६१ कल्प और सृष्टि – संवत्सर । १ ९ २ कलियुग के अन्तकी समीक्षा १६३ पुराणोंका लाभ और पुराणोंको विषयसूची । १६४ पुराणोंका संक्षिप्त परिचय | १६५ प्रत्येक पुराण में भिन्न – भिन्न देवताके बड़े होनेका समाधान १ ९ ६ पुगरणों में श्रुतिशयोक्ति वेदानुकूल । १६७ पुराण में परस्पर विरोध और पुनरुक्तिका समाधान । १ ९ ८ देवतावाद के विषय में वेद और पुराणोंकी एक- वाक्यता । १६६ पौराणिक इतिहासोंकी वेदमें भी * ‘ ग्रालोक – परिचय # ?? सत्ता । २०० पुराणनाम वेदादि साहित्य में । २०१ पुराण और ब्राह्मणका भेद | चतुर्दश उद्योत – २०२ वैदिकता और पौरारिण- कताका रहस्य । २०३ पौराणिक अश्लीलतापर विचार । २०४ वेदोंमें भी पुराणसदृशता । २०५ पुराणोंका महत्त्व और उनमें विविध भाषाएं श्रौर विविध भाव । २०६ पौराणिक चरित्रोंका पर्यालोचन २०७ शिवलिङ्गपूजन विषयक विमर्श । २०८ पौराणिक- समन्वय । २०६ ‘ पुराणपरिचय ‘ का परिचय | २१० पुराणविषयक विविध प्राक्षेपों का परिहार । २११ पर्वतों के पंख और उनका काटना वैदिक । २१२ पुरा- णोंक्त दीर्घायुष्य में वेद की साक्षी । २१३ पौराणिक दीर्घायुष्यता की परीक्षा । २१४ अमरताकी सिद्धि । २१५ अकालमृत्युका सम्भव । २१६ मृतकका जीवित होना । २१७ सिर काटनेपर भी जीवित रहना । २१८ गौत्रोंका वैदिक , पौराणिक और व्यावहारिक महत्त्व २१६ स्वप्नफलकी समूलकता । २२० व्रत आदिकी शास्त्रीयता और वैज्ञानिक महत्ता । २२१ शकुन एवं अपशकुनकी , समूलकता । २२२ कुश का उपयोग शास्त्रीय । २२३ तोर्थोंकी वैदिकता और उनकी पवित्रता । २२४ भगवान् नन्दनन्दन और उनके चरित्र    १२ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) #की आलोचना । २२५ श्रीराधाविषयक आक्षेपकापरिहार । २२६ क्या भागवतके श्रीकृष्ण प्रन्य हैं औरमहाभारतके अन्य ? . २२७ ‘ कर्मण्यकर्म यः पश्येद्अकर्मणि च कर्म यः ‘ । २२८. श्रीरामववतार । : २२६ यज्ञमें पश्वालम्भक वैदिकता । २३० मद्य और उसकी व्यवस्था । २३१ द्यूत और उसकी व्यवस्था | पंचदश उद्योत -२३२ असम्भवशब्द कूपमण्डूकोंके कोष में २३३ प्रकृतिके नियम सामान्यशास्त्र । २३४ स्त्रीका पुरुष बन जाना और पुरुषका स्त्री बन जाना । २३५ अगस्त्य ऋषिके समुद्रपान में उपपत्ति । २३६ नेत्र आदि के द्वारा जलाने में उप-पत्ति । २३७ स्थूल – मैथुन के बिना भी सन्तान । २३८ विष्णुकर्णमलोद्भूतत्व आदि पर विचार । २३६ सृष्टिकी विलक्षण उत्पत्तियाँ । २४० बहुत सन्तानके

सम्भवकी मीमांसा । २४१ रक्तबीज के रक्तसे असुरोंकी उत्पत्ति । २४२ नारद आदिका आकाशमें जाना और उससे उतरना । २४३ आकाश में आकाश गंगा आदिकी स्थिति । २४४ एकसे अधिक मुखोंका सम्भव । २४५ हनुमानका सूर्यको पकड़ना । २४६ समुद्रमें पत्थरोंका तैरना । २४७ क्या कुम्भकर्णको निद्रा असम्भव है ? २४८ बूढे को जवानी देना । २४६ * ‘ आलोक ‘ – परिचय १३ मरे हुएका संजीवन | २५० पुरुषोंका दीर्घ प्रकार २५१ दीर्घजीवनमें उपपत्ति । २५२ अन्तर्धान सिद्धि में प्रमाण एवं उपपत्ति । २५३ सूर्यका ढक देना और अस्त्रका वापिस आना , २५४-२५५ बिना देखे भी युद्ध आदिका वृत्तज्ञान और भविष्यत्‌को ज्ञान , २५६ युद्ध गीता सुना सकनी सम्भव है , २५७ शिवडमरू से

