मण्डूकोपाख्यान : अधर्म और अहङ्कार के कारण मनुष्य का पतन कैसे होता है?

अहङ्कार और धर्म का ह्रास

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · पृष्ठ 1327–1343

वैशम्पायन ने युधिष्ठिर से कहा

ब्राह्मणों की महिमा और अद्भुत चरित्र के वर्णन हेतु

वैशम्पायनजी कहते हैं— 'जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा — ‘ ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये'

तब मार्कण्डेयजीने कहा – ' राजन्! ब्राह्मणोंके इस अद्भुत चरित्रका श्रवण करो ‘

वैशम्पायन उवाच

अथाचष्ट मार्कण्डेयोऽपूर्वमिदं श्रूयतां ब्राह्मणानां चरितम् ॥

तब मार्कण्डेयजीने कहा – ' राजन्! ब्राह्मणोंके इस अद्भुत चरित्रका श्रवण करो ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 2पृष्ठ 1329

अयोध्यापुरीमें इक्ष्वाकुकुलके धुरन्धर वीर राजा परीक्षित् रहते थे। एक दिन वे शिकार खेलने के लिये निकले। मार्ग में वे एक एकमात्र अश्व की सहायता से एक हिंसक पशु का पीछा करते हुए बहुत दूर निकल आए। वह पीछा करते-करते उन्हें थकावट और तीव्र भूख-प्यास ने घेर लिया। उसी समय उन्हें एक ओर नीले रङ्ग का दूसरा वन दिखाई दिया, जो और भी घना था। राजा उस घने वन के भीतर प्रवेश कर गए।

उस वनस्थली के मध्यभाग में एक अत्यन्त रमणीय सरोवर था। उसे देखकर राजा अपने घोड़े सहित सरोवर के जल में उतर गए। जल पीकर जब वे कुछ आश्वस्त हुए, तब उन्होंने घोड़े के आगे कुछ कमल की नालें डालकर स्वयं उस सरोवर के तट पर लेट गए। लेटे-ही-लेटे उनके कानों में कहीं से एक मधुर गीत की ध्वनि सुनाई पड़ी। राजा सोचने लगे कि यहाँ मनुष्यों की गति तो नहीं दिखायी देती; फिर यह किसके गीत का शब्द सुनायी देता है?

तभी उनकी दृष्टि एक कन्या पर पड़ी, जो अपने परम सुन्दर रूप के कारण देखने ही योग्य थी। वह वन के फूल चुनती हुई और गीत गाती हुई धीरे-धीरे राजा के समीप आ गई। राजा ने उससे पूछा— 'कल्याणी! तुम कौन और किसकी हो?' कन्या ने उत्तर दिया— 'मैं कन्या हूँ— अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है।' तब राजा ने कहा— 'भद्रे! मैं तुझे चाहता हूँ।' कन्या बोली— 'तुम मुझे एक शर्त के साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं। मुझे कभी जल का दर्शन न कराना।' राजा ने 'बहुत अच्छा' कहकर उससे गान्धर्व विवाह कर लिया।

अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत् ।
कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति ॥

‘ कन्या बोली’ तुम मुझे एक शर्तके साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं । ' राजाने उससे वह शर्त पूछी । कन्याने कहा- ' मुझे कभी जलका दर्शन न कराना'

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 11पृष्ठ 1330

विवाह के पश्चात् राजा परीक्षित् अत्यन्त आनन्दपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा-विहार करने लगे और एकान्त में चुपचाप बैठे रहे। तभी उनकी सेना वहाँ आ पहुँची और उन्हें चारों ओर से घेर लिया। सुस्ता लेने के पश्चात राजा एक साफ-सुथरी चिकनी पालकी में अपनी पत्नी के साथ बैठकर नगर की ओर चल दिए।

सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्यातिष्ठत् ।
पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव - घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते ॥

'वह सेना अपने बैठे हुए राजाको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयी । अच्छी तरह सुस्ता लेनेके पश्चात् राजा एक साफ- सुथरी चिकनी पालकीमें उसीके साथ बैठकर अपने नगरको चल दिये और वहाँ पहुँचकर उस नवविवाहिता सुन्दरीके साथ एकान्तवास करने लगे ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 14पृष्ठ 1330

