यवक्रीतोपाख्यान : बिना गुरु के वेद प्राप्त करने की कोशिश क्यों विफल रही?
ज्ञान का वास्तविक मार्ग
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 135–138 · पृष्ठ 922–946
लोमश ने युधिष्ठिर से कहा
भरद्वाज मुनि और उनके पुत्रों की कथा सुनाते हुए
लोमशजी कहते हैं - राजन्! यह मधुविला नदी प्रकाशित हो रही है। इसी का दूसरा नाम समङ्गा है और यह कर्दमिल नामक क्षेत्र है, जहाँ राजा भरत का अभिषेक किया गया था। कहते हैं, वृत्रासुर का वध करके जब शचीपति इन्द्र श्रीहीन हो गये थे, उस समय उस समङ्गा नदी में गोता लगाकर ही वे अपने सब पापों से छुटकारा पा सके थे।
नरश्रेष्ठ! मैनाक पर्वत के कुक्षि भाग में यह विनशन नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकाल में अदिति देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिये साध्य देवताओं के उद्देश्य से अन्न तैयार किया था। भरतवंश के श्रेष्ठ पुरुषों! इस पर्वतराज हिमालय पर आरूढ़ होकर तुम सब अयश फैलानेवाली और नाम लेने के अयोग्य अपनी श्रीहीनता को शीघ्र ही दूर भगा दोगे। युधिष्ठिर! ये कनखल की पर्वत-मालाएँ हैं जो ऋषियों को बहुत प्रिय लगती हैं। ये महानदी गङ्गा सुशोभित हो रही है। यहीं पूर्वकाल में भगवान् सनत्कुमार ने सिद्धि प्राप्त की थी। अजमीढनन्दन! इस गङ्गामें स्नान करके तुम सब पापों से छुटकारा पा जाओगे। कुन्तीकुमार! जल के इस पुण्य सरोवर, भर्भृगुतुङ्ग पर्वत पर तथा 'उष्णीगङ्ग' नामक तीर्थ में जाकर तुम अपने मन्त्रियों सहित स्नान और आचमन करो। यहाँ यह स्थूल शिरा मुनिका रमणीय आश्रम शोभा पा रहा है। कुन्तीनन्दन! यहाँ अहङ्कार और क्रोध को त्याग दो। पाण्डुनन्दन! यह रैभ्य का सुन्दर आश्रम प्रकाशित हो रहा है, जहाँ विद्वान् भरद्वाजपुत्र यवक्रीत नष्ट हो गये थे।
एनं पर्वतराजानमारुह्य भरतर्षभाः ।
अयशस्यामसंशब्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ॥
भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुषो! इस पर्वतराज हिमालयपर आरूढ़ होकर तुम सब अयश फैलानेवाली और नाम लेनेके अयोग्य अपनी श्रीहीनताको शीघ्र ही दूर भगा दोगे ।
युधिष्ठिर ने पूछा — "ब्रह्मन्! प्रतापी भरद्वाज मुनि कैसे योगयुक्त हुए थे और उनके पुत्र यवक्रीत किस लिये नष्ट हो गये थे? ये सब बातें मैं यथार्थ रूप से ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। उन देवोपम मुनियों के चरित्र का वर्णन सुनकर मेरे मन को बड़ा सुख मिलता है।"
सनत्कुमारो भगवानत्र सिद्धिमगात् पुरा ।
आजमीढावगाह्यैनां सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे ॥
यहीं पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने सिद्धि प्राप्त की थी । अजमीढनन्दन! इस गंगामें स्नान करके तुम सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगे ।
लोमशजी ने कहा - "राजन्! भरद्वाज तथा रैभ्य दोनों एक-दूसरे के सखा थे और निरन्तर इसी आश्रम में बड़े प्रेम से रहा करते थे। रैभ्य के दो पुत्र थे— अर्वावसु और परावसु। भारत! भरद्वाज के पुत्र का नाम 'यवक्री' अथवा 'यवक्रीत' था। पुत्रों सहित रैभ्य बड़े विद्वान् थे, परन्तु भरद्वाज केवल तपस्या में संलग्न रहते थे। युधिष्ठिर! बाल्यावस्था से ही इन दोनों महात्माओं की अनुपम कीर्ति सब ओर फैल रही थी।"
निष्पाप युधिष्ठिर! यवक्रीत ने देखा कि मेरे तपस्वी पिता का लोग सत्कार नहीं करते हैं; परन्तु पुत्रों सहित रैभ्य का ब्राह्मणों द्वारा बड़ा आदर होता है। यह देख तेजस्वी यवक्रीत को बड़ा सन्ताप हुआ। पाण्डुनन्दन! वे क्रोध से आविष्ट होकर वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये घोर तपस्या में लग गये। उन महातपस्वी ने अत्यन्त प्रज्ज्वलित अग्नि में अपने शरीर को तपाते हुए इन्द्र के मन में सन्ताप उत्पन्न कर दिया।
तत इन्द्रो यवक्रीतमुपगम्य युधिष्ठिर— तब इन्द्र यवक्रीत के पास आकर बोले— "तुम किस लिये यह उच्चकोटि की तपस्या कर रहे हो?"
