हमारी संस्कृति के घरोहर ।
-श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा
अनन्तं शास्त्रं बहुवेदितव्यं स्वल्पश्चकालो बहवश्च विघ्नाः ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥
सनातन संस्कृति में शास्त्रों की सङ्ख्या अनन्त कहागया है । परन्तु हमारा आयु सीमित है । अतः जैसे हंस पानी में से दुध छान कर पी जाता है, हमें भी शास्त्रों का सार जान लेना चाहिए । हमारे शास्त्रों को १४ अथवा १८ भागोंमें विभक्त करदिया गया है ।
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तर:। इतिहास पुराणानि (पुराणं धर्मशास्त्रं च) विद्या ह्येताश्चतुर्दश ॥
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः। अर्थशास्त्रं चतुर्थन्तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः॥
चार वेद (ऋग, यजु:,साम,अथर्व), छह वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष), मीमांसा, न्याय, पुराण और रामायण/महाभारत अथवा धर्मशास्त्र – यह चौदह विद्याएँ है । वेद के चार उपवेद है – अर्थवेद (अर्थशास्त्र), धनुर्वेद, गन्धर्ववेद तथा आयुर्वेद क्रमशः ऋग, यजु:,साम,अथर्व वेद के उपवेद है । कुछलोग आयुर्वेदको ऋग्वेद का उपवेद मानते हैँ । परन्तु आयुर्वेदके आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि यह अथर्व वेद का उपवेद है । इनमें से प्रथम १० को अपरा विद्या कहते हैँ । यह क्षरविज्ञान (material science) है (तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ मुण्डकोपनिषत् ॥ १.१.५ ॥) जो अक्षरविज्ञान है (science of one fundamental energy), उसे पराविद्या कहते हैँ । अव्ययविज्ञान (science of consciousness) परात्पर विज्ञान है जो शास्त्र के वहिर्भूत है । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । न तस्य कार्यं करणं च विद्यते । नेति नेति । ब्रह्मसूत्र तथा गीता में अव्ययविज्ञानके सङ्केत मात्र दिया गया है ।
पञ्चशिख के मत से एकमेव दर्शनम् । ख्यातिरेव दर्शनम् । दर्शन वह है, जिसकेद्वारा हम देखते हैँ – ज्ञानप्राप्त करते हैँ । स्मृतिपूर्वानुभूतार्थविषयं ज्ञानमुच्यते – स्मृतिपूर्वक अनुभूत अर्थ का जो विषय है, उसे ज्ञान कहते हैँ । किसी विशेष विषय का ज्ञान को विज्ञान कहते हैँ । जो पदार्थ जैसा है, उसे उसके स्वरूप में जानना ही उसका विज्ञान (science – from the Latin word scientia which means knowledge, a knowing, expertness, or experience) है । इसके दो विभाग है । क्षर-अक्षर-अव्यय विज्ञान ब्रह्मविज्ञान है (क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः। गीता) । यह वेद मन्त्रों से जाना जाता है । इसीलिए शतपथ-ब्राह्मण (७.१.१.५) के अनुसार ब्रह्म वै मन्त्रो – ब्रह्म शब्द का अर्थ मन्त्र है । क्षर-अक्षर विज्ञान से वस्तुओं का चरित्र (characteristics or properties) जाना जाता है । अतः उसे जान कर उसका प्रयोग यज्ञविज्ञान है (य॒जँ॑ देवपूजासङ्गतिकरणदा॒नेषु॑), जिसे चारित्र्य (technology) कहते हँ । यह वस्तुप्रसूत है ।
यहाँ चौदह विद्याओंके सूची में षड्दर्शन में से केवल मीमांसा और न्याय को लियागया है । न्याय सर्वशास्त्रस्वीकृत प्रमाण पद्धति है । पूर्वमीमांसा ब्राह्मणग्रन्थों में आरोपित विसङ्गतियों का समाधान करता है । यह कर्म्मप्रधान है । । उत्तरमीमांसा उपनिषदग्रन्थों में आरोपित विसङ्गतियों का समाधान करता है । यह ज्ञानप्रधान है । कुछलोग शाण्डिल्य पञ्चरात्र आगम को मध्यमीमांसा कहते हैँ । यह भक्तिप्रधान है । भक्ति, ज्ञान एवं कर्म्म के मध्यपतित है । वैशेषिक क्षरविज्ञान होने पर भी वेदत्रयी में अन्तर्भाव होने से उसका भिन्न रूप से नामोल्लेख नहीँ किया गया (ऋचा मूर्तिः याजुषी गतिः साममयं तेजः भृग्वङ्गिरसाम् आपः – गोपथब्राह्मणम् पूर्व-२.९) । सांख्य तथा योग अक्षर विज्ञान तथा उसकी प्रक्रिया भाग होनेसे (सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् गीता – ५.४) परा विद्या है । शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैवोपलभ्यते । तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च । शक्तिकी आश्रयमें उसकी सत्ता माननी पडेगी । अतः इसका भी त्रयीमें अन्तर्भाव है ।
वेदः ।
जिसमें समस्त शाश्वत ज्ञान निहित है (विदँ ज्ञाने॑), अथवा जिसमें समस्त सत्तावानवस्तु के विज्ञान है (वि॒दँ॒ सत्ता॑याम्), अथवा उसका विवेचना किया गया है (वि॒दँ॒ वि॒चार॑णे), अथवा जिसका विवेचना करने से हम इच्छितवस्तु को सुगमता से प्राप्त कर सकते हैँ (विदॢँ॑ ला॒भे),अथवा जिसमें जाननेयोग्य सबकुछ है (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑), उसे वेद कहते हैँ । भरत ने कहा है कि –
न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो न तत् कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ नाट्यशास्त्र ॥१-११६ ॥
नाट्यशास्त्रको पञ्चमवेद इसीलिए कहा जाता है कि विश्व में ऐसा कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग तथा कर्म नहीँ है, जो इस शास्त्रमें नहीँ है ।
सादि-सान्त प्रकृतिवेद, प्राकृतवेद, विश्ववेद, छन्दोवेद, वितानवेद, रसोवेद रूप में तत् तत् प्राकृतिक विशेषताओं के भेद से ऋक्-यजुष्-साम-अथर्व नामों से व्यवस्थित किया गया है । बृहज्जाबालोपनिषत् में कहा गया अग्निषोमात्मकं जगत् इसीके लिये है । ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रूप हृदयात्मक सत्यप्रजापति गर्भित अग्नि-सोम का समन्वय ही विश्व का स्वरूप व्याख्या है । अग्नि ब्रह्माग्नि, देवाग्नि, भूताग्नि रूपमें त्रेधा विभक्त है । ये ही एकता-द्विता-त्रिता नामसे जाने जाते हैं । इन्हे ही आङ्गीरस आप्त्यादेवता, अग्निभ्रातरः तथा त्रेताग्नि कहा जाता है । भार्गव ब्रह्मणपति पवमान सोम तथा वृत्रात्मक अन्नसोम भेद से सोम का दो विभाग है । तीन अग्नि और दो सोम मिलकर 5 होते हैं । इनके पञ्चीकरण से जगत् सर्जना कि जाती है । ये ही ब्रह्मनिःश्वसित वेद है । चेतन-आख्यान-निवास का वोधक होते हुये (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑) वही वेदशव्द विश्व का वेद है ।
सृष्टिके आरम्भ ब्रह्मके उन्मेषशक्ति से हुआ । उससमय शक्ति वायु रूपसे (यत् – योऽयं पवते) आकाश (जू) में प्रवल वेग से प्रवाहित होने लगा (so-called big bang)। इसीलिए उसका तथा उसका परवर्ती विवर्त तथा निर्माण के विज्ञान को यज्जुर्वेद कहते हैँ (अयं वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्नेवेदं सर्वं जनयति । एत यन्तमिदमनुप्रजायते । तस्माद्वायुरेव यजुः । अयमेवाकाशो जूः यदिदमन्तरिक्षम् । एतं ह्याकाशमनु जवते । तदेतद्यजुर्वायुश्च अन्तरिक्षं च यच्च जुश्च तस्माद्यजुः – शतपथब्राह्मणम् – १०.३.५.१-२) । वही प्रथमवेद है । व्यासदेवने एक यज्जुर्वेद को चारभागमें विभक्त किया । वायु के अवान्तरविभाग एक अन्यसे धक्का खा कर मूर्च्छित हो कर मूर्ती बनते हैँ । प्रत्येक वस्तुपिण्ड मूर्त्ती है । उसका विज्ञान ऋग्वेद बना (ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् – तैत्तीरियब्राह्मणम् ३/१२/९/३)।
याज्ञिकप्रक्रियामें (electronic interaction of atoms) पञ्च प्रकारके वस्तुधर्म (quantum number) है, जिन्हे आश्रयभावः, प्रयोजकभावः, स्थायीभावः, व्यञ्जकभाव तथा सञ्चारीभाव कहते हैँ । आश्रयभावः (principal quantum number) ७ है । इनका प्रत्येक का ३ भाग है । उसे अहर्गण कहते हैँ । २१ अहर्गण पर्यन्त पृथ्वीलोक (प्रथति विस्तारयातीति – चरणसंचारयोग्य – nucleus or core to mantle) कहते हैँ । यह आग्नेय है । इसलिए ऋग्वेद का २१ शाखाएँ है । प्रत्येक वस्तुके पिण्ड से वाहर एक महिमामण्डल रहता है (radiative zone) । ३३ अहर्गण पर्यन्त द्यौलोक (electron subshells – s subshell has two electrons, p subshell has six electrons, d subshell has ten electrons and f subshell has fourteen electrons, total 32. Including nucleus, 33) रहता है । उसका विज्ञान सामवेद है । इनमें से प्रत्येक का ३० विभाग है । अतः ९९० विभाग हुआ । केन्द्रके १० विभाग को मिलाकर सामवेद का १००० शाखाएँ है । गति का विज्ञान यज्जुर्वेद है । इसका १०० विभाग (यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः । न त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥ ऋग्वेदः ८.७०.५) यज्जुर्वेदः के १०० शाखाएँ है । मूल यज्जुर्वेद को मिलाकर यज्जुर्वेद के १०१ शाखाएँ है । अथर्ववेद रसविज्ञान (consolidation and application) है, जिसके आधाराधेयरूप त्रिवृत्-त्रिवृत् (९) शाखाएँ है । पतञ्जलि ने महाभाष्यमें इसीके विषयमें कहा है । कालक्रमे बिभिन्न गुरुओं के शिक्षा में पाठ-क्रम-विषयभेद हो गया । उससे भी अनेक शाखाएँ हो गए, जो आज प्रचलित है । यह शाखाएँ भिन्न है ।
प्रत्येक वेद के तीन विभाग है – संहिता, ब्राह्मणम्, आरण्यकम् । उपनिषद कोई स्वतन्त्र भाग नहीँ है । ईशोपनिषत् यज्जुःसंहिता का अंश है । अन्य सारे उपनिषत् किसी न किसी ब्राह्मणम् अथवा आरण्यकम् का अंश हैँ । जहाँ छन्दोबन्ध मन्त्र रहते हैँ, उसे संहिता कहते हैँ । यहाँ किसी विषय पर एक साथ कुछ लिखा नहीँ जाता । कारण उसमें पुनरावृत्ति दोष का सम्भावना रहती है । किसी विषयपर जहाँ जितना आवश्यक है, वहाँ उतना ही लिखा जाता है । आगे चलकर जहाँ उसविषय आता है, वहाँ पूर्वलिखित तथ्योंको त्यागकर जितना आवश्यक उतना ही लोखते हैँ । शेष आगे केलिए छोड दिया जाता है । अतः संहिता पुरा पढे बिना किसी विषयका ज्ञान नहीँ होता । वेदमें समस्त विषयका ज्ञान सूक्ष्मरूपसे निहित है । प्रत्येक मन्त्रके ऋषि, छन्द, देवता तथा विनियोग होता है । जो ऋषि, छन्द, और देवता के विनियोगके सम्बन्धको जाने बिना अध्यापनकरे वह पापी बन जाता है (अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च । योSध्यापयेद् जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु सः ॥ बृहद्देवता ८/१३६) ॥
ऋषि शब्द के चार अर्थ है – असद्रूप ऋषि, रोचनालक्षण ऋषि (नक्षत्ररूप, जैसे सप्तर्षि), द्रष्टारूप ऋषि, तथा वक्तारूप ऋषि । शतपथब्राह्मणम् ६-१-१-१ के अनुसार “असद वा इदमग्र आसीत् तदाहुः किं तद् असदासीत् ऋषयो वा व तेऽग्रेऽसदासीत । तदाहुः के ते ऋषयः इति प्राणा वा ऋषयः” । अर्थात् सृष्टि के आरम्भ से सब कुछ अव्यक्त था (वस्तुरहित था । केवल शक्ति ही थी, जो वस्तुके बिना प्रकाशित नहीँ हो सकती थी) । वह अव्यक्त, जो परिस्पन्दात्मक प्राणस्वरूप थे, वे ही ऋषि थे । उनको ऋषि क्यों कहा जाता है ? कारण वह अपने श्रम (कर्म) से तथा तप (द्वन्दसहन) से सबकुछ निर्माण किया (श्रमेण तपसा अरिषन्त तस्मात ऋषयः। Interplay of the primordial energy on the universal base called RASA – रसो वै सः and with itself created everything) 1 धर्म अतीन्द्रिय है । उसका जिन्होंने साक्षात्कार किया, उन्होने ही ऋषि बने (साक्षात्कृतधर्माण: ऋषयो बभूवु:) । भिन्न भिन्न ऋषियों के भिन्न भिन्न लक्षण है । प्राणमात्रा ही छन्द है । एक प्रकार के प्राणों के विभिन्न मात्रा में संग्रह को ऋषि तथा बिभिन्न प्राणों के एकत्र समावेश को विभिन्न प्रकार के देवता कहते हैँ ।
वसिष्ठ ऋषिरिति । प्राणो वै वसिष्ठ ऋषिर्यद्वै नु श्रेष्ठस्तेन वसिष्ठोऽथो यद्वस्तृतमो वसति तेनो एव वसिष्ठः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतत्प्राणं गृह्णामि प्रजाभ्य इति प्राणं पुरस्तात्प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामाः प्राणे तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तत्प्राणं करोत्यथ यन्नाना सादयेत्प्राणं ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका यजुः सादनं सूददोहास्तत्त्रिवृत्त्रिवृदग्निर्यावानग्निर्यावत्यस्य मात्रा तावत्तत्कृत्वोपदधाति – शतपथब्राह्मणम् – ८.१.१.६ । अर्थात प्राण ही वसिष्ठ ऋषि हैं कारण वही सबमें श्रेष्ठ है । और बहुत व्यापक होकर रहता है, इसलिए भी वह वसिष्ठ है ।
भरद्वाज ऋषिरिति । मनो वै भरद्वाज ऋषिरन्नं वाजो यो वै मनो बिभर्ति सोऽन्नं वाजं भरति तस्मान्मनो भरद्वाज ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतन्मनो गृह्णामि प्रजाभ्य इति मनो दक्षिणतः प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामा मनसि तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तन्मनः करोत्यथ यन्नाना सादयेन्मनो ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका तस्योक्तो बन्धुः । शतपथब्राह्मणम् – ८.१.१.९ । अर्थात मन ही भरद्वाज ऋषि है अन्न का नाम वाज है और अन्न से ही मन परिपुष्ट होता है । अतः वही भरद्वाज कहलाती है ।
जमदग्निर्ऋषिरिति । चक्षुर्वै जमदग्निर्ऋषिर्यदेनेन जगत्पश्यत्यथो मनुते तस्माच्चक्षुर्जमदग्निर्ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतच्चक्षुर्गृह्णामि प्रजाभ्य इति चक्षुः पश्चात्प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामाश्चक्षुषि तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तच्चक्षुः करोत्यथ यन्नाना सादयेच्चक्षुर्ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका तस्योक्तो बन्धुः । शतपथब्राह्मणम् – ८.१.२.३ । चक्षु जमकान ही दग्नि ऋषि है । जगमत् अर्थात् जगत् को जिससे जाना जाए, उस शब्द से ग लोप होकर जमत् शब्द बनता है । जगत् को जिससे जाना जाए, वह जमत् चक्षु है । वही जमत् अग्नि भी है । अतः वह जमदग्नि है ।
विश्वामित्र ऋषिरिति । श्रोत्रं वै विश्वामित्र ऋषिर्यदेनेन सर्वतः शृणोत्यथो यदस्मै सर्वतो मित्रं भवति तस्माच्छ्रोत्रं विश्वामित्र ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतच्छ्रोत्रं गृह्णामि प्रजाभ्य इति श्रोत्रमुत्तरतः प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामाः श्रोत्रे तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तच्छ्रोत्रं करोत्यथ यन्नाना सादयेच्छ्रोत्रं ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका तस्योक्तो बन्धुः । शतपथब्राह्मणम् – ८.१.२.६ । आदि । कान ही विश्वामित्र ऋषि है । कान से ही वह सब कुछ सुना जाता है, जो हमें प्रिय है । हम उसी को मित्र बनाते हैँ ।
शक्ति ही विश्व का सञ्चालक है । यह प्रत्येक पदार्थ को कुछ विशिष्ट नियम से छन्दित कर रखा है । उसे वैदिकछन्द कहते हैँ । यह लौकिकछन्द से भिन्न है । जिस दृश्यमान विषयके सम्बन्धमें कहा गया है, वह उस मन्त्रके देवता है (अर्थमिच्छन्नृषिर्देंवं यं यमाहायमस्त्विति । प्राधान्येन स्तुवन्भक्त्या मन्त्रस्तद्देव एव सः)। अर्थात जिस पदार्थ की कामना से ऋषि जिस देवता की स्तुति करने पर अर्थापतित्व को चाहता हुआ स्तुति करता है, वह मन्त्र उस देवता वाला हो जाता है (यत्कामऋषिः: यस्या देवतायामार्थशपत्यममच्छन् स्तुवतां प्रयुङ्क्क्ते तद् दैवताः स मत्रों भवति – निरुक्त) ।
वेदों के विषय ।
स्तुतिः प्रशंसा निन्दा च संशयः परिदेवना । स्पृहाशीः कत्थना याञ्चा प्रश्नः प्रैषः प्रवह्लिका ।। ३५।।
नियोगश्चानुयोगश्च श्लाघा विलपितं च यत् । आचिख्यासाथ संलापः पवित्राख्यानमेव च ।। ३६ ।।
वेद में स्तुति, प्रशंसा, निन्दा, संशय, परिदेवना (अनुशोचने कृतस्य कर्मणोऽनुचितत्वधियानुतापे विलापे च), स्पृहा, आशीष, दम्भ, याचना, प्रश्न, प्रैष (क्लेश, मर्द्दन), प्रवल्हिका (प्रहेलिका), नियोग, अनुयोग, श्लाघा (प्रशंसा कथन), विलाप, वृतान्तकथन, वार्त्तालाप, पवित्र आख्यान, आदि है ।
