माया के स्वरूप और भेद – भाग ६

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ब्रह्म ह वा इदमग्र असीत् स्ययंभ्वेकमेव । ..... तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्रमाजायत । तेनानन्दत्तद्ब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति । तद्यदब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति तस्मात्सुवेदो ऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेदइत्याचक्षते परोक्षेण ... । गोपथब्राह्मणम् ।

उस स्ययम्भू ब्रह्मने जब सृष्टिकाम हुआ, तो क्रिया की उत्पत्ति हुई । क्रियासे ताप सृष्टि हुआ । अग्नेरापः नियमसे उसमें विकार हो कर द्रवित चितेनिधेय भाग (महिमामण्डल) चित्यपिण्ड (मूलपिण्ड) से भिन्न प्रतीत हुआ । वह ब्रह्म का स्वेद जैसा प्रतीत हुआ, जिसे स्वेदब्रह्म अथवा सुब्रह्म कहागया । सर्वव्यापी होने से उसका उसीमें आहुति हुआ संस्त्यान (confinement) करने के कारण सुब्रह्म स्त्री लिङ्ग है । प्रसव (confined) के कारण ब्रह्म पुंलिङ्ग है । इसी स्त्री-पुरुष भाव से मैथुनि सृष्टि (creation due to charge or chemical reaction) होती है । वर्ण आरोपण (color charge) से केवल भाव और गुण (perceptibility and basic characteristics) सृष्टि होती है । उनमें अन्न-अन्नाद भाव होता है । जब योषा-वृषामें अशनाया वृत्ति (भोजनेच्छा) का उदय होता है, तब स्त्री-पुरुष भावका उदय होता है । सुब्रह्म का ब्रह्म के साथ संसर्ग सर्वात्मना नहीं – अवयव सम्बन्ध है । योषा-वृषा का सृष्टिप्रवर्तक अवयवको रेत-योनि कहते हैं । आग्नेयभाग योनि है । सौम्यभाग रेत है । रेत सुब्रह्म नामक योषा का अंश है । योनि द्विब्रह्म नामक वृषा का अंश है । सुब्रह्म का ब्रह्ममें आहुति होता है । स्त्री-रूप सुब्रह्म पुरुषमें प्रतिष्ठित होता है । पुरुषरूप ब्रह्म स्त्री में प्रतिष्ठित होता है । जो वास्तविक स्थिति है, वह दिखता नहीं है (पुरुष आग्नेय, परन्तु रेत सौम्य है । स्त्री सौम्या, परन्तु उसका शोणित आग्नेय है) । अतः परोक्षप्रिया इव ही देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः । जिस प्रदेश अवधि माया का व्याप्ति है, उस अवधि पर्यन्त ब्रह्म-सुब्रह्म का व्याप्ति है ।

संस्त्यानप्रसवौ लिङ्गमास्थेयौ स्वकृतान्ततः । [महाभाष्य]
तदुपव्यञ्जना जातिर्गुणावस्था गुणास्तथा । ,,,
प्रवृत्तिरेकरूपत्वं साम्यं वा स्थितिरुच्यते । 
आविर्भावतिरोभाव प्रवृत्या वावतिष्ठते ।...
उत्पत्तिः प्रसवोऽन्येषां नाशः संस्त्यानमित्यपि । 
आत्मरूपं तु भावानां स्थितिरित्यपदिश्यते ।...

यह लिङ्ग का उत्पत्ति का वर्णन है (theory of generation of electric charge) । प्राण (energy) स्वतन्त्र है । वही सबका जनयिता है । जब वह संस्त्यान (बन्धन – confinement) हो जाता है, तो परतन्त्र हो कर पशु (यदपश्यत तत् पशवः – observables) बन जाता है । यही उसका आविर्भाव-तिरोभाव भी है । इसी से उसका जाति और गुण भी निर्द्धारित होते हैं । प्रसव उत्पत्ति है । संस्त्यान उसको मृत्युमुखी कराता है । मृत्यु और अमृत साथ साथ ही रहते हैं (अन्तरं मृत्योरमृतं, मृत्यावमृतमाहितम् – शतपथ ब्राह्मण, १०/५/२/४) । रस रूप स्थायी अथवा अमृत है । उससे उत्पन्न सृष्टि क्षणिक अथवा मृत्यु है । अमृत रस के समुद्र से मुक्त होने के कारण वह (सृष्टि) मुच्यु है जिसे परोक्ष में मृत्यु कहा गया है (स समुद्रादमुच्यत स मृत्युंरभवत्तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्युरित्याचक्षते – गोपथ ब्राह्मणम्, पूर्व, १/७) । सभी सृष्ट पदार्थ क्षर या मृत्यु हैं, उनका मूल स्रोत और प्रतिष्ठा अमृत है । ब्रह्म अमृततत्त्व एक है । विश्व मृत्युतत्त्व नानात्वयुक्त है । नानात्व मृत्युनिबन्धन है । नानात्वदृष्टि मृत्युपाशमें बद्ध दृष्टि है । एकत्वदृष्टि अमृततत्त्वदृष्टि है ।

