श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1341–1350
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1341–1350
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एकं हि मे सायकं चित्ररूपं दिग्धं विषेणाहर संगृहीतम् । येन विद्धो वामदेवः शयीत संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ॥ ६२ ॥
‘ सूत! एक अद्भुत बाण ले आओ, जो विषमें बुझाकर रखा गया हो, जिससे घायल होकर यह वामदेव धरतीपर लोट जाय । इसे कुत्ते नोच- नोचकर खायँ और यह पृथ्वीपर पड़ा - पड़ा पीड़ासे छटपटाता रहे ' ॥ ६२ ॥
वामदेव उवाच जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं
तं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र ।
तं जहि त्वं मद्वचनात् प्रणुन्न- स्तूर्णं प्रियं सायकैर्घोररूपैः ॥ ६३ ॥
वामदेवने कहा —नरेन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हारी रानीके गर्भसे श्येनजित् नामक एक पुत्र पैदा हुआ है, जो तुम्हें बहुत प्रिय है और जिसकी अवस्था दस वर्षकी हो गयी है । तुम मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर इन भयंकर बाणोंद्वारा अपने उसी पुत्रका शीघ्र वध करोगे ॥ ६३ ॥
मार्कण्डेय उवाच एवमुक्तो वामदेवेन राज- न्नन्तःपुरे राजपुत्रं जघान । स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्टः श्रुत्वा दलस्तत्र वाक्यं बभाषे ॥ ६४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! वामदेवके ऐसा कहते ही उस प्रचण्ड तेजस्वी बाणने धनुषसे छूटकर रनवासके भीतर जा राजकुमारका वध कर डाला । यह समाचार सुनकर दलने वहाँ पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६४ ॥
राजोवाच इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं निमीमं विप्रमद्य प्रमथ्य । आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ॥ ६५ ॥
राजाने कहा – इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! मैं अभी तुम्हारा प्रिय करता हूँ । आज इस ब्राह्मणको रौंदकर मार डालूँगा । एक- दूसरा तेजस्वी बाण ले आओ और आज मेरा पराक्रम
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देखो ॥ ६५ ॥
वामदेव उवाच यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं विषेण दिग्धं मम संदधासि । न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र ॥ ६६ ॥
वामदेवजीने कहा — नरेश्वर! तुम विषके बुझाये हुए इस विकराल बाणको मुझे मारनेके लिये धनुषपर चढ़ा रहे हो, परंतु मैं कहे देता हूँ ' इस बाणको न तो तुम धनुषपर रख सकोगे और न छोड़ ही सकोगे ' ॥ ६६ ॥
राजोवाच इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम् । न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि आयुष्मान् वै जीवतु वामदेवः ॥ ६७ ॥
राजा बोले – इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! देखो, मैं फँस गया । अब यह बाण नहीं छोड़ सकूँगा । इसलिये वामदेवको नष्ट करनेका उत्साह जाता रहा । अतः यह महर्षि दीर्घायु होकर जीवित रहे ॥ ६७ ॥
वामदेव उवाच संस्पृश्यैनां महिषीं सायकेन ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् । ततस्तथा कृतवान् पार्थिवस्तु ततो मुनिं राजपुत्री बभाषे ॥ ६८ ॥
वामदेवजीने कहा-राजन्! तुम इस बाणसे अपनी रानीका स्पर्श कर लेनेपर ब्रह्महत्याके पापसे छूट जाओगे । तब राजाने ऐसा ही किया । तदनन्तर राजपुत्रीने मुनिसे कहा ॥ ६८ ॥
राजपुत्र्युवाच यथा युक्ता वामदेवाहमेनं दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम् । ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ६ ९ ॥