वहाँ निकट होते हुए भी कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता था। एक दिन प्रधान मन्त्री ने राजा के पास रहने वाली स्त्रियों से पूछा— 'यहाँ तुम्हारा क्या काम है?' स्त्रियों ने कहा— 'हमें यहाँ एक अद्भुत-सी बात दिखायी देती है। महाराजके अन्तःपुर में पानी नहीं जाने पाता है।' यह सुनकर मन्त्री ने एक बाग लगवाया, जिसमें कोई जलाशय नहीं था, केवल ऊँचे-ऊँचे वृक्ष थे। उस उपवन के मध्य में मोतियों के जाल से निर्मित एक बावली थी, जिसे लताओं द्वारा बाहर से ढक दिया गया था। मन्त्री ने राजा से कहा— 'महाराज! यह वन बहुत सुन्दर है, आप इसमें भलीभाँति विहार करें।'

एक दिन महाराज परीक्षित् अपनी प्रियतमा के साथ उसी उद्यान में विहार कर रहे थे। थक जाने और भूख-प्यास से पीड़ित होने पर उन्हें वासन्ती लता द्वारा निर्मित एक मनोहर मण्डप दिखाई दिया। उस मण्डप में प्रवेश करते ही उन्होंने सुधा के समान स्वच्छ जल से भरी वह बावली देखी। राजा ने रानी से कहा— 'देवि! सावधानी के साथ इस बावली के जल में उतरो।' रानी ने बावली में गोता लगाया, पर फिर बाहर नहीं निकली।

राजा ने पूरी बावली का जल निकलवा दिया, पर रानी कहीं नहीं दिखी। तभी उन्हें एक बिल के मुँह पर एक मेढक दिखाई दिया। क्रोधित होकर राजा ने आज्ञा दी— 'सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय! जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढक का ही उपहार लेकर मेरे पास आवे।'

तां स मृगयमाणो राजा नापश्यद् वापीमथ निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास स राजा ॥

स मां सर्वत्र मण्डूकवधः क्रियतामिति यो मयार्थी मृतमण्डूकोपायनमादायोपतिष्ठेदिति ॥

‘ राजाने उस वापीमें रानीकी बहुत खोज की, परंतु वह कहीं दिखायी न दी । तब उन्होंने बावलीका सारा जल निकलवा दिया । इसके बाद एक बिलके मुँहपर कोई मेढक दीख पड़ा । इससे राजाको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने आज्ञा दे दी कि ' सर्वत्र मेढकोंका वध किया जाय । जो मुझसे मिलना चाहे, वह मरे हुए मेढकका ही उपहार लेकर मेरे पास आवे '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 23-24पृष्ठ 1332

मेढकों में भय समा गया और वे डरकर मण्डूकराज के पास पहुँचे। तब मण्डूकराज तपस्वी का वेष धारण कर राजा के पास गए और बोले— 'राजन्! आप क्रोध के वशीभूत न हों। हम पर कृपा करें। निरपराध मेढकों का वध न करावें। अच्युत! आप मेढकों को मारने की इच्छा न करें। अपने क्रोध को रोकें; क्योंकि अविवेक से काम लेने वाले मनुष्यों के धन की वृद्धि नष्ट हो जाती है। प्रतिज्ञा करें कि इन मेढकों को पाकर आप क्रोध नहीं करेंगे; इस अधर्म करने से आपको क्या लाभ मिलेगा?'

मा मण्डूकान् जिघांस त्वं कोपं संधारयाच्युत ।
प्रक्षीयते धनोद्रेको जनानामविजानताम् ॥

अच्युत! आप मेढकोंको मारनेकी इच्छा न करें। अपने क्रोधको रोकें; क्योंकि अविवेकसे काम लेनेवाले मनुष्योंके धनकी वृद्धि नष्ट हो जाती है ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 28पृष्ठ 1332

राजा का हृदय रानी के शोक से दग्ध था। उन्होंने कहा— 'मैं क्षमा नहीं कर सकता। इन दुरात्माओं ने मेरी प्रियतमा को खा लिया है। अतः ये मेढक मेरे लिये सर्वथा वध्य ही हैं। विद्वन्! आप मुझे इनके वध से न रोकें।'

मण्डूकराज का मन व्यथित हो उठा। वह बोला— 'महाराज! प्रसन्न होइये। मेरा नाम आयु है। मैं मेढकों का राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है। उसका नाम सुशोभना है। वह आपको छोड़कर चली गयी, यह उसकी दुष्टता है।'

स तद् वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम ।
तस्या हि दौः शील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धाः पूर्वा इति ॥

' राजाकी बात सुनकर मण्डूकराजका मन और इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं । वह बोला —'महाराज! प्रसन्न होइये । मेरा नाम आयु है । मैं मेढकोंका राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है । उसका नाम सुशोभना है । वह आपको छोड़कर चली गयी, यह उसकी दुष्टता है । उसने पहले भी बहुत- से राजाओंको धोखा दिया है '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 32पृष्ठ 1333

राजा ने कहा— 'मैं तुम्हारी उस पुत्री को चाहता हूँ, उसे मुझे समर्पित कर दो।'

मण्डूकराज ने अपनी पुत्री को राजा के सामने प्रस्तुत किया और कहा— 'बेटी! सदा राजा की सेवा करती रहना।' पर जब पिता ने अपनी पुत्री के अपराध को याद किया, तो उसे क्रोध आ गया। उसने सुशोभना को शाप देते हुए कहा— 'अरी! तूने बहुत-से राजाओं को धोखा दिया है, इसलिये तेरी सन्तानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है!'

