विश्वोपाख्यान : पाण्डव युद्ध में अपराजित क्यों हैं और उनके विजय का कारण क्या है?
धर्म और ईश्वर की शक्ति
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
भीष्मपर्व → भीष्मवधपर्व · अध्याय 65–68 · पृष्ठ 1889–1915
सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा
युद्ध की विभीषिका और पाण्डवों की विजय के कारणों की व्याख्या करने हेतु
हस्तिनापुर के राजप्रासाद में धृतराष्ट्र व्याकुल बैठे थे। उनके मुख पर गहरी चिन्ता की लकीरें थीं। उन्होंने सञ्जय की ओर देखते हुए भारी स्वर में कहा, "सञ्जय! पाण्डवों का देवताओं के लिए भी दुष्कर पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा भारी भय और विस्मय हो रहा है। अपने पुत्रों की सब प्रकार से पराजय का हाल सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ती ही जा रही है। सोचता हूँ कैसे उनकी विजय होगी!"
भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्चैव संजय ।
श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवैः सुदुष्करम् ॥
धृतराष्ट्र बोले- संजय! पाण्डवोंका देवताओंके लिये भी दुष्कर पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा भारी भय और विस्मय हो रहा है ।
धृतराष्ट्र की आँखों में एक अनजाना डर था। उन्होंने आगे कहा, "सञ्जय! निश्चय ही विदुर के वाक्य मेरे हृदय को जलाकर भस्म कर डालेंगे, क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, दैवयोग से वह सब वैसा ही होता दिखाई देता है। पाण्डवों की सेनाओं में ऐसे-ऐसे प्रहारकुशल योद्धा हैं, जो शस्त्रविद्या के ज्ञाता एवं योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म आदि समस्त महारथियों के साथ भी युद्ध कर लेते हैं। तात! महाबली महात्मा पाण्डव किस कारण से अवध्य हैं? किसने उन्हें वर दिया है अथवा कौन-सा ज्ञान वे जानते हैं, जिससे आकाश के तारों के समान वे नष्ट नहीं हो रहे हैं? मैं पाण्डवों द्वारा बारम्बार अपनी सेना के मारे जाने की बात सुनकर सहन नहीं कर पाता हूँ। दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयङ्कर दण्ड पड़ रहा है। सञ्जय! क्यों पाण्डव अवध्य हैं और क्यों मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं? यह सब यथार्थ रूप से मुझे बताओ।"
ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदयं मम ।
यथा हि दृश्यते सर्वं दैवयोगेन संजय ॥
संजय! निश्चय ही विदुरके वाक्य मेरे हृदयको जलाकर भस्म कर डालेंगे, क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, दैवयोगसे वह सब वैसा ही होता दिखायी देता है ।
धृतराष्ट्र का स्वर डूबता जा रहा था। उन्होंने कहा, "मैं इस दुःख का अन्त किसी प्रकार नहीं देखता हूँ। निश्चय ही भीमसेन मेरे सभी पुत्रों को मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। मैं ऐसे किसी वीर को नहीं देखता, जो रणक्षेत्र में मेरे पुत्रों की रक्षा कर सके। सञ्जय! अवश्य ही मेरे पुत्रों के विनाश की घड़ी आ पहुँची है। मैं तुमसे शक्ति और कारण के विषय में जो विशेष प्रश्न कर रहा हूँ, वह सब यथार्थ रूप से बताओ।"
सञ्जय ने शान्त भाव से उत्तर दिया, "महाराज! सावधान होकर सुनिये और सुनकर स्वयं ही पाण्डवों की शक्ति और अपनी पराजय के कारण के विषय में निश्चय कीजिये। पाण्डव युद्ध में किसी विभीषिका का प्रदर्शन नहीं करते और न ही वे किसी प्रकार से भयभीत होते हैं। वे न्यायपूर्वक युद्ध करते हैं। कुन्ती के पुत्र जीवन-निर्वाह के सभी कार्य सदा धर्मपूर्वक ही आरम्भ करते हैं, क्योंकि वे जगत् में अपना महान यश फैलाना चाहते हैं। वे युद्ध से कभी पीछे नहीं हटते हैं। धर्मबल से सम्पन्न होने के कारण ही वे महाबली और उत्तम समृद्धि से युक्त हैं; क्योंकि जहाँ धर्म होता है, वहीं विजय होती है। महाराज! धर्म के ही कारण कुन्ती के पुत्र युद्ध में अवध्य और विजयी हो रहे हैं। इधर आपके दुरात्मा पुत्र सदा पापों में ही तत्पर रहते हैं और निर्दय होकर निकृष्ट कर्म में लगे रहते हैं, इसीलिए उन्हें हानि उठानी पड़ती है। आपके पुत्रों ने पाण्डवों के प्रति बहुत से क्रूरतापूर्ण बर्ताव तथा छल-कपट किये हैं, परन्तु पाण्डव उन दोषों पर सदा पर्दा डालते आए हैं। आपके पुत्र इन पाण्डवों को अधिक आदर भी नहीं देते। निरन्तर किये जाने वाले उसी पाप कर्म का यह अत्यन्त भयङ्कर फल प्राप्त हो रहा है।"
