दर्शपूर्णमास का व्यापक विज्ञान

दर्शपूर्णमास का व्यापक स्वरूप विज्ञान

ईशोपनिषद विज्ञान भाष्य भाग २ – पण्डित श्री मोतीलाल शास्त्री।

शुक्र क्या पदार्थ है ? इस का उत्तर है ‘उपादानकारण‘ । विश्व का उपादान कारण कौन है ? इस का उत्तर है — “सृष्टिसाक्षी अव्यययुक्त अतएव बीजावस्थापन्न अक्षरानुगृहीत आत्मक्षर” । अव्यक्ताधिकरण में हमनें यजुर्ब्रह्मगर्भित षड्ब्रह्म को शुक्र बतलाया था, एवं यहां अव्ययाक्षरावच्छिन्न आत्मक्षर को शुक्र बतलाया जारहा है, इस में विरोध नहीं समझना चाहिए, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । चत्वारिंशिनी परमाविराट् के पूर्वोक्त आठ अवयवों का स्मरण कीजिए । उन आठों अवयवों में सातवें ‘पुरञ्जन‘ नाम के अवयव की पाञ् कलाएं वेद-लोक-प्रजा-वीर्य-पशु इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन में वेद नाम का पहिला पुरञ्जन ही सृष्टि का आधार है। बिना वेद के न ईश्वरसृष्टि होती है, न जीवसृष्टि । अन्तर केवल इतना है कि ईश्वरसंस्था में पहिले पुरुष है, पुरुष से विश्व का मूल वेदतत्त्व प्रादुर्भूत होता है, एवं अस्मदादि में पहिले वेद उत्पन्न होता है, अनन्तर वेदद्वारा योगमाया का प्रादुर्भाव होता है। तदनन्तर पुरुष ( जीवाव्यय ) का विकास होता है ( देखिए ई. उ. वि. भा. पृ.सं. ४०० ) क्रममात्र में अन्तर है । परन्तु बिना वेद के प्रजापति का स्वरूप निष्पन्न नहीं होसकता, यह निश्चित है। जबतक प्रजा नहीं, तबतक प्रजापति नहीं। जब तक लोक नहीं, तब तक प्रजा नहीं ।

जब तक आपोमय सुवेद नहीं, तब तक लोक नहीं । जब तक यजुर्वेद नहीं, तबतक सुवेद नहीं । इसप्रकार परम्परया वेद ही प्रजोत्पत्ति का कारण बनता हुआ ‘प्रजापति’ शब्द को अन्वर्थ बनाने में समर्थ होता है। तभी तो प्रजापति को वेदमूर्ति कहा जाता है । इस प्रजापति की ईश्वर-प्रतिमा-जीव-शिपिविष्ट भेद से चार संस्थाएं बतलाई गई हैं। इन चारों में ईश्वरप्रजापति विश्वकर्मा नाम से प्रसिद्ध है । इस विश्वकर्मा प्रजापति के समानशील-व्यसन चार अभिन्न सखा उत्पन्न होते हैं। चारों मित्र वरुण (१), इन्द्र (२), अग्नि (३), सोम (४) इन नामों से प्रसिद्ध हैं। किसी समय यह पांचों पृथक् पृथक् थे | जब तक यह पृथक् पृथक् रहे, तबतक इनकी विश्वनिर्माण सम्बन्धिनी कामना पूरी न हुई । फलतः इन्होंने विचार किया कि ऐसे काम नहीं चल सकता । अपने को परस्पर में मिलकर सृष्टिनिर्माण करना चाहिए। ऐसा ही हुआ । पाञ्चों मिल गये ! मिलने से कामना पूरी होगई । इन की समष्टि कर्मपूर्ति का हेतु बनी, अतएव यह यज्ञ ‘काम’ नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही यज्ञ यज्ञ विज्ञानपरिभाषा के अनुसार आगे जाकर ‘दर्शपूर्णमास‘ नाम से व्यवहृत हुआ ।