जहाँ यज्ञप्रक्रिया का हेतु, निर्वचन, निन्दा, प्रशंसा, संशयो तथा विधान आदि किया गया है, उसे ब्राह्मणम् कहते हैँ । जहाँ मन्त्रों का वैज्ञानिक आलोचना तथा व्यवहार किया गया है, उसे आरण्यक तथा जहाँ आत्मसम्बन्धि चर्चा है, उसे उपनिषत् कहते हैँ । व्यावहारिक दृष्टि से मूर्ती (वस्तु) के व्यवहारज्ञान अर्थशास्त्र है । गति का व्यवहारज्ञान धनुर्वेद है । विस्तार का व्यवहारज्ञान गन्धर्ववेद है । रस का व्यवहारज्ञान आयुर्वेद है ।
वेद में स्तुति है । स्तुति वह है जिसमें किसी का नाम (classification and nomenclature), रूप (physical characteristics). कर्म (chemical characteristics) तथा बान्धव (interactive potential) के विषयमें चर्चा की गयी हो (स्तुतिस्तु नाम्ना रूपेण कर्मणा बान्धवेन च) । किसी कर्म से जो फलप्राप्ति होता है, उसे आशिष कहते हैं (स्वर्गायुर्धनपुत्राद्यैर् अर्थैराशीस्तु कथ्यते)। शब्दके द्वारा उच्चरित होने पर जिस द्रव्य का प्रतीति होता है, उसप्रकार अक्षरयुक्त प्रतीति को नाम कहते हैँ (शब्देनोच्चारितेनेह येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं नामेत्याहुर्मनीषिणः)। नौ प्रकारके विचार से नामकरण किया जाता है । वह है – निवास, कर्म, रूप, मङ्गल, वाक्य, आशिष. यदृच्छा, उपवसन, तथा विशिष्ट व्यक्तित्व । यास्क, गार्ग्य तथा रथीतर चार प्रकारके विचार से नामकरण करते हैँ – आशिष.अर्थवैरूप्य, वाक्य तथा कर्म । शौनक केवल कर्म का ही विचार करते हैं, कारण अन्य सबका कर्ममें ही अन्तर्भाव हो जाता है (सर्वाण्येतानि नामानि कर्मतस्त्वाह शौनकः । आशी रूपं च वाच्यं च सर्वं भवति कर्मतः। प्रजाः कर्म समुत्था हि कर्मतः सत्त्वसङ्गतिः। क्वचित्संजायते सच्च निवासात्तत् प्रजायते । यादृच्छिकं तु नामाभिधीयते यत्र कुत्र चित् । औपम्यादपि तद् विद्याद् भावस्यैवेह कस्यचित् । नाकर्मकोऽस्ति भावो हि न नामास्ति निरर्थकम् । नान्यत्र भावन्नामानि तस्मात् सर्वाणि कर्मत)।
ब्राह्मणग्रन्थों के विषयवस्तु ।
ब्राह्मणग्रन्थों का मुख्य उद्देश्य संहिताओ के मन्त्रों का यज्ञों में विनियोग करने का विधि-विधान करना है । वैदिक संहिताओं की प्रत्येक शाखा की प्रयोग निर्द्देश करने वाले ब्राह्मण-ग्रन्थ भी पृथक् है । जैसे ऋग्वेद के ऐतरेय तथा साङ्ख्यायन ब्राह्मणम्, शुक्लयजुर्वेद के शतपथब्राह्मणम्, कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय ब्राह्मणम्, सामवेद के ताण्ड्य, छान्दोग्य, षड्विंश, सामविधान, आर्षेय, दैवत, उपनिषत्, संहितोपनिषत्, वंश, तथा जैमिनीय ब्राह्मण है । अथर्ववेद की नौ शाखाओं में केवल गोपथब्राह्मण ही उपलब्ध होता है । गोपथ-ब्राह्मण में शौनकीया शाखा तथा पैप्पलाद शाखा के मन्त्रों का निर्देश प्रतीकों के द्वारा किया गया है ।
गोपथ शब्द गोप्ता (गोपायतिरक्षतीति) शब्द से निष्पन्न हुआ है । गोपनार्थक गुप् धातु में आनन्तर्य के वाचक अथ शब्द के योग से गोपथ शब्द व्युत्पन्न होता है । अथर्वाङ्गिरसो हि गोप्तार: (गोपथ ब्राह्मणम् १.१.१३) – अथर्वाङ्गिरस ही यज्ञ के गोप्ता (रक्षक) है । अथवा गोप्यः शब्द गोप्यतेऽसाविति (गुपँ॒ गोप॑ने + कर्म्मणिगयत्) अर्थमें गोपनीय वस्तु को दर्शाता है । अथर्ववेदके प्रक्रिया सबके जाननेयोग्य नहीँ है (उसका अपव्यवहार किया जा सकता है ) । ईसीलिए इसका ब्राह्मण एक ही है । यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒त श॒तं भूमीः । उ॒त स्युः । (तैत्तिरीय-आरण्यकम् १.७.५) के अनुसार रश्मियों के जातिनिर्णयमें १०० विभाग है । इसीलिए गतिविज्ञान यजुर्वेद के ब्राह्मण को शतपथब्राह्मण कहते हैँ ।
पूर्वमीमांसा भाष्यकार शबरस्वामी के मत में – शेषे ब्राह्मणशब्दः। (पूर्वमीमांसा-२.१.३३) । अथ किंलक्षणं ब्राह्मणम्? मन्त्राश्च ब्राह्मणञ्च वेदः। तत्र मन्त्रलक्षणे उक्ते (विधिमन्त्रयोरैकार्थ्यमैकशब्द्यात् । स एवायमेकः शब्दो ब्राह्मणगतो विधास्यति, मन्त्रगतो न शक्नोति विधातुमित्यनुपपन्नम् । तस्माद् विधायकः।।) परिशेषसिद्धत्वात् ब्राह्मणलक्षणमवचनीयम्। मन्त्रलक्षणवचनेनैव सिद्धम्। यस्यैतल्लक्षणं न भवति, तद् ब्राह्मणमिति परिशेषसिद्धं ब्राह्मणम् । वृत्तिकारस्तु शिष्यहितार्थं प्रपञ्चितवान्-इति करणबहुलम्, इत्याहोपनिबद्धमाख्यायिकास्वरूपम् । हेतुः शूर्पेण जुहोति तेन ह्यन्नं क्रियते इति निर्वचनं तद् दध्नो दधित्वम् । निन्दा, उपवीता वा एतस्याग्नयः। प्रशंसा, वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवतेति । संशयः, होतव्यं गार्हपत्ये न होतव्यमिति । विधिः, यजमानसम्मिता उदुम्बरी भवति । परकृतिः माषानेव मह्यं पचतीति । पुराकल्पः, उल्मुकैहं स्म पूर्वे समाजग्मुरिति । व्यवधारणकल्पना, यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयादिति ।।
एक ही शब्दप्रमाण जो संहिता में है, वही ब्राह्मणभागमें भी व्यवहार होता है । मन्त्र ही विधान करता है । अतः वह विधायक है । परिशेष प्रक्रिया भाग को ब्राह्मण कहते हैँ ।
अपत्यार्थमें अण् का आधिकारिक सामान्यप्रत्यय होता है, जिसमें आदिवर्ण का वृद्धि तथा अन्त्यवर्ण का लोप होता है । ब्रह्म+अण् मिलकर ब्राह्मण शब्द बनता है, जो ब्रह्म के अपत्य के अर्थमें जाना जाता है । अवयव-अवयवी प्रवाह को अपत्य कहते हैँ । प्रवाह में पूर्वदेशत्याग-उत्तरदेश संयोग अपेक्षित है । सङ्गतिकरण यज्ञ है (य॒जँ॑ देवपूजासङ्गतिकरणदा॒नेषु॑) । शतपथब्राह्मण (३.१.४.१५) के अनुसार ब्रह्म वै बृहस्पतिर्ब्रह्म यज्ञ – ब्रह्म शब्द का एक अर्थ यज्ञ है । अतः यज्ञों की व्याख्या और विवरण प्रस्तुत कर विनियोग प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ को ब्राह्मण कहते हैं । भट्ट भास्कर के मत से ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां व्याख्यानग्रन्थः – कर्मकाण्ड और मन्त्रों के व्याख्यान ग्रन्थों को ब्राह्मण कहते हैं । यथा देवाः अकुर्वन् तथा करवाम वैदिक सिद्धान्त से वैकल्पिक द्रव्यों से प्रकृति का अनुकरण करना ही यज्ञ है । उसीका प्रक्रिया ब्राह्मणग्रन्थों में दिया गया है ।
आपसम्ब के मत में मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् – मन्त्रभाग के साथ साथ ब्राह्मणभाग भी वेद ही है । शबरस्वामी पितृभूति, शंकराचार्य, भट्ट कुमारिल, भवस्वामी, देवस्वामी, विश्वरूप, मेधातिथि, कर्क, धूर्तस्वामी, देवत्रात, वाचस्पति मिश्र, राजशेखर, रामानुज, उवट, मस्करी, सायणाचार्य, पाणिनी और पतञ्जलि सहित बहुसंख्यक आचार्यों और भाष्यकारों ने मन्त्रसंहिताओं के साथ साथ ब्राह्मणों की भी श्रुतिरूपता का मान्यता दिया है ।
नैरुक्त्यं यत्र मन्त्रस्य विनियोगः प्रयोजनम् ।
प्रतिष्ठानं विधिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते ।।
वाचस्पति मिश्र ने वर्ण्यविषयों का निर्देश करते हुए कहा है कि ब्राह्मण उन ग्रन्थों को कहते हैं, जिनमें निर्वचन (निरुक्ति), मन्त्रों का विविध यज्ञों में विनियोग, प्रयोजन, प्रतिष्ठान (अर्थवाद) और विधि का वर्णन होता है ।
ब्राह्मणग्रन्थों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय यज्ञ एवं यज्ञ का सर्वाङ्गीण विवेचन है । यज्ञमीमांसा के दो भाग हैं – विधि तथा अर्थवाद । विधि का अभिप्राय है यज्ञप्रक्रिया का विशद निरूपण – यज्ञ कब, कहाँ और कैसे किया जाए आदि, यज्ञ में ऋत्विजों की संख्या तथा प्रत्येक के क्या कर्त्तव्य, यज्ञ के लिए कौनसे वस्तु चाहिए, यज्ञशाला का निर्माण कैसे किया जाए आदि । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र का कहना है—“कर्मचोदना ब्राह्मणानि।” अर्थात् ब्राह्मण-ग्रन्थ विविध यज्ञरूप कर्मों में मनुष्यों को प्रेरित करते हैं, आदि विधि है । अर्थवाद का अभिप्राय है स्तुति अथवा निन्दापरक विविध विषय ।
वाचस्पति मिश्र के अनुसार –
नैरुक्त्यं यत्र मन्त्रस्य विनियोगः प्रयोजनम् । प्रतिष्ठानं विधिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते ।
ब्राह्मणग्रन्थों के चार प्रयोजन हैं ।
१). निरुक्ति अथवा निर्वचनः – वैदिक शब्दों की निर्वचन – व्युत्पत्ति के माध्यम से याग में प्रयोज्य पदार्थ की सार्थकता का निरूपण करना । यथा – तद्दध्नो दधित्वम् – यही दही का दहीपन है ।
२). विनियोगः अथवा हेतुः – किसी यज्ञ में किस विधि से किन मन्त्रों का पाठ करने का कारण – यज्ञ में कोई कार्य क्यों किया जाता है, उसका कारण बताना – कर्मकाण्ड सम्बन्धी किसी विशिष्ट विधि की पृष्ठभूमि में निहित कारणवत्ता का निर्देश करना । यथा तेन ह्यन्नं क्रियते, अर्थात सूप से होम करना चाहिए, क्योंकि उससे अन्न प्रस्तुत किया जाता है ।
३). प्रतिष्ठानः अथवा अर्थवाद । यज्ञ की प्रत्येक विधि का क्या महत्त्व है, इसके करने से क्या लाभ है और न करने से क्या हानि है, इस का विवेचन करना ।
४). विधिः । यज्ञ और उससे सम्बद्ध कार्यकलाप का विस्तृत विधान करना । यज्ञकर्म सम्पूर्ण विधि के अनुसार होना चाहिए । किस कार्य को पूर्व में किया जाए तथा किस कार्य को पश्चात् किया जाए, इसका निर्द्देश करना । यथा यजमानेन सम्मिता औदुम्बरी भवति – औदुम्बरी (गूलर की वह शाखा, जिसके नीचे बैठकर उद्गातृमण्डल सामगान करता है) वह यजमान के परिमाण (नाप) की होनी चाहिए ऐसा विधान करना ।
शबरस्वामी के मत में ब्राह्मणग्रन्थों के दशलक्षण है ।
हेतुर्निर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः। परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारणकल्पना ।।
उपमानं दशैते तु विधयो ब्राह्मणस्य तु । एतद्वै सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् ।।
एतदपि प्रायिकम् । इतिकरणबहुलो मन्त्रोऽपि कश्चिद्, इति वा इति मे मनः । इत्याहोपनिबद्धश्च, भगं भक्षीत्याह। आख्यायिकास्वरूपञ्च, उग्रे ह भुज्यमिति । हेतुः इदं वो वामुशन्ति हि । निर्वचनं, तस्मादापोनुस्थना इति । निन्दा, मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता इति । प्रशंसा, अग्निर्मूर्द्धा इति । संशयः, अधः स्विदासीदुपरि स्विदासीदिति । विधिः, पृणीयादिन्नाधमानायेति । परकृतिः सहस्रमयुताददत् । पुराकल्पः, यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा इति ।।३३।। ब्राह्मणनिर्वचनाधिकरणम् ।।८।।
इसमें उपरोक्त लक्षण के साथ साथ निम्नोक्त लक्षणों का विचार किया जाता है । प्रतिष्ठानः अथवा अर्थवाद का विचार नहीँ किया जाता ।
५). निन्दा । यज्ञ में निषिद्ध कर्मों की निन्दा करना । यथा असत्यभाषण निषिद्ध है । यदि कोई यज्ञशाला में असत्य बोलता हो, तो उसकी निन्दा करना चाहिए । अथवा किसी अप्रशस्त वस्तु की निन्दा कर याग में उसकी अनुपादेयता का प्रतिपादन करना । यथा अमेध्या वै माषा: – उड़द यज्ञ की दृष्टि से अनुपादेय है ।
६). प्रशंसा । यज्ञ में विहित कर्मों की प्रशंसा करना । यथा यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म – यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है । इसलिए यज्ञ अवश्य करना चाहिए – इस प्रकार यज्ञ की प्रशंसा करना । वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता – वायु शीघ्रगामी देवता है – इसप्रकार वायु के निमित्त यज्ञानुष्ठान करने का प्रतिपादन करना ।
७). संशय । किसी यज्ञिय कर्म के विषय में कोई सन्देह उपस्थित हो तो उसका निवारण करना । यथा तदव्यचिकित्सज्जुहुवानी इमा हौषादूम् – यदि यजमान के मनमें यह सन्देह उत्पन्न हो जाए कि मैं होम करूँ कि नहीं, उसका समाधान करना ।
८). परक्रिया अथवा परकृति । परार्थक क्रिया, परहित या परोपकार वाले कर्त्तव्य । धर्मार्थ कार्य कूप, तालाब आदि बनवाना आदि । अथवा अन्य का कार्य यथा – माषानेव मह्यं पचति – वह मेरे लिए उड़द ही पकाता है ।
९). पुराकल्पः । यज्ञ की विभिन्न विधियों के समर्थन में किसी प्राचीन आख्यान अथवा ऐतिहासिक घटना का वर्णन करना । यथा पुरा ब्राह्मणा अभैषु: – प्राचीन काल में ब्राह्मण डर गये थे ।
१०). व्यवधारणकल्पनाः । परिस्थिति के अनुसार यज्ञीयकर्म की विशेष प्रकार का निश्चय करना । यथा यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वरुणान् चतुष्कपालार्न्निवपेत् – जितने घोड़ों का प्रतिग्रह करे, उतने ही वरुणदेवताक चतुष्कपालों से याग करे ।
११). उपमानः । कोई उपमा अथवा उदाहरण देकर वर्ण्य विषय की पुष्टि करना । शबरस्वामी ने यद्यपि इसका उदाहरण नहीं दिया है, तथापि कुछ लोग छान्दोग्य उपनिषद का यह उदाहरण देते हैँ – स यथा शकुनि: सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वा अन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयते, एवमेव खलु सोम्य! तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतन्मलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते, प्राणबन्धनं हि सोम्य । मन इति – हे सोम्य । जैसे सूत्र से बँधा हुआ पक्षी प्रत्येक दिशा की ओर जाकर और अन्यत्र आश्रय न पाकर बन्धन का अवलम्ब लेता है, उसी प्रकार से यह मन भी विभिन्न दिशाओं में भटकने के पश्चात् वहाँ आश्रय न पाकर, इस प्राण का अवलम्बन ग्रहण करता है । हे सोम्य । मन का बन्धन प्राण है ।
ब्राह्मण-ग्रन्थों में विधि और अर्थवाद के अतिरिक्त यज्ञ आदि की आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक व्याख्याएँ भी प्रस्तुत की गई हैं । यज्ञ केवल कर्मकाण्ड नहीं है, अपितु सङ्गतिकरण के द्वारा सृष्टि-विद्या का भी प्रतीक है । विधि और अर्थवाद-वाक्यों की एकवाक्यता को स्पष्ट करने के लिए ताण्ड्य महाब्राह्मण षष्ठ अध्याय के सप्तम खण्ड में एक उदाहरण है – बहिष्पवमानं प्रसर्पन्ति । अग्निष्टोमानुष्ठान की प्रक्रिया में बहिष्पवमान स्तोत्र के निमित्त अध्वर्यु के साथ प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्ता तथा ब्रह्मा के एक दूसरे के पीछे इसी क्रम से पंक्तिबद्ध होकर सदोमण्डप से चात्वाल पर्यन्त प्रसर्पण (चलने) का विधान है । इस प्रसर्पण के लिए दो नियम विहित हैं – क्वाण (मृदुपदन्यासपूर्वक) प्रसर्पण तथा वाङनियमन् । नियमों का पालन न करने से अनेकविध अनर्थों की सम्भावनाएँ है । इसी प्रकार प्रशंसा, निन्दा, उनके औचित्यबोधक हेतु आदि भी दिये गये हैं । उसी प्रकार द्रोणकलशप्रोहण – द्रोणकलश में सोम रस चुराकर रथ के नीचे रखा जाना – के समर्थन में एक आख्यायिका कहा गया है । प्रजापति ने एकोऽहं बहुस्याम – एक से अनेक होउँ – इस कामना से सृष्टिविषयक विचार करते ही उनके मस्तक से आदित्य की उत्पत्ति हुई । आदित्य ने स्वयं उत्पन्न होने के लिए प्रजापति के शिर को छेदन किया । वह छिन्न मूर्द्धा ही द्रोणकलश हो गया, जिसमें देवों ने शुभ्रवर्ण के चमकते हुए सोमरस को ग्रहण किया । इस आख्यायिका के माध्यम से द्रोणकलश और तत्रस्थ सोमरस में सृजनशक्ति का उपपादन किया गया है ।
आरण्यकम् ।
ग्रामे॒ मन॑सा स्वाध्या॒यमधी॑यीत॒ दिवा॒ नक्त॑व्वेँ॒ति ह॑स्मा॒ह शौ॒च आह्ने॒य उ॒तार॑ण्ये॒बल॑ उ॒त वा॒चोत तिष्ठ॑न्नु॒त व्रज॑न्नु॒तासी॑न उ॒त शया॑नो॒ऽधीयी॑तै॒व स्वाध्या॒यन्तप॑स्वी॒ पुण्यो॑ भवति॒ । तैत्तिरीयारण्यकम् २.१२ ।।
अरण्याध्ययनादेतदारण्यकमितीर्यते ।
अरण्ये तदधीयीतेत्येवं वाक्यं प्रवक्ष्यते ।।
वैदिक यज्ञों के अन्तरतम अर्थवत्ता, वास्तविक वैज्ञानिक रहस्यों के सन्धान के लिए जिस शास्त्र का प्रकाश हुआ, उसे आरण्यक कहते हैँ । समूह को ग्राम कहते हैँ । एकाकीको अरण्य कहते हैँ । अरण्ये भवम् आरण्यकम् (तत्रभवः – अष्टाध्यायी ४-३ -५३) । समूह को ग्राम कहते हैँ । एकाकी को आरण्य कहते हैँ । वेद में ऋषि-छन्द-देवता-विनियोग के समूह (ग्राम) के अनुरोध में मन्त्रों का वर्णन किया गया है । जो वैज्ञानिक चर्चा एक ही विषयमें होता है, उसे आरण्यकम् कहते हैँ । उदाहरण के लिए, तैत्तिरीय आरण्यक में विश्वसृष्टि में शक्ति के विवर्त का सम्पूर्ण विवेचन है । इसे एकदेशीय ब्राह्मण कहा जा सकता है । इसलिए बौधायन धर्मसूत्र में कहागया है – विज्ञायते कर्मादिष्वेतैर्जुहुयात् पूतो देवलोकात् समश्नुते इति हि ब्राह्मणमिति हि ब्राह्मणम् – यज्ञकर्म कैसे करने से यह देवलोकके (quantum world) फल देते हैँ, उसका ब्राह्मण होने से इसे ब्राह्मण कहा जाता है ।
नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा ।
आरण्यकं च वेदेभ्य औषधिभ्योऽमृतं यथा ।।
आरण्यकों में आत्मविद्या, तत्त्वचिन्तन और रहस्यात्मक विषयों का वर्णन है, जो वेदविज्ञानका सार है ।
इमे सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सेतिहासाः सान्वाख्यानाः सपुराणाः सस्वराः ससंस्काराः सनिरुक्ताः सानुशासनाः सानुमार्जनाः सवाकोवाक्यास् तेषां यज्ञम् अभिपद्यमानानां छिद्यते नामधेयं यज्ञ इत्य् एवाचक्षते ॥ गोपथब्राह्मण १.२.१० ॥
इसीलिए आरण्यकों को रहस्य भी कहा जाता है । निरुक्त के टीकाकार दुर्गाचार्य ने भी आरण्यकों को रहस्य कहा है । आरण्यकों में यज्ञ का गूढ रहस्य और ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है, अतः इन्हें रहस्य कहा जाता है । इसको रहस्य कहने का अन्स कारण स्मृति, प्रत्यक्षम्, ऐतिह्यम्, अनुमानम् के द्वारा यह सृष्टितत्त्व का निर्द्धारण करते हैँ । वय, वयोनाध, वयुन के द्वारा, तथा मा, प्रमा, प्रतिमा छन्द के द्वारा त्रिविक्रम से सृष्टिरहस्य वर्णन करते हैँ ।
सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धस्तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात्, इति ।। ऐतरेय आरण्यकम् २.१.६ ।।
प्राणविद्या के महत्त्व का निरूपण आरण्यकों का विशिष्ट प्रतिपाद्य है । तदनुसार प्राण ही इस विश्व का धारक है । प्राण की शक्ति से जैसे यह आकाश अपने स्थान पर स्थित है, उसी प्रकार पिपीलिका से लेकर समस्त प्राणी इसी प्राण के द्वारा प्रतिष्ठित हैं ।
प्राणेन सृष्टावन्तरिक्षं च वायुश्चान्तरिक्षं वा अनु चरन्त्यन्तरिक्षमनु शृण्वन्ति वायुरस्मै पुण्यं गन्धमावहत्येवमेतौ प्राणं पितरं परिचरतोऽन्तरिक्षं च वायुश्च यावदन्वन्तरिक्षं यावदनु वायुस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यन्तेऽन्तरिक्षस्य च वायोश्च य एवमेतां प्राणस्य विभूतिं वेद, इति ।
।। ऐतरेय आरण्यकम् २.१.७ ।।
प्राण ही आयु का कारण है ।, कौषीतकिउपनिषद् में कहा गया है – यावद्ध्यस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः। जब तक प्राण है, तब तक आयु है । चरक ने भी कहा है – प्राणधारणं जीवनम् । अन्तरिक्ष और वायु प्राण की सेवा में संलग्न रहते हैं ।
ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव प्राण ऋच इत्येव विद्यात्, इति ।। ऐतरेय आरण्यकम् २.२.२ ।।
सभी ऋचाएँ, यहाँ तक की सभी वेद और ध्वनियाँ प्राण में ही सन्निहित हैं ।
मुण्डकोपनिषद् में विद्या का परा-अपरा विभाग करते हुये कहा गया है कि “अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते”। परम्ब्रह्मविद्या शब्दातीत आत्मसंवेद्यमात्र है (यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। तैत्तिरीयोपनिषद् २.४)। इसमें अथ शब्द आनन्तर्य का वोधक है । किसके अनन्तर? अपरा विश्व के अनन्तर । “कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्” (गीता ३.१५) के अनुसार ब्रह्मा क्षर नामसे जाने जाते हैँ । “सर्वं ह्येतद् ब्रह्म” में सर्वं शब्द क्षर का वोधक है । कारण क्षर ही समस्त विश्व का उपादान कारण है । इसका ब्रह्म और सुब्रह्म दो विभाग है (गोपथब्राह्मणम् पूर्व १.१,२)। ब्रह्मसे मूल अनस्था (स्थिर) सृष्टि होती है । ब्रह्मगर्भित सुब्रह्म से अस्थन्वा सृष्टि होती है (को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति – ऋग्वेद- १.१६४.४) । सुब्रह्म ही शुक्र है । यह मैथुनीसृष्टि का मूल है । इसलिये इसे ही (सृष्टि के पूर्व होने के कारण) अव्यक्त कहा जाता है । बिना विज्ञानसूर्य के सम्बन्ध से यह घोर तमोरूप है (तम आसीत् तमसा गुळ्ढमग्रे – ऋग्वेद – १०-१२९-३)। यही शुक्र विज्ञानसूर्य के सम्बन्ध से महान् नाम धारण कर के त्रिगुणभावापन्न हो जाता है । इन सबका आलम्बन अव्ययपुरुष है (“कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति” – मुण्डकोपनिषद् ३.२.७, “यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्र्वरः” – गीता १५-१७)। यही अव्यय-अक्षर-क्षर(ब्रह्म-सुब्रह्म) मिलकर चतुष्पात् ब्रह्म है ।
आत्मा एकपात् है । विश्व अव्यय-अक्षर-क्षर त्रिपात् है । आत्मा शब्द सापेक्ष है । किसका आत्मा? जैसे पुत्र कहने से प्रश्न उठता है कि किसका पुत्र, उसीप्रकार आत्मा कहने से प्रश्न उठता है कि किसका आत्मा? आत्मा का परिभाषा है “यदुक्थं सत् यत् साम सत् यद् ब्रह्म स्यात् स तस्य आत्मा” – जो किसीका उक्थ-ब्रह्म-साम है, वह उस वस्तु का आत्मा है । “यत उत्तिष्ठति तदुक्थम्” अर्थमें जिसके आलम्बनमें वस्तुका प्रतिष्ठा है (जो है तो वस्तु है, नहीं है तो वस्तु नहीं है), वह उसका उक्थ है। “बिभर्त्ति” अर्थमें जो वस्तुका आत्मप्रतिष्ठा को धारण करता है, वह उस वस्तुका ब्रह्म है । “ऋचा समं मेने” अर्थमें जो वस्तुमें आलोम-आनखाग्र सर्वत्र समानरूपमें रहता है, वह उस वस्तुका साम है । इस आत्मा का प्रथम पाद अव्यय सृष्टिका उक्थ है – आलम्बन है। द्वितीय अक्षरपाद सृष्टिका धारक होने से निमित्त कारण है । तृतीय-चतुर्थ पाद ब्रह्म-सुब्रह्म (quark-gluon plasma) बिभागयुक्त क्षर सृष्टिका उपादानकारण है ।
अव्यय अध्यात्म है । अक्षर अधिदैव है। क्षर अधिभूत है। अव्ययके आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् (अन्न) – यह पञ्चकोष अथवा कलायें हैं । वाक् के द्वारा ही समस्त विश्व हमारे वोधगम्य होता है । किसी वस्तु का तत्त्व पद (वाक्) के द्वारा निर्देशित होता है । वस्तु उसी पद द्वारा निर्देशित तत्त्व का अर्थ है । इसलिए वस्तुमात्र को पदार्थ (पद+अर्थ) कहते हैं । विश्वके समस्त पदार्थ वाक् हैं । समस्त शक्तिका मूल प्राण ही है । शतपथब्राह्मणम् (६.१.१.१) के मतसे “प्राणा वा ऋषयस्ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः” – प्राण ही वह ऋषि थे जो पूर्वकालसे अपने श्रम और तपसे सबको धारण किया करते हैं (अरिषन् – रिषँ हिं॒साया॑म्, तत् विपरीतः)। प्राणका सप्तविभाग ही सप्तऋषि है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – यह ५ सत् प्राण है, २ असत् प्राण – परोरजाप्राण तथा ऋषिप्राण है ।
अव्ययके प्राणनामक कला स्वयम्भूका परोरजा प्राण (जिसे विरज भी कहते हैं), आत्मरूप है – प्रजापति है (प्राणा उ वै प्रजापतिः – शतपथब्राह्मणम् ८.४..१.४) । इसलिये उसे ब्रह्म भी कहते हैं (प्राणा उ वै ब्रह्म – शतपथब्राह्मणम् ८.४.१.३) । मूलकेन्द्र से उठनेवाले रश्मिसमूह को भी प्राण कहते हैं (प्राणो वा अर्कः – शतपथब्राह्मणम् १०-४ -१-२३) । उसके अधीन परमेष्ठी महान् का प्राण अग्नि-सोम (रयि-प्राण) विभागसे भृगु एवं अङ्गिरा नामसे जानेजाते हैं (गोपथब्राह्मणम् पूर्व १.३, ७) । “ध्रुवोऽसि-धर्त्रमसि-धरुणमसि” (यजुः संहिता १.१८) के अनुसार पदार्थों का तीन श्रेणियों में वर्गीकरण हुआ है । ध्रुवावस्था ही निबिडावस्था, अथवा घनावस्था है । धर्त्रावस्था ही द्रवावस्था अथवा तरलावस्था है । एव धरुणावस्था ही वाष्पावस्था, अथवा विरलावस्था है । जगत् के उपादानभूत भृगु और अंगिरा नामक तत्व इन्हीं तीन अवस्थाओं के कारण क्रमशः आप-वायुः-सोमः एवं अग्निः-यम-आदित्यः इन तीन-तीन अवस्थाभावों में परिणत हो रहे हैं । तीनों भार्गव-सौम्य तत्वों में से तथा तीनों आंगिरस-आग्नेय तत्वों में से ध्रुवसोम तथा ध्रुवाग्नि के अन्तर्यामसम्बन्धात्मक चितिसम्बन्ध से ही भौतिक पिण्ड की स्वरूपनिष्पत्ति होती है ।
भाषा का सृष्टि तथा विभाग ।
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः । तैत्तिरीयब्राह्मणम् ।
देव, गन्धर्व, पशु तथा मनुष्य वाक् (वचँ परि॒भाष॑णे – communication) के द्वारा ही जीवनके समीपतम प्रयोजन पूर्ण करने में समर्थ होते हैँ । यहाँ देवा (देवनमिह क्रीडा यथा बालः कन्दुकैर्नित्यमिति हलायुधः – त्रयस्त्रीगंशत् तु एव देवा – शतपथब्राह्मणम् – ३३ quantum particles that follow different interactive principles of छन्दः) को अन्यों से भिन्न रखागया है ।
यह ऐसा हो – इसप्रकार के चित्तवृत्तिको इच्छा कहते हैँ । स्व हृदयस्थ चित्तवृत्ति को परहृदयमें सन्निवेशित करने की प्रक्रियाको भाषा कहते हैँ । यह व्युत्पन्न अथवा अव्युत्पन्न हो सकता है । अव्युत्पन्न जातिप्रवृत्ति-निमित्तक, गुणप्रवृत्ति-निमित्तक तथा शब्दप्रवृत्ति-निमित्तक हो सकता है (यदर्थज्ञानाच्छब्दप्रवृत्तिस्तत्प्रवृत्तिनिमित्तम्)) ।
वाग् हि वाजस्य प्रसवः । सा वै वाक् सृष्टा चतुर्था व्यभवत् एषु लोकेषु । त्रीणि तूरीयाणि पशुषु तुरीयम् – मैत्रायणीसंहिता ।
वाक् ही वाज (डुव॒पँ॑ (टुव॒पँ) बीजसन्ता॒ने) का क्षेत्र है । यहीँ वाक् वास करता (उप्यते अस्मिन्निति) है । चतुष्टयं वा इदं सर्वम् – यह शाङ्ख्यायन (कौषितकी) ब्राह्मणम् सिद्धान्त के अनुसार यह वाक् सृष्ट हो कर चार भाग में विभक्त हो गया । इसके तीन भाग मनुष्यों में है । चौथा भाग पशुओं में है ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि देशभाषाविकल्पनम् ।
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया दशरूपे प्रयोगतः ॥ २६॥
संस्कृतं प्राकृतं चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ।
अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ॥ २७॥
तथा योन्यन्तरी चैव भाषा नाट्ये प्रकीर्तिता ।
अतिभाषा तु देवानामार्यभाषा तु भूभुजाम् ॥ २८॥
संस्कारपाठ्यसंयुक्ता सम्यङ् न्याय्यप्रतिष्ठिता ।
विविधा जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ॥ २९॥
म्लेच्छशब्दोपचारा च भारतं वर्षमाश्रिता ।
अथ योन्यन्तरी भाषा ग्राम्यारण्यपशूद्भवा ॥
॥ नाट्यशास्त्रम् अध्यायः १७ अध्याय ॥
भरत में नाट्यशास्त्रके १७ अध्याय के २६ से ३१ श्लोक में इनको अतिभाषा अथवा देवभाषा, आर्यभाषा, जातिभाषा तथा अन्यन्तरीभाषा कहा है । अतिभाषा अथवा देवभाषा को छान्दस् (छन्दसो यदणौ – अष्टाध्यायी ४-३-७१, मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् – श्रीमद्भागवतम् १- ४-१३), दिव्या अथवा भारती कहते हैँ, जो वेद की भाषा है । वैदिक व्याकरण को ऐन्द्र व्याकरण कहाजाता है, कारण इन्द्र ही प्रथम अखण्डा वाक् को प्रकृति-प्रत्ययभेद से व्याकृ (खण्डित) किए थे । प्रत्येक वेद के प्रातिशाख्य ही उसका व्याकरण है । ऋक्तन्त्र तथा पुष्पसूत्रम् सामवेदका प्रातिशाख्य है । अन्य वेद शाखाओं के प्रातिशाख्य उन्हीके नाम से है । इनमें अक्षरोंको ब्राह्म वर्णसमाम्नाय कहते हैँ । पाणिनीके पूर्ववर्त्ती वैयाकरण इन पर पुस्तक लेखे थे । शिक्षाग्रन्थों तथा प्रातिशाख्य प्रत्येक पद का निर्वचन करते हैं । परन्तु पाणिनी ने ऐसा नहीं किया । विषयवस्तु का क्रम भी दोनों मे भिन्न है । यास्क के निरुक्त और निघण्टु, शान्तनव के फिट् सूत्र, व्याडि के जटापटल, वररूची के धातुपाठ – इन सबका व्यवस्थान अष्टाध्यायी से भिन्न है । उपसर्गके व्यवहार वेद और अष्टाध्यायीमें भिन्न है । वेदमें यह अलग रहते हैं, परन्तु अष्टाध्यायीमें यह क्रियापदसे युक्त रहते हैं । वेदमें ळ (जैसे अग्निमीळे) व्यवहार होता है । परन्तु अष्टाध्यायीमें नहीं । वेदमें पुंलिङ्ग अकारान्त शव्द – जैसे देवः – का कतृकारक रूप देवासः हो सकता है । परन्तु अष्टाध्यायीमें यह केवल देवाः होगा । उसी प्रकार वेद में करणकारक वहुवचन में देवेभिः होता है, जब कि अष्टाध्यायीमें यह देवैः होता है ।
आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान्मनो युक्ते विवक्षया ।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ।
मारुतस्तूरसि चरन्मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥
स्वहृदयस्थ भाव को परहृदयमें सन्निवेशित करने की प्रक्रियाको भाषा कहते हैं । इसमें इच्छा, ज्ञान, क्रिया तीनों ही अभिप्रेत है । ये मनके विना कार्य नहीं कर सकते । गति अग्नि का कार्य है । मन ही प्रथमे कायाग्नि (शरीरस्थ उष्मा) को मूलाधार से प्रेरित करती है । वह शरीरस्थ वायु को तापित कर उपर की दिशा में प्रेरित करती है । वही वायु हृदयस्थान से हो कर कण्ठ, तालु, मूर्द्धा, दन्त, ओष्ठ होते हुये जब वाहर निकलती है, तो वही वाङ्गमयमण्डल कहलाती है ।
मन में से कामना का उदय होता है । कामना के अव्यवहितोत्तरकाल में प्राणव्यापार आरम्भ हो जाता है । उससे शान्त-स्थिर वाक् समुद्र में गति सृष्टि होती है (so-called big bang)। प्राणसम्बन्ध के तारतम्य से वाक् समुद्र में वीची तरङ्ग (wave) सृष्टि होता है, जिसे कम्प (vibration) कहते हैं । जब वह हमारे श्रवणेन्द्रिय में नोदन सम्बन्ध से युक्त होता है, तब वह हमारे प्रज्ञारूप इन्द्र से बद्ध हो जाता है । बद्ध-तरङ्गों में परिणत वाक् खण्ड ही क-च-ट-त-प, आदि वर्णों का जननी वनती है । उसीसे शब्दसृष्टि होता है । इसलिये वाक् को इन्द्रपत्नी कहते हैं (वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः, पशवो मनुष्याः । वाचीमां विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी – तैत्तिरीयब्राह्मणम् २-८-८-४)।
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परम्ब्रह्माधिगच्छति ॥ मैत्रायणी उपनिषद् 6-22 ॥
ब्रह्म के दो विवर्त है – शब्दब्रह्म और परम्ब्रह्म। माण्डुक्योपनिषद के मत में “सर्वं ह्येतद् ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म । सोऽयमात्मा चतुष्पात्”। यह आत्मा ब्रह्म है । यह आत्मा (ब्रह्म) चार मुख वाला है । मुखम् शब्द खन् धातुमें करणे अच् प्रत्यय से मुडागम के द्वारा निष्पन्न होता है । “खनुँ॑ अव॒दार॑णे” अर्थमें मुख का अर्थ प्रवेश-निर्गम का सहायक पथ है । मुखसे रूप, रस, गन्ध, शब्द तन्मात्राओं का प्रवेश-निःसरण (ग्रहण-त्याग) होता है । अतः शब्दब्रह्म और परम्ब्रह्म दोनों का भी चार प्रकारसे प्रवेश-निःसरण अनुभूत होता है । ये ही ब्रह्मा के चतुर्मुख है ।
वाक् सृष्टि का मुख्य अधिष्ठान है । उसी से आपः सृष्टि हो कर उसके गर्भ में अन्य सृष्टि होते हैं (सोऽपोऽसृजत । वाच एव लोकाद्वागेवास्य साऽसृज्यत सेदं सर्वमाप्नोद्यदिदं किं च यदाप्नोत्तस्मादापो यदवृणोत्तस्माद्वाः – शतपथब्राह्मणम् (६-१-१-९) । वाक् का ग्रहण प्राण के सहायता से मन के द्वारा होता है । मन से परे विज्ञानबुद्धि है । आनन्द सर्वान्तरतम है । अव्यय के मन को श्वोवसीय नाम से जाना जाता है । यह मन एक एवं अखण्ड है । प्राण शुद्धरूपसे अखण्ड होते हुये भी वाक् (वस्तु) संसर्ग से सखण्ड हो जाता है – अतः खण्डाखण्ड है । वाक् सखण्ड है । यही सखण्डता सृष्टि का बीज वनती है । इसलिये नृसिंहोत्तरतापनी उपनिषद में कहा गया है “अथो वागेवेदं सर्वम्”। तैत्तिरीयब्राह्मणम् २-८-८-४ में भी कहा गया है कि “वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता” । सञ्चरमार्ग सृष्टि में मन-प्राण-वाक् मुख्य कारण है । आनन्द-विज्ञान सहकारी है । यही विज्ञानमार्ग है । प्रतिसञ्चरमार्ग मुक्ति में इसके विपरीत है । आनन्द-विज्ञान मुख्य कारण है । मन-प्राण-वाक् सहकारी है । यही ज्ञानमार्ग है । हमें ज्ञान-विज्ञान दोनों का आवश्यकता है । इसलिए गीता (७.२) में कहागया है “ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यम् अवशिष्यते”। ज्ञान-विज्ञान का सम्यक बोध हो जाने से कुछ भी अज्ञात नहीं रहता ।