न ते युद्धान्निवर्तन्ते धर्मोपेता महाबलाः ।
श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जयः ॥
वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं । धर्मबलसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे महाबली और उत्तम समृद्धिसे युक्त हैं । जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी विजय होती है ।
सञ्जय ने आगे कहा, "महाराज! आप सुहृदों के मना करने पर भी जो ध्यान नहीं देते, उससे अब स्वयं ही अपने पुत्रों और सुहृदों सहित अपनी अनीतिका का फल भोगिये। विदुर, भीष्म तथा महात्मा द्रोण और मैंने भी बारम्बार आपको मना किया; किन्तु आप कभी समझ नहीं पाते थे। जैसे मरणासन्न मनुष्य हितकारी औषध को भी फेंक देता है, वैसे ही आपने हमारे लाभकारी वचनों को ठुकरा दिया और अब अपने पुत्रों की बात में आकर मान रहे हैं कि हमने पाण्डवों को जीत लिया है। शत्रुदमन! मैं आपको पाण्डवों की विजय और अपनी पराजय के विषय में यथार्थ बातें बताता हूँ जैसा मैंने सुना है।"
वाक्यं हितं च पथ्यं च मर्त्याः पथ्यमिवौषधम् ।
पुत्राणां मतमाज्ञाय जितान् मन्यसि पाण्डवान् ॥
जैसे मरणासन्न मनुष्य हितकारी औषधको भी फेंक देते हैं, उसी प्रकार आपने हमलोगोंके कहे हुए लाभकारी और हितकर वचनोंको भी ठुकरा दिया एवं अब अपने पुत्रोंकी बातमें आकर यह मान रहे हैं कि हमने पाण्डवोंको जीत लिया ।
युद्धभूमि में दुर्योधन ने अपने सैनिकों को विमुख देखा, तो उसका हृदय शोक से मोहित हो गया। वह रात में महाज्ञानी पितामह भीष्म के पास गया और विनयपूर्वक पूछा, "पितामह! आप, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और अन्य सभी महारथी मेरे लिए अपना शरीर निछावर करने को तैयार हैं। मेरा विश्वास है कि आप सब मिल जाएँ तो तीनों लोकों पर विजय पा सकते हैं, परन्तु पाण्डवों के पराक्रम के सामने आप टिक नहीं पाते। इसका क्या कारण है? किसका आश्रय लेकर ये कुन्ती के पुत्र क्षण-क्षण में हम पर विजय पा रहे हैं?"
भीष्म ने गम्भीर स्वर में कहा, "कुरुनन्दन! मेरी बात सुनो। मैंने अनेक बार तुमसे यह कहा है कि तुम पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो; इसी में तुम्हारा और भूमण्डल का कल्याण है। तुम जो पाण्डवों का अपमान करते आए हो, आज उसी का फल प्राप्त हुआ है। महाबाहो! महान कर्म करने वाले पाण्डवों के अवध्य होने का हेतु बताता हूँ, सुनो। लोक में ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सुरक्षित इन पाण्डवों पर विजय पा सके।"
यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
तं शृणुष्व महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो ॥
महाबाहो! प्रभो! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पाण्डवोंके अवध्य होनेमें जो हेतु है, उसे बताता हूँ, सुनो ।
भीष्म ने आगे विस्तार से बताया, "प्राचीन काल की बात है, समस्त देवता और महर्षि गन्धमादन पर्वत पर आकर ब्रह्माजी के पास बैठे थे। उस समय प्रजापति ब्रह्माजी ने आकाश में एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेज से प्रज्वलित हो रहा था। ब्रह्माजी ने ध्यान से उस परम पुरुष को देखा और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। उन्होंने कहा— 'प्रभो! आप सम्पूर्ण विश्व को आच्छादित करने वाले और उसके स्वामी हैं। आपकी जय हो! आप विश्वेश्वर और वासुदेव हैं। आपकी जय हो! आप समस्त लोकों के ईश्वर हैं, आपकी जय हो! आप भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी हैं, आपकी जय हो! आप असङ्ख्य गुणों के आधार और सबको शरण देने वाले हैं। हे महाबाहु विश्वेश्वर! आपकी जय हो! आप समस्त कल्याणमय गुणों से सम्पन्न हैं। आप महान शेषनाग और महावाराण रूप धारण करने वाले सबके आदि कारण हैं। आपकी जय हो! आप इन्द्रियों के नियन्ता और भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाले हैं। आप सम्पूर्ण भूतों के आदि कारण और लोकतत्त्व के स्वामी हैं। आप इस कल्प का संहार करने वाले विशुद्ध परब्रह्म हैं। आप स्वभावतः संसार की सृष्टि में प्रवृत्त रहते हैं और समस्त कामनाओं के स्वामी परमेश्वर हैं।'"