सुशोभना के रतिकलासम्बन्धी गुणों ने राजा के मन को बाँध लिया था। वे उसे पाकर अत्यन्त प्रसन्न थे। उन्होंने आनन्द के आँसू बहाते हुए मण्डूकराज को प्रणाम किया और हर्षगद्गद वाणी में कहा— 'मण्डूकराज! तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की है।' इसके पश्चात कन्या से विदा लेकर मण्डूकराज अपने स्थान को चला गया। कुछ काल के पश्चात् सुशोभना के गर्भ से राजा परीक्षित् के तीन पुत्र हुए— शल, दल और बल। इनमें शल सबसे बड़ा था। समय आने पर पिता ने शल का राज्याभिषेक कर स्वयं तपस्या हेतु तपोवन प्रस्थान किया।

वैशम्पायन मुनि कहते हैं— हे युधिष्ठिर! जब राजा शल ने वामदेव के आश्रम से वे दो दिव्य अश्व प्राप्त किए, तो वे हिंसक पशु का पीछा करते हुए अपने सारथि से बोले— 'सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणों के पास रहने योग्य नहीं हैं। अतः इन्हें वामदेव के पास लौटाने की आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर राजा शल उस हिंसक पशु को लेकर अपनी राजधानी लौट आए और उन दोनों अश्वों को अपने अन्तःपुर में बाँध दिया।

भगवन् मृगो मे विद्धः पलायते सम्भावयितुमर्हसि वाम्यौ दातुमिति ।
तमब्रवीदृषिर्ददानि ते वाम्यौ कृतकार्येण भवता ममैव वाम्यौ निर्यात्यौ क्षिप्रमिति ।
स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य ऋषिं प्रायाद् वामीप्रयुक्तेन रथेन मृगं प्रतिगच्छंश्चाब्रवीत् सूतमश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानां नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेत्युक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत् ॥

मुझे देनेकी कृपा करें । ' तब महर्षिने कहा- ' मैं तुम्हें वाम्य अश्व दिये देता हूँ । परंतु जब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाय, तब तुम शीघ्र ही ये दोनों अश्व मुझे ही लौटा देना । ' राजाने दोनों अश्व पाकर ऋषिकी आज्ञा ले वहाँसे प्रस्थान किया । वामी घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा हिंसक पशुका पीछा करते हुए वे सारथिसे बोले – ' सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणोंके पास रहने योग्य नहीं । अतः इन्हें वामदेवके पास लौटानेकी आवश्यकता नहीं है । ' ऐसा कहकर राजा हिंसक पशुको साथ ले अपनी राजधानीको चल दिये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने उन दोनों अश्वोंको अन्तःपुरमें बाँध दिया ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 43पृष्ठ 1336

उधर, वामदेव मुनि मन ही मन चिन्ता करने लगे— 'अहो! वह तरुण राजकुमार मेरे अच्छे घोड़ों को लेकर मौज कर रहा है, उन्हें लौटाने का नाम तक नहीं लेता। यह तो बड़े कष्ट की बात है!' एक मास बीत जाने पर उन्होंने अपने शिष्य आत्रेय से कहा— 'आत्रेय! जाकर राजा से कहो कि यदि उनका कार्य पूरा हो गया हो, तो वे मेरे दोनों वाम्य अश्व लौटा दें।' जब शिष्य ने जाकर यह बात दोहराई, तो राजा ने उत्तर दिया— 'यह सवारी राजाओं के योग्य है। ब्राह्मणों को ऐसे रत्न रखने का अधिकार नहीं है। भला, ब्राह्मणों को घोड़े लेकर क्या करना है? अब आप सकुशल पधारिए।'

जब शिष्य ने लौटकर ये अप्रिय वचन सुनाए, तो वामदेव क्रोध से जल उठे और स्वयं राजा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा— 'राजन्! मेरे वाम्य अश्वों को अब मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ों द्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच विद्यमान हो; कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिता के कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयङ्कर पाशों से बाँध लें।'

