धृतराष्ट्रप्रश्न : असाध्य सङ्कट के समय योद्धा का धर्म क्या होता है?
सङ्कट में कर्तव्यबोध
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ४ · द्रोणपर्व → द्रोणाभिषेकपर्व · अध्याय 1 · पृष्ठ 17–41
892 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
वैशम्पायन ने धृतराष्ट्र से कहा
राजाओं की विजय और पराजय के इतिहास को जानने हेतु
जनमेजय ने पूछा—"हे ब्रह्मन्! अनुपम सत्त्व, ओज और पराक्रम से सम्पन्न देवव्रत भीष्म को पाञ्चालराज शिखण्डी के हाथों मारा गया। यह सुनकर राजा धृतराष्ट्र के नेत्र शोक से व्याकुल हो उठे होंगे। हे ब्रह्मर्षे! अपने ज्येष्ठ पिता के मारे जाने पर पराक्रमी धृतराष्ट्र ने कैसी चेष्टा की? उनका पुत्र दुर्योधन, जो भीष्म और द्रोण जैसे महारथियों द्वारा पाण्डवों को पराजित करके स्वयं राज्य हथिया लेना चाहता था, उसने भीष्मजी के मारे जाने पर क्या प्रयत्न किया? मुझे सब बताइये।"
वैशम्पायनजी ने कहा—"हे जनमेजय! ज्येष्ठ पिता के मारे जाने का समाचार सुनकर कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र चिन्ता और शोक में डूब गए। उन्हें क्षण भर के लिए भी शान्ति नहीं मिल रही थी; वे निरन्तर उसी दुःखदायिनी घटना का चिन्तन करते रहे। उसी समय विशुद्ध अन्तःकरण वाले गवल्गणपुत्र सञ्जय पुनः उनके पास आए।"
तस्य चिन्तयतो दुःखमनिशं पार्थिवस्य तत् ।
आजगाम विशुद्धात्मा पुनर्गावल्गणिस्तदा ॥
वे भूपाल निरन्तर उस दुःखदायिनी घटनाका ही चिन्तन करते रहे। उसी समय विशुद्ध अन्तःकरणवाला गवल्गणपुत्र संजय पुनः उनके पास आया ।
धृतराष्ट्र ने व्याकुल होकर पूछा—"तात सञ्जय! भयङ्कर पराक्रमी महात्मा भीष्म के लिए अत्यन्त शोक करके कालप्रेरित कौरवों ने आगे कौन-सा कार्य किया? उन दुर्धर्ष वीर महात्मा भीष्म के मारे जाने पर तो समस्त कुरुवंशी शोक के समुद्र में डूब गए होंगे; फिर उन्होंने क्या किया?"
संशोच्य तु महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् ।
किमकार्षुः परं तात कुरवः कालचोदिताः ॥
धृतराष्ट्रने पूछा- तात! संजय! भयंकर पराक्रमी महात्मा भीष्मके लिये अत्यन्त शोक करके कालप्रेरित कौरवोंने आगे कौन-सा कार्य किया ।
सञ्जय ने कहा—"राजन्! जब सत्यपराक्रमी भीष्म मार दिए गए, उस समय आपके पुत्र और पाण्डव अलग-अलग चिन्ता करने लगे। आपके पुत्र क्षत्रियधर्म का विचार करके अत्यन्त विस्मित और प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने कठोरतापूर्ण धर्म की निन्दा करते हुए महात्मा भीष्म को प्रणाम किया और उन अमित पराक्रमी भीष्म के लिए झुकी हुई गाँठ वाले बाणों द्वारा तकिये और शय्या की रचना कर दी। परस्पर वार्तालाप करके वे भीष्मजी की रक्षा की व्यवस्था कर दी और गङ्गानन्दन देवव्रत की अनुमति लेकर, उनकी परिक्रमा करके, कालप्रेरित क्षत्रिय क्रोध से लाल आँखें किए पुनः युद्ध के लिए निकल पड़े। तदनन्तर बाजों की ध्वनि और नगाड़ों की गड़गड़ाहट के साथ आपकी तथा पाण्डवों की भी सेनाएँ युद्ध के लिए निकलीं।"