शब्देनोच्चारितेनेह येन द्रव्यं प्रतीयते ।
तदक्षरविधौ युक्तं नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥
सङ्ख्यावान् सत्वभूतोर्थः सर्व एवाभिधीयते ।
भेदाभेद विभागोहि लोके सङ्ख्या निबन्धन ॥
नाम द्वारा किसी वस्तु का अन्य वस्तु से भेद का निर्देश होता है ।
शब्द का यत्किञ्चित्पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्न में शक्ति होती है । नामार्थकल्पसूत्रके अनुसार शब्दः के श बिन्दू का वोधक है, व वायु का वोधक है, द अग्नि का वोधक है और विसर्ग अम्वर (आकाश) का वोधक होने से उनको साङ्केतिक (equation) कहते हैं (बिन्दूवातग्न्यम्वराणां तस्मात् साङ्केतिकाः स्मृताः । गाणितिकभाषा में इसे – श + ब् + दः = शब्दः लिखा जा सकता है । इसके व्याख्या करते हुये ढुण्ढिनाथ ने कहा है – तत्र शकार बिन्दूः, वकार वायुः, दकार अग्निः, विसर्गाश्चाकाशः । बिन्दु, वात, अग्नि, एवं आकाश के सहयोग से शब्द सृष्टि होता है । बिन्दु (अणु) तथा अम्वर (परममहत्) सर्वत्र एक ही है । वह असङ्ग है । विभाग के कारण शब्द तथा उत्तरविभाग होते हैँ (शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ – प्रशस्तपाद भाष्य – mechanical waves whose oscillations are parallel to the direction of the energy transport through compression and rarefaction) ।
बिन्दु उक्थ है । वहाँ से जब वायु के द्वारा क्रिया आरम्भ होती है, तब द्रविणभाव के कारण अग्नि जात होता है । अग्नि वायु को पुनः प्रेरण करता है (मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्)। यदि रिक्तस्थान मिलता है, तो शब्दतरङ्ग क्रमशः गति करती है । इससे शब्दों का ३०४ भेद हो जाते हैं (चतुरुत्त्तरत्रिशतशब्दानाम् – सर्वशब्दनिबन्धनम्)।
बिन्दु अणु होने से तथा आकाश परममहत् होने से, इनका संख्या गणना नहीं होता । अग्नि अष्टसंस्थ है – “अग्निश्च जातवेदाश्च। सहोजा अजिराप्रभुः। वैश्वानरो नर्यापाश्च। पङ्क्तिराधाश्च सप्तमः। विसर्पेवाऽष्टमोऽग्निनाम्। एतेऽवसवः क्षिता”। अग्निः, जातवेदाः, सहोजा, अजिराप्रभुः, वैश्वानरो, नर्यापाः, पङ्क्तिराधाः, विसर्पि – यह अष्ट विभाग है । यह आधुनिक विज्ञान में ग्लुअन् (gluon) नाम से जाने जाते हैं । वायु का प्रभ्राजमाना, व्यवदाताः, वासुकिवैद्युता, रजताः, परुषाः, श्यामाः, कपिला, अतिलोहिताः, ऊर्द्ध्वा, अवपतन्ताः, वैद्युत – यह एकादश विभाग है । अग्निका वायु तथा अग्नि मिलकर १९ विभाग है । इनमें से प्रत्येक का १६ कला है । सब मिलकर (१९ x १६) = ३०४ विभाग होता है । इसीलिए एक ही शब्दतत्त्व शक्तिसम्मिलित हो कर ३०४ प्रकार में विवर्त्तित होता हैँ ।
स्फोटो रवोत्यन्तसूक्ष्मो मन्दोऽतिमन्दकः।
अतितीव्रो तीव्रतरो मध्यश्चातिमध्यमः।
महारबो घनरबो महाघनरबोस्तथा ॥
जैसे विद्युतचुम्बकीय रश्मि तरङ्ग अनेक प्रकार के होने पर भी, उनके एक छोटे से अंश से सातरङ्ग दिखते हैँ (बाकी के नहीँ दिखते), उसीप्रकार ३०४ प्रकार के शब्दों में से केवल १२ प्रकार के शब्द मनुष्यके श्रवणयोग्य है (बाकी के मनुष्यके श्रवणयोग्य नहीँ है) । इनको स्फोट, रब, अत्यन्तसूक्ष्म, मन्द्र, अतिमन्द्रक, अतितीब्र, तीब्रतर, मध्य, अतिमध्यम, महारब, घनरब, महाघनरब कहा जाता है । स्फोट वह है, जिससे शब्दका आभासमात्र होता है । महाघनरब सुनते ही कान के पर्दे फटजाते हैँ और मृत्यु हो जाता है ।
प्राकृत के पूर्व शाखा को पालि कहते हैं, जो पूर्वभारतीय भाषाओं का जननी है । पालि के कच्चायन व्याकरण के सूत्रसंख्या ७, १०, ११, ३१, ५४, ५७, १३३, १६५, १६६ एवं १६७ आदि वैदिक नियम का अनुसरण करते हैं, जो अष्टाध्यायी के नियम से भिन्न है । उसके सूत्रसंख्या २७६, २९३, २९५, २९७, २९९, ३००, ३०१, ३२३ आदि के नियम अष्टाध्यायी जैसा है, परन्तु दोनों का मूल स्रोत प्रातिशाख्य है । एक और भिन्नता समानार्थवाची शब्दों के व्यवहारको ले कर है । संस्कृत तथा अन्य लौकिक भाषाओं में पृथ्वी के स्थान पर मही अथवा धरा शब्दों के व्यवहार किया जा सकता है । परन्तु वेदमें ऐसा नहीं किया जा सकता । ऐसा करने से अर्थ वदल जाते हैं अथवा वह निरर्थक हो जाता है । वेद में प्रत्येक शव्द को उसके सन्दर्भ में विचार किया जाता है । इसके वहुत उदाहरण है । समानार्थक शब्दों में भी अक्षरों के संख्या भेदसे वेद में अर्थ वदल जाते हैं । उदाहरण के लिये अस्य और एतस्य समानार्थक शब्द है । परन्तु वेदमें इनके प्रयोग से अर्थ भिन्न हो जाते हैं, जो संस्कृत में नहीं होता । इससे सिद्ध होता है कि वेद का भाषा संस्कृत नहीं है, छन्दस् है । ऐसे और भी वहुत उदाहरण हैं जो दिखाता है कि वैदिक और संस्कृत भाषायें भिन्न है ।
आर्यभाषा प्राकृत तथा संस्कृत हैं । ऋषियों द्वारा वैदिकभाषा (वेदेविदिता वैदिकाः) पृथ्वीपर लाया गया । जव ऋषि साधारण लोगोंसे मिले, तो लौकिकभाषा (लोकेविदिता लौकिकाः) के उपर उसका प्रभाव पडा । धीरेधीरे भाषाविपर्यय आरम्भ हो कर बढता गया । उससे भाषाका व्यञ्जकता लोपहोने लगा और लोग एक कथित भाषा का विभिन्नअर्थ करने लगे । इससे मुक्ति के लिये विपर्यस्तसंस्कार द्वारा एक व्याकरण लिखागया, जो सर्वप्रथम होने से प्राक् कृत अथवा प्राकृत कहागया ।
वैदिक नियमसे प्रधान को पूर्वमें तथा अप्रधान को पश्चात् लिखने का नियम है यथा इन्द्राग्निम्, न कि अग्नीन्द्रम् । इसीलिए भरतने प्रथम होने से संस्कृत के पूर्व प्राकृत लिखा । पाणिनी ने भी अपनी शिक्षाग्रन्थ में लिखा – त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भवतो मताः । प्राकृते संस्कृते चापि स्वयं प्रोक्ताः स्वायम्भूवा । महेश्वर के मत में वर्ण सङ्ख्या ६३ अथवा ६४ हैं । प्राकृत और संस्कृत दोनों में ही यह स्वयम्भु के द्वारा निर्णीत हैं । पाणिनी का व्याकरण माहेश्वरसूत्रों पर आधारित है । शाकल्य, भरत, कोहल, वररूची, भामह, वरदराज आदि प्राकृत का व्याकरण लिखे थे । वररूची पाणिनी के समसामयिक थे । इसका विवरण कथासरित् सागर में है । प्राकृत का व्याकरण का प्राचीनता का अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि रावणने भी इस पर एक पुस्तक लिखा था । अधुनाप्राप्त रावणकृत प्राकृत कामधेनु पुस्तकमें लिखा है विस्तरात् गदितं पूर्वं संक्षेपाद् अधुनोच्यते । यह उसका प्रमाण है । कातन्त्र व्याकरण, प्राकृत प्रकाशः आदि प्राकृत का व्याकरण उपलब्ध है । अक्सफोर्ड के अध्यापक कोवेल (Edward Byles Cowell of Oxford) प्राकृत प्रकाशः के समीक्षा में लिखा है कि East-India House Library के पुस्तक सङ्ख्या ११२० तथा १५०३ में वसन्तराज कृत प्राकृत सञ्जीवनी, तथा क्रमदीश्वर एवं हेमचन्द्र कृत प्राकृत का व्याकरण पुस्तक उपलब्ध है । उत्कलीय मार्कण्डेय कबीन्द्र स्वकृत प्राकृतसर्वस्व में प्राकृत वैयाकरणों के विषयमें लिखा है – “शाकल्यभरतकोहलवररुचिभामहवसन्तराजाद्यैः प्रोक्तान् ग्रन्थान् …. अव्याकीर्णं विशदं सारं …. प्राकृतसर्वस्वमारभते”।
कालिदास के नाटकमें अन्तःपुर के नारीयाँ प्राकृतमें वार्तालाप करती है । कालक्रम से प्राकृत के पूर्व शाखा से पालि, पश्चिम शाखा से महाराष्ट्री तथा उदीच्य शाखा से पैशाची (काश्मीरी), गोर्खाली आदि भाषा सृष्टि हो गये । इनके भी आञ्चलिक अनेक भेद हो गये । भारतीय भाषाओं का जननी प्राकृत है ।
कालक्रमे पुनः भाषा विपर्यय होने लगा । तब एक अपरसंस्कार का आवश्यकता हुआ । उस अपरसंस्कार सभा में अगस्ति भी थे । आलोचना शिक्षा तथा प्रातिशाख्य के आधार पर हुआ । इच्छा, ज्ञान, क्रिया – यह तीन भावों का साङ्केतिक अ, इ, उ मानलिया गया । परन्तु ऋ के उपर विवाद आ गया । ऋ के गठन में एक चौथाइ मात्रा अ का, मध्य में अर्धमात्रा र का, शेष एक चौथाइ मात्रा अ का है । उसी प्रकार लृ का गठन है । क्युँ कि आरम्भ में और अन्त में स्वरवर्ण है, सब का कथन था कि ऋ ओर लृ स्वर वर्ण है । परन्तु अगस्ति का कथन था कि स्वर और व्यञ्जन समपरिमाण होने पर भी, स्वर का विभाजन के कारण व्यञ्जन का गुरुत्व अधिक है । पुनश्च र और ल अन्तस्थ व्यञ्जन है । इच्छा और उन्मेष शक्ति के मध्यस्थ होने से उन्हे अन्तस्थ कहा जाता है । ऋ और लृ में यही लक्षण दिखा जाता है । अतः इन्हे र्ह और ळ के रूप में व्यञ्जन वर्णों में रखना चाहिये । अन्य ऋषियों का मत था कि स्वर ही भाषाविभाग का बीज है । इच्छा और उन्मेष शक्ति केवल परा और पश्यन्ती वाक् के क्षेत्र में ही प्रकाशित और अनुभूत होते हैं । वैखरी वाणीमें जो मनुष्य कहते हैं, यह अनुभूत नहीं होता । अतः ऋ और लृ स्वर ही होंगे ।
इसके उपरान्त अनुस्वार के उपर विचार किया गया । अगस्ति को छोडकर अन्य ऋषियों का कथन था कि अनुस्वार के पूर्व यदि ह्रस्ववर्ण रहता है, तो ह्रस्ववर्ण अर्द्धमात्रा काल के लिये उच्चारित होता है और अनुस्वार देढमात्राकाल उच्चारित होता है । परन्तु अनुस्वार के पूर्व यदि दीर्घवर्ण रहता है, तो दीर्घवर्ण देढमात्रा काल के लिये उच्चारित होता है और अनुस्वार अर्द्धमात्राकाल के लिये उच्चारित होता है । क्युँ कि इसका उच्चारणकाल कहीं कहीं अर्द्धमात्रा है, जो व्यञ्जन का लक्षण है, कहीं कहीं यह देढमात्रा है, जो स्वर का लक्षण है । इसी द्वेधीभाव के कारण अगस्ति का कथन था कि अनुनासिक कॅ यमवर्ण जैसा है जो स्पर्शवर्णों के द्वैत उच्चारण के विच्छेद के लिये व्यवहृत होते हैं । उदाहरण के लिये रुक्क्मः में जो दो ककार है, उनके विच्छेदके लिये क यम का अनुनासिक व्यवहार कियाजाता है, जो व्यञ्जन है। उसीप्रकार अनुस्वार को एक अतिरिक्त न के आकार में व्यञ्जनवर्ग में रखना चाहिये। परन्तु अन्यऋषियों ने इसका विरोधकिया। उनका कहना था कि यम जीह्वामूलीय है। अतः उन्होने अनुस्वार को प्रथमवर्ग अर्थात स्वरवर्ण में रखने का निर्णय लिया।
स्पर्शवर्णों में स्पृष्टताभित्तिक क-च-ट-त-प और अनुनासिक ङ्, ञ्, ण्, न्, म् के वर्गीकरण में सर्वसम्मति रहा। परन्तु इनका ख,छ,ठ,थ,फ आदि रूप में पुनः वर्गीकरण के सम्बन्ध में मतभेद रहा। जब हृदयस्थान हो कर वायु कण्ठ से बाहर की दिशामें जाती है, तो यदि स्वरतन्त्रीयाँ अपने स्वाभाविक स्थिति (संवृत्) में होती है, उसे श्वास कहते हैं । परन्तु यदि स्वरतन्त्रीयाँ विकृत (विवृत्) स्थिति में होती है, तो उसे नाद कहते हैं । इसमें सवसे सरल अविकृत शब्द जो कण्ठसे सीधा निकल कर बाहर आती है, वह अ है । इसीलिये कहा गया है कि ‘अकारो वै सर्वा वाक् सा एषा स्पर्शअन्तःस्थ-ऊष्मभिः व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति’ (ऐतरेय आरण्यकम् २/३/७/१३) । गीता में भी कहागया है अक्षराणामकारोऽस्मि । पाणिनी माहेश्वरसूत्र अइउण् से आरम्भ कर अन्तिमसूत्र अअ में परिसमाप्त किया है जहाँ विवृत अकार का पुनराय संवृतगुण का प्राप्तिविधान कियागया । पतञ्जलि भी कहते हें अकारस्य विवृतोपदेशः कर्तव्यः।
यदि अकार उच्चारण करने के समय उसे गले में रोक दिया जाय और फिर सीधे छोड दिया जाय, तो वह ककार वन जाता है । परन्तु शक्तिभेद से यदि वह ककार सीधी ओष्ठ से न निकल कर तीरछी हो जाय और तालु, मूर्द्धा अथवा दन्तमूल को स्पर्श करते हुये निकले, तो वह यथाक्रम ख, ग, और घ वन जाता है । अतः यह चार भेद होना चाहिये । अगस्ति का कहना था कि शक्तिभेद से शब्द का उच्चावचता वढ जाती है, परन्तु अर्थभेद नहीं होता । ककार धीरे से उच्चारण करो अथवा जोर से, ककार ककार ही रहता है । अतः ख, ग, घ का वर्गीकरण अनावश्यक है ।
अन्यों का कहना था कि वाह्यप्रयत्न ११ प्रकार के होते हैं – विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष. अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित । खर् प्रत्याहार वाले वर्णों (ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श,ष,स) के वर्ग के वाह्यप्रयत्न विवार, श्वास और अघोष है । इसमें कण्ठ खुला रहता है । हश् प्रत्याहार वाले वर्णों (ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द) के वर्ग के वाह्यप्रयत्न संवार, नाद और घोष है । इसमें कण्ठ मुँदा रहता है । वर्गों के प्रथम, तृतीय और पञ्चम वर्णों तथा य, व, र, ल का वाह्यप्रयत्न अल्पप्राण है । वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ वर्णों तथा श, ष, स, ह का वाह्यप्रयत्न महाप्राण है । अतः ख, ग, घ का वर्गीकरण आवश्यक है ।
अगस्ति का कहना था कि शक्तिभेद उष्मवर्णों के लिये व्यवहार किया जाता है, जहाँ क्रिया और उन्मेषशक्ति का प्राधान्य रहता है । परन्तु स्पर्शवर्णों में ज्ञान और उन्मेषशक्ति का प्राधान्य रहता है । अतः ख, ग, घ का वर्गीकरण अनावश्यक है । अन्यों का कहना था कि पदों के स्वर बीज और व्यञ्जन योनि है । बीज केवल समजातीय पदार्थों का उत्पादन कर सकता है । परन्तु योनि विषमजातीय पदार्थों का उत्पादन भी कर सकती है ।
अगस्ति का कहना था कि उष्मवर्णों में श, ष. स का भेद अनावश्यक है कारण उसमें शक्ति का अपचय होता है । अन्यों का कहना था कि पद के प्रयोजनों में शक्तिग्रह से व्यञ्जकत्व अधिक महत्वपूर्ण है । शक्तिग्रह सन्धि से भी होता है, जहाँ दो पदों के अन्तिम और प्रथम वर्णों का योग होता है (परः सन्निकर्षः संहिता – अष्टाध्यायी १-४-१०९) । वहाँ उच्चारण स्थान पर विशेष ध्यान दिया जाता है । उदाहरण स्वरूप तत् शब्द का अन्तिमवर्ण त् है और पुरुष का प्रथमवर्ण पु है । त और प के उच्चारण स्थान दन्तमूल और ओष्ठ है । अतः उनका सन्धि होनेसे तत्पुरुष उच्चारण करने में असुविधा नहीं है । परन्तु यदि दोनों के उच्चारण स्थान भिन्न हो, तो सन्धि इतना सरल नहीं होता । उदाहरण स्वरूप, तत् और हित का सन्धि करनेके लिये ह (जो कि उष्मवर्णों के चतुर्थअक्षर है) का उच्चारणस्थान कण्ठ है । उच्चारण के सरलताके लिये त अपनास्थान त्यागकर अपनेवर्ग के चतुर्थस्थान ध में परिवर्तित होजाता है । तब तद्धित उच्चारण करनेमें सुगमता होती है । यदि स्पर्शवर्णोंका विभाग नहीं रहेगा, तो उच्चारणमें विषमता होगी ।
स्पर्शवर्णों का उच्चारण के प्रसङ्ग में एक और मतभेद आया । व्यञ्जन वर्णों के उच्चारण के काल अर्द्धमात्रा है । स्वरवर्ण के उच्चारण के काल अधिक हो सकता है । यदि हम क का उच्चारण करते रहें, अल्प समय के पश्चात् वह अ हो जायेगा । अतः अगस्ति को छोडकर अन्य ऋषियों का मत था कि यदि स्पर्शवर्ण के पश्चात् अन्य स्वरवर्ण नहीं रहता, तो वहाँ अ रहेगा – अर्थात् क् नहीं उसका उच्चारण क होगा । अगस्ति का मत था कि व्यञ्जन वर्णों के पश्चात् स्वरवर्ण का रहना गौण है । समस्त व्यञ्जनवर्ण स्थान और प्रयत्न भेद से अकार का विवृतोपदेश है । अतः अकार का प्रधान्य स्वीकार करना चाहिये । परन्तु अक्षरसमाम्नाय में, अनुवृत्तिनिर्देश में तथा धातु आदि में विद्यमान अकार एक । परन्तु व्यञ्जनवर्ण में यह व्यावृत् रह नहीं सकता, कारण अन्य समस्त वर्ण व्यावृत् है । स्वरवर्ण वीज है । व्यञ्जनवर्ण योनि है । विना बीज के शव्द उत्पन्न नहीं हो सकता । परन्तु संवृत् होने से यहाँ अकार का व्यवहार नहीं हो सकता । पुनश्च अकार इच्छाशक्ति के साङ्केतिक है । व्यञ्जनवर्ण भावव्यञ्जक होने से ज्ञानशक्ति का साङ्केतिक है । अतः ककारादि का उच्चारण इक्, इच्, आदि होना चाहिये । अन्य ऋषियों ने इसको भी प्रत्याख्यान किया ।
