हंसगीता : परम सत्य, संयम और क्षमा का वास्तविक स्वरूप क्या है?
सत्य और आत्म-संयम की महिमा
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 299 · पृष्ठ 1963–1974
1,177 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 10 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
सत्य, दम और क्षमा के विषय में युधिष्ठिर द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर हेतु।
युधिष्ठिर ने भीष्म की ओर देखा और पूछा— "पितामह! संसार में बहुत से विद्वान सत्य, इन्द्रिय-संयम, क्षमा और प्रज्ञा की प्रशंसा करते हैं। इस विषय में आपका कैसा मत है?"
सत्यं दमं क्षमां प्रज्ञां प्रशंसन्ति पितामह ।
विद्वांसो मनुजा लोके कथमेतन्मतं तव ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! संसारमें बहुत - से विद्वान् सत्य, इन्द्रिय - संयम, क्षमा और प्रज्ञा ( उत्तम बुद्धि ) -की प्रशंसा करते हैं । इस विषयमें आपका कैसा मत है?
भीष्म बोले— "युधिष्ठिर! इस विषय में साध्यगणों का हंस के साथ जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।"
अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
साध्यानामिह संवादं हंसस्य च युधिष्ठिर ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस विषय में साध्यगणोंका हंसके साथ जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुना रहा हूँ ।
एक समय नित्य अजन्मा प्रजापति सुवर्णमय हंस का रूप धारण करके तीनों लोकों में विचर रहे थे। घूमते-घामते वे साध्यगणों के पास जा पहुँचे। उस समय साध्यों ने उनका स्वागत किया और कहा— "हंस! हम लोग साध्य देवता हैं और आपसे मोक्षधर्म के विषय में प्रश्न करना चाहते हैं; क्योंकि आप मोक्ष-तत्त्व के ज्ञाता हैं, यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है। महात्मन्! हमने सुना है कि आप पण्डित और धीर वक्ता हैं। पतत्रिन्! आपकी उत्तम वाणी का सर्वत्र प्रचार है। पक्षिप्रवर! आपके मत में सर्वश्रेष्ठ वस्तु क्या है? आपका मन किसमें रमता है? पक्षिराज! खगश्रेष्ठ! समस्त कार्यों में से जिस एक कार्य को आप सबसे उत्तम समझते हों तथा जिसके करने से जीव को सब प्रकार के बन्धनों से शीघ्र छुटकारा मिल सके, उसी का हमें उपदेश कीजिये।"
हंसो भूत्वाथ सौवर्णस्त्वजो नित्यः प्रजापतिः ।
स वै पर्येति लोकांस्त्रीनथ साध्यानुपागमत् ॥
एक समय नित्य अजन्मा प्रजापति सुवर्णमय हंसका रूप धारण करके तीनों लोकोंमें विचर रहे थे । घूमते - घामते वे साध्यगणोंके पास जा पहुँचे ।