सञ्जय आगे कहने लगे—"राजन्! जिस समय गङ्गानन्दन भीष्म रथ से गिरे थे, उस समय सूर्य पश्चिम दिशा में ढल चुका था। यद्यपि महात्मा भीष्म ने सबको युद्ध बन्द करने की सलाह दी थी, तथापि काल से विवेकशक्ति नष्ट हो जाने के कारण वे अमर्ष के वशीभूत होकर तुरन्त ही युद्ध के लिए निकल पड़े। पुत्र सहित आपके मोह से और शान्तनुनन्दन भीष्म का वध हो जाने से समस्त राजाओं सहित सम्पूर्ण कुरुवंशी मृत्यु के अधीन हो गए हैं। जैसे हिंसक जन्तुओं से भरे वन में बिना रक्षक की भेड़ और बकरियाँ भय से उद्विग्न रहती हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र और सैनिक देवव्रत से रहित होकर मन ही मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे थे। भरतशिरोमणि भीष्म के धराशायी होने पर कौरव सेना नक्षत्ररहित आकाश, वायुशून्य अन्तरिक्ष और नायकविहीन हुई असुरों की सेना के समान उद्विग्न, असमर्थ और श्रीहीन हो गई। वह सेना विधवा सुन्दरी के समान, उस नदी के समान जिसका पानी सूख गया हो, उस चितकबरी मृगी के समान जिसका साथी यूथप मार डाला हो, और उस विशाल कन्दरा के समान भयभीत जान पड़ती थी जिसमें रहने वाले सिंह को मार डाला गया हो। वीर और बलवान पाण्डव अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक मार गिराने वाले थे; उनके द्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर आपकी सेना महासागर में चारों ओर से वायु के थपेड़े खाकर टूटी हुई नौका के समान बड़ी विपत्ति में फँस गई। उस समय आपकी सेना के घोड़े, रथ और हाथी सब अत्यन्त व्याकुल हो उठे थे; उसका दिल बैठ गया था और वह अत्यन्त दीन हो रही थी।"
पतिते भरतश्रेष्ठे बभूव कुरुवाहिनी ।
द्यौरिवापेतनक्षत्रा हीनं खमिव वायुना ॥
विपन्नसस्येव मही वाक् चैवासंस्कृता तथा ।
आसुरीव यथा सेना निगृहीते नृपे बलौ ॥
भरतशिरोमणि भीष्मके धराशायी हो जानेपर कौरव सेना नक्षत्ररहित आकाश, वायुशून्य अन्तरिक्ष, नष्ट हुई खेतीवाली भूमि, असंस्कृत वाणी तथा राजा बलिके बाँध लिये जानेपर नायकविहीन हुई असुरोंकी सेनाके समान उद्विग्न, असमर्थ और श्रीहीन हो गयी ।
"उस समय कौरवों ने कर्ण का स्मरण किया। जैसे आपत्ति में पड़े मनुष्य का मन अपने मित्र या भाई-बन्धु की ओर जाता है, वैसे ही कौरवों का मन समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तेजस्वी वीर कर्ण की ओर गया। वहाँ सब राजा 'कर्ण! कर्ण!' की पुकार करने लगे। वे कहने लगे कि राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण हमारा हितैषी है और अपने शरीर को हमारे लिए निछावर किए हुए है; उसे शीघ्र बुलाओ। राजन्! बात यह थी कि जब रथियों की गणना की जा रही थी, तब भीष्मजी ने महाबाहु कर्ण को 'अर्ध-रथी' बता दिया था। इस पर क्रोधवश कर्ण ने गङ्गानन्दन भीष्म से कहा था—'कुरुनन्दन! आपके जीते जी मैं कदापि युद्ध नहीं करूँगा। यदि आप पाण्डवों के द्वारा मारे जाकर स्वर्ग पहुँच गये, तो मैं एकमात्र रथ की सहायता से उन सबको मार डालूँगा जिन्हें आप रथी मानते हैं।' ऐसा कहकर महायशस्वी कर्ण दुर्योधन की सम्मति लेकर दस दिनों तक युद्ध में सम्मिलित नहीं हुआ। किन्तु जब