दर्शपूर्णमास

“अन्नरूप चन्द्रमा” अग्निमयी पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । इस की यह परिक्रमा एक चान्द्रमास में पूरी होती है । इस परिक्रमा से चान्द्रमास के कृष्ण-शुक्ल दो पक्ष होगये । कृष्णपक्ष की अन्तिम विश्रामभूमि ‘दर्श’ कहलाने लगी, एवं शुक्लपक्ष की अवसान भूमि ‘पूर्णिमा’ कहलाने लगी । दर्शतिथि में चन्द्रमा की मृत्यु है, पूर्णिमा में युवावस्था है। शुक्लद्वितीया जन्मकाल है, शुक्लाष्टमी बचपन है, कृष्णाष्टमी वृद्धाव स्था है । इन सब भात्रों की मूलाधारभूमि प्रतिपत् ( पड़वा ) है । यहीं से चन्द्रमा के ह्रास एवं वृद्धि की प्रपत्ति ( उपक्रम ) होती है, अतएव इसे ‘प्रतिपत्‘ कहा जाता है । शेष सारे चन्द्र अहोरात्र प्रतिपत् का अनुसरण करते हैं, प्रतिपत् के अनुगामी हैं, अतएव उन्हें अनुचर कहा जाता है। प्रतिपत्-अनुचर सांकेतिक शब्द हैं। मूलप्रतिष्ठा को प्रतिपत् कहा जाता है, मुलानुगत इतरभावों को अनुचर कहा जाता हैं।

मूलप्रतिष्ठा को प्रतिपत् कहा जाता है, मुलानुगत इतरभावों को अनुचर कहा जाता हैं।

सूर्य प्रतिपत् है, रश्मिएं अनुचर हैं । चन्द्रमा प्रति पत् है, नक्षत्र अनुचर हैं। आत्मा प्रतिपत् है, इन्द्रियप्राण अनुचर हैं । मस्तक प्रतिपत् है, इतर’ अङ्ग अनुचर हैं । गुरू प्रतिपत है, शिष्यवर्ग अनुचर है। सेनाध्यक्ष प्रतिपत् है, सेना अनुचर है । हाथ प्रतिपत् है, कर्म अनुचर है । मुख प्रतिपित् है, अन्न अनुचर है । चक्षु प्रतिपत् है, रूप अनुचर हैं। निदर्शन मात्र है। विश्व में सर्वत्र आप इसी प्रकार ‘प्रतिपदनुचरौ‘ इन दो भावों का साक्षात्कार कर सकते हैं । प्रतिपत् एक होगा, अनुचर अनेक होंगे । कृष्ण अहोरात्र अनुचर हैं, कृष्णप्रतिपत् प्रतिपत् है। शुक्ल अहोरात्र अनुचर हैं, शुक्लप्रतिपत् प्रतिपत् है । कृष्णप्रतिपत् का शासन दर्शपर्यन्त है, शुक्ल प्रतिपत् का शासन पूर्णिमा पर्यन्त है । दर्श काल निग्राभ (ह्रास) काल है, पूर्णिमाकाल उद्ग्राभ (वृद्धि) काल है। दर्श में चान्द्र पदार्थ हम से वियुक्त होते रहते हैं । पूर्णिमा में चान्द्रपदार्थ हम से युक्त होते रहते हैं । दर्शेष्टि अवसान की सूचिका है, पौर्णमासेष्टि पूर्णभाव की प्रवर्त्तिका है । ऋतु के अनुसार प्रत्येक पदार्थ का दर्श एवं पौर्णमासकाल नियत है। उदाहरण के लिए घृत को लीजिए । आश्विनमास घृत का पौर्ण मास है, शेषकाल दर्श है । आश्विनमास में आकाश से वायुद्वारा [प्राणरूप से] घृत की दृष्टि होती है अतएव आश्विन के पानी के लिए लोक भाषा में ‘घी बरस रहा है‘ यह कहा जाता है । चैत्र-वैशाख मधु का पौर्णमास है। इनमें सूर्य से मधु [शहद] की वृष्टि होती है । सूर्य जिस समय मधुच्छत्र [मधुमक्षिका का छत्ता] नाम से प्रसिद्ध भरणी नक्षत्र पर आता है, उस समय से ही मधु का पौर्णमासकाल आरम्भ होजाता है । लाखों मन शहद पृथिवी पर गिर जाता है । इसी मधुवृष्टि से वसन्त में प्रत्येक पदार्थ में नैसर्गिक माधुर्य विकसित होजाता है । मधु सम्बन्ध से चैत्र-वैशाख मधु-माधव मास नाम से प्रसिद्ध हैं । कहना यही है कि पदार्थ का आगमनकाल पौर्णमास है, वियोगकाल दर्श है । अहोरात्रपरिक्रमावत् दोनों चक्रवत् परिभ्रमणशील हैं। परिभ्रमण से ही दर्श-पूर्णमास का उदय होता है । अतः इस परिक्रमारूप कर्म को ही ‘दर्शपूर्णमासयज्ञ‘ कह दिया जाता है । चन्द्रमा पृथिवी का उपग्रह है, साथ ही में पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगाता है। अतएव पृथिवी को हम प्रतिपत् कह सकते हैं, एवं चन्द्रमा को अनुचर कह सकते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा को साथ लिए हुए पृथिवी अपनें नियत स्थान पर (क्रान्तिवृत्त पर) सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती है । इस परिक्रमा से पृथिवी में अदिति-दिति यह दो अवस्थाएं उत्पन्न होजातीं हैं। यह अदिति-दिति अहोरात्र, संवत्सर, अयन भेद से तीन भागों में विभक्त है । दिन में पृथिवी का जो भाग सौरप्रकाश से युक्त हो रहा है, वह अदिति है। रात्रिगत पार्थिवभाग सौरप्रकाश मे वञ्चित होता हुआ दिति है। मध्यान्ह प्रर्णिमा है, मध्यरात्रि अमावास्या है, प्रातःकाल शुक्लाष्टमी है, सायंका है । इसी प्रकार उत्तरायणमण्डल अदिति है, दक्षिणायनमण्डल दिति है। उत्तरायण उपक्रमकाल शुक्लाष्टमी है, मध्यकाल पूर्णिमा है, उपसंहारकाल कृष्णाष्टमी है, दक्षिणायन मध्यकाल दर्श है, विषुवकाल पूर्णिमा है । सारा सम्वत्सर पूर्णिमारूप है, प्रकाशरूप है, संवत्सर के पूर्व-पश्चिम सब ओर पूर्णिमा (प्रकाश) का साम्राज्य है। इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है—

पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तादुन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय । 
तस्यां देवा अधि संवसन्त उत्तमे नाक इह मादयन्ताम् ॥ (तै० ब्रा० ३।१।१।) इति ।

पौर्णमासेष्टि का सम्बन्ध मध्य के विषुवकाल से ही है। यहीं सारे प्राणदेवता प्रतिष्ठित हैं, यही नाक स्थान है। इसी अभिप्राय से ‘मध्यतः पौर्णमासी जिगाय०‘ इत्यादि कहा गया है। यही पृथिवी का दर्शपूर्णमास है। पृथिवी सूर्य का उपग्रह है, अतएव सूर्य प्रतिपत् है, पृथिवी अनुचर है ।

चन्द्रयुक्त पृथिवी को साथ लिए हुए सूर्य परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है। यही सूर्य का दर्शपूर्णमास है । इसी सौरदर्शपूर्णमास से परमेष्ठी रूप महान् में त्रैगुण्य भाव का उदय होता है । परमेष्ठी का वह भाग है, जो सौरप्रकाश से युक्त रहता है, पूर्णिमाकाल है यही यही अदिति मण्डल है, अध्यात्मभाषानुसार सत्त्वप्रधान महान् है । विरुद्ध तमोमय भाग दर्शकाल है, यही दिति मण्डल है, यही तमःप्रधान महान् है । सन्धिभाग रजोमहान् है। इसी सौर अदिति का निरूपण करती हुई उपनिषच्छुति कहती है—

या प्राणेन (सौरप्राणेन) सम्भवसदितिर्देवतामयी । 
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत || (कठ० ४।७) ।

सूर्य परमेष्ठी का उपग्रह है, अतएव परमेष्ठी प्रतिपत् है, सूर्य अनुचर है । चन्द्रमा–पृथिवी एवं सूर्य को अपने महिमामण्डल में प्रतिष्ठित रखता हुआ परमेष्ठी स्वयम्भू लगाता है । इस परिक्रमा से ही विश्वका स्वरूप निर्माण होता है। विश्व एक प्रकार का प्रकाश है, यही पुण्याह (ब्रह्मा का दिन-सृष्टिकाल) है । यही सृष्टिकाल अदिति मण्डल है, यही पूर्णिमा है । प्रलयावस्था विश्वभावात्मक तमोरूप दितिकाल है, यही दर्श है, यही परमेष्ठीकृत दर्शपूर्णमास है । स्त्रयं स्त्रयम्भू स्थिर है, अतएव इसे परोरजा कहा जाता है । पृथिवीरूप भूलोक (१), सूर्य्यरूप स्वर्लोक (२), पृथिवी और सूर्य के मध्य का भुवर्लोक (३), परमेष्ठीरूप जनल्लोक (४), परमेष्ठी और सूर्य के मध्यका महर्लोक (५), स्वयम्भू और परमेष्ठी के मध्यका तपोलोक (६) यह ६ औं रज (परिभ्रमणशील लोक ) उस परोरजा सत्यलोकात्मक स्थिर स्वयम्भू (७) के आधार पर प्रतिष्ठित हैं। उसनें अपनी प्राणशक्ति से [स्वयम्भू प्राण प्रधान है] ६ ओं का विधरण कर रक्खा है। इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है ।

अचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विदुमने न विद्वान् । 
वियस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्यरूपे किमपि स्विदेकम् ।। (ऋक्सं० नासदीयसूक्त १।१६४।६।) 

इस प्रकार प्राणप्रधान विश्वकर्मा स्वयम्भू ( ईश्वर ) प्रजापति अपनी वरुण [ परमेष्ठी ], इन्द्र [ सूर्य ], अग्नि [पृथिवी], सोम [चन्द्रमा] इन चार प्रतिमाओं से युक्त होकर दर्शपूर्णमास का प्रवर्तक बनता हुआ परमप्रजापति नाम से प्रसिद्ध होजाता है। इसी परमप्रजापति का निरूपण करती हुई यजुःश्रुति कहती है—

या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा। 
शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः ।। (यजुःसं. १७। २१ ।)

सत्य, तप, जन, पह यह चार परमधाम हैं, स्वः मध्यमधाम है, सुब: भूः अवमधाम है । दूसरे शब्दों में स्त्रयम्भू परमेष्ठी परमधाम है, सूर्य मध्यमधाम है, चन्द्रमा एवं पथिवी अवमधाम है । परमेष्ठी-सूर्य-चन्द्रमा-पथिवी-यह चार उस के अभिन्न सखा- हैं। इन्हें वह श्रेष्ठमित्र (स्वयम्भू) शिक्षा देरहा है। जैसा स्वरूप उस का है, जो संस्थाक्रम उस में है, ठीक वैसा ही स्वरूप, वही संस्थाक्रम उक्त चारों प्रतिमाप्रजापतियों में है । वह वर्तुल है, यह चारों भी वर्तुल हैं । वह आम [ हृदयभाव], पद [पिण्ड], पुनःपद [ महिमा ] भेद से त्रिपत्री है, वे ही तीन तीन पर्व इन चारों में हैं । यही शिक्षण है। उक्त कामप्रयज्ञ से परस्पर में मिलते हुए पांचों सर्वरूप बन रहे हैं। इसी आधारपर पूर्वप्रकरणों में हमनें प्राणादि पांचों को ‘सार्थ्य’ किंवा ‘सर्व’ नाम से व्यवहृत किया है [ देखिए ई. वि. भा. पृ. सं- ३२५ ] । विश्व में सर्वत्र इन्हीं सर्वप्राणादि का साम्राज्य है । प्रजापति की इन्हीं संस्थाओं का दिग्दर्शन कराती हुई वाजिश्रुति कहती है—

“स ऐक्षत प्रजापतिः-इमं वा आत्मनः प्रतिमामसक्षि++++ ता वाऽएताः प्रजापतेरधिदेवता असृज्यन्त-अभि-रिन्द्रः-सोमः परमेष्ठी प्राजाप त्यः + + + + तत एतं परमेष्ठी प्राजापत्यो यज्ञमपद्यदर्श पूर्णमासौ, ताभ्यामयजत । ताभ्यामिष्वाऽकामयत-अहमेवेदं सर्व स्यामिति, सपोऽभवत् “आपो वा इदं सर्वम्” । स परमेष्ठी प्रजापतिं पितरमब्रवीत-कामप्रं वाऽहं यज्ञमदर्श, तेन त्वा याजयानीती, तथेति । तमयाजत् । स इष्ट्वा अकाम यत – अहमेवेदं सर्वं स्यामिति, सप्राणो ऽभवत् “प्राणो वा इदं सर्वम्" स प्रजापतिरिन्द्रं पुत्रमब्रवीत् - अनेन त्वा काममेण० + + + + स वाग भवत्, “वाग्वां इदं सर्वम्” । स इन्द्रोऽग्नीषौमौ भ्रातरौ-अब्रवीत्, अने॑न बां कामभेण० + + ++ अन्नाद एवान्यतरोऽभवत्, अन्तः । अन्नाद एवाभिरभवत्, अन्नं सोपः। अन्नदश्च वा इदं सर्वमन्नं च । ता वा एताः पञ्च देवताः (ब्रह्मा (प्राणः), विष्णुः (आपः-वरुणः), इन्द्रः (वाक्', अग्निः (अन्नादः), सोमः ( अन्नम् ) एताः पञ्चदेवताः) एतेन कामप्रेण यज्ञेना जयन्त । ता यत्कामा ( सर्वव्याप्ति-प्राप्तिकामा ) अयजन्त, सभ्यः काम: समात | यवँकामो हवाऽएतेन यज्ञेन यजते, सोऽस्मै कामः समृध्यते" ( ब्रा० ११ कां । १ अ० । ६ ब्रा० । १३ क० - २० कं० पर्यन्त) ।