वामदेव उवाच

प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम् ।
मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै- ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥

तब वामदेवने कहा- राजन्! मेरे वाम्य अश्वोंको अब मुझे लौटा दो । निश्चय ही उन घोड़ोंद्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रियके बीचमें विद्यमान हो । कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिताके कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशोंसे बाँध लें ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 48पृष्ठ 1337

राजा शल ने तर्क दिया— 'वामदेवजी! ये दो अच्छे स्वभाव के सीखे-सिखाए हृष्ट-पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं; यही ब्राह्मणों के लिए उचित वाहन हो सकते हैं। आप इन्हीं को गाड़ी में जोतकर जहाँ चाहें जा सकते हैं। आप जैसे महात्मा का भार तो वेदमन्त्र ही वहन करते हैं।' वामदेव ने कहा— 'राजन्! हम जैसे लोगों के लिए वेद के मन्त्र ही वाहन का काम देते हैं, परन्तु वे परलोक में उपलब्ध होते हैं। इस लोक में तो ये अश्व ही हमारा वाहन हैं।'

राजा ने उपहास करते हुए कहा— 'ब्रह्मन्! तब चार गधे या वायु के समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारी के लिए प्रस्तुत हो सकते हैं। यह वाहन, जिसे आप माँगने आए हैं, क्षत्रिय नरेश के ही योग्य है। इसलिए समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आपके नहीं।' वामदेव क्रोधित होकर बोले— 'राजन्! तुम ब्राह्मणों का यह धन हड़पकर जो उपयोग में लाना चाहते हो, यह बड़ा भयङ्कर कर्म है। यदि मेरे घोड़े वापस न दिए, तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी और लौह-शरीर वाले चार भयङ्कर राक्षस हाथों में तीखे त्रिशूल लिए तुम्हारे वध की इच्छा से टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीर के चार टुकड़े करके उठा ले जाएँगे!' \राजा ने पलटवार किया— 'वामदेवजी! आप ब्राह्मण होकर भी मन, वाणी और क्रिया द्वारा मुझे मारने को उद्यत हैं; यह बात मेरे सेवकों को पता चल गई है। वे मेरी आज्ञा पाते ही हाथों में तीखे त्रिशूल और तलवार लेकर आपको मार गिराएंगे।' वामदेव ने अन्तिम चेतावनी दी— 'राजन्! तुमने प्रतिज्ञा की थी कि तुम इन्हें लौटा दोगे। यदि जीवित रहना चाहते हो, तो मेरे दोनों वाम्य अश्व वापस दे दो।' राजा बोला— 'यद्यपि आप मिथ्यावादी हैं, तो भी मैं आपको दण्ड नहीं दूँगा और आपके आदेशों का पालन करूँगा, परन्तु ये घोड़े आपको नहीं मिल सकते।'

वामदेव उवाच

ममैतौ वाम्यौ प्रतिगृह्य राजन् पुनर्ददानीति प्रपद्य मे त्वम् ।
प्रयच्छ शीघ्रं मम वाम्यौ त्वमश्वौ यद्यात्मानं जीवितुं ते क्षमं स्यात् ॥

वामदेव बोले — राजन्! तुमने जब ये मेरे दोनों घोड़े लिये थे, उस समय यह प्रतिज्ञा की थी मैं इन्हें पुनः लौटा दूँगा । ऐसी दशामें यदि अपने - आपको तुम जीवित रखना चाहते हो तो मेरे दोनों वाम्यसंज्ञक घोड़े वापस दे दो ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 54पृष्ठ 1339

वामदेव ने कहा— 'राजन्! मन, वाणी अथवा क्रिया द्वारा कोई भी अनुशासन ब्राह्मण पर लागू नहीं हो सकता। जो इस प्रकार कष्ट सहकर ब्राह्मण की सेवा करता है, वही जीवित रहता है।' यह कहते ही चार विकराल रूपधारी राक्षस त्रिशूल लेकर प्रकट हो गए। जब वे राजा पर चोट करने लगे, तब राजा चिल्लाया— 'यदि इक्ष्वाकुवंश के लोग और मेरी प्रजा भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं इन घोड़ों को कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि ऐसे लोग धर्मात्मा नहीं होते!' इतना कहते ही राजा शल उन राक्षसों द्वारा मारे गए और वहीं धराशायी हो गए।

इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु- विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि ।
नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥

‘ यदि ये इक्ष्वाकुवंशके लोग तथा मेरे आज्ञापालक प्रजावर्गके मनुष्य भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेवके इन वाम्य संज्ञक घोड़ोंको कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि इनके - जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैं '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 58पृष्ठ 1340