अपने मत का बारम्बार प्रत्याख्यान किये जाने से अगस्ति क्षुब्ध होकर सभात्याग करके चलेगये और कैलाशमें शिवशम्भू से मिलने पहुँचे । कैलाश पहुँच कर कोइ कुछ बोलने से पूर्व, अगस्ति को एक दिव्यसुगन्ध का अनुभव हुआ । वह सुगन्धका स्रोत जानने केलिये अगस्ति चारोंदिशाओं को देखरहे थे । शिवजी उनका आशय जानकर चक्षुसे एक दिशा में इङ्गित किये । अगस्तिने देखा कि कुछ विल्वपत्र और विल्वपुष्प से वह सुगन्ध आ रही थी । अनायास उनके मुँहसे निकल गया तमिलम्, तमिलम् (मधुरम्, मधुरम्)। उसके पश्चात् उन्होने शिवजी से सारे वृतान्त कह कर उनका विचार जानना चाहा । सवकुछ शुनने के पश्चात् शिवजी ने कहा व्यञ्जकत्व के दृष्टि से अन्य ऋषियों ने जो कहा, वही ठीक है । परन्तु वाक्य का शव्दशक्तिग्राहकता भी आवश्यक है । उस दृष्टि से अगस्ति का मत भी उचित ही है ।
अपने मत का शिवजी द्वारा पुष्टि किये जाने पर अगस्ति वहुत आनन्दित हुए । उन्होने अपना एक अलग व्याकरण वनाने का निश्चय किया। अन्य ऋषियों का व्याकरण अपरसंस्कार से उद्धृत होने के कारण संस्कृत कहलाया । अगस्ति ने विचार किया कि शिवजी के सान्निध्यमें जहाँ उन्होने अपने नुतन व्याकरण वनाने का निश्चय किया था, प्रथम उच्चारित शब्द तमिलम् था । अतः उन्होने अपने भाषा का नाम तमिल रखा । परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से तमिल भाषा में कुछ त्रृटियाँ थी । इसलिये अगस्ति को संस्कृत के कुछ शब्द (जैसे ज तथा अन्य ग्रन्थलिपि) लेना पडा ।
वर्णसृष्टि का मूल अकार है । “अकारो वै सर्वावाक्। सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति” के अनुसार एक अकार से ही सम्पूर्ण वाक् प्रपञ्चका निर्माण हुआ है । अकार ही तालु स्थान में व्यङ्ग्य हो कर इ वन जाता है । वही ओष्ठ, दन्त, मूर्द्धा स्थानमें उन्मेष हो कर उकार, ऋकार, लृकार वन जाता है । वही स्पर्श से (स्थान और करण के संयोग से) क-च-ट-त-प हो जाता है । महाप्राण से क ख वन जाता है। इ य वन जाता है । उ व वन जाता है । केवल स्पर्श-उष्ण के तारतम्य से एक अकार ही सम्पूर्ण वाङ्मण्डल वन जाता है । “अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्” इसी विद्या का प्रतिपादन करता है । शम्भुशिक्षा में भी कहा गया है “मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । मारुतस्तूरसि चरन्मन्द्रं जनयति स्वरम्”। मन शरीर के उष्मा को मूलाधार से प्रेरित करता है । वह उष्मा वायु को प्रेरित करता है । वह वायु नाभि, हृत्, होते हुये कण्ठ के स्वरतन्त्रियों को आन्दोलित करते हुए जब मुख से निर्गत होता है, उसे स्वर कहते हैं । अ से वर्णमाला का आरम्भ है और क्ष से शेष है । मध्य का वर्ण अ का गतिशीलता के कारण आगन्तु है । यही गतिशीलता को र द्वारा द्योतित किया जाता है । इसलिये वर्णप्रपञ्च के अङ्ग को अक्षर कहते हैं । अ ही उपक्रम है । अ ही उपसंहार है । अ ही हिंकार है । अ ही निधन है । इसलिये “वागित्येकमक्षरम्” कहा गया है । पाणिनि का अन्तिमसूत्र “अ-अ” इसी विद्या का प्रतिपादन करता है ।
“शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परम्ब्रह्माधिगच्छति” के अनुसार शब्दब्रह्म की उपासना ही परम्ब्रह्म को जानने का उपाय है। परन्तु कैसे? प्रज्ञानविशिष्ट अक्षर द्योतनशीलता के कारण देवतारूप है। वही उपास्य है। कारण उपासना केवल विशिष्ट की ही हो सकती है। उपासना हेतुभाव से सम्बन्ध रखती है। अद्वैत में उपासना नहीं है। वहाँ केवल ज्ञानमात्र है। वह केवल परमात्मा अथवा ब्रह्म है (जो कि शब्द-पर भेदशून्य एकरूप है)। परन्तु जब उपासना पर दृष्टि जाता है, तो चतुष्पात् आत्मब्रह्म का शब्द-पर दो भेद मानने पडते हैं। वही आत्मा उपास्य कोटि में जाता हुआ अध्यक्षरम् नाम से व्यवहृत होता है (अक्षरमधिकृत्य वर्ण्यमानः उपास्यात्मा अध्यक्षरम्)। उपास्य आत्मा (परम्ब्रह्म) अक्षर नाम से प्रसिद्ध होता है। उपासनासाधनभूत शब्दब्रह्म ओंकार नाम से प्रसिद्ध होता है। मात्रा को लक्ष्य वनाकर प्रवृत्त होनेसे उसे अधिमात्र कहते हैं (सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति – माण्डुक्योपनिषद् ३.१)।
मन में से कामना का उदय होता है। कामना के अव्यवहितोत्तरकाल में प्राणव्यापार आरम्भ हो जाता है। उससे शान्त-स्थिर वाक् समुद्र में गति सृष्टि होती है (so-called big bang)। प्राणसम्बन्ध के तारतम्य से वाक् समुद्र में वीची तरङ्ग (wave) सृष्टि होता है, जिसे कम्प (vibration) कहते हैं। जब वह हमारे श्रवणेन्द्रिय में नोदन सम्बन्ध से युक्त होता है, तब वह हमारे प्रज्ञारूप इन्द्र से बद्ध हो जाता है। बद्ध-तरङ्गों में परिणत वाक् खण्ड ही क-च-ट-त-प, आदि वर्णों का जननी वनती है। उसीसे शब्दसृष्टि होता है। इसलिये वाक् को इन्द्रपत्नी कहते हैं (वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः, पशवो मनुष्याः। वाचीमां विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी – तैत्तिरीयब्राह्मणम् २.८८.४)।
प्राणसम्बन्ध के तारतम्य से वाक् समुद्र में जो वीची तरङ्ग (wave) सृष्टि होता है, यदि वह किसी केन्द्रपर अभिघात सम्बन्ध से युक्त होता है, तब उसे चिति (confinement) कहते हैं। प्रत्येक चिति में प्राणसम्बन्ध के तारतम्य से केन्द्र से विक्षेपण रूपी गति (positive charge) अथवा परिधि से केन्द्र के दिशा में आगति (negative charge) सृष्टि होता है (स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः – ऋग्वेदः १.१६४.१६)। विक्षेपणधर्मा गति इन्द्र कहलाता है (स योऽयं मध्ये प्राणः। एष एवेन्द्रस्तानेष प्राणान्मध्यत इन्द्रियेणैन्द्ध यदैन्द्ध तस्मादिन्ध इन्धो ह वै तमिन्द्र इत्याचक्षते परोऽक्षं परोऽक्षकामा हि देवास्त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त – शतपथब्राह्मणम् ६.१.१.२) । गति-आगति समष्टि को स्थिति रूप ब्रह्मा कहते है । वही सब का प्रतिष्ठा है (सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मैव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्यां सैवास्मै प्रतिष्ठाऽभवत्तस्मादाहुर्ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठेति – शतपथब्राह्मणम् ६.१.१.८) । स्थिति से यदि गति अथवा आगति का एक अंश वाहर कर दिया जाये अथवा योग कर दिया जाये, तो वह आगति अथवा गति वन जाती है । जिस स्थान से यह गति आरम्भ होती है, वही मध्यप्राण है । उसे ही इन्द्र कहते हैं ।
आगति प्रविष्टधर्मा व्याप्ति होने से विष्णु कहलाता है (वि॒षॢँ॑ व्या॑प्तौ)। गति-आगति रूपी इन्द्र-विष्णु का स्पर्धा से तीन साहस्री उत्पन्न होते हैं (इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदेरयेथाम् – ऋग्वेदः ६-६९-८)। ऐतरेयारण्यक के मत से यह तीन साहस्री लोक, वेद और वाक् है (इमे लोकाः इमे वेदाः अथ वागितिव्रुयात्)। ये ही तीन लोक है। ये ही सम्पूर्ण विश्व है। स्थिति गर्भित गति को अग्नि (fermions) कहते हैं (अथ यो गर्भोऽन्तरासीत् । सोऽग्रिरसृज्यत स यदस्य सर्वस्याग्रमसृज्यत तस्मादग्रिरग्रिर्ह वै तमग्निरित्याचक्षते परोऽक्षं परोऽक्षकामा हि देवा – शतपथब्राह्मणम् ६.१.१.११)। तथा स्थिति गर्भित आगति को सोम (leptons) कहते हैं। विश्व इन्ही का मिथुन (coupling) है (अग्निषोमात्मकं जगत् – बृहज्जाबालोपनिषत् २.१)।
सृष्टिमूला वाक्, अव्यय वाक् का स्वयम्भू (सत्यलोक) में विकाश है। उसे स्वायम्भुवी, अनादिनिधना, सत्या, वेद आदि नाम से जाना जाता है। इस वेद वाक् का ऋक्-साम दो विभाग है। ऋक् मूर्त्ति को कहते हैं कारण चिति का अभिघात से तरङ्गें मूर्छित हो जाते हैं (मूर्छनात् मूर्त्तिः)। साम तेज रूपी महिमामण्डल को कहते हैं। (ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत्। सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्वं हेदं ब्रह्मण हैव सृष्टम् – तैत्तिरीय ब्राह्मणम् ३.१२.९.१)। यजुः का यत् और जू दो विभाग है। यत् भाग प्राण है। जू भाग वाक् है। (अयं वाव यजुः योऽयं पवते। एष हि यन्नेवेदं सर्वं जनयति। एतं यन्तमिदमनु प्रजायते। तस्माद्वायुरेव यजुः। अयमेवाकाशो जूः-यदिदमन्तरिक्षम्। एतं ह्याकाशमनु जवते। तदेतत्-यजुर्वायुश्चान्तरिक्षञ्च। यच्च जूश्च। तस्माद्यजुः। तदेतत्-यजुर्ऋक्सामयोः प्रतिष्ठितम्। ऋक्सामे वहतः – शतपथब्राह्मणम् १०.३.४.१,२। त्रयीवेद अन्नाद है। आग्नेय है (सैषा त्रय्येव विद्या तपति – शतपथब्राह्मणम् १०.४.२.१)। अथर्वणवेद अन्न है। सौम्य है (अथर्वणां चन्द्रमा देवतं तदेव ज्योतिः सर्वाणि छन्दास्यापः स्थानम् – गोपथब्राह्मणम् पूर्व १.२९)।
इसी वाक् भाग से प्राणव्यापार द्वारा अप् सृष्टि होता है। वह जनलोक का आपोमय परमेष्ठी कहलाता है। स्वायम्भुवी सत्यावाक्गर्भिता पारमेष्ठ्य आपोमयी वाक् ही शब्द तथा परम्ब्रह्म का उपादान है। समस्त भूत आपोमय है। इसका भृगु एवं अङ्गिरा दो विभाग है (आपो भृग्वङ्गिरो रूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम्। सर्वमापोमयं भूतं सर्वं भृग्वङ्गिरोमयम्। अन्तरैते त्रयो वेदा भृगुनङ्गिरसोऽनुगाः – गोपथब्राह्मणम् – पूर्व १-३९)। भृगु सोम है। वह सौम्या वाक् का जननी है। सौम्या वाक् को आम्भृणी वाक् (वागाम्भृणी) कहते हैं। ऋग्वेद १०.१२५ के “अहं रुद्रोभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।…” सूक्त में इसके उपर विशेष चर्चा किया गया है। यही परम्ब्रह्म का जननी है। “त्रयो वा इमे त्रिवृतो लोकाः। अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः। प्रजापतिस्तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा प्राणादेव इमं लोकं, अपानादन्तरिक्षलोकं, व्यानादमुं लोकं प्रावृहत्। सोऽग्निमेवास्माल्लोकात् वायुमन्तरिक्षलोकात् आदित्यं दिवः असृजत। सोऽग्नेरेवर्चः, वायोर्यजूषि, आदित्यात् सामानि असृजत” (शाङ्खायनब्राह्मणम् ६.१०)।
अङ्गिराभाग आपोमय होने पर भी आग्नेय है। वह आग्नेयी वाक् का जननी है। आपः के अम्भः, मरीची, मर, आपः चार विभाग है जो त्रिलोक एवं चतुर्थो देवलोक में रहते हैं। “अपां चैव समुद्रेकात् समुद्र इति संज्ञितः” – यह ब्रह्मवैवर्त वचन के अनुसार लोक भेद से समुद्र के नाम भिन्न हो जाता है। पार्थिव समुद्र को अर्णव कहते हैं। आन्तरिक्ष समुद्र को सरस्वान् कहते हैं। द्वौलोक के समुद्र को नभस्वान् कहते हैं । आग्नेयी वाक् आन्तरिक्ष होने से, उसे सरस्वती वाक् कहते हैं । ऋग्वेद ६.६१ के सरस्वती सूक्त में इसके उपर विशेष चर्चा किया गया है । इस सूक्तके १४ ऋचाओंमें से ९ गायत्रीछन्द में है, जो पृथ्वीसे सम्बन्धित है। एकऋचा त्रिष्टुप् छन्दमें है, जो अन्तरिक्ष से सम्बन्धित है। चारऋचायें जगती छन्द में है, जो द्वौलोक से सम्बन्धित है। अतः सरस्वती त्रिलोकव्यापिनी है। यही शब्दब्रह्म का जननी है।
चतुर्विध पुरुषार्थ ।
प्रजापति ने एकलक्ष अध्याय का प्रथम धर्मार्थकाममोक्ष सम्बलित ग्रन्थ लिखा । उसमें आन्विक्षिकी (आत्मविद्या), त्रयी (वेदों का प्रक्रिया सम्बन्धी चर्चा), वार्ता (वृत्तिरस्याम् अस्तीति – वृत्ति सम्बन्धी ज्ञान), तथा दण्डनीति (राज्यशासन कला) यह चार विभाग थे । मनु ने उसका धर्मसम्बन्धी आन्विक्षिकी भाग का संकलन कर तथा अन्य विषयों को गौण कर संक्षिप्त से मानव धर्मशास्त्र का उपदेश किया । अपस्तंब, गौतम, बौधायन और वशिष्ठ के धर्मसूत्र प्रसिद्ध है । मानव धर्मसूत्रको मनुसंहिता अथवा मनुस्मृति कहते हैँ । अन्य १८ स्मृतिग्रन्थ प्रसिद्ध है ।
विशालाक्ष ने उसका अर्थसम्बन्धी त्रयी भाग का संकलन कर तथा अन्य विषयों को गौण कर संक्षिप्त से अर्थशास्त्र का उपदेश किया । उसपर इन्द्रने बाहुदन्त नामक अर्थशास्त्र का उपदेश किया, जिसमें त्रयी को प्राधान्य दिया गया था । वृहष्पति ने वार्ता को मुख्य मान कर वाहर्पत्य अर्थशास्त्रम् का उपदेश किया । शुक्रने दण्डनीति को मुख्य मान कर शुक्रनीति का उपदेश किया । कालक्रम से यह विद्या लोप होता हुआ देख कौटिल्य ने वृहष्पति तथा शुक्र के शास्त्रों को सङ्कलित कर अपना अर्थशास्त्रम् का उपदेश किया ।
शिवानुचर नन्दि ने काम का संकलन कर तथा अन्य विषयों को गौण कर कामशास्त्र का उपदेश किया । उसमें दशहजार अध्याय थे । नन्दिकेश्वरकृत कामसूत्रम् का श्वेतकेतु औदालकीने संक्षिप्त कर एक हजार अध्याय में किया था । बाभ्रव्य पाञ्चाल उसे संक्षिप्त कर एक शत अध्याय में लिखा तथा उसे ७ अधिकरणों में विभाग किया । पाटलीपुत्र नगरके गणिकाओं के अनुरोधसे दत्तक उसके पारदारिक अधिकरणके उपर एक शास्त्र लिखा । तत्पश्चात् चारायण साधारण अधिकरणके उपर, सुवर्णनाभ साम्प्रयोगिक अधिकरणके उपर, घोटकमुख कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरणके उपर, गोनर्दीय भार्याधिकारिक अधिकरणके उपर, गोणिकापुत्र पारदारिक अधिकरणके उपर एवं कुचुमार औपनिषदिक अधिकरणके उपर एकदेशीय शास्त्र लिखा । ऐसे एकदेशीय परम्परासे मूल कामसूत्रम् का स्वरूपविच्युति देखकर वात्सायनने उसका सङ्कलन कर अपना कामसूत्रम् लिखा, जो सबसे अधिक प्रसिद्ध हुआ ।
शिक्षा ।
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत् प्रैरत नामधेयं दधानाः।
यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः॥ (ऋक् १०/७१/१) ॥
ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ तैत्तिरीयोपनिषदत् – शिक्षावल्ली १ ॥
शिक्षँ॒ विद्योपादा॒ने धातु से शिक्षा शब्द वनता है, जिसका अर्थ अभ्यासे वर्णानामुच्चारणप्रदर्शके, वेदाङ्गे ग्रन्थभेदे आदि है ।
अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि पाणिनीयमतं यथा ।
शास्त्रानुपूर्वं तद्विद्याद् यथोक्तं लोकवेदयोः ।
प्रसिद्धमपि शब्दार्थमविज्ञातमबुद्धिभिः ।
पुनर्व्यक्तीकरिष्यामि वाच उच्चारणे विधिम् ।
वेदाङ्गों में उच्चारणपद्धति का ज्ञान सम्बन्धी उपदेश को शिक्षा कहते हैँ (शिक्ष्यते ज्ञायते साक्षाद्वर्णाद्योच्चारणं यया)। अ, क, आदि वर्ण । त्रिषष्ठी (६३) अथवा चतुःषष्ठी (६४) वर्ण (त्रिषष्टिश्चतुष्षष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः-पाणिनीय शिक्षा) । उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि तथा सामवेदके जात्य, क्षैप्र, तैरव्यञ्जन, तिरोविराम आदि स्वर । ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत – अर्द्ध, पूर्ण आदि उच्चारणकाल मात्रा । बल अर्थात वर्णों के उच्चारण में होनेवाली वाह्य तथा आभ्यन्तर प्रयत्न एवं कण्ठ, तालु आदि अष्टस्थान । सम एवं सुस्वर नातिद्रुत नातिबिलम्बित स्पष्ट उच्चारण – वैषम्य विवर्जित समता – वर्णानां मध्यमवृत्योच्चारणम् । संहिता पाठ में सन्धिनियम का पालन – यह शिक्षा का विषय है ।
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य – शिक्षा वेद का घ्राणस्थानीय है, जिससे मेध्य-अमेध्य – शुद्धाशुद्ध का ज्ञान होता है । स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्र शिक्ष्यते उपदिश्यते सा शिक्षा । स्वर-वर्ण आदि का उच्चारण प्रकार जिससे शिक्षा दी जाती है, वह शिक्षा वेदाङ्ग है ।
अध्ययन (अधि+इङ्) का ग्रहण, धारण तथा ब्रह्मयज्ञ के भेद से तीन विभाग किया गया है । गुरुमुख से उच्चारित शब्द का ग्रहण (कण्ठस्थ करना) और स्मृति में उसका धारण (याद रखना) करने के पश्चात उसका पारायण (मनन करना) को ब्रह्मयज्ञ कहते हैँ । व्यासशिक्षा, लक्ष्मीशिक्षा, भारद्वाजीशिक्षा, आरण्यशिक्षा, शम्भुशिक्षा, आपिशलीशिक्षा, पाणिनीयशिक्षा, कौहली शिक्षा, वासिष्ठीशिक्षा – यह नौ शिक्षाग्रन्थ प्रसिद्ध है । सामवेदके लिए नारदीया शिक्षा प्रशस्त है ।
सर्वप्रथम समस्त वस्तुओंके केवल नाम ही दियेगये थे । गुहाके भीतर वाक् के जो ३पद थे, उनको उसीप्रकार वैखरीवाक् (उच्चरित और लिखित) में व्यक्तकिया । अव्यक्त वाणीको व्यक्तरूपमें यथातथ्य उपसर्ग-प्रत्यय, कारक, विराम चिह्नों (पाप-विद्ध) आदि द्वारा वाक्यमें प्रकटकरनेसे वह शाश्वत होती है – शब्द वेद दोनों का सृष्टि अव्यक्त से व्यक्त का निर्माण है । इनकी प्रक्रिया ईशावास्योपनिषत् में है –