चौदहसूत्र , २५८ : आग्नेय , वायव्य , सम्मोहन आदि अस्त्र । २५ε गोवर्धनपर्वतके उठानेपर विचार , २६०

समुद्रमन्थनका सम्भव । २६१ देवताओं आदि की बहु- २६२ शरीर तथा दूसरोंके शरीर बना लेने में शक्ति ,

प्रह्लाद आदिका चरित्र सम्भव । षोडश उद्योत —२६३ वादियोंकी नीति – रीतिका [ प्रस्ता- दिग्दर्शन , २६४ ‘ संस्कारविधि ‘ में सनातनधर्म [वना , १ गर्भाधानसमीक्षा , २ पुंसवन – समीक्षा , ३

सीमन्तोन्नयन – स ० , ४ जातकर्म – स ० , ५ नामकरणस ० , ८ चूड़ाकर्म- ११ ६ निष्क्रमण – स ० , ७ अन्नप्राशन- स ० , वेदा- स ० , ६ कर्णवेध स ० , १० उपनयन स ० , रम्भ – स ० , १२ समावर्तन स ० , ε कर्णवेध स ० , १०० उपनयन- स ० , ११ वेदारम्भ स ० , १२ समावर्तन स ० , १३. विवाह स ० १४ गृहाश्रम स ० , १५ वानप्रस्थाश्रम-

स ० , १६ संन्यास – स ० १७ अन्त्येष्टि – स ० ] । २६५

   १४ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * सत्यार्थप्रकाशके कई अशोंकी ग्रालोचना , २६६ स्वामी दयानन्दजी और आर्यसमाज । २६७ आर्यसमाजियों से उल्लंघित स्वामी दयानन्दजी के सिद्धान्त , २६८ शुद्धि – विमर्श , २६६ असवर्णाविवाहकी सदोषता , २७० समुद्र- यात्रा – प्रायश्चित्तविचार । सप्तदश उद्योत —२ः १ सङ्कलित सनातनधर्मके नियमोंका वेदशास्त्रादिमें मूलं [ १ अपनी संहिता ( शाखा ) का अध्ययन , २ शंखलाभ , ३ सुवधारण का माहात्म्य , ४ सरस्वतीदेवी का वर्णन , ५ बालक के ऊर्ध्वदन्तों का दुष्फल , ६ दिग्बलि , ७ दिग्रक्षाकवच , युगनाम ऋतु और मास १० ब्राह्मणों को दान , ११ , यज्ञका दक्षिणास सम्बन्ध , १२ दक्षिणादान- माहात्म्य , १३ युद्ध में मरने पर स्वर्गः १४ मरने के बाद पुरुषकी दशा , १५ धनान्नदानकी प्रशंसा . १६ यजमान – वर्धन , १७ अभिचारादिका वर्णन और मन्त्र- शक्ति , १८ स्त्रियोंके भूषरण १६ श्रद्धाका महत्त्व । २० दीक्षा ग्रहण , २१ तान्त्रिक – शब्द , २२ इन्द्रजाल- वर्णच , २३ शयनकी दिशा , २४ नामग्रहणका माहा- त्म्य , २५ चर्म – स्थिति , २६ पुत्र में पक्षपात २७ सात वस्तुए  ं , २८ प्रकाशयान – जल – नौका मूल , २६ सुदर्शन- चक्रक़ा मूल , ३० सगोत्रविवाहका निषेध ) : * आलोक – परिचय १५ . ३१ प्राततायीका वध , ३२ मनुका पिता होना , ३३ रात्रिकी स्तुति , ३४ त्रुटिकी प्रार्थना , ३५ खरवाहन , ३६ सत्यासत्यका विवेक , ३७ श्राचमन फल , ३८ प्रेतका पिपीलिका से उपहत होनेपर दोष ३६ अङ्गस्पर्श , ४० वेदमें विविध जातियां , ४१ ग्रनुस्तरणी का मूल , ४२ मन्देह दैत्य , ४३ इन्द्रका वज्र , ४४ ग्रायु- र्वेद , ४५ मृतकको सुबर्ण पहाना और स्नान कराना ४६ मलमासका मूल ४७ मृषकवाहन , ४८ सूर्यके घोड़े , ४६. जाया – प्रर्धाङ्ग , ५० पत्नीके वस्त्रको पहिरने का निषेध । ५१ पातिव्रत्य , ५२ पाणिग्रहण में स्त्रीके अंगूठे आदिका ग्रहण , ५३ ग्रन्नदोष , ५४ ग्रोंकार- जपकी महिमा , ५५ अश्वके प्रतिग्रहका निषेध , ५६ भोजन – नियम , ५७ वंदकी शाखाएं , ५८ प्रकीर्ण सना- तनधर्म की बातों का मूल ] • २७२ सनातनधर्मके सिद्धान्तोंकी वैज्ञानिकता [ १ सवर्ण विवाह – विधि , २ असवता में तथा निकट- सम्बन्ध में विवाहका निषेध , ३ जपपाठ , ४ ग्रहण में भोजनादिका निषेध , ५ उत्तर में सिर करके सोनेका निषेध , ६ घरमें तुलसीका पूजन , ७ पीपलका पूजन , ८ शङ्खध्वनि , काष्ठ – पादुका पहनना , १० कुशोंका श्रासन , ११ रेशमी आसन , मृग और व्याघ्रके चर्म    १६ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) ०

