विश्वोपाख्यान : पाण्डव युद्ध में अवध्य और विजयी क्यों हैं?
धर्म और विजय का आधार
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ३ · भीष्मपर्व → भीष्मवधपर्व · अध्याय 65–68 · पृष्ठ 1889–1915
3,617 शब्द · 19 मिनटका पाठ · 45 श्लोक
सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा
युद्धभूमि के विवरण के बीच
धृतराष्ट्र बोले— "सञ्जय! पाण्डवों का देवताओं के लिये भी दुष्कर पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा भारी भय और विस्मय हो रहा है। अपने पुत्रों की सब प्रकार से पराजय का हाल सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ती ही जा रही है। सोचता हूँ कैसे उनकी विजय होगी? निश्चय ही विदुर के वाक्य मेरे हृदय को जलाकर भस्म कर डालेंगे, क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, दैवयोग से वह सब वैसा ही होता दिखाई देता है। पाण्डवों की सेनाओं में ऐसे-ऐसे प्रहारकुशल योद्धा हैं, जो शस्त्रविद्या के ज्ञाता एवं योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म आदि समस्त महारथियों के साथ भी युद्ध कर लेते हैं। तात! महाबली महात्मा पाण्डव किस कारण से अवध्य हैं? किसने उन्हें वर दिया है अथवा कौन-सा ज्ञान वे जानते हैं, जिससे आकाश के तारों के समान वे नष्ट नहीं हो रहे हैं? मैं पाण्डवों द्वारा बारम्बार अपनी सेना के मारे जाने की बात सुनकर सहन नहीं कर पाता हूँ। एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन सञ्जय! दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयङ्कर दण्ड पड़ रहा है। सञ्जय! क्यों पाण्डव अवध्य हैं और क्यों मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं? यह सब यथार्थ रूप से मुझे बताओ।"
येन क्षयं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव ।
पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं तु पाण्डवैः ॥
जिससे आकाशके तारोंके समान वे नष्ट नहीं हो रहे हैं । मैं पाण्डवोंके द्वारा बारंबार अपनी सेनाके मारे जानेकी बात सुनकर सहन नहीं कर पाता हूँ ।
धृतराष्ट्र की आँखों में छाया अन्धकार उनकी व्याकुलता को बढ़ा रहा था। वे बोले— "जैसे अपनी भुजाओं से तैरने वाला मनुष्य महासागर का पार नहीं कर सकता, उसी प्रकार मैं इस दुःख का अन्त किसी प्रकार नहीं देखता हूँ। निश्चय ही भीमसेन मेरे सभी पुत्रों को मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। मेरा विश्वास है कि वह मेरे सभी पुत्रों को मार डालेगा। ध्रुव विनाश सम्प्राप्त हुआ है मेरे पुत्रों का, सञ्जय! मैं ऐसा कोई वीर नहीं देखता जो रणक्षेत्र में मेरे पुत्रों की रक्षा कर सके। मैं तुमसे शक्ति और कारण के विषय में जो विशेष प्रश्न कर रहा हूँ, वह सब यथार्थ रूप से बताओ।"
पुत्राणां च पराभावं श्रुत्वा संजय सर्वशः ।
चिन्ता मे महती सूत भविष्यति कथं त्विति ॥
सूत संजय! अपने पुत्रोंकी सब प्रकारसे पराजयका हाल सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ती ही जा रही है । सोचता हूँ कैसे उनकी विजय होगी ।
सञ्जय ने कहा— "महाराज! सावधान होकर सुनिये और सुनकर स्वयं ही पाण्डवों की शक्ति और अपनी पराजय के कारण के विषय में निश्चय कीजिये। पाण्डवों में न कोई मन्त्र का प्रभाव है और न वे कोई वैसी माया करते हैं। वे युद्ध में किसी विभीषिका का प्रदर्शन नहीं करते, अर्थात् किसी भी प्रकार से भयभीत नहीं होते। वे न्यायपूर्वक युद्ध करते हैं। कुन्ती के पुत्र जीवन-निर्वाह आदि के सभी कार्य सदा धर्मपूर्वक ही आरम्भ करते हैं, क्योंकि वे जगत् में अपना महान यश फैलाना चाहते हैं। वे युद्ध से कभी पीछे नहीं हटते। धर्मबल से सम्पन्न होने के कारण ही वे महाबली और उत्तम समृद्धि से युक्त हैं। जहाँ धर्म होता है, वहीं विजय होती है। महाराज! धर्म के ही कारण कुन्ती के पुत्र युद्ध में अवध्य और विजयी हो रहे हैं। इधर आपके दुरात्मा पुत्र सदा पापों में ही तत्पर रहते हैं; वे निर्दय होने के साथ-साथ निकृष्ट कर्म में लगे रहते हैं, इसीलिए उन्हें युद्धस्थल में हानि उठानी पड़ती है। आपके पुत्रों ने नीच मनुष्यों की भाँति पाण्डवों के प्रति बहुत से क्रूरतापूर्ण बर्ताव तथा छल-कपट किये हैं, परन्तु पाण्डव आपके पुत्रों का वह सारा अपराध भुलाकर उन दोषों पर पर्दा ही डालते आये हैं। इस पर भी आपके पुत्र इन पाण्डवों को अधिक आदर नहीं देते। जनेश्वर! निरन्तर किये जाने वाले उसी पाप कर्म का अब यह अत्यन्त भयङ्कर फल प्राप्त हुआ है।"
न ते युद्धान्निवर्तन्ते धर्मोपेता महाबलाः ।
श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जयः ॥
वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं । धर्मबलसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे महाबली और उत्तम समृद्धिसे युक्त हैं । जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी विजय होती है ।