हंस ने उत्तर दिया— "अमृतभोगी देवताओं! मैं तो सुनता हूँ कि तप, इन्द्रिय-संयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह आदि कार्य ही सबसे उत्तम हैं। हृदय की सारी गाँठें खोलकर प्रिय और अप्रिय को अपने वश में करें अर्थात् उनके लिये हर्ष एवं विषाद न करें। किसी के मर्म में आघात न पहुँचाएँ। दूसरों से निष्ठुर वचन न बोलें। किसी नीच मनुष्य से अध्यात्मशास्त्र का उपदेश न ग्रहण करें तथा जिसे सुनकर दूसरों को उद्वेग हो, ऐसी नरक में डालने वाली अमङ्गलमयी बात भी मुँह से न निकालें।" हंस ने आगे कहा— "वचनरूपी बाण जब मुँह से निकल पड़ते हैं, तब उनके द्वारा बींधा गया मनुष्य रात-त-दिन शोक में डूबा रहता है; क्योंकि वे दूसरों के मर्म पर आघात पहुँचाते हैं, इसलिये विद्वान् पुरुष को किसी दूसरे मनुष्य पर वाग्बाण का प्रयोग नहीं करना चाहिये। दूसरा कोई भी यदि इस विद्वान् पुरुष को कटु वचनरूपी बाणों से बहुत अधिक चोट पहुँचाए, तो भी उसे शान्त ही रहना चाहिये। जो दूसरों के क्रोध करने पर भी स्वयं बदले में प्रसन्न ही रहता है, वह उसके पुण्य को ग्रहण कर लेता है। प्रज्वलित क्रोध को रोक लेता है, चित्त में कोई विकार या दोष नहीं आने देता, प्रसन्न रहता और दूसरों के दोष नहीं देखता है, वह पुरुष अपने प्रति शत्रुभाव रखने वाले लोगों का पुण्य ले लेता है।"
हंस ने अपने वचन जारी रखे— "आक्रुश्यमानो न वदामि किञ्चित् क्षमाम्यहं ताड्यमानश्च नित्यम्। श्रेष्ठं ह्येतद् यत्क्षमामाहुरार्याः सत्यं तथैवार्जवमानृशंस्यम्॥ मुझे कोई गाली दे तो भी बदले में कुछ नहीं कहता हूँ। कोई मार दे तो उसे सदा क्षमा ही करता हूँ; क्योंकि श्रेष्ठ जन क्षमा, सत्य, सरलता और दया को ही उत्तम बताते हैं। वेदाध्ययन का सार है सत्यभाषण, सत्यभाषण का सार है इन्द्रिय-संयम और इन्द्रिय-संयम का फल है मोक्ष। यही सम्पूर्ण शास्त्रों का उपदेश है। जो वाणी का वेग, मन और क्रोध का वेग, तृष्णा का वेग तथा पेट और जननेन्द्रिय का वेग— इन सब प्रचण्ड वेगों को सह लेता है, उसी को मैं ब्रह्मवेत्ता और मुनि मानता हूँ।"
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।
दमस्योपनिषन्मोक्ष एतत् सर्वानुशासनम् ॥
वेदाध्ययनका सार है सत्यभाषण, सत्यभाषणका सार है इन्द्रियसंयम और इन्द्रियसंयमका फल है मोक्ष । यही सम्पूर्ण शास्त्रोंका उपदेश है ।
हंस ने स्पष्ट किया— "अक्रोधनः क्रुध्यतां वै विशिष्ट- स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः। अमानुषान्मानुषो वै विशिष्ट- स्तथाज्ञानाज्ज्ञानविद् वै विशिष्टः॥" अर्थात्, जो क्रोध करने वाले मनुष्यों से क्रोध न करे वह श्रेष्ठ है। जो असहनशील के सामने सहनशील बने, वह बड़ा है। मनुष्येतर प्राणियों में मनुष्य ही बढ़कर है तथा अज्ञानी से ज्ञानवान् ही श्रेष्ठ है।
यत् कार्याणां मन्यसे श्रेष्ठमेकम् ।
यत् कृत्वा वै पुरुषः सर्वबन्धै- विमुच्यते विहगेन्द्रेह शीघ्रम् ॥
पक्षिराज! खगश्रेष्ठ! समस्त कार्योंमेंसे जिस एक कार्यको आप सबसे उत्तम समझते हों तथा जिसके करनेसे जीवको सब प्रकारके बन्धनोंसे शीघ्र छुटकारा मिल सके, उसीका हमें उपदेश कीजिये ।
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा— "हे युधिष्ठिर! जब तुमने सत्य, दम और क्षमा जैसे सद्गुणों के विषय में पूछा, तब मैंने तुम्हें साध्य देवताओं और उस सुवर्णमय हंस के बीच हुए संवाद की कथा सुनाई।