जब इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों को पता चला कि राजा मार गिराए गए हैं, तो उन्होंने उनके छोटे भाई दल का राज्याभिषेक कर दिया। राजा दल के पास पुनः वामदेव पहुँचे और कहा— 'महाराज! ब्राह्मणों की वस्तु उन्हें दे दी जानी चाहिए। यदि तुम अधर्म से डरते हो, तो शीघ्र मेरे वाम्य अश्व लौटा दो।' क्रोधित होकर राजा दल ने अपने सारथि से कहा— 'सूत! एक अद्भुत बाण ले आओ जो विष में बुझाकर रखा गया हो, जिससे घायल होकर यह वामदेव धरती पर लोट जाए और कुत्ते इसे नोच-नोच कर खाएँ।'

वामदेव ने कहा— 'नरेन्द्र! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी रानी के गर्भ से श्येनजित् नामक पुत्र पैदा हुआ है, जो तुम्हें बहुत प्रिय है। तुम मेरी आज्ञा से उसी पुत्र का वध करोगे।' जैसे ही यह कहा, वह प्रचण्ड तेजस्वी बाण धनुष से छूटा और राजकुमार का वध कर डाला। समाचार सुनकर राजा दल ने कहा— 'इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! मैं अभी तुम्हारा प्रिय करता हूँ। एक दूसरा तेजस्वी बाण ले आओ और मेरा पराक्रम देखो।' वामदेव बोले— 'नरेश्वर! तुम इस विकराल बाण को धनुष पर चढ़ा रहे हो, परन्तु मैं कहता हूँ कि इस बाण को न तुम धनुष पर रख सकोगे और न छोड़ सकोगे!'

वामदेव उवाच

यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं विषेण दिग्धं मम संदधासि ।
न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र ॥

वामदेवजीने कहा — नरेश्वर! तुम विषके बुझाये हुए इस विकराल बाणको मुझे मारनेके लिये धनुषपर चढ़ा रहे हो, परंतु मैं कहे देता हूँ ' इस बाणको न तो तुम धनुषपर रख सकोगे और न छोड़ ही सकोगे '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 66पृष्ठ 1342

राजा दल घबराकर बोला— 'इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! देखो, मैं फँस गया। अब यह बाण नहीं छोड़ सकूँगा। अतः यह महर्षि जीवित रहे।' वामदेव ने कहा— 'राजन्! इस बाण से अपनी रानी का स्पर्श कर लेने पर तुम ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाओगे।' राजा ने ऐसा ही किया। तब राजपुत्री ने मध्यस्थता करते हुए कहा— 'वामदेवजी! मैं अपने स्वामी को सदैव मीठे वचन बोलने की सलाह देती हूँ और स्वयं ब्राह्मणों की सेवा ढूँढ़ती हूँ। इन सत्कर्मों के कारण मुझे पुण्यलोक मिले।'

vमदेव ने प्रसन्न होकर कहा— 'शुभ दृष्टि वाली राजकुमारी! तुमने इस राजकुल को ब्राह्मण के कोप से बचा लिया है। कोई अनुपम वर माँगो।' राजकुमारी बोली— 'भगवन्! मैं यही चाहती हूँ कि मेरे पति पापों से छुटकारा पाकर अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवों सहित सुख से रहें।' वामदेव ने कहा— 'ऐसा ही होगा।' यह सुनकर राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षि को प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिए।

वामदेव उवाच

त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते ।
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥

वामदेवने कहा- शुभ दृष्टिवाली अनिन्द्य राजकुमारी! तुमने इस राजकुलको ब्राह्मणके कोपसे बचा लिया । इसके लिये कोई अनुपम वर माँगो । मैं तुम्हें अवश्य दूँगा । तुम इन स्वजनोंके हृदय और विशाल इक्ष्वाकु- राज्यपर शासन करो ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 192 · श्लोक 70पृष्ठ 1343

In English

The Stories of Parikshit and his sons

King Parikshit marries a woman named Sushobhana on the condition that he never shows her water, but she disappears into a well. Later, Parikshit's son Shal dies after refusing to return two horses to the sage Vamadeva, and his other son Dal is defeated by Vamadeva's power.

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  • What was the condition for king parikshit to marry sushobhana?
  • Why did king parikshit want to kill the frogs?
  • How did vamadeva kill the son of king dal?

Also written: Mandukopakhyana, Manduka, Sushobhana, Shala, Dala, Vamadeva, Atreya, Rajaputri, मण्डूकोपाख्यान