ऋतम्भरा प्रज्ञा का स्वरूप।

श्रीवासुदेव मिश्रशर्म्मा

ऋतम्भरा प्रज्ञा क्या है?

निर्विचारवैशारद्ये अध्यात्मप्रसादः।

निर्विचरस्य – निर्विचारसमापत्तेः, तया जातस्य समाधेः।
वैशारद्यम् – नैर्मल्यम्। शुद्धता।
अध्यात्मम् – आत्मनि इति अध्यात्मम्। बुद्धौ आत्मनि।
प्रसादः – प्रसन्नता। अनुग्रहः।
निर्विचारासमापत्तेः यः समाधिः भवति तेन चित्तस्य परमशुद्धता, नैर्मल्यं, वैशारद्यं भवति। तस्यां स्थितौ योगिनः अध्यात्मप्रसादः, शुदधः स्थितिप्रवाहः, परमनैर्मल्यं निष्पद्यते इति।

अध्यात्म, ग्रहण अथवा करणशक्ति को कहते हैं । उसका प्रसाद नैर्मल्य – चित्त का निर्मलता। अशुद्धि (रज-तम वहुलता) रूप आवरकमलयुक्त, बुद्धिसत्त्व के रज-तम द्वारा अनभिभूत (अनावरित), स्वच्छ स्थितिप्रवाह को वैशारद्य कहते हैं। जब निर्विकार समाधि में ऐसे वैशारद्य जात हो जाता है, तब योगी का अध्यात्मप्रसाद होता है – यथाभूतवस्तु (जो जैसा है, उसे उसी रूप में जानना) विषयक क्रमहीन (धीरे धीरे नहीं) अथवा युगपत् (एकसाथ) सर्वभासक स्फुटप्रज्ञालोक (सर्वज्ञता) अथवा साक्षात्कारजनित विज्ञानालोक होता है।

साधारणतः शब्द (पद) के साथ उसके अर्थ का स्मरण होता है एवं अर्थ के ज्ञान के साथ नाम (जातिगत अथवा व्यक्तिगत) का स्मरण होता है। अर्थात् शब्द एवं अर्थका परष्पर सम्पर्क अविनाभावी है (शब्दार्थमिव संपृक्तौ)। परन्तु शब्द भिन्न सत्ता है और अर्थ भिन्न सत्ता है। केवल सङ्केतपूर्वक व्यवहारजनित संस्कार के वश में ही उनका स्मृतिसाङ्कर्य (एकत्र स्मृति) होता है। शब्द का त्याग कर के केवल अर्थमात्र के चिन्ता करने से वह स्मृतिसाङ्कर्य नष्ट होता है। उसे शब्दसङ्केत-स्मृतिपरिशुद्धि कहते हैं। उस शब्दसङ्केत का स्मृति अपनीत होने से श्रुत्यानुमान-ज्ञानकालीन जो विकल्प है (जो नाम-रूप के ज्ञान से ही उदित होता है), तद्विहीना (उसको छोडकर) जो समाधिप्रज्ञा उसमें स्वरूपमात्रे अवस्थित जो विषय, वह स्वरूपाकारमात्र (केवल अर्थमात्र) में ही भासित होता है, उस अवस्थाको निर्वितर्का समापत्ति कहते हैं। वह परमप्रत्यक्ष है एवं श्रुत्यानुमान के बीज है। उसीसे श्रुत्यानुमान प्रवर्त्तित होता है। वह परमप्रत्यक्ष श्रुत्यानुमानका सहभूत नहीं है। सुतरां योगीयों का निर्वितर्क समाधिजात दर्शन प्रत्यक्ष को छोडकर अन्य प्रमाणों से असंकीर्ण है (जाना नहीं जा सकता)। परमार्थ साक्षात्कारी ऋषिगण प्रथमे निर्वितर्क-निर्विचारज्ञानलाभ कर शब्द के द्वारा (सवितर्क रूप में) उपदेश करनेसे प्रचलित परमार्थ और तत्त्वविषयक प्रतिज्ञा तथा बुद्धिस्वरूप मोक्षशास्त्र प्रादुर्भूत हुआ है।