भेद मायिक है – कल्पित है । अभेद सत्य है । स्वरूप आविर्भावक आधारके भिन्नता से भेदसृष्टि होता है । आधार के अभाव से भेद का अभाव है । मूलतः अभेद सर्वत्र है । बल भी मूलरूप से सर्वत्र तथा एक है । केवल उसके प्रकाशक आधार के भिन्नता के कारण एक ही बल नाना रूप से प्रतिभात होता है । आधार रस का कार्य है । बलगर्भित रस आधारमें परिणत होता है । यही आधुनिक विज्ञान का हिग क्षेत्र (higg’s field) का सिद्धान्त है । अमृतके आधारमें वही एक बल चतुष्टयं वा इदं सर्वम् (शाङ्ख्यायन ब्राह्मणम्) सिद्धान्तके अनुसार परत्वापरत्व सम्बन्धसे अन्तर्यामादि चतुष्टय रूपमें परिणत होता है । यही चतुष्टय अमृतं-मृत्युञ्च (यजुर्वेद) न्यायसे एकजं षळिद्जमा (ऋग्वेदः १-१६४-१५) हो कर प्रवहादि सप्त वातस्कन्दमें परिणत होता है । उसका मर्त्यभाग स्वायम्भूवादि पञ्चपुर के सम्बन्धसे प्रभ्राजमानादि ११ वायुमें परिणत होता है । यही १२२ प्रकार के कार्यरूपमें परिणत होते हैं ।

कर्त्तृत्वं तत्र धर्मी कलयति जगतां पञ्चसृष्ट्यादि कृत्ये । 
धर्मः पुंरूपमाद्यात् सकलजगदुपादानभावं विभर्ति । 
स्त्रीरूपं प्राप्य दिव्या भवति च महिषी स्वाश्रयस्यादिकर्तृः । 
प्रोक्तौ धर्मप्रभेदावपि निगमविदां धर्म्मिवद् ब्रह्मकोटी ।

भावपदार्थ ३ प्रकार के होते हैं – द्रव्य (matter), क्रिया (effect of energy on matter) तथा शक्ति (information – सा पूर्वोदिता सिसृक्षा स्वस्वरूपाभेदमयानहमित्येव पश्यति) । उनमें से क्रिया के द्वारा द्रव्य परिणत होता है । अतः क्रिया परिणामका निमित्तकारण है । जिसे हम सत्त्व अथवा द्रव्य कहते हैं, वह क्रियामूलक होनेपर भी, “जिसका क्रिया” – ऐसे एक सत्त्व अथवा प्रकाश (information) है – यह मानना पडेगा । वही सत्त्व ही मूलद्रव्य है । काठिन्यादि गुण अलक्ष्यक्रिया है । परिणाम – अवस्थान्तरप्रापक क्रिया – लक्ष्य अथवा स्फुटक्रिया है । स्फुटक्रिया ही निमित्त है । अलक्ष्यक्रियाजनित प्रकाश अथवा स्थिरसत्तारूपमें प्रतीयमान द्रव्य नैमित्तिक है । निमित्तक्रिया के द्वारा नैमित्तिकका परिणति होना ही द्रव्यके परिणाम का स्वरूप है । शक्ति अवस्थासे पुनः शक्ति अवस्थामें परिणत होना निमित्तक्रियाका स्वरूप है ।

दृश्य स्थूलक्रियासकल क्षणावच्छिन्न (temporal) सूक्ष्मक्रियाका (quantum processes) समाहारज्ञान है । रूपरसादि भी उसीप्रकार है । आलोकके द्वारा रूप प्रतिक्षण उसीरूपसे पुनःपुनः अवभासित होता है । आलोक नहीं रहनेसे रूप का अभाव नहीं होता – दृश्यता का अभाव होता है । कारण तमावरणसे रूपत्व अभिभूत होता है । अतएव घटपटादि वस्तु अलातचक्र जैसे वहुसङ्ख्यक क्षणिकक्रियाजनित समाहारज्ञान मात्र है । कहागया है –

नित्यदा ह्यङ्गभूतानि भवन्ति च भवन्ति च ।
कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ।

शक्ति से क्रियारूप निमित्त, क्रियारूप निमित्तसे ज्ञान (प्रकाशभाव), प्रकाशभावसे पुनः शक्तित्वमें प्रत्यागमन – इसी परिणामप्रवाह ही वाह्य जगत् का मूल अवस्था है । परिणामज्ञान क्रिया का ज्ञान अथवा प्रकाशित भाव (bio-photons) है । हमारे मनमें शक्तिभावमें स्थितसंस्कारके साथ प्रकाश (बुद्धि) का योग होने से वह स्मृतिरूप भाव (द्रव्य अथवा सत्त्व) होता है । इसी शक्तिका क्रियारूपमें प्रकाश्य होने को परिणाम कहते हैं । उसका ईयता नहीं हो सकता । अतः परिणाम असंख्य है । वाह्यजगत् में जो क्षणिकपरिणाम है, उसे स्तोके स्तोके (gradually slowly) ग्रहण करना लौकिक करणों का स्वभाव है । वही स्तोके स्तोके ग्रहण ही द्रव्यज्ञान है । लौकिक निमित्तजात परिणाममें निमित्तका भी स्तोके स्तोके ग्रहण होता है तथा नैमित्तिकका भी स्तोके स्तोके ग्रहण होता है । हम जिसे ग्रहण कियाहुआ मानते हैं, वह अतीत है । जो कर रहे हैं, वह वर्तमान है । जो करना सम्भव है, वह अनागत (भविष्यत) है ।

(क्रमशः)