यवक्रीत ने कहा — "देववृन्द पूजित महेन्द्र! मैं यह उच्चकोटि की तपस्या इसलिये करता हूँ कि द्विजातियों को बिना पढ़े ही सब वेदों का ज्ञान हो जाये। पाकशासन! मेरा यह आयोजन स्वाध्याय के लिये ही है। कौशिक! मैं तपस्या द्वारा सब बातों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। प्रभो! गुरु के मुख से दीर्घकाल के पश्चात् वेदों का ज्ञान हो सकता है। अतः मेरा यह महान् प्रयत्न शीघ्र ही सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये है।"
स्वाध्यायार्थं समारम्भो ममायं पाकशासन ।
तपसा ज्ञातुमिच्छामि सर्वज्ञानानि कौशिक ॥
पाकशासन! मेरा यह आयोजन स्वाध्यायके लिये ही है । कौशिक! मैं तपस्याद्वारा सब बातोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ ।
इन्द्र बोले— "विप्रर्षे! तुम जिस राह से जाना चाहते हो, वह अध्ययन का मार्ग नहीं है। स्वाध्याय के समुचित मार्ग को नष्ट करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? अतः जाओ और गुरु के मुख से ही अध्ययन करो।"
अमार्ग एष विप्रर्षे येन त्वं यातुमिच्छसि ।
किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात् ॥
इन्द्र बोले- विप्रर्षे! तुम जिस राहसे जाना चाहते हो, वह अध्ययनका मार्ग नहीं है । स्वाध्यायके समुचित मार्गको नष्ट करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? अतः जाओ गुरुके मुखसे ही अध्ययन करो ।
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर इन्द्र चले गये; तब अत्यन्त पराक्रमी यवक्रीत ने भी पुनः तपस्या के लिये ही घोर प्रयास आरम्भ कर दिया। राजन्! उसने घोर तपस्या द्वारा महान् तप का सञ्चय करते हुए देवराज इन्द्र को अत्यन्त सन्तप्त कर दिया; यह बात हमारे सुनने में आयी है।
महामुनि यवक्रीत को इस प्रकार तपस्या करते देख इन्द्र ने उनके पास जाकर पुनः मना किया और कहा — "मुने! तुमने ऐसे कार्य का आरम्भ किया है जिसकी सिद्धि होनी असम्भव है। तुम्हारा यह आयोजन— कि द्विजमात्र के लिये बिना पढ़े वेद का ज्ञान हो जाए— बुद्धि सङ्गत नहीं है; किन्तु केवल तुमको और तुम्हारे पिता को ही वेदों का ज्ञान होगा।"
तं तथा तप्यमानं तु तपस्तीव्रं महामुनिम् ।
उपेत्य बलभिद् देवो वारयामास वै पुनः ॥
अशक्योऽर्थः समारब्धो नैतद् बुद्धिकृतं तव ।
प्रतिभास्यन्ति वै वेदास्तव चैव पितुश्च ते ॥
महामुनि यवक्रीतको इस प्रकार तपस्या करते देख इन्द्रने उनके पास जाकर पुनः मना किया और कहा — ' मुने! तुमने ऐसे कार्यका आरम्भ किया है जिसकी सिद्धि होनी असम्भव है । तुम्हारा यह ( द्विजमात्रके लिये बिना पढ़े वेदका ज्ञान होनेका) आयोजन बुद्धि - संगत नहीं है; किंतु केवल तुमको और तुम्हारे पिताको ही वेदोंका ज्ञान होगा'
यवक्रीत ने कहा— "देवराज! यदि इस प्रकार आप मेरे इष्ट मनोरथ की सिद्धि नहीं करते हैं तो मैं और भी कठोर नियम लेकर अत्यन्त भयङ्कर तपस्या में लग जाऊँगा। देवराज इन्द्र! यदि आप यहाँ मेरी सारी मनोवाञ्छित कामना पूरी नहीं करते हैं तो मैं प्रज्वलित अग्नि में अपने एक-एक अङ्ग को होम दूँगा। इस बात को आप अच्छी तरह समझ लें।"
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उन महामुनि के उस निश्चय को जानकर बुद्धिमान् इन्द्र ने उन्हें रोकने के लिये बुद्धिपूर्वक कुछ विचार किया और एक ऐसे तपस्वी ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया जिसकी उम्र कई सौ वर्षों की थी, तथा जो यक्ष्मा का रोगी और दुर्बल दिखायी देता था। गङ्गा के जिस तीर्थ में यवक्रीत मुनि स्नान आदि किया करते थे, उसी में वे ब्राह्मण देवता बालू द्वारा पुल बनाने लगे। द्विजश्रेष्ठ यवक्रीत ने जब इन्द्र का कहना नहीं माना, तब वे बालू से गङ्गाजी को भरने लगे। वे निरन्तर एक-एक मुट्ठी बालू गङ्गाजी में छोड़ते थे और इस प्रकार उन्होंने यवक्रीत को दिखाकर पुल बाँधने का कार्य आरम्भ कर दिया।
वालुकामुष्टिमनिशं भागीरथ्यां व्यसर्जयत् ।
सेतुमभ्यारभच्छक्रो यवक्रीतं निदर्शयन् ॥
वे निरन्तर एक- एक मुट्ठी बालू गंगाजीमें छोड़ते थे और इस प्रकार उन्होंने यवक्रीतको दिखाकर पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दिया ।