बुद्धि ही प्रधान आध्यात्मिक भाव है। सुतरां उसका प्रसाद होने से यावतीय करण प्रसन्न हो जाते हैं। वह ज्ञान साघारण अवस्था के ज्ञान जैसा क्रमशः स्तोके स्तोके उत्पन्न नहीं होता। परन्तु उसमें ज्ञेय विषयके समस्त धर्म युगपत् प्रभासित होते हैं। वह प्रज्ञा श्रुत्यानुमानिक (आगम और अनुमानप्रमाण के द्वारा सिद्ध) साधारण विषयक प्रज्ञा नहीं है, परन्तु साक्षात्कार जनित प्रज्ञा है। प्रत्यक्ष विशेष विषयक है (आनुमानिक किम्वा साधारण विषयक नहीं है)। वह इस समाधि प्रत्यक्ष का चरम उत्कर्ष है (समाधि अवस्था में ही सर्वज्ञता की प्राप्ति होती है)। सुतरां इसके द्वारा चरम विशेष सकल (वस्तुओं का मूलभूत रूप) का ज्ञान होता है। जैसे उच्चस्थान पर वैठाहुआ पुरुष भूमिस्थ लोगों को स्पष्ट देखता है, उसी प्रकार प्रक्षारूप प्रासादमें (सर्वज्ञ स्थितिमें) आरोहण करनेपर स्वयं अशोच्य, प्राज्ञ व्यक्ति (अविद्या और अज्ञान के कारण) समस्त शोकाकुल लोगों को देखता है।

महर्षिगण ऐसी प्रज्ञा लाभ कर जो उपदेश किए हैं, उसे ही श्रुति कहते हैं। प्रथमे उस अलौकिक विषय को प्रज्ञात हो कर (सर्वज्ञदृष्टि से देख कर), लौकिकदृष्टि से अनुमान के द्वारा, कैसे अलौकिक विषय का सामान्यज्ञान होता है, वही ज्ञान मोक्षदर्शन कहलाता है। अतः निर्विचारा समापत्तिका ऋतम्भरा प्रज्ञा और श्रुत्यानुमानिक साधारण प्रज्ञा अत्यन्त पृथक् वस्तु है। यदि श्रुत्यानुमानिक साधारण प्रज्ञा कर्दमकलुषित जल है, तो ऋतम्भरा प्रज्ञा तुषारकण गलित शुद्धजल है।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।

ऋतम्भरा – ऋतं बिभर्ति, धारयति इति।

प्रज्ञा – या प्रकर्षेण जानाति। बुद्धिः।

तस्यां स्थितौ यदा योगी निर्विचारवैशारद्ये अध्यात्मप्रसादः प्राप्नोति तदा या प्रज्ञा जायते, यस्यां ऋतं सत्यं एव अस्ति, या ऋतं बिभर्ति, तस्याः प्रज्ञायाः नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा इति।

आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च। त्रिधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम्। शास्त्रोंके श्रवण से, अनुमान से, अथवा निर्विचारा समापत्ति से प्रज्ञा प्राप्त होता है। हम पढते हैं कि शरीर आत्मा से पृथक् है। अथवा तत्त्व सकलों का स्वरूप क्या है। अथवा इस प्रकार से दुःखनिवृत्ति का नाम मोक्ष है। परन्तु उससे हमें पूर्णज्ञानप्राप्ति नहीं होती। उसीप्रकार अनुमान से भी कुछ नहीं होता। इसीलिये गीता के प्रारम्भ में भगवान ने तीन श्लोकों द्वारा अर्जुन को शरीर मरणशील है, उसमें आत्मबुद्धि न करने का उपदेश दिया है। अशोच्यानन्वशोचस्त्वं से आगम अथवा शब्दप्रमाण, न त्वेवाहं जातु नाशं से अनुमानप्रमाण एवं देहिनोऽस्मिन्यथा देहे से प्रत्यक्षप्रमाण दिया है।

परन्तु उतने में भी कुछ नहीं हुआ। कारण जबतक ज्ञान अनुभवसे दृझीभूत न हो जाये, वह साधारण विषयक प्रज्ञा ही रहता है। मैं यह शरीर नहीं हुँ, बाह्य विषयसकल दुःखमय और त्याज्य है, मैं विषयों को पाने अथवा उपभोग करने का सङ्कल्प (इच्छा) त्याग करँगा, इत्यादि विषयों का एकाग्रचित्त होकर पुनः पुनः ध्यान करने से अपने समयपर वह प्रज्ञा उदित होगा। जैसे कि मुण्डक उपनिषद में कहा गया है, – नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्। वह ऐसा होता है जैसे कि वेद में कहा गया है कि – ऊतो त्वस्मै तन्वंविसस्रे जायेव पत्य ऊशती सुवासाः – कामयमाना सुवेशा जाया जैसे पतिके सम्मुख अपना तनु प्रकटित कर देती है।  यदि कोइ व्यक्ति सब कुछ पढते-जानते-सुनते हुये भी दुःख से विचलित हो जाता है, तो ऐसे ज्ञान का क्या लाभ। इसीलिये कृष्णभगवान को योग का उपदेश देना पडा।