स पर्यगात् शुक्रं अकायं अव्रणं अस्नाविरं शुद्धं अपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भू याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ (८) ॥
कवि = निर्माता-कणों या शब्दों को कवल में बन्द करता है । मनीषी-विचारक, मन के संकल्प से निर्माण करता है । परिभू -जैसे भूमि को घेर रखा है ।
ब्रह्मा बृहस्पतये प्रोवाच, बृहस्पतिरिन्द्राय, इन्द्रो भरद्वाजाय, भरद्वाज ऋषिभ्यः, ऋषयो ब्राह्मणेभ्यः । (ऋक्तन्त्र)।
महेश्वरसे ज्ञानप्राप्तकर ब्रह्माने इसका ज्ञान वृहस्पतिको दिया, वृहस्पतिने इन्द्रको, इन्द्रने भरद्वाजको और भरद्वाजने ब्राह्मणोंको इसका उपदेश दिया । कथित है कि –
येनाक्षर समाम्नायं अधिगम्य महेश्वरात् ।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नम्ः॥ (पाणिनीय शिक्षा, अन्तिम श्लोक) ॥
देवलक्ष्मं वै त्र्यालिखिता तामुत्तर लक्ष्माण देवा उपादधत (तैत्तिरीय संहिता ५/२/८/३)
ब्रह्माद्वारा इसप्रकार लेखनका आरम्भ हुआ –
नाकरिष्यद् यदि ब्रह्मा लिखितम् चक्षुरुत्तमम् । तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभा गतिः॥ (नारद स्मृति) ॥
षण्मासिके तु समये भ्रान्तिः सञ्जायते यतः।
धात्राक्षराणि सृष्टानि पत्रारूढ़ान् यतः परां ॥ (बृहस्पति-आह्निक तत्त्व) ॥
ब्रह्माद्वारा अधिकृत बृहस्पतिने प्रति पद के लिये अलगचिह्न बनाये थे ।
वर्णों के संकेत से १४सूत्र महेश्वर ने बनाये (१४ माहेश्वरसूत्र) जिनसे क्रमशः व्याकरण परम्परा चली । यह सूत्र है –
१. अ इ उ ण्। २. ॠ ॡ क्। ३. ए ओ ङ्। ४. ऐ औ च्। ५. ह य व र ट्। ६. ल ण् ७. ञ म ङ ण न म्। ८. झ भ ञ्। ९. घ ढ ध ष्। १०. ज ब ग ड द श्। ११. ख फ छ ठ थ च ट त व्। १२. क प य्। १३. श ष स र्। १४. ह ल्।
प्रत्याहारका अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन । अष्टाध्यायीके प्रथमअध्यायके प्रथमपाद के ७१ वें सूत्र “आदिरन्त्येन सहेता” (१-१-७१) सूत्रद्वारा प्रत्याहार बनानेकी विधिका पाणिनिने निर्देश किया है । (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्णके साथ (सह) मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदिवर्ण (पहला) एवं इत्सञ्ज्ञक अन्तिमवर्णके पूर्व आए हुए वर्णोंका समष्टिरूपमें बोधकराता है । जैसे अच् – अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ। उसीप्रकार हल् प्रत्याहारकी सिद्धि ५वें सूत्र हयवरट् के आदिअक्षर “ह” को अन्तिम १४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर ल् के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है । फलतः हल् – ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द,ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह ।
स्वरा विंशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः । यादयश्च स्मृता ह्यष्टौ चत्वारश्च यमाः स्मृताः ॥ (पाणिनीयशिक्षा ४) ॥
शुक्लयजुःप्रातिशाख्यम् । अष्टमोऽध्यायः ।
अ इति आ इति आ३ इति । इ इति ई इति ई३ इति । उ इति ऊ इति ऊ३ इति । ऋ इति ॠ इति ॠ३ इति । लृ इति लॄ इति लॄ३ इति । अथ सन्ध्यक्षराणि । ए इति ए३ इति । ओ इति ओ३ इति । ऐ इति ऐ३ इति । औ इति औ३ इति । इति स्वराः ।
अथ व्यञ्जनानि ।
किति खिति गिति घिति ङिति कवर्गः । चिति छिति जिति झिति ञिति चवर्गः । टिति ठिति डिति ढिति णिति टवर्गः । तिति थिति दिति धिति निति तवर्गः । पिति फिति बिति भिति मिति पवर्गः । इति स्पर्शाः २५
अथान्तःस्थाः । यिति रिति लिति विति ।
अथोष्माणः । शिति षिति सिति हिति ।
अथायोगवाहाः । अः इति विसर्जनीयः । ःक इति जिह्वामूलीयः । ःप इत्युपध्मानीयः । अं इत्त्यनुस्वारः । हुं इति नासिक्यः । कुं खुं गुं घुं इति यमाः ।
एते पञ्चषष्टिवर्णाः ब्रह्मराशिरात्मा वाचः । यत्किञ्चिद्वाङ्मयं लोके सर्वमत्र प्रयुज्यते । तत्समुदायोऽक्षरम् वर्णो वा । अक्षरसमुदायः पदम् ।
शम्भुशिक्षा में कहा गया है “मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । मारुतस्तूरसि चरन्मन्द्रं जनयति स्वरम्”। मन शरीर के उष्मा को मूलाधार से प्रेरित करता है। वह उष्मा वायु को प्रेरित करता है । वह वायु नाभि, हृत्, होते हुये कण्ठ के स्वरतन्त्रियों को आन्दोलित करते हुए जब मुख से निर्गत होता है, उसे स्वर कहते हैं । अ से वर्णमाला का आरम्भ है और क्ष से शेष है । मध्य का वर्ण अ का गतिशीलता के कारण आगन्तु है । यही गतिशीलता को र द्वारा द्योतित किया जाता है । इसलिये वर्णप्रपञ्च के अङ्ग को अक्षर कहते हैं । अ ही उपक्रम है । अ ही उपसंहार है । अ ही हिंकार है । अ ही निधन है । इसलिये “वागित्येकमक्षरम्” कहा गया है । पाणिनि का अन्तिमसूत्र “अ-अ” इसी विद्या का प्रतिपादन करता है ।
प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण मूलाधारादि सात चक्रों में से एक या अधिक चक्रों को प्रभावित करते है । जैसे –
मूलाधार चक्र अकार स्वर एवं क वर्ग व्यञ्जन का उच्चारण को क्रियाशील करता है ।
स्वाधिष्ठान चक्र इ तथा च वर्ग व्यञ्जन का उच्चारण को क्रियाशील करता है ।
मणिपूरक चक्र ऋ तथा ट वर्ग व्यञ्जन का उच्चारण को क्रियाशील करता है ।
अनाहत चक्र लृ तथा त वर्ग व्यञ्जन का उच्चारण को क्रियाशील करता है ।
विशुद्धि चक्र उ तथा प वर्ग व्यञ्जन का उच्चारण को क्रियाशील करता है ।
ईषत् स्पृष्ट वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से आज्ञा चक्र एवं अन्य चक्रों को क्रियाशील करता है ।
ईषत् विवृत वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से सहस्त्राधार चक्र एवं अन्य चक्रों को क्रियाशील करता है ।
विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है । अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है । जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं वे केवल विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं । उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भवरे की तरह गुंजन करना होता है । अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है । अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा, उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा ।
बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यवर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दपारायणं प्रोवाच । (पतञ्जलि-व्याकरण महाभाष्य १/१/१)
तथा च बृहस्पतः-प्रतिपदं अशक्यत्वात् लक्षणस्यापि अव्यवस्थितत्वात् तत्रापि स्खलित दर्शनात् अनवस्था प्रसंगाच्च मरणान्तो व्याधिः व्याकरणमिति औशनसा इति। (न्याय मञ्जरी)। इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः। पाणिन्यमरजैनेन्द्रा भवन्त्यष्टौ हि शाब्दिकाः॥
प्रतिशब्द के अध्ययन को शब्दपारायण कहते थे । पूरे जीवन पढ़ने पर भी से समझना सम्भव नहीं था । अतः शुक्र (उशना) ने इसे मारणान्तक व्याधि कहा । इसमें सुधार केलिये इन्द्रने ध्वनिविज्ञानके आचार्य मरुत् की सहायतसे शब्दोंको अक्षरों और वर्णोंमें बांटा तथा वर्णोको उच्चारण स्थानके आधारपर वर्गीकृत किया (व्याकरोत्) । उसीको व्याकरण कहते हैँ ।
वाक् वै पराची अव्याकृता अवदत् । ते देवा इन्द्रं अब्रुवन्। इमां नो वाचं व्याकुरुत-इति । … तां इन्द्रो मध्यत अपक्रम्य व्याकरोत् । तस्मादिदं व्याकृता वाग् उद्यते इति। (तैत्तिरीय संहिता ६/४/७)। तामखण्डां वाचं मध्ये विच्छिद्य प्रकृति-प्रत्यय विभागं सर्वत्राकरोत् – सायण भाष्य ।
स (इन्द्रो) वाचैव व्यवर्तयद् (मैत्रायणी संहिता ४/५/८)।
इसमें क से ह तक ३३ व्यञ्जन सौरमण्डल के ३३ भागों के प्राण रूप ३३ देवों के चिह्न हैं । १६ स्वर मिलाने पर ४९ वर्ण ४९ मरुतों के चिह्न हैं जो पूरी आकाशगंगा के क्षेत्र हैं । चिह्न रूप से देवों का नगर होने के कारण इसे देवनागरी कहा गया ।
कल्प ।
वेदविहितानांकर्मणामानुपूर्व्यणकल्पनाशास्त्रम् । वेदविहित कर्म्मों के विहित क्रम (किसके पश्चात् क्या करना चाहिए) का जिससे वर्णन हो, उसे कल्प कहते हैँ ।
हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते – कल्प वेद का हस्तस्थानीय है । अर्थात् कार्यशक्ति है ।
कल्पमें अनुष्ठान तथा देवपूजा प्रकरण आदि आते हैँ । मशकविरचितः आर्षेयकल्पः तथा पर्शुरामकल्पसूत्रम् प्रसिद्ध है । इसी वर्ग में गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र, श्रौतसूत्र, शुलबसूत्र – यह चार विभाग है । भाव को व्यक्त करने की आत्मव्यञ्जक शक्ति को संस्कार कहते हैँ । विभिन्न प्रकार के संस्कार के प्रयोग, पद्धति आदि का निर्द्देश करनेवाले ग्रन्थ इस विभाग में आते हैँ । स्मृति भी इस विभाग में आते हैँ ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह यः – शरीरको पावन वनाने के लिए जो अनुष्ठान किया जाता है, उसे गृह्यसूत्र में सङ्कलित किया गया है । प्रकृति ने जैसे सृष्टि किया है, उसका संस्कार कर अधिक उपयोगी वनाने के प्रक्रिया इस के अन्तर्गत आते हैँ । इसके द्वारा दोषमार्ज्जन (उपस्थित दोष का दूरीकरण), अतिशय-आधान (उपस्थित गुणों में वृद्धि) एवं हीनाङ्गपूर्त्ती (अभाव का दूरीकरण) होता है । यह संस्कार षोडश प्रकार के हैँ –
१. उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये गर्भाधान संस्कार।
२. गर्भस्थ शिशुके बौद्धिक एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधानके दूसरे अथवा तीसरे मास में किया जाने वाला – पुंसवन संस्कार ।
३. गर्भस्थ-शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो इसलिए माताको प्रसन्नचित्त रखने के लिये, गर्भाधान के सातवें अथवा आठवें मास में किया जाने वाला – सीमन्तोन्नयन संस्कार ।
४. नवजात शिशुको बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होनेकी कामना हेतु किया जाने वाला – जातकर्म संस्कार ।
५. नवजात शिशुको नामप्रदान करने हेतु जन्म के दसवें दिन के पश्चात् किया जाने वाला – नामकरण संस्कार ।
६. जन्मके तीन मास के पश्चात् शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना केलिये किया जाने वाला – निष्क्रमण संस्कार ।
७. जन्म के पश्चात् छठवें मास में शिशुको माताके दूधके साथ अन्न भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला – अन्नप्राशन संस्कार ।
८. जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से किया जाने वाला – चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कार ।
९. जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला विद्यारम्भ संस्कार ।
१०. जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला कर्णवेध संस्कार ।
११. जातक की उपयुक्त शिक्षादान के अधिकार-प्राप्ति की कामना से किया जाने वाला उपनयन संस्कार
१२. जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला वेदारम्भ संस्कार ।
१३. गुरुकुल से घर लौटने के पूर्व किया जाने वाला केशान्त संस्कार ।
१४. गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला समावर्तन संस्कार ।
१५. पति-पत्नी को दाम्पत्यसूत्र में बाँधने वाला पाणिग्रहण संस्कार ।
१६. मृत्यु के उपरान्त किया जाने वाला अन्त्येष्टि संस्कार ।
इसके अतिरिक्त दैनिक पञ्च महायज्ञ, सप्त पाकयज्ञ, गृहनिर्माण, गृहप्रवेश आदि भी इसी में आते हैँ ।
विभिन्न वेदशाखा के लिए विभिन्न गृह्यसूत्र है । ऋग्वेद के आश्वलायन, शाङ्ख्यायन, कौषितकी, शुक्लयज्जुर्वेद के पारस्कर, कृष्णयज्जुर्वेद के बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, भारद्वाज, मानव, काठक, सामवेद के द्राह्यायण, गोभिल, खादीर, जैमिनीय, अथर्ववेदके कौशिक गृह्यसूत्र प्रसिद्ध है ।
चारों वर्णों और चारों आश्रम के नीति, नियम, व्यवस्था आदि का वर्णन धर्मसूत्र में है । ऋग्वेद के वशिष्ठ और विष्णु, शुक्लयज्जुर्वेद के हारीत और शङ्ख, कृष्णयज्जुर्वेद के बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, तथा सामवेदीय गौतम धर्मसूत्र प्रसिद्ध है ।
दर्श, पौर्णमास, सोमयाग, राजसूय, वाजपेय, सौत्रामणी, अश्वमेध आदि यज्ञ, आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि आदि अग्निचयन श्रौतसूत्र के विषय है । ऋग्वेद के आश्वलायन, शाङ्ख्यायन, शुक्लयज्जुर्वेद के कात्यायन, कृष्णयज्जुर्वेद के बौधायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी (सत्याषाढ), वैखानस, भारद्वाज, मानव, वाराह, सामवेदीय आर्षेय (मशक), लाट्यायन, द्राह्यायण, जैमिनीय, तथा अथर्ववेद के वैतान श्रौतसूत्र प्रसिद्ध है ।
शुल्बसूत्रमे यज्ञवेदी के गाणितीक प्रक्रिया का वर्णन है । शुक्लयज्जुर्वेद के कात्यायन, कृष्णयज्जुर्वेद के बौधायन, आपस्तम्ब, तथा मानव शुल्बसूत्र प्रसिद्ध है । आजकल जो Pythagorean Theorem के नाम से जाना जाता है, वह बौधायन शुल्बसूत्र में मिलता है ।
व्याकरणम् ।
मुखं व्याकरणं स्मृतम् – व्याकरण वेद का मुखस्थानीय है । अर्थात् पदपदार्थज्ञानशक्ति है ।
व्यक्त, व्युत्पन्न एवं सार्थक शब्द ही संस्कृतभाषाको अन्यतरीभाषासे विशेष वनाता है । शब्द तथा अर्थका सम्पूर्ण समन्वय ही वागार्थ है । कोष तथा व्याकरणके द्वारा उस शव्दभण्डारकी सृष्टि तथा चयन एवं समीचिन प्रयोग का यत्किञ्चित शक्ति आती है ।
शब्दोऽपि वाचकस्तावत् लक्षको व्यञ्जकस्तथा ।
वाच्य, लक्ष तथा व्यङ्ग्य भेदसे शब्द त्रिविध है । व्युत्पत्तिके आधार पर कुछलोग पद का रुढ, यौगिक, योगरुढ तथा यौगिकरुढ – यह चार भेद किया जाता है । परन्तु नागेश रुढ, यौगिक, योगरुढको ही मानते हैं (मञ्जूषा)। पण्डित जगन्नाथ केवलसमुदायशक्ति, केवलअवयवशक्ति, समुदायअवयवशक्ति संकर – यह मानते हैं । ॠ ॡ क् सूत्रके भाष्यमें पतञ्जलिने जाति, गुण, क्रिया, यदृच्छा रूपमें चारप्रकार शब्दप्रवृत्तिके विषयमें कहा है । इन्द्रने एक अखण्डा वाक् को प्रकृति प्रत्यय भेद से व्याकृ (हिंसित, खण्डित) किया था । तभी से इस प्रक्रिया को व्याकरण कहते हैँ । कहागया है –
समुद्रवत् व्याकरणं महेश्वरे तदर्द्धकुम्भोद्धरणं बृहस्पतौ ।
तद्भागभागाच्च शतं पुरन्दरे कुशाग्रविन्दुत् पतितं हि पाणिनौ ॥
यदि शिवजी के व्याकरण का ज्ञान को एक समुद्र के साथ तुलना किया जाय, तो बृहस्पति का ज्ञान अर्धकुम्भ मात्र होगा । इन्द्र का ज्ञान उसका शतभाग से एकभाग होगा । और पाणिनी के व्याकरण का ज्ञान कुशाग्रमात्र होगा । शिक्षाग्रन्थों तथा प्रातिशाख्य प्रत्येक पद का निर्वचन करते हैं । परन्तु पाणिनी ने ऐसा नहीं किया । विषयवस्तु का क्रम भी दोनों मे भिन्न है । यास्क के निरुक्त और निघण्टु, शान्तनव के फिट् सूत्र, व्याडि के जटापटल, वररूची के धातुपाठ – इन सबका व्यवस्थान अष्टाध्यायी से भिन्न है । उपसर्गके व्यवहार वेद और अष्टाध्यायीमें भिन्न है । वेदमें यह भिन्न रहते हैं, परन्तु अष्टाध्यायीमें यह क्रियापदसे युक्त रहते हैं । वेदमें ळ (जैसे अग्निमीळे) व्यवहार होता है । परन्तु अष्टाध्यायीमें नहीं । वेदमें पुंलिङ्ग अकारान्त शव्द – जैसे देवः – का कतृकारक रूप देवासः हो सकता है । परन्तु अष्टाध्यायीमें यह केवल देवाः होगा । उसी प्रकार वेद में करण कारक वहुवचन में देवेभिः होता है, जब कि अष्टाध्यायीमें यह देवैः होता है । ऐसे और भी वहुतसारे उदाहरण है जो दिखाता है कि वैदिक और संस्कृत भाषायें भिन्न है ।
व्याकरण आठ प्रकार का है – ब्राह्म, ऐन्द्र,याम्य,रौद्र,वायव्य,वारुण,सावित्र तथा वैष्णव । कौमार व्याकरण स्वल्प समयमें कथित संस्कृत शिखने के लिए है । पाणिनीकृत अष्टाध्यायी तथा दक्षिणका तोल्काप्पियम् (जो तमिल का पूर्ववर्ती है । इसके तीन भाग हैं – एझुत्ताधिकारम्, सोल्लाधिकाराम् और पोरुलाधिकारम् । प्रत्येक भाग में नौ-नौ अध्याय हैं) ऐन्द्र व्याकरण के आश्रित है ।
