नोदन तथा अभिघात कर्म्म का प्रतिपादन

नोदन तथा अभिघात कर्म्म का प्रतिपादन
– वासुदेव मिश्र

“नोदनविशेषाभावान्नोर्ध्वं न तिर्यग्गमनम्। प्रयत्नविशेषान्नोदन विशेषः। नोदनविशेषादुदसनविशेषः।”

यह कणादसूत्र के पञ्चमाध्याय प्रथमान्हिक के अष्टम, नवम तथा दशम सूत्र है। पञ्चमाध्याय में कर्म्म का प्रतिपादन कियागया है। यह 3 सूत्र नोदन विशेष से जात क्रिया के नियम है। नोदन (coupling) संयोग विशेष है। इन सूत्रों का अर्थ है – नोदन विशेष (तीव्रतर नोदन) के अभाव से न ऊर्ध्वगमन (अग्नि का कार्य) होता है न तिर्यग्गमन (वायु का कार्य) होता है। प्रयत्न विशेष से नोदन विशेष उत्पन्न होता है। नोदन विशेष से उदसन विशेष (प्रतिक्षेप – rebounding / scattering) उत्पन्न होता है।

“अप्राप्तयोस्तु या प्राप्तिः सैव संयोग ईरितः”। अप्राप्त वस्तु का प्राप्ति को संयोग (coupling) कहते हैं । “आधार्याधार भूतानां” – भूतों का एक आधार पर अन्य का आधेय होने वाले सम्बन्ध (container-contained relationship) को प्राप्ति कहते हैं। यह आधार-आधेय सम्बन्ध से जात संयोग दो प्रकार के होते है – नोदन और अभिघात। जहाँ दो वस्तुओं के संयोग के पश्चात् दोनों एकत्र रहते हैं, उसे नोदन (contact) तथा जहाँ दोनों भिन्न दिशाओं में चले जाते हैं (impact) उसे अभिघात कहते हैं। “संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम्”। विधारकप्रयत्न के अभाव से (संयोगाभावे) गुरुत्व (mass) के कारण अवक्षेपण क्रियारूपी पतन होता है। गुरु शव्द “गृ॒ऽ सेच॑ने” अथवा “गृ निगरणे” धातु से निष्पन्न हुआ है। निगरणे का अर्थ भक्षण अथवा गिलन है। जो अपने घनत्व से अपर का सिञ्चन करता है अथवा अन्यका सान्द्रता (जैसे मन्दबुद्धि शिष्य का अज्ञान अथवा विरलावयव वायु तथा तरलावयव जल) को भेदन करता है, उसे गुरु कहते है। गुरु के लक्षण को गुरुत्व कहते हैं।

“सर्वे वै प्राणभृतां व्यवहाराः प्रयोजनाश्रयाः”। समस्त जीवित प्राणीयों के व्यवहार (freewill) प्रयोजन के आश्रित हो कर होते हैं। “प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते”। अर्थात विना प्रयोजनके प्रयत्न नहीं होता। “यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्”। किसी पदार्थको अधिकारसूत्रसे धर्मान्तर परिणाम केलिए प्रेरित करनेका इच्छाको प्रयोजन कहते हॆ। “न धीयते – धार्यते” अर्थमें उपरिभागको निर्देश करनेवाला “अधि” उपसर्गपूर्वक “कृ॒ञ् कर॑णे” अथवा “कृ॒ञ् हिं॒साया॑म्” धातु से घञ् प्रत्ययसे अधिकारशब्द वना है, जिसका अर्थ वस्तुके उपर प्रक्रियाविशेष है। प्रयोजनाभावसे यदि किसी वस्तुका किसी अन्यवस्तुके साथ संयोग नहीं होता, तो प्रतियत्नके कारण उसमें जो संस्कार उत्पन्न होकर उसमें गुणान्तरका आधान करता है, वह असंसर्गज होनेसे केवल देशान्तरप्रापण कराता है। इसे “वेगाख्य संस्कार” (inertia of motionकहते हैं। कणादके मतमें-

वेगः निमित्तविशेषात् कर्मणो जायते |

Meaning: Change of position due to inertia of motion is due to an impressed force (अभिघात).