ध्यानेनावेद्य तद् ब्रह्मा कृत्वा च नियतोऽञ्जलिम् ।
नमश्चकार हृष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम् ॥
अपने मनको संयममें रखनेवाले ब्रह्माजीने ध्यानसे यथार्थ बात जानकर हाथ जोड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उन परम पुरुष परमेश्वरको नमस्कार किया ।
ब्रह्माजी ने उस परमेश्वर की स्तुति करते हुए कहा— 'हे देव! आप ही प्रजापतियों के पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं। सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो। पृथ्वी देवी आपके चरण हैं, दिशाएँ आपकी बाहु हैं और द्युलोक आपका मस्तक है। मैं ब्रह्मा आपका शरीर हूँ; देवता आपके अङ्ग-प्रत्यङ्ग हैं; चन्द्रमा और सूर्य आपकी नेत्र हैं। तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज है, वायु आपकी श्वास है और जल आपका पसीना है। अश्विनीकुमार आपके कान हैं और सरस्वती देवी आपकी जिह्वा हैं। वेद आपकी संस्कारनिष्ठा हैं। यह जगत् सदा आप ही के आधार पर टिका हुआ है।"
हे योगीश्वर! हम न तो आपकी सङ्ख्या जानते हैं, न परिमाण। आपके तेज, पराक्रम और बल का हमें ज्ञान नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि आपका आविर्भाव कैसे होता है। हे विष्णो! हम सदा आपकी ही उपासना में लगे रहते हैं। आपके नियमों का पालन करते हुए हम आपकी ही शरण में हैं। आपकी ही कृपा से हमने पृथ्वी पर ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, मनुष्य, मृग, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े आदि की सृष्टि की है।"
हे पद्मनाभ! विशाललोचन! दुःखहारी श्रीकृष्ण! आप ही सम्पूर्ण प्राणियों के आश्रय और नेता हैं, आप ही संसार के गुरु हैं। आपकी कृपादृष्टि होने से ही सब देवता सदा सुखी रहते हैं। हे देव! आपके ही प्रसाद से पृथ्वी सदा निर्भय रही है; इसलिए हे विशाललोचन! आप पुनः पृथ्वी पर यदुवंश में अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये। प्रभो! धर्म की स्थापना, दैत्यों के वध और जगत् की रक्षा के लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये।'
पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात् सदाभवत् ।
तस्माद् भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥
देव! आपके ही प्रसादसे पृथ्वी सदा निर्भय रही है, इसलिये विशाललोचन! आप पुनः पृथ्वीपर यदुवंशमें अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये ।
ब्रह्माजी ने अपनी इस परम गुह्य और यथार्थ स्तुति को पूर्ण किया और कहा— 'हे वासुदेव! आप ही पूर्णतम परमेश्वर हैं। आपका जो यह परम गुह्य स्वरूप है, उसे आपकी कृपा से यहाँ गाया गया है। श्रीकृष्ण! आपने स्वयं को सङ्कर्षणदेव के रूप में प्रकट करके अपने ही आत्मज स्वरूप प्रद्युम्न की सृष्टि की है। प्रद्युम्न से आपने अनिरुद्ध को प्रकट किया, जिन्हें ज्ञानी जन अविनाशी विष्णुरूप से जानते हैं। उन अनिरुद्ध ने ही मुझ लोकधाता ब्रह्मा की सृष्टि की है।"
प्रद्युम्नादनिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् ।
अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥
प्रद्युम्नसे आपने ही उन अनिरुद्धको प्रकट किया है जिन्हें ज्ञानीजन अविनाशी विष्णुरूपसे जानते हैं । उन विष्णुरूप अनिरुद्धने ही मुझ लोकधाता ब्रह्माकी सृष्टि की है ।
प्रभो! इस प्रकार आपने ही मेरी सृष्टि की है। आपसे अभिन्न होने के कारण मैं भी वासुदेवमय हूँ। हे लोकेश्वर! मैं याचना करता हूँ कि आप स्वयं को वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपों में विभक्त करके मानव शरीर ग्रहण कीजिये। वहाँ सब लोगों के सुख के लिये असुरों का वध करके धर्म और यश का विस्तार कीजिये। अन्त में अवतार का उद्देश्य पूर्ण करके आप पुनः अपने पारमार्थिक स्वरूप से संयुक्त हो जाइयेगा।'
वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवास्मि विनिर्मितः ।
( तस्माद् याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना ।
) विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥
प्रभो! इस प्रकार आपने ही मेरी सृष्टि की है । आपसे अभिन्न होनेके कारण मैं भी वासुदेवमय हूँ। लोकेश्वर! इसलिये याचना करता हूँ कि आप अपने- आपको स्वयं ही ( वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) –इन चार रूपोंमें विभक्त करके मानव- शरीर ग्रहण कीजिये ।
हे अमित पराक्रमी परमेश्वर! संसार में महर्षि और देवगण आपकी इन लीलाओं के नामों द्वारा आपका गान करते हैं। हे सुबाहो! आप वरदायक प्रभु का ही आश्रय लेकर समस्त प्राणी आपमें ही स्थित हैं। ब्राह्मण लोग आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, असीम तथा लोकमर्यादा की रक्षा करने वाले सेतु स्वरूप बताते हैं।'
स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघाः कृत्वाऽऽश्रयं त्वां वरदं सुबाहो ।
अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ॥
सुबाहो! आप वरदायक प्रभुका ही आश्रय लेकर समस्त प्राणिसमुदाय आपमें ही स्थित हैं । ब्राह्मणलोग आपको आदि, मध्य और अन्तसे रहित, किसी सीमाके सम्बन्धसे शून्य ( असीम) तथा लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये सेतुस्वरूप बताते हैं ।
भीष्म कहते हैं— दुर्योधन! तब लोकेश्वरों के भी ईश्वर, दिव्य रूपधारी श्रीभगवान ने अत्यन्त स्नेहमधुर और गम्भीर वाणी में ब्रह्माजी से कहा— 'तात! तुम्हारे मन में जैसी इच्छा है, वह सब मुझे योगबल से ज्ञात हो गयी है। उसके अनुसार ही सब कार्य होगा।' ऐसा कहकर भगवान वहीं अन्तर्धान हो गये।
विदितं तात योगासे सर्वमेतत् तवेप्सितम् ।
तथा तद् भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥
‘ तात! तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा है, वह सब मुझे योगबलसे ज्ञात हो गयी है । उसके अनुसार ही सब कार्य होगा' – ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ।
तभी देवता, ऋषि और गन्धर्व बड़े विस्मय में पड़ गए। उन्होंने अत्यन्त उत्सुक होकर ब्रह्माजी से पूछा— 'प्रभो! आपने विनयपूर्वक प्रणाम करके और श्रेष्ठ वचनों द्वारा जिनकी स्तुति की है, वे कौन थे? हम उनके विषय में सुनना चाहते हैं।'
को न्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद् विभो ।
वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छाम तं वयम् ॥
‘ प्रभो! आपने विनयपूर्वक प्रणाम करके श्रेष्ठ वचनोंद्वारा जिनकी स्तुति की है, ये कौन थे? हम उनके विषयमें सुनना चाहते हैं'
तब ब्रह्माजी ने मधुर वाणी में कहा— 'प्रभु कहे गए हैं, जो परम ब्रह्म और परम पद के नाम से विख्यात हैं। उन्हीं परमात्मा ने मुझे दर्शन देकर मुझसे बातचीत की है। मैंने उन जगदीश्वर से प्रार्थना की है कि आप वासुदेव नाम से विख्यात होकर कुछ काल तक मनुष्यलोक में रहें और असुरों के वध के लिये इस भूतल पर अवतीर्ण हों।'
ब्रह्माजी ने आगे बताया— 'जो दैत्य, दानव तथा राक्षस सङ्ग्रामभूमि में मारे गये थे, वे अब मनुष्यलोक में उत्पन्न हुए हैं और अत्यन्त बलवान होकर जगत् के लिये भयङ्कर बन बैठे हैं। उन सबका वध करने के लिये, सबको वश में करने वाले भगवान नारायण, नर के साथ मनुष्य योनि में अवतीर्ण होकर इस भूतल पर विचरेंगे।"
तेषां वधार्थं भगवान् नरेण सहितो वशी ।
मानुषीं योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले ॥
‘ उन सबका वध करनेके लिये सबको वशमें करनेवाले भगवान् नारायण नरके साथ मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण होकर भूतलपर विचरेंगे ।