संस्कृतसे लेकर समस्त साधारण अथवा लौकिक (लोकेविदिता लौकिकाः) भाषा का शुद्धता उसके व्याकरणसे निर्णय किया जाता है, जैसेकि पतञ्जलि के व्याकरण महाभाष्य के आरम्भमें लिखागया है । परन्तु इसके विपरीत वैदिकव्याकरण का शुद्धता उसके वेदसम्मत होनेसे सिद्धहोता है (वेदेविदिता वैदिकाः)। अतः वैदिकव्याकरण लौकिकव्याकरणसे भिन्न होता है, जैसेकि पतञ्जलिने कहा है । उसी वैदिकभाषा को पाणिनीने छन्दस् कहा है (उदाहरण – छन्दसो यदणौ – अष्टाध्यायी ४-३-७१)। भागवत १-४-१३ में भी कहागया है कि मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ।
रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम् । ( महाभाष्य नवा०१ )
व्याकरण के ५ उद्देश्य है ।
१. वेदों की रक्षा है ।
२. ऊह (तर्क) – यथा स्थान, विभक्ति-परिवर्तन, वाच्य परिवर्तन आदि ।
३. आगम – स्तुता मया वरदा वेदमाता आदि वैदिक आदेशों की पूर्ति ।
४. लघु – संक्षिप्त ढंग से शब्द-ज्ञान ।
५. असन्देह – सन्देह का निवारण, ये सभी मुख्यरूप से वैदिक साहित्य के उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं ।
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महो देवो मर्त्या आविवेश ॥ (ऋग्० ४/५८/३) ॥
चत्वारि श्रृंगा – नाम‚ आख्यात‚ उपसर्ग‚ निपात ।
त्रयः पादाः – भूतकाल‚ वर्तमानकाल‚ भविष्यकाल ।
द्वे शीर्षे – सुप् (सु‚ औ‚ जस् आदि)‚ तिड्。(तिप्‚ तस्‚ झि आदि) ।
सप्तहस्ताः – प्रथमा‚ दि्वतीया‚ तृतीया‚ चतुर्थी‚ पंचमी‚ षष्ठी‚ सप्तमी ।
त्रिधा बद्धः – उरस्‚ कण्ठः‚ शिरस् ।
पतञ्जलि ने इस वृषभ को संस्कृत भाषा के रूप में देखा जिसके चार सींग चार प्रकार के पद – नाम (संज्ञा), आख्यात (क्रिया), उपसर्ग व निपात जैसे उसकी रक्षा करते हैं । उसके तीन पाद भूत, भविष्यत् व वर्तमान में उसको स्थित करते हैं । दो सिर उसकी जैसे दो आत्माएं हैं – नित्य और कार्य शब्द । उसके सात हाथ सात विभक्तियां हैं जो उसे अर्थ ग्रहण करना रही हैं (विभक्तियां केवल नामपदों के लिए कही गई हैं, परन्तु उपलक्षण से क्रियापदों के लकार और उपसर्ग व निपात के अव्ययीभाव का भी यहां ग्रहण कर लेना चाहिए) । तीन प्रकार से जो वह बद्ध कहा गया है, वे शब्दोच्चारण के स्थान हैं – छाती, कण्ठ व सिर । मनुष्य के शरीर में इन स्थानों से ही शब्द का उच्चारण होता है, जैसे वह इन स्थानों से बन्धा हो । वृषभ इसलिए कहा गया है, क्योंकि वह (ज्ञान, और उससे सुख की) वर्षा करता है । चिल्लाना इसलिए क्योंकि शब्द ध्वन्यात्मक है । यह महान प्रकाशक देव मरणधर्मा मनुष्यों में प्रवेश करता है । जिससे हमारा इस महान् देव से साम्य हो, इसलिए व्याकरण पढ़ना चाहिए ।
एकमात्रो भवेद् ह्रस्व: द्विमात्रो दीर्घ उच्यते । त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनम् चार्धमात्रकम् ।
स्वयं राजन्ते इति स्वर: – इस परिभाषा के अनुसार दीर्घ उच्चारण के समय जो स्वयं अपने स्वरूपमें रहता है – विकृत नहीँ होता, (जैसै अ ऽ ऽ …), उसे स्वर कहते हैँ । इनके समुदाय को अच् (प्रत्याहार) कहते हैँ । मुख्यतः यह तेरह है – अ । आ । इ । ई । उ । ऊ । ऋ । ॠ । ऌ । ए । ऐ । ओ । औ ॥ संस्कृत में ९ प्लुत स्वर भी होते हैं । ॡ भी एक स्वर है । परन्तु इसका व्यवहार सीमित है । अं और अः स्वर नहीं हैं । यह स्वराश्रित (स्वर – जैसै अ – के आश्रय में रहनेवाला) अथवा स्वरादि (स्वर जिसके आदि में हो – जैसे कविं – अनुस्वार के आदि में इ है, वेदः – विसर्ग के आगे अ है) होते हैँ । इनके उच्चारणकाल एकमात्रा (साधारण श्वास लेने का समय) होता है । जिन शब्दों के अन्त में स्वर (अच्) होता है, वह शब्द अजन्त (अच् + अन्त) शब्द कहलाता है ।
अष्टौ स्थानांनि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा ॥ जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥ १३ ॥
संस्कृत वर्णमाला में उच्चारण स्थान और प्रयत्न का बहुत महत्व है । उच्चारण स्थान को अष्टधा विभाजित किया गया है – उर, कण्ठ, शिर, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठ, तालु ।
अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः – अ, आ, कवर्ग और विसर्ग का कण्ठ-स्थान है । अतः ये कण्ठ्य हैं।
इचुयशानां तालु – इ, ई, चवर्ग, य और श का तालु-स्थान है । ये तालव्य हैं ।
ऋटुरषाणां मूर्धा – ऋ, ऋ, टवर्ग, र और ष का मूर्धा-स्थान है । ये मूर्धन्य हैं।
लुतुलसानां दन्ता – लु, ल, तवर्ग, ल और स का दन्त-स्थान है । ये दन्त्य हैं
उपूपध्मानीयानाम् औष्ठी – उ, ऊ, पवर्ग उपध्मानीय अर्थात् प, फ का ओष्ठ-स्थान हैं। ये ओष्ठ्य हैं।
ञमङणनानां नासिका च – ञ, म, ङ, ण और न का नासिका स्थान है । अतः ये अनुनासिक वर्ण हैं।
एदैतो:कण्ठ-तालु – ए और ऐ का कण्ठ-तालु स्थान है।
ओदौतो: कण्ठोष्ठम् – ओ और औ का कण्ठ- -ओष्ठ्य स्थान है ।
वर्णो के उच्चारण करने में लगनेवाली प्रयास को प्रयत्न कहते हैं । यह आभ्यान्तर-बाह्य भेद से दो प्रकार का होता है ।
वर्णो के उच्चारण के पूर्व मुख के भीतर जो प्रयास होता है, उसे आभ्यान्तर प्रयत्न कहते हैँ । यह पांच प्रकार का होता है –
१. स्पृष्ट – स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् । इस में जिह्वा, तालु-मूर्धा-दन्त आदि उच्चारण स्थानों को स्पर्श करती हैं । क से म पर्यन्त इनको स्पर्श वर्ण कहते हैं ।
२. ईषत् स्पृष्ट – ईषत्स्पृष्टम् अन्तःस्थानम् । इस प्रयत्न में जिह्वा उच्चारण स्थान को इषत् स्पर्श करती है, जैसे य् व् र् ल् (यण् प्रत्याहार) अन्तस्थ वर्ण ।
३. विवृत – विवृतं स्वराणाम् । विवृत उच्चारण स्वर वर्णों का है, जिस में मुख को विवृत करना पड़ता है ।
४. ईषत् विवृत – ईषत् विवृतम् उष्मणाम् । ऊष्म वर्ण श् ष् स् ह् (शल् प्रत्याहार) जिसमें जिह्वा को ईषत् विवृत करना पड़ता है ।
५. संवृत – ह्रस्वस्य अवर्णस्य प्रयोगे संवृतम् । संवृत में वायु का मार्ग बन्द रहता है । उच्चारणावस्था में ह्स्व अ का प्रयत्न संवृत होता है ।
बाह्य प्रत्यन – मुख जब वर्ण बाहर निकलने लगते हैं उस समय उच्चारण की जो चेष्टा होती है, उसे बाह्य चेष्टा कहते हैं । बाह्य प्रत्यन ८ प्रकार के होते हैं ।
१. विवार, २. संवार, ३.श्वास, ४. नाद, ५. घोष, ६. अघोष, ७. अल्पप्राण, ८. महाप्राण । ९. उदात्त, १०. अनुदात्त, ११. स्वरित भी इसी वर्ग में हैँ ।
कम्पन के आधार पर वर्ण द्विधाविभक्त होते है – घोष वर्ण, अघोष वर्ण । घोष वर्णों का उच्चारण करने पर नाद अधिक होती है । अघोषमें इसके विपरीत । समस्त स्वर वर्ण घोष होते हैँ ।
विवार-श्वास-अघोष । खरो विवारा: श्वास अघोषश्च । ख्, फ्, छ्, ठ् थ् च्,ट्, त् क् प् श् ष् स् (खर् प्रत्याहार) के अन्तर्गत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न विवार श्वास तथा अघोष होते हैँ ।
संवारः-नाद-घोष । हशः संवारा नादा घोषश्च । ह्, य्, व्, र् ल्, ञ्, म्, ङ् न् झ् भ घ ढ ध ज ब ग ड द् (हस् प्रत्याहार) के अन्र्तगत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न संवार नाद घोष होते हैँ ।
अल्पप्राण – वर्गांणां प्रथमा तृतीया पंचमा यणश्च अल्पप्राणाः । जिस वर्ण का उच्चाण करने के लिए अल्प वायु की आवश्यकता होती है – जैसे स्पर्शवर्णों के प्रथम , द्वितीय, तृतीय वर्ण तथा यण् प्रत्याहार के वर्ण (य व र ल) – यह १९ व्यंजन वर्णो का बाह्य प्रयत्न को अल्पप्राण कहते हैं ।
महाप्राण – वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः । जिस वर्ण का उच्चाण करने के लिए अधिक वायु की आवश्यकता होती है – जैसे स्पर्शवर्णों उसे महा के द्वितीय-चतुर्थवर्ण तथा शल् प्रत्याहार के वर्ण (श ष स ह) – यह १४ व्यंजन वर्णो का बाह्य प्रयत्न को महाप्राण कहते हैं ।
उदात्त अनुदात्त और स्वरित प्रयत्न केवल स्वरों के होते हैं ।
उदात्त – उच्चैरुदातः – मुख के भीतर जो कण्ठ तालु आदि उच्चारण स्थान के ऊर्ध्व भाग से उच्चारण किए जाने वाले स्वर ।
अनुदात्त – नीचैरनुदातः – कण्ठ तालु आदि उच्चारण स्थान के निम्न भाग से उच्चारण किए जाने वाले स्वर ।
स्वरित – समाहारः स्वरितः – उदात्त और अनुदात्त का समाहार ।
अर्थवोधक अक्षर को व्यञ्जन कहते हैँ – व्यज्यते वर्णान्तरसंयोगेन द्योत्यते ध्वनिविशेषो येन तद् विज्ञानम् व्यञ्जनम् । यह स्वराश्रित होते हैँ – स्वर जैसा स्वतंत्र रूप से उच्चारित नहीं होते – जैसे क् अ ऽ ऽ … । इनके उच्चारणकाल अर्द्धमात्रा (साधारण श्वास लेने का समय का आधा) होता है । अतः इसमें अपना ध्वनि नहीँ, स्वर की ध्वनि सुनाई देती है । इनके समुदाय को हल् कहते हैँ । जैसा कि –
स्पर्शवर्ण – कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग के २५ वर्ण स्पर्श वर्ण हैं । (कादयोमावसानाः स्पर्शा:)।
घोषवर्ण – पाँचों वर्गों के तृतीय, चतुर्थ और पञ्चम वर्ण तथा य्, र्, ल्, व् और ह् घोषवर्ण हैं ।
अघोषवर्ण – सभी वर्गों के प्रथम और द्वितीय वर्ण तथा श्, ष्, स् को अघोषवर्ण कहते हैं ।
अल्पप्राण – सभी वर्गों के प्रथम, तृतीय और पंचम वर्ण तथा य, र, ल, व्, अल्पप्राण हैं ।
महाप्राण – सभी वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ वर्ण तथा श्, ष्, स्, ह, महाप्राण हैं ।
अन्त:स्थ – य, र, ल, व् को अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं ।
उष्मवर्ण – श्, ष, स्, ह उष्म वर्ण हैं ।
अयोगवाह – अनुस्वार और विसर्ग को अयोगवाह कहते हैं ।
कृदन्त प्रत्यय – जो किसी शब्द के अन्त में युक्त होकर उस शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं, उस शब्दांश को प्रत्यय कहते हैं । धातु के अन्त में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों को कृत प्रत्यय कहते हैं और उनके संयोग से बने शब्द को कृदन्त कहते हैं ।
तद्धित प्रत्यय – प्रातिपदिक के अन्त में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं और उनके संयोग से बने शब्द को तद्धितान्त कहते हैं ।
संस्कृत में लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं । यह दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं । सभी प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं । इन में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए यह टित् लकार भी कहे जाते हैं । उसीप्रकार अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं । इनका प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया दर्शित करने के लिए किया जाता है ।
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा । विध्याशिषोर्लिङ् लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥
(१) लट् लकार (वर्तमान काल) के लिए ।
(२) लिट् लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो, उस) के लिए ।
(३) लुट् लकार (अनद्यतन भविष्यत् काल, जो आज का दिन नहीँ, भविष्य के लिए हो, उस) के लिए ।
(४) लृट् लकार (सामान्य भविष्यत् काल, जो आने वाले किसी भी समय में हो, उस) के लिए ।
(५) लेट् लकार (यह लकार केवल वेद में कालातीत ईश्वर) के लिए ।
(६) लोट् लकार (यह लकार आज्ञा, अनुमति, प्रशंसा, प्रार्थना आदि) के लिए ।
(७) लङ् लकार (अनद्यतन भूत काल – आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन) के लिए ।
(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं –
(क) आशीर्लिङ् (किसी को आशीर्वाद देने) के लिए ।
(ख) विधिलिङ् (किसी को विधि बताने) के लिए ।
(९) लुङ् लकार (सामान्य भूत काल) के लिए ।
(१०) लृङ् लकार (ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान पर्यन्त हो, उस) के लिए ।
वचन – संस्कृत में तीन वचन होते हैं- एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन । संख्या में एक होने पर एकवचन का, दो होने पर द्विवचन का तथा दो से अधिक होने पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है ।
लिंङ्ग – पुंलिंङ्ग, स्त्रीलिंङ्ग, नपुंसकलिंङ्ग ।
पुरुष तीन ही है –
प्रथम पुरुष (third person) – स:, सा, कुमारः, रामः, गोविन्दः
मध्यम पुरुष (second person) – त्वम्, युवाम्, युयम्
उत्तम पुरुष (First person) – अहं, आवाम्, वयम्
कारक नाम – वाक्य के भीतर उपस्थित चिह्न, जैसे –
कर्ता – ने ।
कर्म – को ।
करण – से, द्वारा ।
सम्प्रदान – के लिये ।
अपादान – से, भिन्न ।
सम्बन्ध – का के की रा, रे, री, ना, ने, नी
अधिकरण – मे, पे, पर ।
सम्बोधन – हे, अरे ।
समास पूर्व पद को उत्तर पद से जोडने के प्रक्रिया हैं । उसके विपरीत प्रक्रिया को विग्रह कहते हैं । समास के छह भेद है – १) द्वन्द्व, २) तत्पुरुष, ३) कर्मधारय, ४) बहुव्रीहि, ५) अव्ययीभाव, ६) द्विगु ।
व्याकरणशास्त्र में पञ्च अङ्ग हैं – सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ तथा लिंगानुशासनम् ।
निघण्टु तथा निरुक्त ।
निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते । निरुक्त को वेद का श्रोत्र कहा जाता है । वैदिक शब्दों का व्युत्पत्ति निघण्टु तथा निरुक्त से किया जाता है । एक ही शब्द के बहुत अर्थ हो सकते हैँ तथा बहुत सारे शब्द एकार्थ वोधक हो सकते हैँ । उन सबका ज्ञान तथा कौन से शब्द का कहाँ कौन सा अर्थ होगा, यह निघण्टु तथा निरुक्त के विषय है । वेद में एक शब्द का प्रकरण अनुरोध से एक ही अर्थ होता है । निरुक्त (thesaurus) और निघण्टु (synonym) में व्युत्पत्ति (etymology) का विवेचन है । नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात इन्हीं चार पदों का संग्रह निघण्टु ग्रन्थ में है । व्युत्पत्ति का अर्थ है विशेष उत्पत्ति । इसमें शब्द के स्वरूप और उसके अर्थ के आधार का अध्ययन किया जाता है । प्राचीन भारतमें कोश का परम्परा निघण्टु तथा निरुक्त से आया ।
वृषो हि भगवान् धर्मो ख्यातो लोकेषु भारतः। निघण्टुकपदाख्याने विद्धि मां वृषमुत्तमम् ॥८६॥
कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृष उच्यते । तस्मात् वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापतिः ॥८७॥
॥ महाभारत मोक्षपर्व ३४२ अध्याय ॥
कहा जाता है कि – सर्वे सर्वार्थवाचकाः – सभी शब्द सभी अर्थका वाचक है । यह तभी सम्भव होगा, यदि हमें किसी पदका समस्त अर्थका ज्ञान होगा । तब हम किस परिप्रेक्षमें किसपदका कौनसा अर्थ उपयुक्त होगा – यह निर्णय करसकते हैं । परन्तु जहाँ बृहस्पति जैसे गुरुसे इन्द्र जैसे शिष्य हजारोंवर्ष पर्यन्त शब्दपारायण करतेहुये भी अनन्तशब्दसागर का सीमा न जान सके, हमारे जैसे तुच्छ केलिये यह कैसे सम्भव होगा ? अतः कश्यपने वेदके कठिन शब्दोंका संग्रह कर निघण्टु नामक ग्रन्थका रचना किया । फिर उन शब्दोंका निर्वचन करने केलिए निरुक्त नामका अन्य ग्रन्थका रचना किया । वेदके व्याख्यानमें विशेष उपयोगिताके कारण इनका समष्टिको निरुक्त नामक वेदाङ्ग कहाजाता है । यह निरुक्त कालक्रमे दुर्वोध्य होनेसे यास्कने उसका व्याख्या कर अपना निघण्टु और निरुक्त लिखा, जो आजकल प्रचलनमें है । महाभारत मोक्षपर्व ३४२ अध्यायमें इसका विवरण है ।
निघण्टु और निरुक्तके पश्चात् उसका सरलीकरण कोशों द्वारा कियागया । कृश्यते संश्लिषते (कुशँ सं॒श्लेष॑णे, श्लेष॑णे इत्येके॑) अर्थमें जो वागार्थका आन्तरिक संयोग करे (श्लि॒षँ आ॒लिङ्ग॑ने) – निहितार्थका वितान – विस्तार करे, उसे कोश कहते हैं । विभिन्नग्रन्थोंमें ३९ कोशकारोंके नाम मिलते हैं । सर्वप्रथम कौनसा कोश लिखागया – यह कहना सम्भव नहीं है । सम्भवतः इनमेंसे अधिक एकदेशीय (किसी विशेष दृष्टिकोणसे लिखागया) कोश हो सकते हैं ।