मुनिवर यवक्रीत ने देखा कि ब्राह्मण देवता पुल बाँधने के लिये बड़े यत्नशील हैं, तब उन्होंने हँसते हुए इस प्रकार कहा— इन्द्र बोले - "तात! मैं गङ्गाजी पर पुल बाँधूंगा। इससे पार जाने के लिये सुखद मार्ग बन जायेगा; क्योंकि पुल के न होने से इधर आने-जाने वाले लोगों को बार-बार तैरने का कष्ट उठाना पड़ता है।"
यवक्रीत ने कहा — "तपोधन! यहाँ अगाध जलराशि भरी है; अतः तुम पुल बाँधने में सफल नहीं हो सकोगे। इसलिये इस असम्भव कार्य से मुँह मोड़ लो और ऐसे कार्य में हाथ डालो जो तुमसे हो सके।"
नायं शक्यस्त्वया बद्धुं महानोघस्तपोधन ।
अशक्याद् विनिवर्तस्व शक्यमर्थं समारभ ॥
यवक्रीतने कहा —तपोधन! यहाँ अगाध जलराशि भरी है; अतः तुम पुल बाँधनेमें सफल नहीं हो सकोगे । इसलिये इस असम्भव कार्यसे मुँह मोड़ लो और ऐसे कार्यमें हाथ डालो जो तुमसे हो सके ।
इन्द्र बोले — "मुने! जैसे आपने बिना पढ़े वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये यह तपस्या प्रारम्भ की है जिसकी सफलता असम्भव है, उसी प्रकार मैंने भी यह पुल बाँधने का भार उठाया है।"
यवक्रीत ने कहा — "देवेश्वर पाकशासन! जैसे आपका यह पुल बाँधने का आयोजन व्यर्थ है, उसी प्रकार यदि मेरी इस तपस्या को भी आप निरर्थक मानते हैं तो वही कार्य कीजिये जो सम्भव हो; मुझे ऐसे उत्तम वर प्रदान कीजिये, जिनके द्वारा मैं दूसरों से बढ़-चढ़कर प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ।"
यथा तव निरर्थोऽयमारम्भस्त्रिदशेश्वर ।
तथा यदि ममापीदं मन्यसे पाकशासन ॥
क्रियतां यद् भवेच्छक्यं त्वया सुरगणेश्वर ।
वरांश्च मे प्रयच्छान्यान् यैरन्यान् भवितास्म्यति ॥
यवक्रीतने कहा – देवेश्वर पाकशासन! जैसे आपका यह पुल बाँधनेका आयोजन व्यर्थ है, उसी प्रकार यदि मेरी इस तपस्याको भी आप निरर्थक मानते हैं तो वही कार्य कीजिये जो सम्भव हो, मुझे ऐसे उत्तम वर प्रदान कीजिये, जिनके द्वारा मैं दूसरोंसे बढ़-चढ़कर प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ ।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब इन्द्र ने महातपस्वी यवक्रीत के कथनानुसार उन्हें वर देते हुए कहा— ‘यवक्रीत! तुम्हारे पिता सहित तुम्हें वेदों का यथेष्ट ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। साथ ही और भी जो तुम्हारी कामना है, वह पूर्ण हो जाएगी। अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रम को लौट जाओ।’ इस प्रकार पूर्णकाम होकर यवक्रीत अपने पिता के पास गया और बोला— “पिताजी! आपको और मुझे दोनों को ही सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान हो जाएगा। साथ ही हम दोनों दूसरों से ऊँची स्थिति में हो जाएँगे— ऐसा वर मैंने प्राप्त किया है।”
प्रतिभास्यन्ति वै वेदा मम तातस्य चोभयोः ।
अति चान्यान् भविष्यावो वरा लब्धास्तदा मया ॥
यवक्रीतने कहा — पिताजी! आपको और मुझे दोनोंको ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान हो जायगा । साथ ही हम दोनों दूसरोंसे ऊँची स्थितिमें हो जायँगे - ऐसा वर मैंने प्राप्त किया है ।
भरद्वाज ने उसे देखते हुए कहा— “तात! इस तरह मनोवाञ्छित वर प्राप्त करने के कारण तुम्हारे मन में अहङ्कार उत्पन्न हो जाएगा और अहङ्कार से युक्त होने पर तुम कृपण होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे।”
दर्पस्ते भविता तात वराँल्लब्ध्वा यथेप्सितान् ।
स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनङ्क्ष्यसि ॥
भरद्वाज बोले — तात! इस तरह मनोवाञ्छित वर प्राप्त करनेके कारण तुम्हारे मनमें अहंकार उत्पन्न हो जायगा और अहंकारसे युक्त होनेपर तुम कृपण होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ।