'ऋषियों में श्रेष्ठ जो पुरातन महर्षि, अमित तेजस्वी नर और नारायण हैं, वे एक साथ मानवलोक में अवतीर्ण होंगे। युद्धभूमि में यदि वे विजय के लिये यत्नशील हों, तो सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते; किन्तु मूढ़ मनुष्य उन नर-नारायण ऋषियों को नहीं जान सकेंगे। मैं ब्रह्मा, सम्पूर्ण जगत् का स्वामी, उन भगवान् का ज्येष्ठ पुत्र हूँ। तुम सब वासुदेव की आराधना करो।"
'सुरश्रेष्ठगण! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले उन महापराक्रमी वासुदेव को केवल 'मनुष्य' समझकर उनका अनादर मत करना। ये भगवान ही परम गुह्य हैं, यही परम पद हैं, यही परम ब्रह्म हैं और यही सनातन तेज हैं। इन्हें 'पुरुष' कहा जाता है, किन्तु इनका वास्तविक रूप जाना नहीं जा सकता।"
यत् तत् पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते न च ॥
एतत् परमकं तेज एतत् परमकं सुखम् ।
एतत् परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा ॥
‘ ये ही पुरुष नामसे कहे जाते हैं, किंतु इनका वास्तविक रूप जाना नहीं जा सकता । ये ही विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीके द्वारा परम सुख, परम तेज और परम सत्य कहे गये हैं ।
'जो इन इन्द्रियों के स्वामी भगवान वासुदेव को केवल मनुष्य कहता है, वह मूर्ख है और उसे नराधम कहा गया है। भगवान वासुदेव साक्षात् परमात्मा हैं और योगशक्ति से सम्पन्न होकर मानव शरीर में आए हैं। जो उन्हें नहीं जानता, ज्ञानी पुरुष उसे तमोगुणी कहते हैं। जो चराचर स्वरूप से सम्पन्न इन पद्मनाभ को नहीं पहचानता, वह विद्वान् नहीं है। किरीट और कौस्तुभमणि धारण करने वाले, भक्तों को अभय देने वाले इन परमात्मा की अवहेलना करने वाला मनुष्य घोर नरक में डूबता है।"
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् ।
अवजानम् महात्मानं घोरे तमसि मज्जति ॥
'जो किरीट और कौस्तुभमणि धारण करनेवाले तथा मित्रों ( भक्तजनों) -को अभय देनेवाले हैं, उन परमात्माकी अवहेलना करनेवाला मनुष्य घोर नरकमें डूबता है ।
भीष्म कहते हैं— दुर्योधन! देवताओं और ऋषियों से ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने सबको विदा कर दिया। इसके बाद ब्रह्माजी द्वारा कही गई उस परमार्थ चर्चा को सुनकर देवता, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोक चले गये। तात! एक समय शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षियों का एक समाज जुटा हुआ था, जो उन पुरातन भगवान वासुदेव की माहात्म्य कथा कह रहे थे। उन्हीं के मुख से मैंने ये बातें सुनी हैं। इसके सिवा मैंने जमदग्निनन्दन परशुराम, बुद्धिमान मार्कण्डेय, व्यास तथा नारद से भी यह सब सुना है। \संह: भरतश्रेष्ठ! इस विषय को समझकर मैं वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण को अविनाशी प्रभु परमात्मा, लोकेश्वर और सर्वशक्तिमान् नारायण जानता हूँ। सम्पूर्ण जगत् के पिता ब्रह्मा जिनके पुत्र हैं, वे वासुदेव मनुष्यों के लिये पूजनीय कैसे नहीं हैं?"
यस्य चैवात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता ।
कथं न वासुदेवोऽयमर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः ॥
सम्पूर्ण जगत्के पिता ब्रह्मा जिनके पुत्र हैं, वे भगवान् वासुदेव मनुष्योंके लिये आराधनीय तथा पूजनीय कैसे नहीं हैं?
तात! वेदों के विद्वान् महर्षियों ने तथा मैंने भी तुम्हें मना किया था कि तुम धनुर्धर भगवान वासुदेव के साथ विरोध न करो और पाण्डवों से लोहा न लो; परन्तु मोहवश तुमने इन बातों का मूल्य नहीं समझा। मैं समझता हूँ कि तुम कोई क्रूर राक्षस हो, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि तमोगुण से आच्छन्न है। तुम गोविन्द तथा पाण्डुनन्दन धनञ्जय से द्वेष करते हो, जबकि वे दोनों ही नर और नारायण देव हैं।
यस्माद् द्विषसि गोविन्दं पाण्डवं तं धनंजयम् ।
नरनारायणौ देवौ कोऽन्यो द्विष्याद्धि मानवः ॥
तुम भगवान् गोविन्द तथा पाण्डुनन्दन धनंजयसे द्वेष करते हो । वे दोनों ही नर और नारायण देव हैं । तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य उनसे द्वेष कर सकता है?