साध्य देवताओं ने हंस से मोक्षधर्म के विषय में प्रश्न किए। हंस ने उत्तर दिया— 'देवताओ! तप, इन्द्रियसंयम और सत्य ही श्रेष्ठ कार्य हैं।' हंस ने आगे कहा— 'जो दूसरे के द्वारा गाली दिए जाने पर भी बदले में उसे गाली नहीं देता, उस क्षमाशील मनुष्य का दबा हुआ क्रोध ही उस गाली देने वाले को भस्म कर देता है और उसके पुण्य को भी ले लेता है। जो दूसरों द्वारा कड़वी बात कही जाने पर भी कठोर या प्रिय कुछ नहीं कहता तथा धैर्य के कारण बदले में न तो मारने वाले को मारता है और न उसकी बुराई चाहता है, उस महात्मा से मिलने के लिए देवता भी सदा लालायित रहते हैं।'
पापीयसः क्षमेतैव श्रेयसः सदृशस्य च ।
विमानितो हतोत्क्रुष्ट एवं सिद्धिं गमिष्यति ॥
पाप करनेवाला अपराधी अवस्थामें अपनेसे बड़ा हो या बराबर, उसके द्वारा अपमानित होकर, मार खाकर और गाली सुनकर भी उसे क्षमा ही कर देना चाहिये । ऐसा करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त होगा ।
हंस ने उपदेश देते हुए कहा— 'पाप करने वाला अपराधी चाहे अपने से बड़ा हो या बराबर, उसके द्वारा अपमानित होकर और गाली सुनकर भी उसे क्षमा ही कर देना चाहिए। ऐसा करने वाला पुरुष परम सिद्धि को प्राप्त होगा। मैं सब प्रकार से परिपूर्ण हूँ, फिर भी श्रेष्ठ पुरुषों की उपासना करता हूँ। मुझ पर न तृष्णा का वश चलता है न रोष का। कोई मुझे शाप दे दे तो भी मैं बदले में उसे शाप नहीं देता; इन्द्रियसंयम को ही मोक्ष का द्वार मानता हूँ।'
हंस ने आगे स्पष्ट किया— 'मनुष्य योनि से बढ़कर कोई उत्तम योनि नहीं है। जो अपने मन को वश में रखने वाला विद्वान है, वह ऊँचे उठाने वाले खम्भे की भाँति आदर के योग्य होकर देवभाव को प्राप्त कर लेता है। समझदार मनुष्य को चाहिए कि वह कटु वचन कहने वाले अज्ञानियों को समझाकर अपनी हिंसा न कराए। विद्वान को चाहिए कि वह अपमान पाकर अमृत पीने की भाँति सन्तुष्ट रहे, क्योंकि अपमानित पुरुष तो सुख से सोता है, किन्तु अपमान करने वाले का नाश हो जाता है। क्रोध करने वाले के यज्ञ, दान और तप के फल को यमराज हर लेते हैं।'
अमृतस्येव संतृप्येदवमानस्य पण्डितः ।
सुखं ह्यवमतः शेते योऽवमन्ता स नश्यति ॥
विद्वान्को चाहिये कि वह अपमान पाकर अमृत पीनेकी भाँति संतुष्ट हो; क्योंकि अपमानित पुरुष तो सुखसे सोता है, किंतु अपमान करनेवालेका नाश हो जाता है ।
हंस ने सत्य की महिमा बताते हुए कहा— 'मैंने अब तक सत्य से बढ़कर परम पावन वस्तु कहीं नहीं देखी। जैसे जहाज समुद्र से पार होने का साधन है, वैसे ही सत्य स्वर्गलोक में पहुँचने की सीढ़ी है। जो मनुष्य नियमपूर्वक सत्य बोलने वाले, कृतज्ञ और धर्मपरायण हैं, उन्हीं के साथ देवता स्नेह-सम्बन्ध स्थापित करते हैं। वाणी की विशेषताएँ ये हैं— व्यर्थ बोलने की अपेक्षा मौन रहना, फिर सत्य बोलना, उसके बाद प्रिय बोलना और अन्त में धर्मसम्मत बोलना।'