सञ्जय आगे बोले— "महाराज! आप सुहृदों के मना करने पर भी जो ध्यान नहीं देते, इससे अब स्वयं ही पुत्रों और सुहृदों सहित अपनी अनीतिका का फल भोगिये। विदुर, भीष्म तथा महात्मा द्रोण ने और मैंने भी बारम्बार आपको मना किया; किन्तु आप कभी समझ नहीं पाते थे। जैसे मरणासन्न मनुष्य हितकारी औषध को भी फेंक देता है, उसी प्रकार आपने हम लोगों के कहे हुए लाभकारी वचनों को ठुकरा दिया और अब अपने पुत्रों की बात में आकर यह मान रहे हैं कि हमने पाण्डवों को जीत लिया है। भरतश्रेष्ठ! आप पाण्डवों की विजय और अपनी पराजय का जो कारण पूछते हैं, उसके विषय में यथार्थ बातें सुनिये। दुर्योधन ने यही बात पितामह भीष्म से पूछी थी। युद्ध में अपने समस्त महारथी भाइयों को पराजित हुआ देख आपके पुत्र दुर्योधन का हृदय शोक से मोहित हो गया था। उसने रात में महाज्ञानी पितामह भीष्म के पास विनयपूर्वक जाकर जो पूछा था, वह बताता हूँ—"
भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्चैव संजय ।
श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवैः सुदुष्करम् ॥
धृतराष्ट्र बोले- संजय! पाण्डवोंका देवताओंके लिये भी दुष्कर पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा भारी भय और विस्मय हो रहा है ।
दुर्योधन ने भीष्म से कहा था— "पितामह! आप, द्रोणाचार्य, शल्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, सुदक्षिण, भूरिश्रवा, विकर्ण तथा पराक्रमी भगदत्त—ये सब महारथी कहे जाते हैं। सभी कुलीन हैं और मेरे लिये अपना शरीर निछावर करने को तैयार हैं। मेरा विश्वास है कि आप सब मिल जाएँ तो तीनों लोकों पर विजय पा सकते हैं, परन्तु पाण्डवों के पराक्रम के सामने आप टिक नहीं पाते। इसका क्या कारण है? किसका आश्रय लेकर ये कुन्ती के पुत्र क्षण-क्षण में हम लोगों पर विजय पा रहे हैं?"
भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्च जयद्रथः ।
द्रौणिर्वापि महेष्वासो विकर्णो वा महाबलः ॥
युद्धमें अपने सैनिकोंको विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या किया? भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शकुनि, जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा और महाबली विकर्णने भी क्या किया? महाप्राज्ञ संजय! मेरे पुत्रोंके विमुख होनेपर उन महामना महारथियोंने उस समय क्या निश्चय किया?
भीष्मजी ने उत्तर दिया— "कुरुनन्दन! मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें यथार्थ बात बताता हूँ, जो मैंने अनेक बार कही है परन्तु तुमने माना नहीं। तुम पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो; इसी में तुम्हारा और भूमण्डल का कल्याण है। तुम शत्रुओं को सन्ताप और बन्धु-बान्धवों को आनन्द प्रदान करते हुए पृथ्वी का राज्य भोगो। तात! तुम जो पाण्डवों का अपमान करते आये हो, आज उसी का फल प्राप्त हुआ है। सुनो, महान कर्म करने वाले पाण्डवों के अवध्य होने का हेतु क्या है? लोक में ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो शार्ङ्ग-धनुष धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सुरक्षित इन पाण्डवों पर विजय पा सके। देवता, असुर और मनुष्य—कोई भी उन्हें जीत नहीं सकता।"
क्रियतां पाण्डवैः सार्धं शमो भरतसत्तम ।
एतत् क्षेममहं मन्ये पृथिव्यास्तव वा विभो ॥
भरतश्रेष्ठ! तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो । प्रभो! इसीमें मैं तुम्हारा और भूमण्डलका कल्याण समझता हूँ ।
भीष्म ने आगे कहा— "पवित्र अन्तःकरण वाले मुनियों ने मुझे जो यथार्थ बातें बताई हैं, वे सुनो। प्राचीन काल की बात है, समस्त देवता और महर्षि गन्धमादन पर्वत पर आकर ब्रह्माजी के पास बैठे थे। उस समय प्रजापति ब्रह्माजी ने आकाश में एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेज से प्रज्वलित हो रहा था। ब्रह्माजी ने ध्यान से यथार्थ बात जानकर हाथ जोड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उन परम पुरुष परमेश्वर को नमस्कार किया। ऋषि तथा देवता ब्रह्माजी को खड़े हुए देखकर स्वयं भी उस अद्भुत तेज का दर्शन करते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
तेषां मध्ये समासीनः प्रजापतिरपश्यत ।
विमानं प्रज्वलद् भासा स्थितं प्रवरमम्बरे ॥
उस समय उनके बीचमें बैठे हुए प्रजापति ब्रह्माने आकाशमें खड़ा हुआ एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था ।
ब्रह्माजी ने उस तेजोमय परम पुरुष का पूजन कर स्तुति की— 'प्रभो! आप सम्पूर्ण विश्व को आच्छादित करने वाले, विश्वस्वरूप और विश्व के स्वामी हैं। इस विश्व में सब ओर आपकी सेना है; यह विश्व आपका कार्य है। आप सबको अपने वश में रखने वाले हैं, इसलिए आपको विश्वेश्वर और वासुदेव कहते हैं। आप योगस्वरूप देवता हैं, मैं आपकी शरण में आया हूँ। विश्वरूप महादेव! आपकी जय हो! लोकहित में लगे रहने वाले परमेश्वर! आपकी जय हो! सर्वत्र व्याप्त योगीश्वर! आपकी जय हो!
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ।
तथा मया चाप्यसकृद् वार्यमाणो न बुध्यसे ॥
विदुर, भीष्म तथा महात्मा द्रोणने और मैंने भी बारंबार आपको मना किया है; किंतु आप कभी समझ नहीं पाते थे ।
आपकी नाभि से आदि कमल की उत्पत्ति हुई है; आपके नेत्र विशाल हैं और आप लोकेश्वरों के भी ईश्वर हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी! आपका स्वरूप सौम्य है; मैं स्वयम्भू ब्रह्मा आपका पुत्र हूँ। आप असङ्ख्य गुणों के आधार और सबको शरण देने वाले हैं। शार्ङ्ग-धनुष धारण करने वाले नारायण! आपकी महिमा का पार पाना अत्यन्त कठिन है। आप समस्त कल्याणमय गुणों से सम्पन्न, विश्वमूर्ति और निरामय हैं। महाबाहु विश्वेश्वर! आपकी जय हो!