इस विषय में विज्ञजन देवताओं की कही हुई यह गाथा सुनाया करते हैं— प्राचीन काल में बालधि नाम से प्रसिद्ध एक शक्तिशाली मुनि थे। उन्होंने पुत्र-शोक से सन्तप्त होकर अत्यन्त कठोर तपस्या की। उनकी अभिलाषा थी कि उन्हें देवोपम पुत्र प्राप्त हो। अपनी उस अभिलाषा के अनुसार बालधि को एक पुत्र प्राप्त हुआ। देवताओं ने उन पर कृपा अवश्य की, परन्तु उनके पुत्र को देवतुल्य नहीं बनाया और वरदान देते हुए कहा— ‘मरणधर्मा मनुष्य कभी देवता के समान अमर नहीं हो सकता। अतः उसकी आयु निमित्त (कारण) के अधीन होगी।’
तस्य प्रसादो वै देवैः कृतो न त्वमरैः समः ।
नामर्त्यो विद्यते मर्त्यो निमित्तायुर्भविष्यति ॥
देवताओंने उनपर कृपा अवश्य की, परंतु उनके पुत्रको देवतुल्य नहीं बनाया और वरदान देते हुए यह कहा 'कि मरणधर्मा मनुष्य कभी देवताके समान अमर नहीं हो सकता । अतः उसकी आयु निमित्त ( कारण) के अधीन होगी'
बालधि ने प्रार्थना की— “देववरो! जैसे ये पर्वत सदा अक्षय भाव से खड़े रहते हैं, वैसे ही मेरा पुत्र भी सदा अक्षय बना रहे। ये पर्वत ही उसकी आयु के निमित्त होंगे; अर्थात् जब तक ये पर्वत यहाँ बने रहें, तब तक मेरा पुत्र भी जीवित रहे।”
बालधिरुवाच यथेमे पर्वताः शश्वत् तिष्ठन्ति सुरसत्तमाः ।
अक्षयास्तन्निमित्तं मे सुतस्यायुर्भविष्यति ॥
बालधि बोले — देववरो! जैसे ये पर्वत सदा अक्षयभावसे खड़े रहते हैं, वैसे ही मेरा पुत्र भी सदा अक्षय बना रहे। ये पर्वत ही उसकी आयुके निमित्त होंगे अर्थात् जबतक ये पर्वत यहाँ बने रहें तबतक मेरा पुत्र भी जीवित रहे ।
भरद्वाज कहते हैं— यवक्रीत! तदनन्तर बालधि के पुत्र का जन्म हुआ, जो मेधा की शक्ति के कारण 'मेधावी' नाम से विख्यात हुआ। वह स्वभाव का बड़ा क्रोधी था। अपनी आयु के विषय में देवताओं के वरदान की बात सुनकर मेधावी घमण्ड में भर गया और ऋषियों का अपमान करने लगा। वह ऋषि-मुनियों को सताने के उद्देश्य से ही इस पृथ्वी पर सब ओर विचरा करता था। एक दिन मेधावी महान शक्तिशाली एवं मनीषी धनुषाक्ष के पास जा पहुँचा और उनका तिरस्कार करने लगा।
तपस्वी धनुषाक्ष ने उसे शाप देते हुए कहा— “अरे, तू जलकर भस्म हो जा!” परन्तु उनके कहने पर भी वह भस्म नहीं हुआ। शक्तिशाली धनुषाक्ष ने ध्यान में देखा कि मेधावी रोग एवं मृत्यु से रहित है; तब उन्होंने उसकी आयु के निमित्तभूत पर्वतों को भैंसों द्वारा विदीर्ण करा दिया। निमित्त का नाश होते ही उस मुनिकुमार की सहसा मृत्यु हो गई। तदनन्तर पिता अपने मरे हुए पुत्र को लेकर अत्यन्त विलाप करने लगे।
धनुषाक्षस्तु तं दृष्ट्वा मेधाविनमनामयम् ।
निमित्तमस्य महिषैर्भेदयामास वीर्यवान् ॥
शक्तिशाली धनुषाक्षने ध्यानमें देखा कि मेधावी रोग एवं मृत्युसे रहित है । तब उसकी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंको उन्होंने भैंसोंद्वारा विदीर्ण करा दिया ।
जब वेदवेत्ता मुनि उस विलाप को देख एकत्र हुए, तब वे इस गाथा को गाने लगे— ‘मरणधर्मा मनुष्य किसी तरह दैव के विधान का उल्लङ्घन नहीं कर सकता, तभी तो धनुषाक्ष ने उस बालक की आयु के निमित्तभूत पर्वतों का भैंसों द्वारा भेदन करा दिया।’ इस प्रकार बालक तपस्वी वर पाकर घमण्ड में भर जाते हैं और अपने दुर्व्यवहारों के कारण शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। तुम्हारी भी यही अवस्था न हो, इसलिए मैं तुम्हें सावधान करता हूँ।
एवं लब्ध्वा वरान् बाला दर्पपूर्णास्तपस्विनः ।
क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात् तथा भवान् ॥
इस प्रकार बालक तपस्वी वर पाकर घमण्डमें भर जाते हैं और ( अपने दुर्व्यवहारोंके कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । तुम्हारी भी यही अवस्था न हो ( इसलिये सावधान किये देता हूँ)
यवक्रीत! ये रैभ्य मुनि महान शक्तिशाली हैं और इनके दोनों पुत्र भी इन्हीं के समान हैं। बेटा! तुम उन रैभ्य मुनि के पास कदापि न जाना और आलस्य छोड़कर इसके लिए सदा प्रयत्नशील रहना। वे बड़े क्रोधी हैं और कुपित होकर तुम्हें पीड़ा दे सकते हैं।
यवक्रीत ने अपने पिता से कहा— “पिताजी! मैं ऐसा ही करूँगा, आप मन में सन्ताप न करें। जैसे आप मेरे माननीय हैं, वैसे ही रैभ्य मुनि मेरे लिए पिता के समान हैं।”
एवं करिष्ये मा तापं तात कार्षीः कथंचन ।
यथा हि मे भवान् मान्यस्तथा रैभ्यः पिता मम ॥