राजन्! इसलिए मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि ये श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी, सर्वलोकस्वरूप और नित्य शासक हैं। ये चराचर गुरु हैं जो तीनों लोकों को धारण करते हैं। ये ही योद्धा हैं, ये ही विजय हैं और ये ही विजयी हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। इनका माहात्म्ययोग पाण्डवों को सदा सुरक्षित रखता है। वे उन्हें कल्याणमयी बुद्धि देते हैं, युद्ध में बल प्रदान करते हैं और भय से उनकी रक्षा करते हैं।"
राजन् सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः ।
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥
राजन्! ये श्रीहरि सर्वस्वरूप और तम एवं रागसे रहित हैं । जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।
भारत! जिनके विषय में तुम पूछ रहे हो, वे सनातन देवता सर्वगुह्यमय कल्याणस्वरूप परमात्मा 'वासुदेव' नाम से जानने योग्य हैं।
स एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः ।
वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ॥
भारत! जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वे सनातन देवता सर्वगुह्यमय कल्याणस्वरूप परमात्मा ही ' वासुदेव' नामसे जाननेयोग्य हैं ।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुभ लक्षण सम्पन्न शूद्र—ये सभी नित्य तत्पर होकर अपने कर्मों द्वारा इन्हीं की सेवा-पूजा करते हैं। द्वापर युग के अन्त और कलियुग के आदि में सङ्कर्षण ने श्रीकृष्ण की उपासना की विधि का आश्रय लेकर इन्हीं की महिमा का गान किया है। ये ही श्रीकृष्ण नाम से विख्यात होकर इस लोक की रक्षा करते हैं।
युद्धभूमि के बीच, जहाँ एक ओर विजय का उत्साह था, वहीं दूसरी ओर जिज्ञासाओं का ज्वार था। दुर्योधन ने अपनी व्याकुलता छिपाते हुए पितामह की ओर देखा और पूछा— "पितामह! वासुदेव श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण लोकों में महान बताया जाता है; अतः मैं उनकी उत्पत्ति और स्थिति के विषय में जानना चाहता हूँ।"
वासुदेवो महद् भूतं सर्वलोकेषु कथ्यते ।
तस्यागमं प्रतिष्ठां च ज्ञातुमिच्छे पितामह ॥
दुर्योधनने पूछा- पितामह! वासुदेव श्रीकृष्णको सम्पूर्ण लोकोंमें महान् बताया जाता है; अतः मैं उनकी उत्पत्ति और स्थितिके विषयमें जानना चाहता हूँ ।
भीष्म ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया— "भरतश्रेष्ठ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वास्तव में महान हैं। वे सम्पूर्ण देवताओं के भी देवता हैं। कमलनयन श्रीकृष्ण से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। मार्कण्डेय जी भगवान गोविन्द के विषय में अत्यन्त अद्भुत बातें कहते हैं। वे भगवान ही सर्वभूतमय हैं और वे ही सबके आत्मस्वरूप महात्मा पुरुषोत्तम हैं। सृष्टि के आरम्भ में इन्हीं परमात्मा ने जल, वायु और तेज—इन तीन भूतों तथा सम्पूर्ण प्राणियों की सृष्टि की थी।"
वासुदेवो महद् भूतं सर्वदैवतदैवतम् ।
न परं पुण्डरीकाक्षाद् दृश्यते भरतर्षभ ॥
भीष्मजीने कहा- भरतश्रेष्ठ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वास्तवमें महान् हैं । वे सम्पूर्ण देवताओंके भी देवता हैं । कमलनयन श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ।
भीष्म की वाणी में सृष्टि के विस्तार का वर्णन बह रहा था— "सम्पूर्ण लोकों के ईश्वर इन भगवान् श्रीहरि ने पृथ्वी देवी की सृष्टि करके जल में शयन किया। वे महात्मा पुरुषोत्तम सर्वतेजोमय देवता योगशक्ति से उस जल में सोये। उन्होंने अपने मुख से अग्नि की, प्राण से वायु की और मन से सरस्वती देवी तथा वेदों की रचना की। इन्होंने ही सर्ग के आरम्भ में सम्पूर्ण लोकों तथा ऋषियों सहित देवताओं की रचना की थी। ये ही प्रलय के अधिष्ठान और मृत्युस्वरूप हैं। प्रजा की उत्पत्ति और विनाश इन्हीं से होते है। ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाले तथा धर्मस्वरूप हैं। ये ही कर्ता, कार्य आदि देव और स्वयं सर्वसमर्थ हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों की सृष्टि भी पूर्वकाल में इन्हीं के द्वारा हुई है। इन जनार्दन ने ही दोनों सन्ध्याओं, दसों दिशाओं, आकाश तथा नियमों की रचना की है। महात्मा अविनाशी प्रभु गोविन्द ने ही ऋषियों तथा तपस्या की रचना की; जगत्स्रष्टा प्रजापति को भी उन्होंने ही उत्पन्न किया है।"
एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः ।
एष कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वयम्प्रभुः ॥
ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले तथा धर्मस्वरूप हैं । ये ही कर्ता, कार्य, आदिदेव तथा स्वयं सर्वसमर्थ हैं ।
भीष्म ने आगे बताया कि कैसे उस परमेश्वर से सृष्टि का क्रम चला— "उस पूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्ण ने पहले सम्पूर्ण भूतों के अग्रज सङ्कर्षण को प्रकट किया, जिनसे सनातन देवाधिदेव नारायण का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण की नाभि से कमल प्रकट हुआ और सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति के स्थानभूत उस कमल से पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए; और ब्रह्माजी से ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। जो सम्पूर्ण भूतों को तथा पर्वतों सहित इस पृथ्वी को धारण करते हैं, जिन्हें विश्वरूपी अनन्तदेव तथा शेष कहा गया है, उन्हें भी उन परमात्मा ने ही उत्पन्न किया है।"
नाभौ पद्मं बभूवास्य सर्वलोकस्य सम्भवात् ।
तस्मात् पितामहो जातस्तस्माज्जातास्त्विमाः प्रजाः ॥
नारायणकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ । सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत उस कमलसे पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीसे ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं ।
कथा के प्रवाह में भीष्म ने एक उग्र प्रसङ्ग छेड़ा— "ब्राह्मण लोग ध्यानयोग के द्वारा इन्हीं परम तेजस्वी वासुदेव का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जलशायी नारायण के कान की मैल से महान असुर मधु का प्राकट्य हुआ था। वह मधु बड़े ही उग्र स्वभाव का तथा क्रूरकर्मा था। उसने ब्रह्माजी का समादर करते हुए अत्यन्त भयङ्कर बुद्धिका आश्रय लिया था, इसलिए ब्रह्माजी का समादर करते हुए भगवान पुरुषोत्तम ने मधु को मार डाला था। हे तात! मधु का वध करने के कारण ही देवता, दानव, मनुष्य तथा ऋषिगण श्रीजनार्दन को 'मधुसूदन' कहते हैं।"
भीष्म ने कहा— "वे ही भगवान समय-समय पर वाराह, नृसिंह और वामन के रूप में प्रकट हुए हैं। ये श्रीहरि ही समस्त प्राणियों के पिता और माता हैं। इन कमलनयन भगवान से बढ़कर दूसरा कोई तत्त्व न हुआ है, न होगा। राजन्! इन्होंने अपने मुख से ब्राह्मणों को, दोनों भुजाओं से क्षत्रियों को, जङ्घा से वैश्यों को और चरणों से शूद्रों को उत्पन्न किया है। जो मनुष्य तपस्या में तत्पर होकर, संयम और नियम का पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमा को समस्त देहधारियों के आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान केशव की आराधना करता है, वह परम पद को प्राप्त कर लेता है। हे नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकों के पितामह भगवान श्रीकृष्ण परम तेज हैं; मुनिजन इन्हें हृषीकेश कहते हैं। इन भगवान गोविन्द को तुम आचार्य, पिता और गुरु समझो। भगवान श्रीकृष्ण जिसके ऊपर प्रसन्न हो जाएँ, वह अक्षय लोकों पर विजय पा जाता है।"
केशवः परमं तेजः सर्वलोकपितामहः ।
एनमाहुर्हृषीकेशं मुनयो वै नराधिप ॥
नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंके पितामह भगवान् श्रीकृष्ण परम तेज हैं । मुनिजन इन्हें हृषीकेश कहते हैं ।
भीष्म ने चेतावनी भरे स्वर में कहा— "जो मनुष्य भय के समय इन भगवान श्रीकृष्ण की शरण लेता है और सर्वदा इस स्तुतिका का पाठ करता है, वह सुखी एवं कल्याण का भागी होता है। जो मानव भगवान श्रीकृष्ण की शरण लेते हैं, वे कभी मोह में नहीं पड़ते। जनार्दन महान भय में निमग्न मनुष्यों की सदा रक्षा करते हैं।"
ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः ।
भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥
जो मानव भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते । जनार्दन महान् भयमें निमग्न भगवान् उन मनुष्योंकी सदा रक्षा करते हैं ।