१२ कमण्डलु , १३ रातमें निद्रा के समय सिरकी ओर जल रखना , १४ वस्त्रसे विना छाने गायका दूध न पीना , १५ पृथ्वीमें लात मारना पापजनक , १६ शिशु- ओंके गलेमें रक्षा आदिका पहिराना , १७ कुनोंपर घृत का दीपक जलाना , १८ भोजनसे पूर्वं ग्रास रखना , अग्नि में डालना और काकबलि ] २७३ सनातनधर्मके मन्तव्यों की रहस्यपूर्णता [ १ ब्राह्ममुहूर्तमें उठना , २ प्रातः भूमिका वन्दन , उस पर उठते ही पांव न रखना , ३ हस्तदर्शन , ४ प्रातः ब्राह्मणका दर्शन अशुभ क्यों ? – मलत्यागकर मिट्टी से हस्तशुद्धि , ६ दन्तधावन ७ तैलनियम , ५ स्नान , काठके खडाऊ पहिनना , १० रेशमी आसन , कुशासन , मृग वा व्याघ्रके चर्मका आसन , ११ मूर्ति- पूजा , १२ तिलक , १३ भस्मधारण , १४ मार्जन , १५ अभिषेक , १६ शिखा – बन्धन ; १७ सन्ध्योपासना , १८ प्राणायाम , १६ सूर्योपस्थान , २० जप , २१ जपपाठः , २२ मालाकी मणियां १०८ क्यों ? २३ मन्त्र और सिद्धियाँ , २४ जपन १०८ वार क्यों ? २५ परि- क्रमा , २६ तुलसी – पूजन , २७ तुलसी- पत्रके चबाने का निषेध २८ देवमन्दिर – गमन , २६ पंचगव्य , गोमय , गोमूत्र , ३० गोमूत्र में गंगानिवास , ३१ गोवर में लक्ष्मीका * ‘ आलोक ‘ – परिचय १७ निवास ३२ श्रावणी , ३३ विजय दशमी , ३४ दीपावली , ३५ होली , ३६ अपने नामके छिपानेका रहस्य , ३७ उपवास , ३८ दृष्टिदोष , ३६ भोजनकी शुद्धि , ४० बाजारके अन्नको खानेका निषेध , ४१ घृतपक्वकी शुद्धता , ४२ स्पृश्यास्पृश्यता , ४३ व्रतोपवास , ४४ तीर्थं ४५ परलोक ] २७४ आचारोंमें वैज्ञानिक चमत्कार [ १ ब्राह्म- मुहूर्त्तमें शय्यात्याग , २ प्रातः मलमूत्र त्याग , ३ मलमूत्र- त्यागके नियम ४ गण्डूष ( कुल्ला ) करना , ५ मुह धोना , ६ प्रातः स्नानका फल , ७ सन्ध्याके लिए प्रातः पुष्प चुनना ८ स्नान के बाद चन्दन लगाना , ६ पूर्व दिशा की ओर मुख करके भो न करना , १० भोजनके समय मौन , ११ भोजनके समय अथवा अन्य समय रेशमी वस्त्र पहननेकी महिमा , १२ भोजनके समय नैवेद्य १३ भोजनकी विशुद्धि , १४ शूद्रादिके भोजनका निषेध १५ समान वर्ण वालोंकी पक्तिमें भोजन , १६ पंक्ति के भोजन समाप्त हो जानेपर इकट्टा उठना , १७ भोजन में दृष्टिदोष , १८ सिर बन्द करके