यवक्रीत बोले- पिताजी! मैं ऐसा ही करूंगा, आप किसी तरह मनमें संताप न करें । जैसे आप मेरे माननीय हैं, वैसे रैभ्यमुनि मेरे लिये पिताके समान हैं ।
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पिता से ये मीठी बातें कहकर यवक्रीत निर्भय होकर विचरण करने लगा। दूसरे ऋषियों को सताने में उसे अधिक सुख मिलता था और वह ऐसे ही सन्तुष्ट रहता था।
युधिष्ठिर! उन दिनों यवक्रीत सर्वथा भयशून्य होकर चारों ओर चक्कर लगाता था। एक दिन वैशाख मास में वह रैभ्य मुनि के आश्रम में गया। वह आश्रम खिले हुए वृक्षों की श्रेणियों से सुशोभित और अत्यन्त रमणीय था। वहाँ रैभ्य मुनि की पुत्रवधू किन्नरी के समान विचर रही थी। यवक्रीत ने उसे देखते ही कामदेव के वशीभूत होकर अपनी विचारशक्ति खो दी और लजाती हुई उस मुनि-वधू से निर्लज्ज होकर बोला— “सुन्दरी! तू मेरी सेवा में उपस्थित हो।”
यवक्रीस्तामुवाचेदमुपातिष्ठस्व मामिति ।
निर्लज्जो लज्जया युक्तां कामेन हृतचेतनः ॥
देखते ही वह कामदेवके वशीभूत हो अपनी विचारशक्ति खो बैठा और लजाती हुई उस मुनि- वधूसे निर्लज्ज होकर बोला- ' सुन्दरी! तू मेरी सेवामें उपस्थित हो'
वह यवक्रीत के शील स्वभाव को जानकर भी उसके शाप से डरती थी और रैभ्य मुनि की तेजस्विता का स्मरण करती थी। अतः उसने 'बहुत अच्छा' कहकर उसके पास आने का निश्चय किया।
सा तस्य शीलमाज्ञाय तस्माच्छापाच्च बिभ्यती ।
तेजस्वितां च रैभ्यस्य तथेत्युक्त्वाऽऽजगाम ह ॥
वह यवक्रीतके शील स्वभावको जानकर भी उसके शापसे डरती थी । साथ ही उसे रैभ्यमुनिकी तेजस्विताका भी स्मरण था । अतः ' बहुत अच्छा ' कहकर उसके पास चली आयी ।
भारत! तब यवक्रीत ने उसे एकान्त में ले जाकर पाप के समुद्र में डुबो दिया। इतने में ही रैभ्य मुनि आश्रम में आ गए। उन्होंने देखा कि उनकी पुत्रवधू और परावसु की पत्नी आर्तभाव से रो रही है। रैभ्य ने मधुर वाणी से सान्त्वना दी और रोने का कारण पूछा। उस शुभलक्षणा बहू ने यवक्रीत की सारी बातें अपने श्वशुर के सामने कह सुनाईं और उन बातों का सारा वृत्तान्त भी बता दिया जिन्हें उसने अस्वीकार कर दिया था।
यवक्रीत की यह कुचेष्टा सुनते ही रैभ्य के हृदय में क्रोध की प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो उठी। तपस्वी रैभ्य स्वभाव से ही क्रोधी थे, उस समय तो उनके ऊपर क्रोध का भारी आवेश था। उन्होंने एक जटा उखाड़कर अग्नि में होम कर दी, जिससे एक नारी के रूप में 'कृत्या' प्रकट हुई जो उनकी पुत्रवधू के समान थी। फिर दूसरी जटा उखाड़कर डाली, जिससे एक भयानक आँखों वाला राक्षस प्रकट हुआ। उन दोनों ने पूछा— “हम आपकी किस आज्ञा का पालन करें?”
स तदा मन्युनाऽऽविष्टस्तपस्वी कोपनो भृशम् ।
अवलुच्य जटामेकां जुहावाग्नौ सुसंस्कृते ॥
तपस्वी रैभ्य स्वभावसे ही बड़े क्रोधी थे, तिसपर भी उस समय उनके ऊपर क्रोधका आवेश छा रहा था । अतः उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़कर संस्कारपूर्वक स्थापित की हुई अग्निमें होम दी ।
क्रोध में भरे रैभ्य ने कहा— “यवक्रीत को मार डालो!” वे दोनों 'बहुत अच्छा' कहकर उसका पीछा करने लगे।
कृत्या रूपी सुन्दरी नारी ने पहले यवक्रीत के पास जाकर उसे मोह में डाला और उसका कमण्डलु हर लिया। कमण्डलु खो जाने से यवक्रीत का शरीर उच्छिष्ट रहने लगा। उसी समय वह भयानक राक्षस हाथ में त्रिशूल लिए उसकी ओर दौड़ा। यह देखकर यवक्रीत सहसा उठे और उस मार्ग से भागे जो एक सरोवर की ओर जाता था। उसके जाते ही सरोवर का पानी सूख गया। जलहीन देख यवक्रीत तुरन्त समस्त सरिताओं के पास गए, परन्तु वे सब भी सूख गईं।
राक्षस के खदेड़ने पर भयभीत यवक्रीत अपने पिता के अग्निहोत्रगृह में घुसने लगा। उस समय वहाँ एक शूद्र जातीय रक्षक नियुक्त था, जिसकी दोनों आँखें अन्धी थीं। उसने दरवाजे के भीतर घुसते ही यवक्रीत को बलपूर्वक पकड़ लिया। उस शूद्र द्वारा पकड़े गए यवक्रीत पर राक्षस ने शूल से प्रहार किया; इससे उसकी छाती फट गई और वह प्राणशून्य होकर वहीं गिर पड़ा।
निगृहीतं तु शूद्रेण यवक्रीतं स राक्षसः ।
ताडयामास शूलेन स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥
शूद्रके द्वारा पकड़े गये यवक्रीतपर उस राक्षसने शूलसे प्रहार किया । इससे उसकी छाती फट गयी और वह प्राणशून्य होकर वहीं गिर पड़ा ।
इस प्रकार यवक्रीत को मारकर राक्षस रैभ्य के पास लौट आया और उनकी आज्ञा लेकर कृत्या के साथ सेवा में रहने लगा।
यवक्रीतं स हत्वा तु राक्षसो रैभ्यमागमत् ।
अनुज्ञातस्तु रैभ्येण तया नार्या सहावसत् ॥
इस प्रकार यवक्रीतको मारकर राक्षस रैभ्यके पास लौट आया और उनकी आज्ञा ले उस कृत्यास्वरूपा रमणीके साथ उनकी सेवामें रहने लगा ।
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! भरद्वाज मुनि प्रतिदिन का स्वाध्याय पूरा करके बहुत-सी समिधाएँ लिये आश्रम में आये। उस दिन से पहले सभी अग्नियाँ उनको देखते ही उठकर स्वागत करती थीं, परन्तु उस समय उनका पुत्र मारा गया था, इसलिये अशौचयुक्त होने के कारण अग्नियों ने पूर्ववत् खड़े होकर स्वागत नहीं किया।
अग्निहोत्रगृह की इस विकृति को देखकर उन महातपस्वी भरद्वाज ने वहाँ बैठे हुए अन्धे गृहरक्षक शूद्र से पूछा— "दास! क्या कारण है कि आज अग्नियाँ पूर्ववत् मेरा दर्शन करके प्रसन्नता नहीं प्रकट करती हैं? इधर तुम भी पहले जैसे समादर का भाव नहीं दिखाते हो। इस आश्रम में कुशल तो है न? कहीं मेरा मन्दबुद्धि पुत्र रैभ्य के पास तो नहीं चला गया? यह बात मुझे शीघ्र बताओ; क्योंकि मेरा मन शान्त नहीं हो रहा है।"
रैभ्यं यातो नूनमयं पुत्रस्ते मन्दचेतनः ।
तथा हि निहतः शेते राक्षसेन बलीयसा ॥
शूद्र बोला- भगवन्! अवश्य ही आपका यह मन्दमति पुत्र रैभ्यके यहाँ गया था । उसीका यह फल है कि एक महाबली राक्षसके द्वारा मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ।
शूद्र ने अत्यन्त भारी मन से कहा— "भगवन्! अवश्य ही आपका यह मन्दमति पुत्र रैभ्य के यहाँ गया था। उसी का यह फल है कि एक महाबली राक्षस के द्वारा मारा जाकर वह पृथ्वी पर पड़ा है। वह राक्षस अपने हाथ में शूल लेकर इसका पीछा कर रहा था और यह अग्निशाला में घुसा जा रहा था। उस समय मैंने दोनों हाथों से पकड़कर इसे द्वार पर ही रोक लिया। निश्चय ही अपवित्र होने के कारण यह शुद्धिकरण हेतु जल लेने की इच्छा रखकर यहाँ आया था, परन्तु मेरे रोक देने से यह हताश हो गया। उसी समय उस शूलधारी राक्षस ने इसके ऊपर बड़े वेग से प्रहार करके इसे मार डाला।"
शूद्र के इन अत्यन्त अप्रिय वचनों को सुनकर भरद्वाज बड़े दुखी हो गये और अपने प्राणशून्य पुत्र के शव के पास बैठकर विलाप करने लगे। उन्होंने कहा— "बेटा! तुमने ब्राह्मणों के हित के लिये भारी तपस्या की थी। तुम्हारी तपस्या का यह उद्देश्य था कि द्विजों को बिना पढ़े ही सब वेदों का ज्ञान हो जाये। तुम्हारा स्वभाव ब्राह्मणों के प्रति अत्यन्त कल्याणकारी था और तुम किसी भी प्राणी के प्रति कोई अपराध नहीं करते थे; फिर भी तुम्हारा स्वभाव कुछ कठोर हो गया था। तात! मैंने तुम्हें बार-बार मना किया था कि तुम रैभ्य के आश्रम की ओर न देखना, परन्तु तुम उसे देखने चले ही गये और वह तुम्हारे लिये काल, अन्तक एवं यमराज के समान हो गया। महान् तेजस्वी होने पर भी उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है। वह जानता था कि मुझ बूढ़े का तुम एक ही पुत्र हो, फिर भी वह दुष्ट क्रोध के वशीभूत हो गया। बेटा! आज रैभ्य के इस कठोर कर्म से मुझे पुत्रशोक प्राप्त हुआ है। तुम्हारे बिना मैं इस पृथ्वी पर अपने परम प्रिय प्राणों का भी परित्याग कर दूँगा। जैसे मैं पापी अपने पुत्र के शोक से व्याकुल होकर शरीर का त्याग कर रहा हूँ, उसी प्रकार रैभ्य का ज्येष्ठ पुत्र अपने निरपराध पिता की शीघ्र हत्या कर डालेगा। संसार में वे मनुष्य सुखी हैं जिन्हें पुत्र पैदा ही नहीं हुआ; क्योंकि वे पुत्रशोक का अनुभव न करके सदा सुखपूर्वक विचरते हैं। जो पुत्रशोक से मन-ही-मन व्याकुल होकर अपने प्रिय मित्रों को भी शाप दे देते हैं, उनसे बढ़कर महापापी दूसरा कौन है? मैंने अपने पुत्र की मृत्यु देखी और प्रिय मित्र को शाप दे दिया; मेरे सिवा संसार में दूसरा कौन है जो ऐसी विपत्ति का अनुभव करेगा?"