भीष्मजी के मारे जाने पर सङ्कट आया, तब समस्त राजाओं सहित आपके पुत्र और सैनिक 'हा कर्ण!' कहकर विलाप करने लगे। वे कहने लगे—'कर्ण! तुम्हारे पराक्रम का यह अवसर आया है।' इस प्रकार आपके महाबली योद्धागण राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण को पुकारने लगे, क्योंकि वह जन्म से ही दुर्निवार्य पराक्रमी था और जैसे भगवान विष्णु भय से रक्षा करते हैं, वैसे ही कर्ण उन्हें भारी भय से उबारने में समर्थ था।"
कर्ण हि कुरवोऽस्मार्षुः स हि देवव्रतोपमः ।
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं रोचमानमिवातिथिम् ॥
बन्धुमापद्गतस्येव तमेवोपागमन्मनः ।
चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तत्र भारत पार्थिवाः ॥
उस समय कौरवोंने कर्णका स्मरण किया । जैसे गृहस्थका मन अतिथिकी ओर तथा आपत्तिमें पड़े हुए मनुष्यका मन अपने मित्र या भाई-बन्धुकी ओर जाता है, उसी प्रकार कौरवोंका मन समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं तेजस्वी वीर कर्णकी ओर गया; क्योंकि वही भीष्मके समान पराक्रमी समझा जाता था । भारत! वहाँ सब राजा ' कर्ण! कर्ण! ' की पुकार करने लगे ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—"जब सञ्जय इस प्रकार बार-बार कर्ण का नाम ले रहे थे, तब राजा धृतराष्ट्र ने विषधर सर्प के समान उच्छ्वास लेकर कहा—'सञ्जय! जब सबका मन कर्ण की ओर गया, तब क्या तुमने शरीर निछावर करने वाले सूतपुत्र कर्ण को वहाँ देखा? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि सङ्कट में घबराये हुए कौरवों की प्रार्थना को सत्यपराक्रमी कर्ण ने निष्फल कर दिया हो? क्या भीष्म के मारे जाने पर जो कमी आई थी, उसे श्रेष्ठ धनुर्धर कर्ण ने पूरा किया? क्या उसने शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न किया? सञ्जय! जगत् में कर्ण को 'पुरुषसिंह' कहा जाता है; क्या उसने रणभूमि में शोकार्त अपने उन बन्धुजनों की रक्षा एवं कल्याण के लिये अपने प्राणों का परित्याग करके मेरे पुत्रों की विजयाभिलाषा को सफल किया?'"
तत् खण्डं पूरयन् कर्णः परेषामादधद् भयम् ।
स हि वै पुरुषव्याघ्रो लोके संजय कथ्यते ॥
क्या उस खण्डित अंशकी पूर्ति करके कर्णने शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न किया? संजय! जगत्में कर्णको ' पुरुषसिंह ' कहा जाता है ।
In English
The Death of Bhishma and the Call for Karna
After Bhishma is killed by Shikhandi, Dhritarashtra grieves while Sanjaya describes the chaos in the Kaurava camp. The Kaurava soldiers feel helpless without their leader, so they call upon Karna to come and lead them in battle.
This page answers
- How did the kauravas react to the death of bhishma?
- Why did the kaurava army call for karna?
- What did the kaurava soldiers do for bhishma before returning to war?
- Did karna participate in the battle after bhishma died?
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