एकदेशीय परम्परा कुछ नया नहीं है । आयुर्वेदके क्षेत्रमें भी ऐसे ही हुआ । इन्द्रकृत आयुर्वेदका अग्निवेशतन्त्र चरकसंहितामें संकलित हुआ । धन्वन्तरीतन्त्र सुश्रुतसंहितामें तथा अत्रितन्त्र हारितसंहितामें संकलित हुआ । कोश के क्षेत्रमें भी ऐसा ही हुआ । कुछ कोशमें केवल नानार्थक अथवा नामार्थक शब्दोंका संग्रह पायाजाता है तो कुछमें साधारण शब्दोंका संग्रह पायाजाता है । साधारण शब्दोंका संग्रहकोशमें लिङ्ग का विवरण नहीं मिलता । कुछ कोश साधारण-असाधारण शब्दोंका भण्डार प्रस्तुत कर उसे दुरूह-दुर्बोध्य करदिया । तब अमरसिंहने अन्य कोशों का दोषविवर्जित प्रसिद्धतम, नानार्थक, लिङ्गनिर्देशयुक्त, आबालवृद्धोंके लिये सुवोध्य छन्दोमय अमरकोशका निर्माण किया। अमरसिंहने लेखा है कि यह नाम और लिङ्गको दर्शानेवाली (वररुचि आदिके) तन्त्रों (कोशों) को एकत्रित कर विस्तार अल्प होनेपर भी प्रत्येक पदकी प्रकृति और प्रत्ययों को विचारपूर्वक संस्कार कर बनाये हुये वर्गों (प्रकरणों) से सम्पूर्ण नाम (जैसे स्वः, स्वर्गः, नाकः आदि) तथा लिङ्ग (पुं, स्त्री, नपुंसक) को दर्शानेवाली नामलिङ्गानुशासन नामक ग्रन्थ है । तभी से प्रमुख अष्टकोशकारोंमें उनका नाम गणना किया जाता है –
छन्दः ।
मा छन्दः । प्रमा छन्दः । प्रतिमा छन्दः । ऽ अस्रीवयश्छन्दः । पङ्क्तिश्छन्दः । ऽ उष्णिक् छन्दः । बृहती छन्दः । ऽअनुष्टुप् छन्दः । विराट् छन्दः । गायत्री छन्दः । त्रिष्टुप् छन्दः । जगती छन्दः ॥ शुक्लयजुर्वेदः –१४.१८ ॥
पृथिवी छन्दः । ऽअन्तरिक्षं छन्दः । द्यौश्छन्दः । समाश्छन्दः । नक्षत्राणि छन्दः । वाक् छन्दः । मनश्छन्दः । कृषिश्छन्दः । हिरण्यं छन्दः । गौश्छन्दः । ऽअजा छन्दः । ऽअश्वश्छन्दः ॥ १९ ॥
अग्निर्देवता । वातो देवता । सूर्यो देवता । चन्द्रमा देवता । वसवो देवता । रुद्रा देवता । ऽऽआदित्या देवता । मरुतो देवता । विश्वे देवा देवता । बृहस्पतिर्देवता । इन्द्रो देवता । वरुणो देवता ॥ २० ॥
छन्दः पादौ तु वेदस्य । छन्द ही गतिशीलता के प्रतीक होने से उसे वेद का पद कहा गया है । शिक्षा, निरुक्ति, गणित, व्याकरण, कल्प भेद से छन्द पञ्चधा विभक्त है । यदक्षरपरिमाणं तच्छन्दः – किसी पद में अक्षरों के संख्या से उसका छन्द निर्णय होता है । मात्राक्षरसंख्यानियता वाक् छन्दः – जिसमें मात्रा, अक्षरसंख्यानियत हो वह छन्द है । अवच्छेद – सीमा का मर्यादा – मान, प्रतिष्ठा, सादृश्य के द्वारा किया जाने वाला वस्तुस्वरूप का मर्यादाबन्ध छन्द है । इसमें वाचिक अथवा पदच्छन्द और अर्थच्छन्द दो विभाग है । मात्रा, अक्षरसंख्या आदि पदच्छन्द है । प्राणमात्रा को छन्द कहते हैँ । किसी मूर्ती की स्वरूपरक्षा के लिए जो विशेष प्राणमात्रा से आच्छादन करना पडता है, वह उसका छन्द होता है । स च्छन्दोभिच्छन्नः, यश्च्चन्दोभिच्छन्नस्तस्माच्छन्दासीत्याचक्षते, छादयन्ति ह वा एनं छन्दांसि पापात् कर्मणः ते छन्दोभिरात्मानं छादयित्वोपायन् तच्छन्दसा छन्दस्त्वम् । प्राणमात्रा से आच्छादन अर्थच्छन्द है ।
त्रीणि च्छन्दांसि कवयो वि येतिरे पुरुरूपं दर्शतं विश्वचक्षणम् ।
आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि ॥ अथर्ववेदः – काण्डं १८.०१.१७॥
विश्व में सारेपदार्थ निबिडावयव, तरलावयव, विरलावयव रूप से त्रिविध है । औषधि (ओषं धत्ते) निबिडावयव, अप् तरलावयव, तथा वायु विरलावयव है । इन्ही तीनों भावों से संसार प्रतिष्ठित है । अतः विश्वप्रतिष्ठारूप होने से यह मानाद्यवच्चेदकरूपी छन्द विभाग के अन्तर्गत आते हैँ ।
छन्दशिक्षा के परिभाषा के अनुसार इस शास्त्रका छन्द, पद, अवष्टम्भ, वर्ण, मात्रा, गण, गति, सङ्केत – यह ८ तत्त्व है । किसी भी मात्रामें नियत अवयवविशेषोंके सन्निवेश से विहित मर्यादा छन्द है । व्यवस्थित मात्राओं से ही सारे वस्तु उत्पन्न होते हैँ । अतः वह व्यवस्थित मात्रा वस्तुजनक होने से जाति कहलाती है । यही छन्दजाति – Higg’s mechanism नहीँ, परिमाण (mass) का नियामक है । इससे माछन्द, प्रमाछन्द, प्रतिमाछन्द, अस्रीवयछन्द आदि उत्पन्न होते है (संख्यादिपरिच्छेदे माशब्दस्य, तत्तदर्धायतनभूता यामाशयपदवाच्यायां वस्तुप्रतिष्ठायां प्रमाशब्दस्य, तुलितके च प्रतिमाशब्दस्य व्याख्या स्यमानत्वात्)। साहित्य के छन्द इससे भिन्न है ।
प्राग्गायत्रीछन्दः पञ्चकम् । मा – प्रमा –प्रतिमोपमा – समासंज्ञकान्यत्र छन्दांसि भवन्ति क्रमेण ४-८-१२-१६-२० अक्षरान्वितानि ।
एकाक्षरं भवेदुक्तमत्युक्तं द्व्यक्षरं भवेत् । मध्यं त्र्यक्षरमित्याहुः प्रतिष्ठा चतुरक्षरा ॥ सुप्रतिष्ठा भवेत् पञ्च ॥ नाट्यशास्त्रम् – १४.४८॥
व्यक्तिभावप्रधान दिग्-देश-काल-संवित्-संख्या अवच्छेद, सीमामर्यादा, अभिविधि, नियति, नीति, रीति, व्यवस्था, मिति, मान पर्यायवाची मा छन्द । आकृतिभावप्रधान अणुत्व, महत्त्व, दीर्घत्व, ह्रस्वत्व के नियामक सन्निवेशरूप अवच्छेद, प्रतिष्ठा, आयतन, आशय, परिमाण, प्रमाण के पर्यायवाची प्रमा छन्द । जातिभावप्रधान समान द्रव्य-गुण-कर्म्म रूप अवच्छेद, साधर्म्य, सामान्य, सादृश्य, सारूप्य, तूलीतक प्रतिमिति, प्रतिमान पर्यायवाची प्रतिमा छन्द ।
यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दो दैवतब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वा अध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गर्त्ये वा पात्यते प्रमीयते वा पापीयान् भवति (सर्वानुक्रमणी १।१)।
छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति न च्छन्दश्शब्दवर्जितम् ॥ नाट्यशास्त्रम् – १४ अध्यायः – ४७॥
भरत के मत में छन्दहीन कोई भी शब्द नहीँ है । संख्या के विषयमें भरत ने कहा है कि –
पद्य-गद्य-गेय रूप से त्रिधा विभक्त छन्द में पद्यरूप छन्द वृत्त तथा जाति भेद से द्विधा विभक्त है । नियत वर्णव्यवस्था से उत्पन्न छन्द वृत्त है । नियत मात्राव्यवस्था से उत्पन्न छन्द जाति है । पद्य में विश्रामस्थान को पद कहते हैँ । यह पादखण्ड, पाद, दल भेद से त्रेधा विभक्त है । जहाँ किसी भी प्रकार के विश्राम होता है, उसे पादखण्ड कहते हैँ । उससे अधिक विश्राम होने से पाद तथा उससे अधिक विश्राम होने से दल कहते हैँ । उससे अधिक विश्राम होने से उसे चतुष्पदी अथवा श्लोक कहते हैँ ।
अवष्टम्भ, विष्टम्भ, यम, यति, विरति, विराम, विश्राम, व्च्छेद, त्रुटी समानार्थक है । यह यात्न, सामयिक तथा छान्दस भेद से त्रेधा विभक्त है । वर्णोच्चारण के लिए प्रयुक्त प्रयत्न के अनुरोध से उत्पन्न होनेवाला वर्णस्वरूपभेद का उत्पादक दो वर्णों का मध्यवर्ती अवष्टम्भ यात्न है । अर्थज्ञान के लिए प्रयुक्त सङ्केत के अनुरोध से उत्पन्न होनेवाला पद तथा वाक्य के स्वरूप के भेद का उत्पादक दो पदों तथा दो वाक्यों का मध्यवर्ती अवष्टम्भ सामयिक है । छन्द के अनुरोध से उत्पन्न होनेवाले अवष्टम्भ छान्दस है, जो अयति, यति, विरति, विच्छेद, अवसाय भेद से पञ्चधा है । जैसे घोडा कभी रुक रुक कर चरण सञ्चारण करता है, उस प्रकीर का अवष्टम्भ अयति है । चलते हुए घोडे को नियन्त्रण करने के लिए जैसे लगाम लगाना पडता है, उसीप्रकार नियन्त्रक अवष्टम्भ को यति कहते हैँ । जैसे घुडसवार किसी को सन्देश देने के पश्चात् न उतरते हुए पश्चात्गमन करता है, ऐसे अवष्टम्भ को विरति कहते हैँ । वह घुडसवार रास्तेमें रुक कर मित्रों से वार्तालाप करने के पश्चात् आगे बढता है, ऐसे अवष्टम्भ को विच्छेद कहते हैँ । जब वह घुडसवार गन्तव्यस्थान पर पहुँचकर विश्राम करता है, ऐसे अवष्टम्भ को अवसाय कहते हैँ ।
छन्दशास्त्रमें वर्ण और अक्षर एक नहीँ है । यथा वागित्यकमक्षरम् । अक्षरमितित्र्यक्षरम् । आदि । व्यञ्जन सहित स्वर तथा निर्व्यञ्जन स्वर – दोनों अक्षर है । इसलिए अग्निम् यह अ ग् न् इ म् – यह पाञ्च अक्षर वाला पद है । परन्तु छन्दशास्त्रमें यह तीन अक्षरवाला पद है । इसलिए कहा गया है कि स्वरोऽक्षरम् । सहाद्यैर्व्यञ्जनैः । उत्तरैश्चावसितै । संयोगादिः पूर्वस्य । यमश्च । क्रमजं च । तस्माच्चोत्तरं स्पर्शे । अवसितं च । वर्णवेदमें वर्णपदार्थ मुर्ख्य है – अक्षरपदार्थ गौण है । छन्दोवेद में अक्षरपदार्थ मुर्ख्य है – वर्णपदार्थ गौण है ।
वर्णस्वरूप को सीमित करनेवाला तत्त्व को मात्रा कहते हैँ । यह अर्द्धमात्रा, एकमात्रा, अध्यर्द्धमात्रा, द्विमात्रा, त्रिमात्रा भेद से अनेक प्रकार के होते हैँ । इसमें व्यञ्जनों की अर्द्धमात्रा, ह्रस्व स्वरों की एकमात्रा, ए तथा ओ की अध्यर्द्धमात्रा, ऐ तथा औ की द्विमात्रा, तथा प्लुत की त्रिमात्रा होते हैँ । गेयकाण्ड में तीतर, चिडिया, बक, नीलकण्ठ, कोयल, काक, कुक्कुट के बोली के अनुसार अणुद्रुत, द्रुत, द्रुविराम, लघु, लघुविराम, गुरु प्लुत भेद से सप्तधा विभक्त हो कर ताल के अन्तरङ्ग कहे गए हैँ । परन्तु यह छन्दोवेद में विवक्षित नहीँ है । छन्दोवेद के अनुसार अक्षर गुरु-लघु भेद से द्विविध है । एकमात्रावाला अक्षर (ह्रस्व) लधु एवं द्वी (दीर्घ) अथवा त्रि (प्लुत) मात्रावाला अक्षर, तथा सानुस्वार, सविसर्ग स्वर गुरु कहलाते हैँ ।
छन्दोनिर्वचन के सौकर्य के लिए समूहविशेष को गण संज्ञा दिया गया है । यह गण वर्णगण तथा मात्रागण भेद से द्विधा विभक्त है । वर्णगण में छन्द के ८ गण होते हैँ, जो तीन अक्षर के होते हैँ । १- यगणः, २- मगणः, ३- तगणः, ४- रगणः, ५- जगणः, ६- भगणः, ७- नगणः, ८- सगणः । इन गणों के क्षिति-अप्-तेज-वायु-आकाश-सूर्य-चन्द्र-यजमान यह अष्ट शिवमूर्त्ती है । इनका फल श्री-वृद्धि-मृत्यु-विदेशगमन-शून्य-रोग-कीर्ति-सुख है । मात्रागण में क्षगणः, भगणः, जगणः, सगणः, हगणः – यह पञ्चप्रकार के चार मात्राओं वाली (अक्षर न्यूनाधिक हो सकता है) गण होते हैँ ।
छन्दस्वरूप के अभिव्यक्ति के मूल कारण गति है । त्र्यक्षरक किम्बा चतुर्मात्राक प्रस्तारस्वरूप में गतियुक्त किसी प्रस्तार में छन्दोव्यवहार होता है । इनमें कुछ गतियों को (सबको नहीँ) अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए यति की भी अपेक्षा रहती है । विरति, विच्छेद, अवसाय – इन तीन अवष्टम्भों का अपेक्षा सभी गतियों को रहती है । किन्तु जिस प्रस्तारस्वरूप में गति नहीँ होती, उस प्रस्तारस्वरूप में यति, विरति, विच्छेद, अवसाय का सन्निवेश होनेपर भी पदःच्छन्दस्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीँ होती । इसीलिए गति को स्वीकार करना पडता है । गति कालकृत्, यतिकृत्, नादकृत्, प्रदेशकृत् भेद से चतुर्द्धा विभक्त है ।
कालकृत् गति को वृत्ति कहते हैँ, जो द्रुता-मध्या-विलम्बिता भेद से त्रेधा विभक्त है । यतिकृत् गति को लय कहते हैँ । लय द्रुतवृत्ति, मध्यवृत्ति, बिलम्बितवृत्ति का इच्छानुसार प्रयोग करने पर भी, छन्दों में नियतस्थानों पर कृत विरत्यादि अवष्टम्भों के स्वरूप का निर्माणकर उससे भिन्न प्रतीत होती है । उस लय के सौष्ठव से छन्द में सौष्ठव आता है । दुःस्थित वर्ण आदि के प्रयोग से उस लय का व्याघात होने पर छन्दसौष्ठव का विनाश हो जाता है । वह लय प्रत्येक छन्द में वर्ण, मात्रा, अवष्टम्भ के भेद से भिन्न हो जाता है । इस गति के अङ्गभूत अवष्टम्भ भी अणुद्रुत, द्रुत, द्रुविराम, लघु, लविराम, गुरु, प्लुत भेद से सप्तधा विभक्त है ।
नादकृत गति ध्वनि कहलाती है । भिन्न भिन्न छन्दों के अभिनय में कहीँ वर्णों की उच्चस्वरता, कहीँ नीचस्वरता, कहीँ समता की अपेक्षा होती है । छन्द के प्रथम अवयव में रहनेवाले वर्णों के उच्चारण से लेकर छन्द के अन्तिम अवयव में रहनेवाले वर्णों के उच्चारण में आभ्यन्तर प्रयत्न तथा अनुप्रदान (वाह्य प्रयत्न) की समानता नहीँ रह सकती । इसप्रकार नादकृत उच्चता, नीचता, समता क्रम से अनुगत भेद के कारण गति में जो भेद हो जाता है, उसे ध्वनि कहते हैँ । प्रदेशकृत गति को चाल कहते हैँ ।
समय-सङ्केत-परिभाषा-संज्ञा समानार्थक है । समय लोकतन्त्रसिद्ध, साधारणतन्त्रसिद्ध, एवं प्रतितन्त्रसिद्ध भेद से त्रिधा विभक्त है । नियतसंख्याविशेष से ज्ञात लौकिक अर्थों के वाचकशब्द, स्वार्थ में तात्पर्य न होने से, जब स्वार्थ से सम्बन्ध संख्यामात्र के बोधन में प्रयुक्त किए जाते हैँ, उसे लोकतन्त्रसिद्ध समय कहते हैँ । उदाहरण केलिए, भू, चन्द्र, आदि शब्द भूमी, चन्द्रमा आदि अर्थ में प्रसिद्ध है । परन्तु जहाँ इन शब्दों के भूमी, चन्द्रमा आदि अर्थ ग्रहण करने पर वक्ता का तात्पर्य के अनुपपन्न होने से उन अर्थों में समवायसम्बन्ध में रहनेवाली एकत्वादि संख्या का वोध कराते हैँ, वह लोकतन्त्रसिद्ध समय है । उसीप्रकार, पक्ष, नेत्र आदि द्वित्व संख्या का वोधक हैँ । अन्य शास्त्रों में प्रसिद्ध जिस अर्थ का छन्दशास्त्र से विरोध न होने के कारण ग्रहण किया जाता है, वह साधारणतन्त्रसिद्ध समय है । जैसे क-ट-प-यादि संख्यागणना, सुबन्त एवं तिङ्न्त का पदत्व, समास सिद्धि आदि । जिस अर्थ का छन्दशास्त्रमें विशेषरूप से विधान किया गया है, वह प्रतितन्त्रसिद्ध सङ्केत है । जैसे वर्णवेदमें प्रसिद्ध वर्ण, मात्रा, अवष्टम्भ के स्थान पर छन्दशास्त्रमें इनका भिन्न उपदेश किया गया है ।
गायत्री षड् भवेदिह ।
सप्ताक्षरा भवेदुष्णिगष्टाक्षरानुष्टुबुच्यते ॥ ४९॥
नवाक्षरा तु बृहती पङ्क्तिश्चैव दशाक्षरा ।
एकादशाक्षरा त्रिष्टुब् जगती द्वादशाक्षरा ॥ ५०॥ तत्रैव ।
वेद में सात प्रकारके मूल छन्द व्यवहार होता है, जिसका अनेक अवान्तर विभाग है ।
गायत्री – इसके२४ अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः तीन पाद होते हैँ । ऋग्वेद में कहीँ कहीँ एकपदा, द्विपदा, चतुष्पदा, पञ्चपदा आदि भी मिलते हैँ ।
उष्णिक् – इसके२८ अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः तीन अथवा चार पाद होते हैँ । अक्षरक्रमसे तथा पादविचार से इसका अनेक भेद होते हैँ ।
अनुष्टुप् – इसके ३२ अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः चार पाद होते हैँ । कहीँ कहीँ त्रिपादानुष्टुप् भी मिलते हैँ ।
बृहती – इसके ३६ अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः चार पाद होते हैँ ।
पङ्क्ति – इसके ४० अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः चार पाद होते हैँ । कहीँ कहीँ पञ्चपाद भी मिलते हैँ ।
त्रिष्टुप् – इसके ४४ अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः चार पाद होते हैँ ।
जगती – इसके ४८ अक्षर होते हैँ । इसका मुख्यतः चार पाद होते हैँ ।
इनमें गायत्रीछन्द पृथ्वीलोक सम्बन्धी, त्रिष्टुप् छन्द अन्तरीक्षलोक सम्बन्धी, जगतीछन्द द्यौलोक सम्बन्धी तथा अनुष्टुप् छन्द सर्वलोक सम्बन्धी है ।
ऊनाधिकेनैकेन निचृद्भुरिजौ । द्वाभ्यां विराट्स्वराजौ ।
एक अक्षर अधिक अथवा न्यून होने से उस छन्द को यथाक्रमे निचृद् तथा भुरिक् कहते हैँ । दो अक्षर अधिक अथवा न्यून होने से उस छन्द को यथाक्रमे विराट् तथा स्वराट् कहते हैँ । जहाँ सन्देह होता है. वहाँ देवता से छन्द का निर्द्धारण किया जाता है ।
सानुस्वारो विसर्गान्तो दीर्घो युक्तपरश्च यः।
वा पादान्ते त्वसौ वक्रो ज्ञेयोऽन्यो मात्रिको ऋजुः॥
अर्थात्- अनुस्वारेण युक्ताः यथा- अं, कं, खं इत्यादयः,
विसर्गान्ताः यथा- अः, कः, खः इत्यादयः,
दीर्घाः यथा- आ, ई, ऊ इत्यादयः, (अत्र दीर्घग्रहणं प्लुतस्यापि उपलक्षणं वर्तते) ।
संयोगपरकाः ह्रस्ववर्णाः यथा- कृष्णः विष्णुः इत्यादिषु स्थिताः ऋ, इ इत्यादयः वर्णाः च एते सर्वे गुरवः भवन्ति । अर्थात् एते गुरुसंज्ञकाः भवन्ति ।
अत्र विशेषः- विसर्गान्तः इति कथनं जिह्वामूलीयोपध्मानयोः उपलक्षणम्। परं वृत्तरत्नाकरस्य टीकाकारस्तु-“युक्तपरश्चेति व्यञ्जनोपध्मानीयजिह्वामूलीयपराणाम् उपलक्षणम् ” इत्याह ।