ये तु पुत्रकृताच्छोकाद् भृशं व्याकुलचेतसः ।
शपन्तीष्टान् सखीनार्तास्तेभ्यः पापतरो नु कः ॥
जो पुत्रशोकसे मन- ही- मन व्याकुल हो गहरी व्यथाका अनुभव करते हुए अपने प्रिय मित्रोंको भी शाप दे डालते हैं, उनसे बढ़कर महापापी दूसरा कौन हो सकता है?
युधिष्ठिर! इन्हीं दिनों महान् सौभाग्यशाली एवं प्रतापी नरेश बृहद्युम्न ने एक यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया। वे रैभ्य के यजमान थे। बुद्धिमान् बृहद्युम्न ने यज्ञ की पूर्ति के लिये रैभ्य के दोनों पुत्रों, अर्वावसु तथा परावसु को सहयोगी बनाया। पिता की आज्ञा पाकर वे दोनों भाई राजा के यज्ञ में चले गये। आश्रम में केवल रैभ्य मुनि तथा उनके पुत्र परावसु की पत्नी ही रह गयी थी। एक दिन घर की देख-भाल करने के लिये परावसु अकेले ही आश्रम पर आये। उस समय उन्होंने काले मृगचर्म से ढके हुए अपने पिता को वन में देखा। रात का पिछला पहर बीत रहा था और अभी अन्धकार शेष था; परावसु नींद से अन्धे हो रहे थे, अतः उन्होंने गहन वन में विचरते हुए अपने पिता को हिंसक पशु समझ लिया। इस धोखे के कारण उन्होंने अपने पिता की हत्या कर डाली। यद्यपि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे, तथापि हिंसक पशु से शरीर की रक्षा के लिये उनका यह क्रूर कार्य बन गया।
जघन्यरात्रे निद्रान्धः सावशेषे तमस्यपि ।
चरन्तं गहनेऽरण्ये मेने स पितरं मृगम् ॥
रातका पिछला पहर बीत रहा था और अभी अन्धकार शेष था । परावसु नींदसे अन्धे हो रहे थे; अतः उन्होंने गहन वनमें विचरते हुए अपने पिताको हिंसक पशु ही समझा ।
अपने पिता के समस्त प्रेतकर्म करके परावसु पुनः यज्ञमण्डप में आए और अपने भाई अर्वावसु से कहा— "भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते। इधर मैंने हिंसक पशु समझकर पिताजी की हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्या-निवारण हेतु व्रत करो और मैं राजा का यज्ञ कराऊँगा। मुने! मैं अकेला भी इस कार्य का सम्पादन करने में समर्थ हूँ।"
अर्वावसु मुनि भाई के लिये ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञ में आये। परावसु ने अपने भाई को वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्युम्न से हर्षगद्गद वाणी में कहा— "राजन्! यह ब्रह्महत्या है, अतः इसे आपका यज्ञ देखने के लिये इस मण्डप में प्रवेश नहीं करना चाहिये। ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टि मात्र से भी आपको महान् कष्ट में डाल सकता है।"
स तस्य ब्रह्मवध्यायाः पारं गत्वा युधिष्ठिर ।
अर्वावसुस्तदा सत्रमाजगाम पुनर्मुनिः ॥
ततः परावसुर्दृष्ट्वा भ्रातरं समुपस्थितम् ।
बृहद्युम्नमुवाचेदं वचनं हर्षगद्गदम् ॥
एष ते ब्रह्महा यज्ञं मा द्रष्टुं प्रविशेदिति ।
ब्रह्महा प्रेक्षितेनापि पीडयेत् त्वामसंशयम् ॥
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये । परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्युम्नसे हर्षगद्गद वाणीमें कहा - ' राजन्! यह ब्रह्महत्यारा है । अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये । ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान् कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है '
राजा ने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि 'अर्वावसु को भीतर न आने दो।' अर्वावसु ने बार-बार कहा कि 'मैंने ब्रह्महत्या नहीं की है,' परन्तु राजा के सेवक उन्हें ब्रह्महत्यारा कहकर ही सम्बोधित करते थे। अर्वावसु किसी तरह यह स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि उनके भाई ने हत्या की है और उन्होंने प्रायश्चित्त करके उन्हें पाप से छुड़ाया है। उनके ऐसे कहने पर भी राजा के सेवकों ने उन्हें क्रोधपूर्वक फटकार दिया, तब वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि चुपचाप वन की ओर चले गये।
स तथा प्रवदन् क्रोधात् तैश्च प्रेष्यैः प्रभाषितः ।
तूष्णीं जगाम ब्रह्मर्षिर्वनमेव महातपाः ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी राजाके सेवकोंने उन्हें क्रोधपूर्वक फटकार दिया । तब वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि चुपचाप वनको ही चले गये ।