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राजपुत्री बोली - वामदेवजी! मैं इन कठोर स्वभाववाले अपने स्वामीको प्रतिदिन सावधान रहकर मीठे वचन बोलनेकी सलाह देती रहती हूँ और स्वयं ब्राह्मणोंकी सेवाका अवसर ढूँढ़ती हूँ । ब्रह्मन्! इन सत्कर्मोंके कारण मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो ॥ ६ ९ ॥ वामदेव उवाच त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते । प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥ ७० ॥
वामदेवने कहा- शुभ दृष्टिवाली अनिन्द्य राजकुमारी! तुमने इस राजकुलको ब्राह्मणके कोपसे बचा लिया । इसके लिये कोई अनुपम वर माँगो । मैं तुम्हें अवश्य दूँगा । तुम इन स्वजनोंके हृदय और विशाल इक्ष्वाकु- राज्यपर शासन करो ॥ ७० ॥
राजपुत्र्युवाच वरं वृणे भगवंस्त्वेवमेष विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता । शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्रय ॥ ७१ ॥
राजकुमारी बोली– भगवन्! मैं यही चाहती हूँ कि मेरे ये पति आज सब पापोंसे छुटकारा पा जायँ । आप यह आशीर्वाद दें कि ये पुत्र और बन्धु- बान्धवोंसहित सुखसे रहें । विप्रवर! मैंने आपसे यही वर माँगा है ॥ ७१ ॥
मार्कण्डेय उवाच श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या- स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर । ततः स राजा मुदितो बभूव वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य ॥ ७२ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं – कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! राजपुत्रीकी यह बात सुनकर वामदेव मुनिने कहा - 'ऐसा ही होगा । ' तब राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षिको प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिये ॥ ७२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि मण्डूकोपाख्याने द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ २ ॥ इसप्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें मण्डूकोपाख्यानविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ २ ॥
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त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः इन्द्र और बक मुनिका संवाद वैशम्पायन उवाच मार्कण्डेयमृषयो ब्राह्मणा युधिष्ठिरश्च पर्यपृच्छ- नृषिः केन दीर्घायुरासीद् बको मार्कण्डेयस्तु तान् सर्वानुवाच ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! एक दिन ऋषियों, ब्राह्मणों तथा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिसे पूछा — ' ब्रह्मन्! महर्षि बक कैसे दीर्घायु हुए थे? ' तब मार्कण्डेयजीने उन सबसे कहा- ॥ १ ॥
महातपा दीर्घायुश्च बको राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २ ॥
‘ राजन्! बक महान् तपस्वी होनेके कारण दीर्घायु हुए थे । इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ' ॥ २ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सह भारत ।
मार्कण्डेयं पर्यपृच्छद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन जनमेजय! मार्कण्डेयजीका यह कथन सुनकर भाइयोंसहित कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः पूछा- ॥ ३ ॥
श्रूयते हि महाभाग बको दाल्भ्यो महातपाः ।
प्रियः सखा च शक्रस्य चिरजीवी च सत्तम ॥ ४ ॥
महाभाग मुनिश्रेष्ठ! दल्भके पुत्र महातपस्वी बक ऋषि चिरजीवी तथा देवराज इन्द्रके प्रिय मित्र सुने जाते हैं ॥ ४ ॥
एतदिच्छामि भगवन् बकशक्रसमागमम् ।
सुखदुःखसमायुक्तं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥ ५ ॥