कृतवर्मा च हार्दिक्यः काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥
भूरिश्रवा विकर्णश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् ।
महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः ॥
दुर्योधनने पूछा - पितामह! आप, द्रोणाचार्य, शल्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, हृदिकपुत्र कृतवर्मा, कम्बोजराज सुदक्षिण, भूरिश्रवा, विकर्ण तथा पराक्रमी भगदत्त — ये सब महारथी कहे जाते हैं । सभी कुलीन और युद्धमें मेरे लिये अपना शरीर निछावर करनेको तैयार हैं ।
आप महान शेषनाग और महावाराह रूप धारण करने वाले सबके आदि कारण हैं। हे हरिकेश! आपकी जय हो; आप पीताम्बरधारी, दिशाओं के स्वामी, विश्व के आधार और अविनाशी हैं। व्यक्त और अव्यक्त—सब आप ही का स्वरूप है। आपके रहने का स्थान असीम-अनन्त है। आप इन्द्रियों के नियन्ता हैं और आपके सभी कर्म शुभ हैं। आप आत्मस्वरूप के ज्ञाता, स्वभावतः गम्भीर और भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करने वाले हैं; आपकी जय हो!
तदिदं समनुप्राप्तं यत् पाण्डूनवमन्यसे ॥
तात! इस तरहकी बातें मैंने पहले पुकार- पुकारकर कही हैं, परंतु तुमने उन सबको अनसुनी कर दिया है । तुम जो पाण्डवोंका अपमान करते आये हो, आज उसीका यह फल प्राप्त हुआ है ।
ब्रह्मन्! आप अनन्तबोध स्वरूप, नित्य और सम्पूर्ण भूतों को उत्पन्न करने वाले हैं। आपकी बुद्धि पवित्र है, आप धर्म का तत्त्व जानने वाले और विजय प्रदाता हैं। पूर्णयोगस्वरूप परमात्मन्! आपका स्वरूप गूढ़ होते हुए भी स्पष्ट है। अब तक जो हुआ और जो हो रहा है, सब आपका ही रूप है। आप सम्पूर्ण भूतों के आदि कारण और लोक-तत्त्व के स्वामी हैं; आपकी जय हो! आप स्वयम्भू हैं, आपका सौभाग्य महान है। आप इस कल्प का संहार करने वाले विशुद्ध परब्रह्म हैं। ध्यान करने से आपके स्वरूप का आविर्भाव होता है। आप जीवमात्र के प्रियतम परब्रह्म हैं। आप स्वभावतः संसार की सृष्टि में प्रवृत्त रहते हैं और सम्पूर्ण कामनाओं के स्वामी परमेश्वर हैं। अमृत की उत्पत्ति के स्थान, सत्यस्वरूप, मुक्तात्मा और विजय देने वाले आप ही हैं!'"
यथावच्च तमभ्यर्च्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः जगाद जगतः स्रष्टा परं परमधर्मवित् ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परम धर्मज्ञ, जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने उन तेजोमय परम पुरुषका यथावत् पूजन करके उनकी स्तुति की ।
विश्वावसुर्विश्वमूर्तिर्विश्वेशो विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च ।
विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्माद् योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि ॥
प्रभो! आप सम्पूर्ण विश्वको आच्छादित करनेवाले, विश्वस्वरूप और विश्वके स्वामी हैं । विश्वमें सब ओर आपकी सेना है । यह विश्व आपका कार्य है । आप सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं । इसीलिये आपको विश्वेश्वर और वासुदेव कहते हैं । आप योगस्वरूप देवता हैं, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ।
जय विश्व महादेव जय लोकहिते रत ।
जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ॥
विश्वरूप महादेव! आपकी जय हो, लोकहितमें लगे रहनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो । सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले योगीश्वर! आपकी जय हो । योगके आदि और अन्त! आपकी जय हो ।
पद्मगर्भ विशालाक्ष जय लोकेश्वरेश्वर ।
भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज ॥
असंख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण ।
नारायण सुदुष्पार जय शार्ङ्गधनुर्धर ॥
आपकी नाभिसे आदि कमलकी उत्पत्ति हुई है, आपके नेत्र विशाल हैं, आप लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं; आपकी जय हो । भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी! आपकी जय हो । आपका स्वरूप सौम्य है, मैं स्वयम्भू ब्रह्मा आपका पुत्र हूँ । आप असंख्य गुणोंके आधार और सबको शरण देनेवाले हैं, आपकी जय हो । शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले नारायण! आपकी महिमाका पार पाना बहुत ही कठिन है, आपकी जय हो ।
जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय ।
विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर ॥
आप समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न, विश्वमूर्ति और निरामय हैं; आपकी जय हो । जगत्का अभीष्ट साधन करनेवाले महाबाहु विश्वेश्वर! आपकी जय हो ।
हरिवास दिशामीश विश्ववासामिताव्यय ॥
आप महान् शेषनाग और महावाराह रूप धारण करनेवाले हैं, सबके आदि कारण हैं । हरिकेश! प्रभो! आपकी जय हो, आप पीताम्बरधारी, दिशाओंके स्वामी, विश्वके आधार, अप्रमेय और अविनाशी हैं ।
व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय ।
असंख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीर कामद ॥
व्यक्त और अव्यक्त— सब आपहीका स्वरूप है, आपके रहनेका स्थान असीम - अनन्त है, आप इन्द्रियोंके नियन्ता हैं । आपके सभी कर्म शुभ ही शुभ हैं । आपकी कोई इयत्ता नहीं है, आप आत्मस्वरूपके ज्ञाता, स्वभावतः गम्भीर और भक्तोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं; आपकी जय हो ।
अनन्तविदित ब्रह्मन् नित्य भूतविभावन ।
कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह ॥