भीष्म ने दुर्योधन को सम्बोधित करते हुए कहा— "भरतवंशी नरेश! इस बात को अच्छी तरह समझकर राजा युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण हृदय से योगों के स्वामी, सर्वसमर्थ, जगदीश्वर एवं महात्मा भगवान केशव की शरण ली है। महाराज दुर्योधन! पूर्वकाल में इस भूतल पर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओं ने इनका जो ब्रह्मभूत स्तोत्र कहा है, उसे तुम मुझसे सुनो— 'प्रभो! आप साध्यगण और देवताओं के भी स्वामी एवं देवदेवेश्वर हैं। आप सम्पूर्ण जगत् के हृदय के भावों को जानने वाले हैं। मार्कण्डेय जी ने आपको भूत, भविष्य और वर्तमान स्वरूप बताया है। वे आपको यज्ञों का यज्ञ और तपस्याओं का सारभूत तप बताते हैं। भगवान भृगु ने आपको देवताओं का भी देवता कहा है। हे विष्णो! आपका रूप अत्यन्त पुरातन और उत्कृष्ट है। आप वसुओं के वासुदेव तथा इन्द्र को स्वर्ग के राज्य पर स्थापित करने वाले हैं। देव! आप देवताओं के भी देवता हैं। प्रथम प्रजासृष्टि के समय आपको ही दक्ष प्रजापति कहा गया है; आप ही सम्पूर्ण लोकों के स्रष्टा हैं—इस प्रकार अङ्गिरा मुनि आपके विषय में कहते हैं। आपके मस्तक से द्युलोक और भुजाओं से भूलोक व्याप्त है; तीनों लोक आपके उदर में स्थित हैं। आप ही सनातन पुरुष हैं। तपस्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले महात्मा पुरुष आपको ऐसा ही जानते हैं। मधुसूदन! जो सम्पूर्ण धर्मों में प्रधान और सङ्ग्राम से कभी पीछे हटने वाले नहीं हैं, उन उदार राजर्षियों के परम आश्रय भी आप ही हैं। सनत्कुमार आदि योगवेत्ता पापापहारी आप भगवान पुरुषोत्तम की सदा ही स्तुति और पूजा करते हैं।' तात दुर्योधन! इस तरह विस्तार और सङ्क्षेप से मैंने तुम्हें भगवान केशव की यथार्थ महिमा बताई है। अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो।"
एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः ।
केशवस्य यथातत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम् ॥
तात! दुर्योधन! इस तरह विस्तार और संक्षेपसे मैंने तुम्हें भगवान् केशवकी यथार्थ महिमा बतायी है । अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो ।
सञ्जय बताते हैं कि भीष्म के इन पवित्र वचनों को सुनकर दुर्योधन ने पाण्डवों को अत्यन्त महत्वपूर्ण समझ लिया। तब शान्तनु पुत्र भीष्म ने पुनः कहा— "नरेश्वर! तुमने महात्मा केशव तथा नरस्वरूप अर्जुन का यथार्थ माहात्म्य, जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे थे, उसे अच्छी तरह सुन लिया है। ऋषि नर और नारायण जिस उद्देश्य से मनुष्यों में अवतीर्ण हुए हैं, वे दोनों अपराजित वीर जिस प्रकार युद्ध में अवध्य हैं तथा समस्त पाण्डव भी जिस प्रकार समरभूमि में किसी के लिए भी वध्य नहीं हैं, वह सब विषय तुमने सुन लिया। राजेन्द्र! भगवान श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवों पर बहुत प्रसन्न हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि पाण्डवों के साथ तुम्हारी सन्धि हो जाए। वे तुम्हारे बलवान भाई हैं। तुम अपने मन को वश में रखते हुए उनके साथ मिलकर पृथ्वी का राज्य भोगो। भगवान नर-नारायण की अवहेलना करके तुम नष्ट हो जाओगे।"
प्रीतिमान् हि दृढ़ कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु ।
तस्माद् ब्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवैः ॥
‘ राजेन्द्र! भगवान् श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवोंपर बहुत प्रसन्न हैं । इसीलिये मैं कहता हूँ कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जाय ।
यह कहकर पितामह भीष्म चुप हो गए। उन्होंने राजा दुर्योधन को विदा किया और स्वयं शयन के लिए चले गए। राजा दुर्योधन ने भी पितामह को प्रणाम किया और अपने शिविर में लौट आया।
राजा च शिबिरं प्रायात् प्रणिपत्य महात्मने ।
शिश्ये च शयने शुभ्रे रात्रिं तां भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधन भी महात्मा भीष्मको प्रणाम करके अपने शिविरमें चला आया और अपनी शुभ्र शय्यापर सो गया ।
In English
Dhritarashtra, Sanjaya, and the Glory of Krishna
Dhritarashtra expresses fear to Sanjaya regarding the unstoppable strength of the Pandavas. Sanjaya explains that the Pandavas succeed because they follow dharma and are protected by Krishna. Bhishma tells Duryodhana that the Pandavas are invincible because they are under the protection of Lord Krishna.
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