‘ भगवन्! बक और इन्द्रका यह समागम (चिरजीवी पुरुषोंके ) सुख और दुःखकी वार्तासे युक्त कहा गया है । मैं इसे सुनना चाहता हूँ; आप यथार्थरूपसे इसका वर्णन करें' ॥ ५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
वृत्ते देवासुरे राजन् संग्रामे लोमहर्षणे ।
त्रयाणामपि लोकानामिन्द्रो लोकाधिपोऽभवत् ॥ ६ ॥
मार्कण्डेयजी बोले — राजन्! जब रोंगटे खड़े कर देनेवाला देवासुर संग्राम समाप्त हो गया, उस समय लोकपाल इन्द्र तीनों लोकोंके अधिपति बना दिये गये ॥ ६ ॥
सम्यग् वर्षति पर्जन्ये सस्यसम्पद उत्तमाः ।
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निरामयाः सुधर्मिष्ठाः प्रजा धर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
इन्द्रके शासनकालमें मेघ ठीक समयपर अच्छी वर्षा करते और खेतीकी उपज अच्छी होती थी । सारी प्रजा रोग- व्याधिसे रहित, धर्ममें स्थित तथा धर्मको ही अपना परम आश्रय माननेवाली थी ॥ ७ ||
मुदितश्च जनः सर्वः स्वधर्मेषु व्यवस्थितः ।
ताः प्रजा मुदिताः सर्वा दृष्ट्वा बलनिषूदनः ॥ ८ ॥
ततस्तु मुदितो राजन् देवराजः शतक्रतुः ।
ऐरावतं समास्थाय ताः पश्चन् मुदिताः प्रजाः ॥ ९ ॥
सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने - अपने धर्मोंमें स्थित रहते थे । अपनी उन सारी प्रजाको आनन्दित देखकर बलासुरके शत्रु देवराज इन्द्र बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करते थे । एक दिनकी बात है, इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो चैनसे दिन बिताती हुई अपनी प्रजाको देखनेके लिये भ्रमण करने लगे ॥ ८ - ९ ॥
आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदीश्च विविधाः शुभाः ।
नगराणि समृद्धानि खेटान् जनपदांस्तथा ॥ १० ॥
प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान् धर्मचारिणः ।
उदपानं प्रपा वापी तडागानि सरंसि च ॥ ११ ॥
नाना ब्रह्मसमाचारैः सेवितानि द्विजोत्तमैः ।
ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतुः ॥ १२ ॥
राजन्! विचित्र आश्रमों, नाना प्रकारकी कल्याण- कारिणी नदियों, समृद्धिशाली नगरों, गाँवों, जनपदों, प्रजापालन -कुशल धर्मात्मा नरेशों, कुओं, पौसलों, बावलियों, तालाबों तथा ब्रह्मचर्यपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सेवित अनेकानेक सरोवरोंका अवलोकन करते हुए शतक्रतु इन्द्र एक रमणीय भूभागमें उतरे ॥ १०–१२ ॥
तत्र रम्ये शिवे देशे बहुवृक्षसमाकुले ।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां समुद्राभ्याशतो नृप ॥ १३ ॥
तत्राश्रमपदं रम्यं मृगद्विजनिषेवितम् ।
तत्राश्रमपदे रम्ये बकं पश्यति देवराट् ॥ १४ ॥
राजन्! परम सुन्दर पूर्वदिशामें समुद्रके निकट एक मनोहर एवं सुखद स्थानमें, जो बहुत - से वृक्षोंसे घिरा हुआ था, एक रमणीय आश्रम दिखायी दिया, जहाँ बहुत- से पशु और पक्षी निवास करते थे । देवराज इन्द्रने उस रमणीय आश्रममें जाकर बक मुनिका दर्शन किया ॥
बकस्तु दृष्ट्वा देवेन्द्रं दृढं प्रीतमनाभवत् ।
पाद्यासनार्घ्यदानेन फलमूलैरथार्चयत् ॥ १५ ॥
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देवराज इन्द्रको उपस्थित देख बकके हृदयमें दृढ़ प्रेम उत्पन्न हुआ । उन्होंने पाद्य, आसन, अर्घ्य और फल- मूलादि देकर देवराजका पूजन किया ॥ १५ ॥
सुखोपविष्टो वरदस्ततस्तु बलसूदनः ।
ततः प्रश्नं बकं देव उवाच त्रिदशेश्वरः ॥ १६ ॥
सबको वर देनेवाले बलनिषूदन देवेश्वर इन्द्र जब सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये, तब वे मुनिवर बकसे इस प्रकार बोले – ॥ १६ ॥
शतं वर्षसहस्राणि मुने जातस्य तेऽनघ ।
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १७ ॥