उक्त श्रुति की तीन चार बातों पर पाठकों को विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि उन्हीं के आधार पर पुण्डीरविद्या का रहस्य अवलम्बित है, जो कि आगे जाकर स्पष्ट होगा । पहिली बात तो यह है कि प्रजापति शब्द से प्रकृत में व्यापक मायावच्छिन्न मायी महेश्वर अभिप्रेत है । इस प्रजापति से क्रमशः परमेष्ठी, इन्द्र, अग्नि, सोम इन चार अधिदेवताओं का प्रादुर्भाव होता है। इनमें श्रुतिनें परमेष्ठी को प्राजापत्य कहा है। दूसरी बात यह है कि परमेष्ठी ही सर्वप्रथम दर्शपूर्णमास यज्ञ करता है । परमेष्ठी आगे जाकर उस पितर प्रजापति से कहता है कि मैनें दर्श पूर्णमास नाम का कामप्र यज्ञ देखा है, मेरी इच्छा है कि मैं इस यज्ञ से आप का यजन करूं । प्रजापति की ‘तथास्तु’ इस अनुमति से परमेष्ठी प्राजापत्य कामप्रयज्ञ से प्रजापति का यजन करता है। परमेष्ठी का स्वयम्भू प्रजापति के चारों ओर परिक्रमा लगाना ही कामप्रयज्ञ से इस प्रजापति का यजन करना है । तीसरी बात यह है कि इस परमेष्ठीकृत परिक्रमारूप यज्ञ से ही प्रजा पति की नवीन प्राणसंस्था का उदय होता है । पहिले सर्वरूप आपोमय परमेष्ठी का उदय होता है, अनन्तर प्राणमय स्वयम्भू का उदय होता है। मायी स्वयम्भू पृथक् तत्त्व है, एवं परमेष्ठी के 1 सम्बन्ध से प्राणरूप से उदित होनेंवाला योगमायावच्छिन्न पुण्डीर स्वयम्भू पृथक् है । मायी स्वयम्भू प्रथमज था, इससे परमेष्ठी उत्पन्न हुआ, परमेष्ठी से पुण्डीर स्वयम्भू का जन्म हुआ । प्राजापत्य परमेष्ठी के द्वारा पुण्डीररूप में परिणत होनें वाले इस परिच्छिन्न स्वयम्भू के लिए आगे जाकर ‘स प्रजापतिरिन्द्रं पुत्रमब्रवीत्‘ कहागया है। श्रुतिके आरम्भ का प्रजापति शब्द जहां व्यापक मायी स्वयम्भू (महेश्वर) का वाचक है, वहां यह आगे का प्रजापति शब्द महेश्वर संस्था में भुक्त बल्शेश्वर पुण्डीर स्वयम्भूका वाचक है । मायी स्वयम्भूकी इच्छा से परमेष्ठीनें दर्शपूर्णमास किया है, है, एवं पुण्डीर स्वयम्भू की इच्छा से इन्द्र (सूर्य) अग्नि (पृथिवी ) सोम (चन्द्रमा ) नें दर्शपूर्णमास किया है। पुण्डीर स्वयम्भू की अपेक्षा से ही परमेष्ठी-सूर्य आदि प्रतिमाप्रजापति नाम से व्यव हृत हुए हैं । एक एक बल्शामें पांच पांच पुण्डीर हैं । इन पांचों में स्वयंम्भू परमप्रजापति है, शेष चारों प्रतिमाप्रजापति हैं । उस व्यापक मायी स्वयम्भू के उदर में ऐसी पञ्चपुण्डीरात्मिका सहस्र (१,०००) प्राजापत्य बल्शाएं प्रतिष्ठित रहती हैं । मायावच्छेदेन स्वयम्भू एक है, पुण्डीरावच्छेदेन स्वयम्भू एक सहस्र हैं, यही वक्तव्य है।

पञ्चपुराडीराप्राजापत्यबल्शा