वा जूता पहिर कर भोजन करनेका निषेध , १ ९ भोजन के बादके नियम , २० गायका दूध । २१ काली गायकी विशेषता २२ विशेष – विशेष तिथियों में उपवास । २३ शयनके समय विशेष दिशाका विचार ] २७५ शङ्खध्वनिका विज्ञान | २७६ चरणामृतका वैज्ञानिक महत्त्व | २७७ आयुर्वेदिक दृष्टिसे भी गंगा जलकी महत्ता । २७८ वृक्षोंमें चेतनता । २७ ९ तुलसी- गुण- गौरव । २८० सोलह संस्कारोंका रहस्य । २८१ शिखाको रहस्य । २८२ उपनयन रहस्य । २८३ लांग बांधना । २८४ मेखला कौपीन आदिओंका रहस्य | २८५ मृगचर्मासनका रहस्य , २८६ वैवाहिक रीति- विशेष रहस्य , २८७ श्रीकृष्ण जन्माष्टमीव्रत पूर्ण वैज्ञा- निक २८८ विजयदशमीका महत्त्व । २८६ दीपावली विज्ञान | २६० होलिका -विज्ञान । २६१ एकादशी व्रत विज्ञान । २ ९ २ ओङ्कार – महत्त्व , २ ९ ३ मौन – महत्त्व | अष्टादश उद्योत – २ ९ ४ विविध प्रश्नों के उत्तर , २६५ श्रीसम्पूर्णानन्दजी के प्रक्षेपोंका परिहार । २६६ शनैश्चरमन्त्रविषयक विचार , २ ९ ७ क्या गणपति अवैदिक देव हैं ? २६८ श्रीसत्यनारायण व्रतकथा क्या धर्मके नाम से अधर्म है ? २ ९९ देवचरित्रचर्चा । ३०० श्रीसम्पूर्णानन्दजीके अवशिष्ट प्रक्षेपोंका परि- हार ३०१ वार – क्रम – रहस्य , ३०२ आर्य – समाजिक विवाहका रहस्यभेद , ३०३ महाब्राह्मणोंकी अव्यवहार्यं – ताकी विवेचना , ३०४ उपनिषद् के विषय में डुइसन ” * आलोक – परिचय L

साहिबको भ्रांति , ३०५ दर्शनों में सनातनधर्म , ३०६ भगवद्गीता में सनातनधर्म , ३०७ भगवद्गीता में वेद-खंडनका रहस्य , ३०८ क्या गीतामें केवल कर्मकाण्ड है ? ३०१-३१० गीताप्रोक्त यज्ञविषयमें विमर्श ( १ ) ( २ ) ।

एकोनविंश उद्योत –३११ आयुर्वेदमें श्रातुर-कवच , ३१२ आयुर्वेदमें सनातनधर्म ( सुश्रुत – सूत्र-स्थानमें ) ३१३ प्रा ० सना ० ( सुश्रुत – निदानस्थान में )३१४ आयु ० सना ० ( सुश्रुत शारीर – स्थान में ) . ३१५आयु ० में सनातनधर्म ( सुश्रुत चिकित्सा – स्थान में )३१६ आयु ० में सना ० ( सुश्रुत कल्पस्थान में ) ३१७

आयुर्वेद सनातन धर्म ( सुश्रुतसंहिता उत्तर तन्त्र में ) ,३१८ श्रीश्रायुर्वेद ( चरक – सूत्रस्थान ) में सनातन धर्म ,