‘ निष्पाप मुने! आपकी अवस्था एक लाख वर्षकी हो गयी । ब्रह्मन्! आप अपने अनुभवके आधारपर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या दुःख होता है '? ॥ बक उवाच
अप्रियैः सह संवासः प्रियैश्चापि विनाभवः ।
असद्भिः सम्प्रयोगश्च तद् दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १८ ॥
बकने कहा — देवेश्वर! अप्रिय मनुष्योंके साथ रहना पड़ता है । प्रियजनोंकी मृत्यु हो जानेसे उनके वियोगका दुःख सहते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है और दुष्ट मनुष्योंका
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संग प्राप्त होता है । चिरजीवी मनुष्योंके लिये यही महान् दुःख है ॥ १८ ॥
पुत्रदारविनाशोऽत्र ज्ञातीनां सुहृदामपि ।
परेष्वायत्तताकृच्छ्रं किं नु दुःखतरं ततः ॥ १ ९ ॥
अपनी आँखोंके सामने स्त्री और पुत्रोंकी मृत्यु होती है । भाई- बन्धु आदि जातिके लोगों और सुहृदोंका सदाके लिये वियोग हो जाता है तथा जीवन -निर्वाहके लिये दूसरोंके अधीन रहकर उनके तिरस्कारका कष्ट भोगना पड़ता है । इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? ॥ १ ९ ॥
नान्यद् दुःखतरं किञ्चिल्लोकेषु प्रतिभाति मे ।
अर्थैर्विहीनः पुरुषः परैः सम्परिभूयते ॥ २० ॥
निर्धन मनुष्यको जो दूसरोंसे तिरस्कृत होना पड़ता है, इससे बढ़कर महान् कष्टकी बात संसारमें मुझे और कोई नहीं जान पड़ती है ॥ २० ॥
अकुलानां कुले भावं कुलीनानां कुलक्षयम् ।
संयोगं विप्रयोगं च पश्यन्ति चिरजीविनः ॥ २१ ॥
चिरजीवी मनुष्य अकुलीनोंके कुलकी उन्नति, कुलीनोंके कुलका संहार तथा संयोग और वियोग देखते रहते हैं ॥ २१ ॥
अपि प्रत्यक्षमेवैतत् तव देव शतक्रतो ।
अकुलानां समृद्धानां कथं कुलविपर्ययः ॥ २२ ॥
देव शतक्रतो! आप भी तो यह प्रत्यक्ष ही देख रहे हैं कि किस प्रकार समृद्धिशाली अकुलीन मनुष्योंके कुलमें उलट- फेर हो जाता है ॥ २२ ॥
देवदानवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसाः ।
प्राप्नुवन्ति विपर्यासं किं नु दुःखतरं ततः ॥ २३ ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षस – ये सभी विपरीत अवस्थामें पहुँचकर क्यासे क्या हो जाते हैं? इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा? ॥ २३ ॥
कुले जाताश्च क्लिश्यन्ते दौष्कुलेयवशानुगाः ।
आढ्यैर्दरिद्राश्चाक्रान्ताः किं नु दुःखतरं ततः ॥ २४ ॥
कुलीन मनुष्य भी नीच कुलके लोगोंके वशमें पड़कर क्लेश उठा रहे हैं और धनीलोग दरिद्रोंको सताते हैं । इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ॥ २४ ॥
लोके वैधर्म्यमेतत् तु दृश्यते बहुविस्तरम् ।
हीनज्ञानाश्च हृष्यन्ते क्लिश्यन्ते प्राज्ञकोविदाः ॥ २५ ॥
बहुदुःखपरिक्लेशं मानुष्यमिह दृश्यते । लोकमें यह विपरीत अवस्था बहुत अधिक दिखायी देती है । ज्ञानहीन मूढ़ मनुष्य तो मौज करते हैं और श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य क्लेश भोग रहे हैं । यहाँ मानवयोनिमें दुःख और क्लेशकी अधिकता ही दृष्टिगोचर होती है ॥ २५३ ॥
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इन्द्र उवाच पुनरेव महाभाग देवर्षिगणसेवित ॥ २६ ॥
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं सुखं चिरजीविनाम् । इन्द्रने पूछा— महाभाग! देवता तथा ऋषियोंके समुदाय आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं । ब्रह्मन्! अब मुझसे फिर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या सुख मिलता है? ॥ २६ ॥
बक उवाच अष्टमे द्वादशे वापि शाकं यः पचते गृहे ॥ २७ ॥
कुमित्राण्यनपाश्रित्य किं वै सुखतरं ततः ।
यत्राहानि न गण्यन्ते नैनमाहुर्महाशनम् ॥ २८ ॥