ब्रह्मन्! आप अनन्तबोधस्वरूप हैं, नित्य हैं और सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं । आपको कुछ करना बाकी नहीं है, आपकी बुद्धि पवित्र है, आप धर्मका तत्त्व जाननेवाले और विजयप्रदाता हैं ।
गुह्यात्मन् सर्वयोगात्मन् स्फुटं सम्भूतसम्भव ।
भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन ॥
पूर्णयोगस्वरूप परमात्मन्! आपका स्वरूप गूढ होता हुआ भी स्पष्ट है । अबतक जो हो चुका है और जो हो रहा है, सब आपका ही रूप है । आप सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण और लोकतत्त्वके स्वामी हैं । भूतभावन! आपकी जय हो ।
आत्मयोने महाभाग कल्पसंक्षेप तत्पर ।
उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्म जनप्रिय ॥
आप स्वयम्भू हैं, आपका सौभाग्य महान् है । आप इस कल्पका संहार करनेवाले एवं विशुद्ध परब्रह्म हैं । ध्यान करनेसे अन्तःकरणमें आपका आविर्भाव होता है, आप जीवमात्रके प्रियतम परब्रह्म हैं, आपकी जय हो ।
निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर ।
अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद ॥
आप स्वभावतः संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त रहते हैं, आप ही सम्पूर्ण कामनाओंके स्वामी परमेश्वर हैं । अमृतकी उत्पत्तिके स्थान, सत्यस्वरूप, मुक्तात्मा और विजय देनेवाले आप ही हैं ।
प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महाबल ।
आत्मभूत महाभूत सत्त्वात्मन् जय सर्वदा ॥
देव! आप ही प्रजापतियोंके भी पति, पद्मनाभ और महाबली हैं । आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं । सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो ।
पादौ तव धरा देवी दिशो बाहू दिवं शिरः ।
मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ॥
पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं, दिशाएँ बाहु हैं और द्युलोक मस्तक है । मैं ब्रह्मा आपका शरीर, देवता अंग - प्रत्यंग और चन्द्रमा तथा सूर्य नेत्र हैं ।
बलं तपश्च सत्यं च कर्म धर्मात्मकं तव ।
तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवाः ॥
तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है । अग्नि आपका तेज, वायु साँस और जल पसीना है ।
इस स्तुतिके श्लोक 46–67 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →
ब्रह्माजी ने गन्धमादन पर्वत पर उपस्थित होकर उस विश्वरूप परमेश्वर की स्तुति की। उनके मुख से निकले शब्द अत्यन्त भक्तिमय थे:
सृष्ट्वा संकर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना ।
कृष्ण त्वमात्मनास्राक्षीः प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ॥
श्रीकृष्ण! आपने आत्माद्वारा स्वयं अपने - आपको ही संकर्षणदेवके रूपमें प्रकट करके अपने ही द्वारा आत्मजस्वरूप प्रद्युम्नकी सृष्टि की है ।
"देव! आप ही प्रजापतियों के पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं। सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो! पृथ्वी देवी आपके चरण हैं, दिशाएँ आपकी बाहु हैं और द्युलोक आपका मस्तक है। मैं ब्रह्मा आपका शरीर हूँ; देवता आपके अङ्ग-प्रत्यङ्ग हैं; चन्द्रमा तथा सूर्य आपके नेत्र हैं। तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज है, वायु आपकी श्वास है और जल आपका पसीना है। अश्विनीकुमार आपके कान हैं और सरस्वती देवी आपकी जिह्वा हैं। वेद आपकी संस्कारनिष्ठा हैं। यह जगत् सदा आप ही के आधार पर टिका हुआ है।"
ब्रह्माजी की वाणी में विवशता और शरणागति का भाव था। उन्होंने आगे कहा, "हे योगीश्वर! हम न तो आपकी सङ्ख्या जानते हैं, न परिमाण। आपके तेज, पराक्रम और बल का हमें ज्ञान नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि आपका आविर्भाव कैसे होता है। हे देव! आपकी ही कृपा से हमने पृथ्वी पर ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, मनुष्य, मृग, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े आदि की सृष्टि की है। पद्मनाभ! विशाललोचन! दुःखहारी श्रीकृष्ण! आप ही सम्पूर्ण प्राणियों के आश्रय और नेता हैं। आप ही संसार के गुरु हैं। आपकी कृपादृष्टि से ही सब देवता सुखी रहते हैं।"
ब्रह्माजी ने अपनी प्रार्थना को एक लक्ष्य दिया, "हे विशाललोचन! पृथ्वी सदा आपके प्रसाद से निर्भय रही है। अतः आप पुनः पृथ्वी पर यदुवंश में अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये। प्रभो! धर्म की स्थापना, दैत्यों के वध और जगत् की रक्षा के लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये।"
ब्रह्माजी ने अपनी स्तुति पूर्ण करते हुए कहा कि वासुदेव ही पूर्णतम परमेश्वर हैं। उन्होंने बताया कि कैसे भगवान ने स्वयं को सङ्कर्षण देव के रूप में प्रकट किया और फिर प्रद्युम्न की सृष्टि की। उन अनिरुद्धों से, जिन्हें ज्ञानी जन अविनाशी विष्णुरूप कहते हैं, ब्रह्माजी की यह सृष्टि हुई है। ब्रह्माजी ने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की, "लोकेश्वर! मैं याचना करता हूँ कि आप अपने-आप को वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपों में विभक्त करके मानव शरीर ग्रहण कीजिये। वहाँ सब लोगों के सुख के लिये असुरों का वध करके धर्म और यश का विस्तार कीजिये। अन्त में अवतार का उद्देश्य पूर्ण करके आप पुनः अपने पारमार्थिक स्वरूप से संयुक्त हो जाइयें।"
वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवास्मि विनिर्मितः ।
( तस्माद् याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना ।
) विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥
प्रभो! इस प्रकार आपने ही मेरी सृष्टि की है । आपसे अभिन्न होनेके कारण मैं भी वासुदेवमय हूँ। लोकेश्वर! इसलिये याचना करता हूँ कि आप अपने- आपको स्वयं ही ( वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) –इन चार रूपोंमें विभक्त करके मानव- शरीर ग्रहण कीजिये ।
अमित पराक्रमी परमेश्वर! संसार में महर्षि और देवगण एकाग्रचित्त होकर उन लीलानुसारी नामों द्वारा आपके परमात्मस्वरूप का गान करते रहते हैं। ब्राह्मण लोग आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, असीम तथा लोकमर्यादा की रक्षा के लिये सेतु स्वरूप बताते हैं।
स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघाः कृत्वाऽऽश्रयं त्वां वरदं सुबाहो ।
अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ॥
सुबाहो! आप वरदायक प्रभुका ही आश्रय लेकर समस्त प्राणिसमुदाय आपमें ही स्थित हैं । ब्राह्मणलोग आपको आदि, मध्य और अन्तसे रहित, किसी सीमाके सम्बन्धसे शून्य ( असीम) तथा लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये सेतुस्वरूप बताते हैं ।
तभी, लोकेश्वरों के भी ईश्वर भगवान् ने स्नेहमधुर और गम्भीर वाणी में ब्रह्माजी से कहा— 'तात! तुम्हारे मन में जैसी इच्छा है, वह सब मुझे योगबल से ज्ञात हो गयी है। उसके अनुसार ही सब कार्य होगा।' इतना कहकर भगवान वहीं अन्तर्धान हो गये।
विदितं तात योगासे सर्वमेतत् तवेप्सितम् ।
तथा तद् भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥
‘ तात! तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा है, वह सब मुझे योगबलसे ज्ञात हो गयी है । उसके अनुसार ही सब कार्य होगा' – ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ।
भगवान के इस अचानक ओझल होने पर वहाँ उपस्थित देवता, ऋषि और गन्धर्व बड़े विस्मय में पड़ गए। अत्यन्त उत्सुक होकर उन्होंने पितामह ब्रह्माजी से पूछा— "प्रभो! आपने विनयपूर्वक प्रणाम करके श्रेष्ठ वचनों द्वारा जिनकी स्तुति की है, ये कौन थे? हम उनके विषय में सुनना चाहते हैं।"
ब्रह्माजी ने मधुर वाणी में उत्तर दिया— "प्रभु कहा गया है, जो परम ब्रह्म और परम पद के नाम से विख्यात हैं, उन्हीं परमात्मा ने मुझे दर्शन देकर मुझसे बातचीत की है। मैंने उन जगदीश्वर से सम्पूर्ण जगत् पर कृपा करने के लिये प्रार्थना की है कि आप वासुदेव नाम से विख्यात होकर कुछ काल तक मनुष्यलोक में रहें और असुरों के वध के लिये इस भूतल पर अवतीर्ण हों।"
ब्रह्माजी ने आगे गम्भीर स्वर में कहा— "जो दैत्य, दानव तथा राक्षस सङ्ग्रामभूमि में मारे गये थे, वे अब मनुष्यलोक में उत्पन्न हुए हैं और अत्यन्त बलवान होकर जगत् के लिये भयङ्कर बन बैठे हैं। उन सबका वध करने के लिये भगवान नारायण, नर के साथ मनुष्य योनि में अवतीर्ण होकर भूतल पर विचरेंगे। ऋषियों में श्रेष्ठ जो पुरातन महर्षि अमित तेजस्वी नर और नारायण हैं, वे एक साथ मानव लोक में अवतीर्ण होंगे। युद्धभूमि में यदि वे विजय के लिये यत्नशील हों, तो सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते। किन्तु मूढ़ मनुष्य उन नर-नारायण ऋषियों को पहचान नहीं पाएंगे।"
ब्रह्माजी ने देवताओं को सचेत करते हुए कहा— "मैं उन भगवान् का ज्येष्ठ पुत्र हूँ। तुम सब लोग उन सर्वलोकमहेश्वर भगवान् वासुदेव की आराधना करो। उन्हें केवल 'ये मनुष्य हैं' समझकर उनका अनादर मत करना। वे परम गुह्य, परम पद, परम ब्रह्म और परम यश हैं। वे अक्षर, अव्यक्त और सनातन तेज हैं। जो इन्हें केवल मनुष्य कहता है, वह मूर्ख है और उसे नराधम कहा गया है। भगवान वासुदेव साक्षात् परमात्मा हैं जिन्होंने योगशक्ति से मानव शरीर ग्रहण किया है। जो उनके चराचर स्वरूप और उत्तम कान्ति को नहीं जानता, उसे विद्वान पुरुष तमोगुणी कहते हैं। वे किरीट और कौस्तुभमणि धारण करने वाले हैं और भक्तों को अभय देने वाले हैं। जो उनकी अवहेलना करता है, वह घोर नरक में डूबता है।"
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् ।
अवजानम् महात्मानं घोरे तमसि मज्जति ॥
'जो किरीट और कौस्तुभमणि धारण करनेवाले तथा मित्रों ( भक्तजनों) -को अभय देनेवाले हैं, उन परमात्माकी अवहेलना करनेवाला मनुष्य घोर नरकमें डूबता है ।
इतना कहकर ब्रह्माजी ने देवताओं और ऋषियों को विदा किया। वे अपने लोक चले गए। ब्रह्माजी की इस परमार्थ चर्चा को सुनकर देवता, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोक लौट गए।
एवमुक्त्वा स भगवान् देवान् सर्षिगणान् पुरा ।
विसृज्य सर्वभूतात्मा जगाम भवनं स्वकम् ॥
भीष्मजी कहते हैं - दुर्योधन! देवताओं तथा ऋषियोंसे ऐसा कहकर पूर्वकालमें सर्वभूतात्मा भगवान् ब्रह्माने उन सबको विदा कर दिया । फिर वे अपने लोकको चले गये ।
भीष्म कहते हैं— दुर्योधन! एक समय शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षियों का एक समाज जुटा हुआ था, जो पुरातन भगवान वासुदेव की माहात्म्य कथा कर रहे थे। उन्हीं के मुख से मैंने ये बातें सुनी हैं। इसके सिवा मैंने जमदग्निनन्दन परशुराम, बुद्धिमान् मार्कण्डेय, व्यास तथा नारद से भी यह सब सुना है।
हे भरतश्रेष्ठ! इस विषय को समझकर मैं वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण को अविनाशी प्रभु परमात्मा, लोकेश्वर और सर्वशक्तिमान् नारायण जानता हूँ। सम्पूर्ण जगत् के पिता ब्रह्मा जिनके पुत्र हैं, वे वासुदेव मनुष्यों के लिये पूजनीय कैसे नहीं हैं?