निर्विचारा समापत्तिका प्रज्ञा ऋतम्भरा प्रज्ञा कहलाती है। ताहा अन्वर्था (जैसी नाम, वैसी काम) है। वह सत्यको धारण करती है। उसमें विपर्यासका सामान्यतम भाव भी नहीं रहता। एक ही वस्तु को विभिन्न लोग विभिन्न नाम से जानते हैं। एक नाम कहने से अन्यों का ज्ञान भिन्न हो सकता है। परन्तु नाम न कहकर केवल वस्तु का निर्देश करने से सब का एक जैसा ज्ञान होगा। ऐसे ही शब्द के विना सहायता के जो ज्ञान, वही यथार्थ (यथा-अर्थ) ज्ञान है। कारण शब्दके द्वारा हम अवस्तु को भी वस्तु मान लेते हैं। जैसे कि कोइ यदि कहे कि “काल अनादि अनन्त है”, तो उस से एक विकल्प ज्ञान तो होता है, परन्तु अनादि और अनन्त का इयता का हमें स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। काल भी केवल एक अधिकरण है। काल, अनादि, अनन्त, आदि शब्दों का साक्षात्कार नहीं हो सकता। अतः यह ज्ञान अलीक विकल्प मात्र है। यह यथार्थज्ञान नहीं है।

ऋत शब्द ऋ॒ गतिप्राप॒णयोः॑ धातु से क्त प्रत्यय से बना है जिस का अर्थ जल (ऋग्वेद 7-101-6) से लेकर उच्छशील (मनु 4-5) तक किया गया है। ऋतचिद्धि सत्यम् (ऋग्वेद 1-145-5) के अऩुसार ऋतस्य ज्ञाता सत्य है। भातिसिद्ध-अशरीरी-अहृदयम् को ऋतम् और स्थितिसिद्ध-सशरीरी-सहृदयम् को सत्यम् कहाजाता है। मुण्डक उपनिषद में सत्यमेव जयते नानृतम् इसी अर्थ में कहागया है। वस्तु का जो ज्ञान उसके स्थिति को देखकर होता है, वह स्थितिसिद्ध है। परन्तु जो स्वयं प्रत्यक्ष न होते हुये भी प्रत्यक्ष जैसा व्यवहार होता है, उसे भातिसिद्ध कहते हैं। जैसे रूप, रङ्ग स्थितिसिद्ध है, परन्तु आयतन (dimension) अथवा परिमाण (mass) उस वस्तु को छोडकर अन्य कुछ नहीं है। देश, काल भी अवस्तु है। परन्तु हम उसका व्यवहार ऐसे करते हैं, जैसे वह कोइ वस्तु है। हृदय का अर्थ केन्द्रयुक्त है। हृदय न रहे तो वस्तु नहीं रहेगा। जैसे प्रोटोन (proton) सत्य है। इलेक्ट्रन (electron sea) ऋत है। प्रोटोन का केन्द्र क्वार्क से वना है, परन्तु इलेक्ट्रन समुद्र जैसा है।

ऋत और सत्य अविनाभावी है। सत्य ऋत में अवश्य ही रहता है। इसीलिये ऋत को सत्य भी कह देते हैं। ब्राह्मणम् ग्रन्थों में कहा गया है कि “ऋतमेव परमेष्ठि । ऋतं नात्येति किञ्चन । ऋते समुद्र आहितः । ऋते भुमिरियँ श्रिता । अग्निस्तिग्मेन शोचिषा । तप आक्रान्तमुष्णिहा । शिरस्तपस्याहितम् । वैश्वानरस्य तेजसा । ऋतेनास्य निवर्तये । सत्येन परिवर्तये” (तैत्तिरीयब्राह्मणम् 1-5-5-1)। अतः ऋत ही सवका मूल है।आगम तथा अनुमान प्रमाण शब्दसहायक ज्ञान है। उन से प्रमित सकल सत्य ऋत नहीं होता। उदाहरण के लिये सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म को लिजिये। सत्य का अर्थ है यथार्थ। यथार्थ, अनन्त आदि शब्दों के अर्थ धारणा (ऐन्द्रियक अथवा मानस प्रत्यक्ष) के योग्य नहीं है। कारण जिसका अन्त नहीं है, वह कितना बडा है, यह धारणा असम्भव है। वस्तुतः इन शब्दों के साथ वाचक ब्रह्म का कोइ सम्बन्ध नहीं है। इन शब्दों का त्याग करने से ही ब्रह्मपदार्थ का उपलव्धि होता है। अतः श्रुत्यानुमानजनित ज्ञान और शब्दसहाय प्रत्यक्षज्ञान विकल्पहीन विशुद्ध ऋत नहीं है। परन्तु शब्दसहायशून्य केवल अर्थमात्र निर्भासक जो निर्वितर्कज्ञान, वही ऋतज्ञान है। उससे उत्तमज्ञान और कुछ भी नहीं है ।