३१६ आयु ० ( चरक – निदानस्थान में ) , ३२० प्रायु ०में सनातन धर्म ( चरक विमानस्थान में ) , ३२१ प्रायु ० में सना ० ( चरक – शारीरस्थान में ) ३२२ आयु ० में सना ०( चरक – इन्द्रियस्थान में ) ३२३ आयु ० में स ० ध ०

( चरक चिकित्सास्थान में ) , ३२४ आयु ० में स ० ध ०. ( चरक कल्पस्थान में ) , ३२५ आयुर्वेद में सनातनधर्मं

( चरक संहिता – सिद्धिस्थान में ) । I विंश उद्योत – ३२६ वैज्ञानिकसंसारके अद्भुत

आविष्कार । ३२७ प्राचीनता श्रेष्ठ है वा अर्वाची- नता ? ३२८ संन्यास आश्रमकी प्राचीनता वा शास्त्री- यता । ३२ ९ ‘ देवृकामा ‘ विषयक विमर्श । ३३० मुसलमानोंसे छुआ हुआ अन्न अभोज्य ही है । ३३१ हिंदुकोबिल की संक्षिप्त आलोचना । ३३२ हिंदुकोड- – विधान और निरुक्त , ३३३ हिंदुकोड – विधान और स्मृतियां , ३३४ भारतीय नारी – विषयक प्राक्षपों पर विचार , ३३५ हमें सनातनधर्मकी भक्ति क्यों करनी चाहिए ? ३३६ सनातनधर्म प्रचारकों का स्मरण , ३३८ सनातनधर्मका वर्तमान साहित्य और उसकी आलोचना , ३३६ सनातनधर्मी पत्र – पत्रिकाओंका परिचय , ३४० उपसंहार । परिशिष्ट उद्योत – ३४१ प्रणेताके विषय में समा- ‘ चारपत्रोंमें मुद्रित सम्मतियाँ , ३४२ प्रणेताके परि- चायक विद्वानोंके पत्र , ३४३ साक्षात्कार वा सन्देश · द्वारा प्रणेताके प्रोत्साहकोंकी नामावली । ३४४ हमारे शास्त्रार्थं । ३४५ प्राप्त पत्र- पुस्तकादिका विवरण । ३४६ किन – किन नगरोंसे पत्र आदि आये ? ३४७ • मुद्रण – यन्त्र जिसमें हमारे निबन्ध मुद्रित हुए । ३४८ प्रणेतृ – परिचय ( १ ) ( ले . श्रीयशोदानन्दनशास्त्री जयतल ) । ३४६ प्रणेतृपरिचय ( २ ) ( ले . श्री महावीर * प्रालोक ‘ परिचय २१

प्रसादजोशी ) ३५० प्रणेतृ परिचय ( ४ ) ले . ‘ संस्कृतम् ‘सम्पादकः ) । ३५१ प्रणेतृ – परिचय ‘ ( ४ ) ( ले . श्री

! नागार्जुन ) । ३५२ ‘ श्रो सनातनधर्मालोक ‘ के संरक्षकतथा सहायकों का परिचय । ३५३ समाप्ति – मङ्गल ।पाठक महानुभावोंने वर्तमान शताब्दी के नव – उप-हार एवं सनातनधर्म के महाभारत – इस ‘ श्रीसनातन-

धर्मालोक ‘ महाग्रन्थको विषयसूची , देख ली । उन्होंने अनुभव किया होगा कि सनातन धर्मका कोई भी विषय

. इसमें छूट नहीं पाया । ‘ पुराण विषयक विविध आक्षेपों का परिहार ‘ ( २१० ) और विविध प्रश्नोंके उत्तर ‘ ( २ ९ ४ ) इन निबन्धों में सनातन धर्म पर होनेवाली सौ- सौ से अधिक शंकाका प्रमाणोपपत्तिसहित समाधान किया गया है । कई उद्योतों में विविध विषय भी आ गए हैं । जो विषय हमारे ध्यान में न आया हो , उसे सुझा देने पर उसको भी इस महाग्रंथ में अन्तर्निविष्ट कर लिया जाएगा । ऐसे महाग्रन्थकी आवश्यकतासे कौन नकार कर सकता है ? हमने संवत् १६८० सन् ( १ ९ २४ ) से अबतक निरन्तर ३० साल पत्र – पत्रिकाओं के द्वारा – सनातन धर्मकी जो सेवा की है , उसका श्रेय इसी महा ग्रन्थको है ।