यस्य चैवात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता ।
कथं न वासुदेवोऽयमर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः ॥
सम्पूर्ण जगत्के पिता ब्रह्मा जिनके पुत्र हैं, वे भगवान् वासुदेव मनुष्योंके लिये आराधनीय तथा पूजनीय कैसे नहीं हैं?
तात! वेदों के पारङ्गत विद्वान् महर्षियों ने और मैंने तुम्हें मना किया था कि तुम धनुर्धर भगवान वासुदेव के साथ विरोध न करो और पाण्डवों से लोहा न लो। परन्तु मोहवश तुमने इन बातों का मूल्य नहीं समझा। मैं समझता हूँ कि तुम कोई क्रूर राक्षस हो, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि तमोगुण से आच्छन्न है। तुम गोविन्द और पाण्डुनन्दन धनञ्जय से द्वेष करते हो, जबकि वे दोनों ही नर और नारायण देव हैं।
मा पाण्डवैः सार्धमिति तत् त्वं मोहान्न बुध्यसे ।
मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरं तथा चासि तमोवृतः ॥
तात! वेदोंके पारंगत विद्वान् महर्षियोंने तथा मैंने तुमको मना किया था कि तुम धनुर्धर भगवान् वासुदेवके साथ विरोध न करो, पाण्डवोंके साथ लोहा न लो; परंतु मोहवश तुमने इन बातोंका कोई मूल्य नहीं समझा। मैं समझता हूँ, तुम कोई क्रूर राक्षस हो; क्योंकि राक्षसोंके ही समान तुम्हारी बुद्धि सदा तमोगुणसे आच्छन्न रहती है ।
राजन्! श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी और नित्य शासक हैं। वे चराचर गुरु हैं और तीनों लोकों को धारण करते हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। उनके माहात्म्ययोग से समस्त पाण्डव सुरक्षित हैं। वे उन्हें सदा कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं, युद्ध में बल देते हैं और भय से उनकी रक्षा करते हैं। हे भारत! जिनके विषय में तुम पूछ रहे हो, वे सनातन देवता 'वासुदेव' नाम से जानने योग्य हैं।"
राजन् सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः ।
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥
राजन्! ये श्रीहरि सर्वस्वरूप और तम एवं रागसे रहित हैं । जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुभ लक्षणसम्पन्न शूद्र—ये सभी नित्य तत्पर होकर अपने कर्मों द्वारा इन्हीं की सेवा और पूजा करते हैं। द्वापरयुग के अन्त और कलियुग के आदि में सङ्कर्षण ने श्रीकृष्ण की उपासना की विधिका आश्रय ली और इन्हीं की महिमा का गान किया। ये ही श्रीकृष्ण नाम से विख्यात होकर इस लोक की रक्षा करते हैं। ये ही भगवान वासुदेव युग-युग में देवलोक, मर्त्यलोक तथा समुद्र से घिरी हुई द्वारिका नगरी का निर्माण करते हैं और ये ही बारम्बार मनुष्यलोक में अवतार ग्रहण करते हैं।
सेव्यतेऽभ्यर्च्यते चैव नित्ययुक्तैः स्वकर्मभिः ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुभ लक्षणसम्पन्न शूद्र- ये सभी नित्य तत्पर होकर अपने कर्मोंद्वारा इन्हींकी सेवा - पूजा करते हैं ।
इस प्रकार श्रीमहाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत भीष्मवधपर्व में विश्वोपाख्यान विषयक छियासठवाँ अध्याय पूरा हुआ।
दुर्योधन ने पूछा— "पितामह! वासुदेव श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण लोकों में महान बताया जाता है; अतः मैं उनकी उत्पत्ति और स्थिति के विषय में जानना चाहता हूँ।"
भीष्म बोले— "भरतश्रेष्ठ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वास्तव में महान हैं। वे सम्पूर्ण देवताओं के भी देवता हैं। कमलनयन श्रीकृष्ण से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है।"
वासुदेवो महद् भूतं सर्वदैवतदैवतम् ।
न परं पुण्डरीकाक्षाद् दृश्यते भरतर्षभ ॥
भीष्मजीने कहा- भरतश्रेष्ठ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वास्तवमें महान् हैं । वे सम्पूर्ण देवताओंके भी देवता हैं । कमलनयन श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ।
मार्कण्डेय जी भगवान गोविन्द के विषय में अत्यन्त अद्भुत बातें कहते हैं। वे भगवान ही सर्वभूतमय हैं और वे ही सबके आत्मस्वरूप महात्मा पुरुषोत्तम हैं। सृष्टि के आरम्भ में इन्हीं परमात्मा ने जल, वायु और तेज—इन तीन भूतों तथा सम्पूर्ण प्राणियों की सृष्टि की थी। सम्पूर्ण लोकों के ईश्वर इन भगवान श्रीहरि ने पृथ्वी देवी की सृष्टि करके जल में शयन किया। वे महात्मा पुरुषोत्तम सर्वतेजोमय देवता योगशक्ति से उस जल में सोये। उन अच्युत ने अपने मुख से अग्नि की, प्राण से वायु की तथा मन से सरस्वती देवी और वेदों की रचना की।
इन्होंने ही सर्ग के आरम्भ में सम्पूर्ण लोकों तथा ऋषियों सहित देवताओं की रचना की थी। ये ही प्रलय के अधिष्ठान और मृत्यु स्वरूप हैं। प्रजा की उत्पत्ति और विनाश इन्हीं से होते हैं। ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाले तथा धर्मस्वरूप हैं। ये ही कर्ता, कार्य आदि देव और स्वयं सर्वसमर्थ हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों की सृष्टि भी पूर्वकाल में इन्हीं के द्वारा हुई है। इन जनार्दन ने ही दोनों सन्ध्याओं, दसों दिशाओं, आकाश तथा नियमों की रचना की है। महात्मा अविनाशी प्रभु गोविन्द ने ही ऋषियों तथा तपस्या की रचना की है। जगत्स्रष्टा प्रजापति को भी उन्होंने ही उत्पन्न किया है।
एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः ।