तभी साध्यों ने प्रश्न किए— 'हंस! इस जगत् को किसने आवृत कर रक्खा है? मनुष्य किस हेतु से मित्रों का त्याग करता है और किस दोष से स्वर्ग में नहीं जा पाता?' हंस ने उत्तर दिया— 'देवताओ! अज्ञान ने इस लोक को आवृत कर रक्खा है। मनुष्य लोभ से मित्रों का त्याग करता है और आसक्ति के दोष के कारण स्वर्ग में नहीं जा पाता।'
अज्ञानेनावृतो लोको मात्सर्यान्न प्रकाशते ।
लोभात् त्यजति मित्राणि संगात् स्वर्गं न गच्छति ॥
हंसने कहा- देवताओ! अज्ञानने इस लोकको आवृत कर रक्खा है । आपसमें डाह होनेके कारण इसका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता। मनुष्य लोभसे मित्रोंका त्याग करता है और आसक्तिदोषके कारण वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता ।
साध्यों ने पुनः पूछा— 'हंस! ब्राह्मणों में कौन एकमात्र सुख का अनुभव करता है? वह कौन है जो बहुतों के बीच रहकर भी चुप रहता है और दुर्बल होने पर भी बलवान है?' हंस बोला— 'देवताओ! ब्राह्मणों में जो ज्ञानी है, वही परम सुख का अनुभव करता है। ज्ञानी ही बहुतों के बीच रहकर मौन रहता है और एकमात्र ज्ञानी ही किसी के साथ कलह नहीं करता।'
प्राज्ञ एको रमते ब्राह्मणानां प्राज्ञश्चैको बहुभिर्जोषमास्ते ।
प्राज्ञ एको बलवान् दुर्बलोऽपि प्राज्ञ एषां कलहं नान्ववैति ॥
हंसने कहा— देवताओ! ब्राह्मणोंमें जो ज्ञानी है, एकमात्र वही परम सुखका अनुभव करता है । ज्ञानी ही बहुतोंके साथ रहकर भी मौन रहता है । एकमात्र ज्ञानी दुर्बल होनेपर भी बलवान् है और इनमें ज्ञानी ही किसीके साथ कलह नहीं करता है ।
साध्यों ने अन्तिम प्रश्न किया— 'हंस! ब्राह्मणों का देवत्व क्या है? उनमें साधुता क्या है? उनके भीतर असाधुता और मनुष्यता क्या मानी गई है?' हंस ने कहा— 'साध्यगण! वेद-शास्त्रों का स्वाध्याय ही ब्राह्मणों का देवत्व है। उत्तम व्रतों का पालन करना ही उनमें साधुता है। दूसरों की निन्दा करना ही उनकी असाधुता है और मृत्यु को प्राप्त होना ही उनकी मनुष्यता है।'
स्वाध्याय एषां देवत्वं व्रतं साधुत्वमुच्यते ।
असाधुत्वं परीवादो मृत्युर्मानुष्यमुच्यते ॥
हंसने कहा — साध्यगण! वेद- शास्त्रोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंका देवत्व है । उत्तम व्रतोंका पालन करना ही उनमें साधुता बतायी जाती है । दूसरोंकी निन्दा करना ही उनकी असाधुता है और मृत्युको प्राप्त होना ही उनकी मनुष्यता बतायी गयी है ।
यह संवाद समाप्त हुआ और ब्रह्मा जी वापस चले गए।"
In English
The Dialogue of the Golden Swan and the Sadyas
Bhishma tells Yudhishthira a story about a golden swan who converses with the Sadyas gods. The swan explains that truth, self-control, and forgiveness are the highest virtues for achieving liberation.
This page answers
- What did the golden swan tell the sadyas?
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- What is the importance of truth and forgiveness in the text?
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Also written: Hansagita, Hansa, Yudhishthira, Bhishma, हंसगीता