वहाँ जाकर उन्होंने भगवान सूर्य की शरण ली और बड़ी उग्र तपस्या करके सूर्य-सम्बन्धी रहस्यमय वैदिक मन्त्र का अनुष्ठान किया। तदनन्तर साक्षात् भगवान सूर्य ने साकार रूप में प्रकट होकर अर्वावसु को दर्शन दिए। अर्वावसु के उस कार्य से सूर्य आदि सब देवता प्रसन्न हो गये। उन्होंने अर्वावसु का यज्ञ में वरण कराया और परावसु को निकलवा दिया। तत्पश्चात् अग्नि और सूर्य आदि देवताओं ने उन्हें वर देने की इच्छा प्रकट की।
प्रीतास्तस्याभवन् देवाः कर्मणार्वावसोर्नृप ॥
तं ते प्रवरयामासुर्निरासुश्च परावसुम् ।
ततो देवा वरं तस्मै ददुरग्निपुरोगमाः ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! अर्वावसुके उस कार्यसे सूर्य आदि सब देवता उसपर प्रसन्न हो गये । उन्होंने अर्वावसुका यज्ञमें वरण कराया एवं परावसुको निकलवा दिया । तत्पश्चात् अग्नि - सूर्य आदि देवताओंने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की ।
तब अर्वावसु ने यह वर माँगा— "मेरे पिताजी जीवित हो जायें, मेरे भाई निर्दोष हों और उन्हें पिता के वध की बात भूल जाये। साथ ही मैंने यह भी माँगा कि भरद्वाज तथा यवक्रीत दोनों जी उठें और इस सूर्यदेवता सम्बन्धी रहस्यमय वेदमन्त्र की प्रतिष्ठा हो।" द्विजश्रेष्ठ अर्वावसु के इस वर माँगने पर देवता बोले— "ऐसा ही हो।" और उन्होंने पूर्वोक्त सभी वर दे दिये।
भरद्वाजस्य चोत्थानं यवक्रीतस्य चोभयोः ।
प्रतिष्ठां चापि वेदस्य सौरस्य द्विजसत्तमः ।
एवमस्त्विति तं देवाः प्रोचुश्चापि वरान् ददुः ॥
साथ ही उन्होंने यह भी माँगा कि ' भरद्वाज तथा यवक्रीत दोनों जी उठें और इस सूर्यदेवतासम्बन्धी रहस्यमय वेदमन्त्रकी प्रतिष्ठा हो । ' द्विजश्रेष्ठ अर्वावसुके इस प्रकार वर माँगनेपर देवता बोले — ‘ ऐसा ही हो । ' इस प्रकार उन्होंने पूर्वोक्त सभी वर दे दिये ।
इसके बाद पूर्वोक्त सभी मुनि जीवित हो गये। उस समय यवक्रीत ने अग्नि आदि सम्पूर्ण देवताओं से पूछा— "देवेश्वरो! मैंने वेद का अध्ययन किया है, वेदोक्त व्रतों का अनुष्ठान भी किया है; मैं स्वाध्यायशील और तपस्वी भी हूँ, तो भी रैभ्यमुनि इस प्रकार अनुचित रीति से मेरा वध करने में कैसे समर्थ हो सके?"
ततः प्रादुर्बभूवुस्ते सर्व एव युधिष्ठिर ।
अथाब्रवीद् यवक्रीतो देवानग्निपुरोगमान् ॥
समधीतं मया ब्रह्म व्रतानि चरितानि च ।
कथं च रैभ्यः शक्तो मामधीयानं तपस्विनम् ॥
तथायुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमाः । युधिष्ठिर! इसके बाद पूर्वोक्त सभी मुनि जीवित हो गये । उस समय यवक्रीतने अग्नि आदि सम्पूर्ण देवताओंसे पूछा— ' देवेश्वरो! मैंने वेदका अध्ययन किया है, वेदोक्त व्रतोंका अनुष्ठान भी किया है । मैं स्वाध्यायशील और तपस्वी भी हूँ, तो भी रैभ्यमुनि इस प्रकार अनुचित रीतिसे मेरा वध करनेमें कैसे समर्थ हो सके '
देवताओं ने समझाया— "मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो। तुमने पूर्वकाल में बिना गुरु के ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्य मुनि ने बड़े क्लेश उठाकर, अपने व्यवहार से गुरुजनों को सन्तुष्ट करके और दीर्घकाल तक कष्ट सहन करके उत्तम वेदों का ज्ञान प्राप्त किया है।"
देवा ऊचुः मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने ।
ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा ॥
अनेन तु गुरून् दुःखात् तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा ।
कालेन महता क्लेशाद् ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ॥
देवताओंने कहा – मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो । तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ।
अग्नि आदि देवताओं ने यवक्रीत से ऐसा कहकर उन सबको नूतन जीवन प्रदान किया और पुनः स्वर्गलोक को प्रस्थान किया।
In English
The Story of Yavakrita and his Father Bharadwaja
Yavakrita performs intense penance to gain knowledge of the Vedas without studying under a guru. Indra grants him a boon for this knowledge, but his father Bharadwaja warns him that pride will lead to his destruction. Yavakrita later loses his character and troubles other sages after becoming arrogant.
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Also written: Yavakritopakhyana, Yavakrita, Bharadvaja, Raibhya, Indra, Baladhi, Medhavi, Dhanushaksha, Paravasu, Putravadhu, Arvavasu, Suryadeva, यवक्रीतोपाख्यान