एष कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वयम्प्रभुः ॥
ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले तथा धर्मस्वरूप हैं । ये ही कर्ता, कार्य, आदिदेव तथा स्वयं सर्वसमर्थ हैं ।
उन पूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्ण ने पहले सम्पूर्ण भूतों के अग्रज सङ्कर्षण को प्रकट किया, जिनसे सनातन देवाधिदेव नारायण का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण की नाभि से कमल प्रकट हुआ। सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति के स्थानभूत उस कमल से पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और ब्रह्माजी से ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। जो सम्पूर्ण भूतों को तथा पर्वतों सहित इस पृथ्वी को धारण करते हैं, जिन्हें विश्वरूपी अनन्तदेव तथा शेष कहा गया है, उन्हें भी उन परमात्मा ने ही उत्पन्न किया है।
नाभौ पद्मं बभूवास्य सर्वलोकस्य सम्भवात् ।
तस्मात् पितामहो जातस्तस्माज्जातास्त्विमाः प्रजाः ॥
नारायणकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ । सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत उस कमलसे पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीसे ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं ।
ब्राह्मण लोग ध्यानयोग के द्वारा इन्हीं परम तेजस्वी वासुदेव का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जलशायी नारायण के कान की मैल से महान असुर मधु का प्राकट्य हुआ था। वह मधु बड़े ही उग्र स्वभाव का तथा क्रूरकर्मा था। उसने ब्रह्माजी का समादर करते हुए अत्यन्त भयङ्कर बुद्धिका आश्रय लिया था; इसलिये ब्रह्माजी का समादर करते हुए भगवान पुरुषोत्तम ने मधु को मार डाला था। तात! मधु का वध करने के कारण ही देवता, दानव, मनुष्य तथा ऋषिगण श्री जनार्दन को 'मधुसूदन' कहते हैं।
वे ही भगवान समय-समय पर वाराह, नर्सिंह और वामन के रूप में प्रकट हुए हैं। ये श्रीहरि ही समस्त प्राणियों के पिता और माता हैं। इन कमलनयन भगवान से बढ़कर दूसरा कोई तत्त्व न हुआ है, न होगा। राजन्! इन्होंने अपने मुख से ब्राह्मणों को, दोनों भुजाओं से क्षत्रियों को, जङ्घाओं से वैश्यों को और चरणों से शूद्रों को उत्पन्न किया है।
जो मनुष्य तपस्या में तत्पर होकर, संयम और नियमों का पालन करते हुए, अमावास्या और पूर्णिमा को समस्त देहधारियों के आश्रय—ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान केशव की आराधना करता है, वह परम पद को प्राप्त कर लेता है। नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकों के पितामह भगवान श्रीकृष्ण परम तेज हैं। मुनिजन इन्हें हृषीकेश कहते हैं। इस प्रकार इन भगवान गोविन्द को तुम आचार्य, पिता और गुरु समझो। भगवान श्रीकृष्ण जिसके ऊपर प्रसन्न हो जाते हैं, वह अक्षय लोकों पर विजय पा जाता है।
तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ॥
ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च ।
योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥
जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम- नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ।
जो मनुष्य भय के समय इन भगवान श्रीकृष्ण की शरण लेता है और सर्वदा इस स्तुतिका का पाठ करता है, वह सुखी एवं कल्याण का भागी होता है। जो मानव भगवान श्रीकृष्ण की शरण लेते हैं, वे कभी मोह में नहीं पड़ते। जनार्दन महान भय में निमग्न मनुष्यों की सदा रक्षा करते हैं।
ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः ।
भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥
जो मानव भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते । जनार्दन महान् भयमें निमग्न भगवान् उन मनुष्योंकी सदा रक्षा करते हैं ।
भरतवंशी नरेश! इस बात को अच्छी तरह समझकर राजा युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण हृदय से योगों के स्वामी, सर्वसमर्थ, जगदीश्वर एवं महात्मा भगवान केशव की शरण ली है।
स तं युधिष्ठिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत ।
सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् ।
प्रपन्नः शरणं राजन् योगानां प्रभुमीश्वरम् ॥
भरतवंशी नरेश! इस बातको अच्छी तरह समझकर राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण हृदयसे योगोंके स्वामी, सर्वसमर्थ, जगदीश्वर एवं महात्मा भगवान् केशवकी शरण ली है ।
इस प्रकार श्रीमहाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत भीष्मवधपर्व में विश्वोपाख्यान विषयक छियासठवाँ अध्याय पूरा हुआ।
भीष्म बोले— "महाराज दुर्योधन! पूर्वकाल में इस भूतल पर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओं ने इनका जो ब्रह्मभूत स्तोत्र कहा है, उसे तुम मुझसे सुनो—"
'प्रभो! आप साध्यगण और देवताओं के भी स्वामी एवं देवदेवेश्वर हैं। आप सम्पूर्ण जगत् के हृदय के भावों को जानने वाले हैं। आपके विषय में नारद जी ने ऐसा ही कहा है कि आप यज्ञों का यज्ञ और तपस्याओं का सारभूत तप हैं। भगवान भृगु ने आपको देवताओं का भी देवता कहा है। हे विष्णो! आपका रूप अत्यन्त पुरातन और उत्कृष्ट है।