वेगः निमित्तापेक्षात् कर्मणो जायते नियतदिक् क्रियाप्रबन्धहेतु |

Meaning: Change of motion is proportional to the impressed force and is in the direction of the force.

वेगः संयोगविशेषविरोधी |

Meaning: Action and reaction are equal and opposite.

तर्कसंग्रह नव्यन्याय के एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। परन्तु इसमें कणादसूत्र के स्पष्टीकरण के स्थान पर वहुत विभ्रान्तिकर तथ्य दिया गया है। कुछ उदाहरण नीचे दिया जा रहा है।

कणाद 17 गुण का वर्णन करने के पश्चात् च कह कर छोड दिये। प्रशस्तपाद उसके व्याख्या कर के 7 और गुण का उल्लेख किये, जो कणाद सम्मत है। प्रश्न है कि कणाद इन 7 गुणों को स्पष्ट क्यों नहीं कहा। यदि अल्पाक्षर कहना चाहते थे, तो रूपादि गुणाः कहकर छोड सकते थे। ऐसा न करने के पीछे एक बहुत बडा विज्ञान छुपा हुआ है, जो आधुनिक विज्ञान में अनेक तथ्यों को परिमार्जन कर सकता है। परन्तु इस विषयपर कोइ नहीं चर्चा करता, कारण वे इस वर्गीकरण समझते ही नहीं हैं।

सब भूतों का शरीर-इन्द्रिय-विषय तीन विभाग है। परन्तु वायु का प्राण नामक एक विभाग अलग से है। इसके पीछे एक बहुत बडा विज्ञान छुपा हुआ है, जिसे आधुनिक पण्डित समझते ही नहीं हैं।

कणाद अभाव को पदार्थ स्वीकार नहीं किया। परन्तु तर्कसंग्रह ऐसा किया है, जो कणादसूत्र का बिरुद्धाचरण करता है। यह विज्ञानसम्मत नहीं है। प्रागाभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव भाव पदार्थों का केवल वर्तमानकाल में अवर्तमानता है – वह अभाव नहीं है। जैसे अन्धकार केवल प्रकाशावरण है – प्रकाशाभाव नहीं है। अत्यन्याभाव केवल विशेष संसर्गाभाव है। अभाव नहीं है।

उसीमें Relativity तथा gravitational interaction के विषयमें भी चर्चा किया गया है। उत्क्षेपणादि कर्म का अन्तर्यामादि 5 सम्बन्धों से जोड देने से आधुनिक Quantum Theoryआ जाता है। जब तक हमारे तथाकथित विद्वान यह नहीं समझेंगे, तब तक यह केवल वागाडम्वर रहेगा। विज्ञान नहीं हो सकता।

“नोदनविशेषाभावान्नोर्ध्वं न तिर्यग्गमनम्। प्रयत्नविशेषान्नोदन विशेषः। नोदनविशेषादुदसनविशेषः।”

यह कणादसूत्र के पञ्चमाध्याय प्रथमान्हिक के अष्टम, नवम तथा दशम सूत्र है। पञ्चमाध्याय में कर्म्म का प्रतिपादन कियागया है। यह 3 सूत्र नोदन विशेष से जात क्रिया के नियम है। नोदन (coupling) संयोग विशेष है। इन सूत्रों का अर्थ है – नोदन विशेष (तीव्रतर नोदन) के अभाव से न ऊर्ध्वगमन (अग्नि का कार्य) होता है न तिर्यग्गमन (वायु का कार्य) होता है। प्रयत्न विशेष से नोदन विशेष उत्पन्न होता है। नोदन विशेष से उदसन विशेष (प्रतिक्षेप – rebounding / scattering) उत्पन्न होता है।