बकने कहा — जो दिनके आठवें या बारहवें भागमें अपने घरपर भोजनके लिये केवल शाक पका लेता है परंतु कुमित्रोंकी शरणमें नहीं जाता, उस पुरुषको जो सुख प्राप्त है, उससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? जहाँ दिन नहीं गिने जाते- जहाँ प्रतिदिन अन्नकी प्राप्तिके लिये चिन्ता नहीं करनी पड़ती; वही सुखी है। उसे लोग अधिक खानेवाला अथवा पेटू नहीं कहते हैं ॥ २७-२८ ॥
अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे ।
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कञ्चन ॥ २ ९ ॥
इन्द्र! जो अपने पराक्रमसे उपार्जन करके घरमें केवल शाक बनाकर खाता है, परंतु दूसरे किसीका सहारा नहीं लेता, उसे ही सुख है ॥ २ ९ ॥
फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे ।
परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः ॥ ३० ॥
सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम् ।
श्ववत् कीलालपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति ॥ ३१ ॥
धिगस्तु तस्य तद् भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः । दूसरेके सामने दीनता न दिखाकर अपने घरमें फल और शाक खाकर रहना अच्छा है । परंतु दूसरेके घरमें सदा तिरस्कार सहकर मीठे पकवान खाना भी अच्छा नहीं है; अतः दूसरेके आश्रित रहकर जीवन निर्वाह करनेके सम्बन्धमें साधु पुरुषोंका सदासे ही विरोध रहा है । जो पराया अन्न खाना चाहता है, वह कुत्तेकी भाँति खून चाटता है । उस दुरात्मा और कृपणके वैसे भोजनको धिक्कार है ॥ ३०-३१३ ॥ यो दत्त्वातिथिभूतेभ्यः पितृभ्यश्च द्विजोत्तमः ॥ ३२ ॥
शिष्टान्यन्नानि यो भुङ्क्ते किं वै सुखतरं ततः ।
अतो मृष्टतरं नान्यत् पूतं किञ्चिच्छतक्रतो ॥ ३३ ॥
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जो श्रेष्ठ द्विज सदा अतिथियों, भूत-प्राणियों तथा पितरोंको अर्पण करके अर्थात् बलिवैश्वदेव करके शेष अन्न स्वयं भोजन करता है, उससे बढ़कर महान् सुख और क्या हो सकता है? देवेन्द्र! इस यज्ञशेष अन्नसे बढ़कर अत्यन्त मधुर और पवित्र दूसरा कोई भोजन नहीं है ॥
दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्यो वै भुङ्क्ते तेनैव नित्यशः ।
यावतो ह्यन्धसः पिण्डानश्नाति सततं द्विजः ॥ ३४ ॥
तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायकः ।
यदेनो यौवनकृतं तत् सर्वं नश्यते ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
जो प्रतिदिन अतिथियोंको देकर शेष अन्नसे ही भोजनका काम चलाता है, उसके अन्नके जितने ग्रास अतिथि ब्राह्मण नित्य भोजन करता है, उतने ही हजार गौओंके दानका पुण्य उस दाताको प्राप्त होता है, तथा उसके द्वारा युवावस्थामें जो पाप हुए होते हैं, वे सब निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४-३५ ॥
सदक्षिणस्य भुक्तस्य द्विजस्य तु करे गतम् ।
यद् वारि वारिणा सिञ्चेत् तद्धयेनस्तरते क्षणात् ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणके भोजन कर लेनेपर जो उसे दक्षिणा दी जाती है, उस समय उसके हाथमें जो प्रतिग्रहका जल रहता है, उसे दाता पुनः उत्सर्गके जलसे सींचे । ऐसा करनेसे वह तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३६ ॥
एताश्चान्याश्च वै बह्वीः कथयित्वा कथाः शुभाः ।
बकेन सह देवेन्द्र आपृच्छय त्रिदिवं गतः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार देवराज इन्द्र बकके साथ ये तथा और बहुत- सी उत्तम कथा-वार्ताएँ करके उनसे आज्ञा लेकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमहाभाग्ये बकशक्रसंवादे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेय समास्यापर्वमें ब्राह्मणोंके माहात्म्यके सम्बन्धमें बक- इन्द्रसंवादविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १ ९३ ॥