आप वसुओं के वासुदेव तथा इन्द्र को स्वर्ग के राज्य पर स्थापित करने वाले हैं। देव! आप देवताओं के भी देवता हैं—ऐसा महर्षि द्वैपायन कहते हैं। प्रथम प्रजा सृष्टि के समय आपको ही दक्ष प्रजापति कहा गया है; आप ही सम्पूर्ण लोकों के स्रष्टा हैं—इस प्रकार अङ्गिरा मुनि कहते हैं।
अव्यक्त आपके शरीर से उत्पन्न हुआ है, व्यक्त महत्तत्त्व आदि कार्यवर्ग आपके मन में स्थित है तथा सम्पूर्ण देवता भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं—ऐसा असित और देवल का कथन है। आपके मस्तक से द्युलोक और भुजाओं से भूलोक व्याप्त है। तीनों लोक आपके उदर में स्थित हैं। आप ही सनातन पुरुष हैं। तपस्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले महात्मा पुरुष आपको ऐसा ही जानते हैं।
मधुसूदन! जो सम्पूर्ण धर्मों में प्रधान और सङ्ग्राम से कभी पीछे हटने वाले नहीं हैं, उन उदार राजर्षियों के परम आश्रय भी आप ही हैं। सनत्कुमार आदि योगवेत्ता पापापहारी आप भगवान पुरुषोत्तम की सदा ही स्तुति और पूजा करते हैं।'
राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।
सर्वधर्मप्रधानानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥
'मधुसूदन! जो सम्पूर्ण धर्मोंमें प्रधान और संग्रामसे कभी पीछे हटनेवाले नहीं हैं, उन उदार राजर्षियोंके परम आश्रय भी आप ही हैं ।
तात दुर्योधन! इस तरह विस्तार और सङ्क्षेप से मैंने तुम्हें भगवान केशव की यथार्थ महिमा बताई है। अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो।"
एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः ।
केशवस्य यथातत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम् ॥
तात! दुर्योधन! इस तरह विस्तार और संक्षेपसे मैंने तुम्हें भगवान् केशवकी यथार्थ महिमा बतायी है । अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो ।
सञ्जय कहते हैं— महाराज! भीष्म जी के मुख से यह पवित्र आख्यान सुनकर तुम्हारे पुत्र ने भगवान श्रीकृष्ण तथा महारथी पाण्डवों को बहुत महत्त्वशाली समझा।
उस समय शान्तनु नन्दन भीष्म जी ने पुनः दुर्योधन से कहा— "नरेश्वर! तुमने महात्मा केशव तथा नर-स्वरूप अर्जुन का यथार्थ माहात्म्य, जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे थे, उसे अच्छी तरह सुन लिया है। ऋषि नर और नारायण जिस उद्देश्य से मनुष्यों में अवतीर्ण हुए हैं, वे दोनों अपराजित वीर जिस प्रकार युद्ध में अवध्य हैं तथा समस्त पाण्डव भी जिस प्रकार समर भूमि में किसी के लिये भी वध्य नहीं हैं, वह सब विषय तुमने अच्छी तरह सुन लिया।
यदर्थं नृषु सम्भूतौ नरनारायणावृषी ॥
अवध्यौ च यथा वीरौ संयुगेष्वपराजितौ ।
यथा च पाण्डवा राजन्नवध्या युधि कस्यचित् ॥
‘ऋषि नर और नारायण जिस उद्देश्यसे मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं, वे दोनों अपराजित वीर जिस प्रकार युद्धमें अवध्य हैं तथा समस्त पाण्डव भी जिस प्रकार समरभूमिमें किसीके लिये भी वध्य नहीं हैं, वह सब विषय तुमने अच्छी तरह सुन लिया ।
राजेन्द्र! भगवान श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवों पर बहुत प्रसन्न हैं; इसलिये मैं कहता हूँ कि पाण्डवों के साथ तुम्हारी सन्धि हो जाय। वे तुम्हारे बलवान भाई हैं। तुम अपने मन को वश में रखते हुए उनके साथ मिलकर पृथ्वी का राज्य भोगो। नर-नारायण की अवहेलना करके तुम नष्ट हो जाओगे।"
प्रीतिमान् हि दृढ़ कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु ।
तस्माद् ब्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवैः ॥
‘ राजेन्द्र! भगवान् श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवोंपर बहुत प्रसन्न हैं । इसीलिये मैं कहता हूँ कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जाय ।
प्रजानाथ! ऐसा कहकर आपके ताऊ भीष्म जी चुप हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने राजा दुर्योधन को विदा किया और स्वयं शयन करने चले गये। भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधन भी महात्मा भीष्म को प्रणाम करके अपने शिविर में चला आया और अपनी शुभ्र शय्या पर सो गया।
एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद् विशाम्पते ।
व्यसर्जयच्च राजानं शयनं च विवेश ह ॥
प्रजानाथ! ऐसा कहकर आपके ताऊ भीष्मजी चुप हो गये । तत्पश्चात् उन्होंने राजा दुर्योधनको विदा किया और स्वयं शयन करने चले गये ।
In English
The Reason for the Pandavas' Victory
Dhritarashtra asks Sanjaya why his sons are losing to the Pandavas despite their great warriors. Sanjaya explains that the Pandavas succeed because they follow dharma and are protected by Krishna. Bhishma reveals to Duryodhana that no one can defeat the Pandavas because they are under the protection of Lord Vishnu.
This page answers
- Why are the pandavas winning the war?
- What did bhishma tell duryodhana about the pandavas?
- How does sanjaya explain the success of the pandavas?
- Who is protecting the pandavas in battle?
Also written: Vishvopakhyana, Vishva, Dhritarashtra, Sanjaya, Duryodhana, Bhishma, Brahma, Shrikrishna, Nara Narayana, Madhu, Sanatkumara, विश्वोपाख्यान