श्रीगणेशाय नमः।

इन्द्रबृहस्पतिसंवाद : किसी भी व्यक्ति को वश में करने का सबसे सरल साधन क्या है?

मधुर वाणी की शक्ति

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 84 · पृष्ठ 575–577

341 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

धर्म और व्यवहार की शिक्षा देने हेतु

भीष्मजी कहते हैं — हे कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! इस विषय में मनस्वी पुरुष इन्द्र और बृहस्पतिके संवादरूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, वह सुनो।

इन्द्र ने पूछा — "ब्रह्मन्! वह कौन-सी ऐसी एक वस्तु है, जिसका नाम एक ही पदका है और जिसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियों का प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है?"

शक्र उवाच

किं स्विदेकपदं ब्रह्मन् पुरुषः सम्यगाचरन् ।
प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥

इन्द्रने पूछा —ब्रह्मन्! वह कौन - सी ऐसी एक वस्तु है, जिसका नाम एक ही पदका है और जिसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियोंका प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 2पृष्ठ 576

बृहस्पतिजी ने उत्तर दिया — "इन्द्र! जिसका नाम एक ही पदका है, वह एकमात्र वस्तु सान्त्वना (मधुर वचन बोलना) है। उसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियों का प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है। शक्र! यही एक वस्तु सम्पूर्ण जगत् के लिये सुखदायक है। इसको आचरण में लानेवाला मनुष्य सदा समस्त प्राणियों का प्रिय होता है।"

शक्र उवाच

एतदेकपदं शक्र सर्वलोकसुखावहम् ।
आचरन् सर्वभूतेषु प्रियो भवति सर्वदा ॥

शक्र! यही एक वस्तु सम्पूर्ण जगत्के लिये सुखदायक है । इसको आचरणमें लानेवाला मनुष्य सदा समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 4पृष्ठ 576

बृहस्पतिजी ने आगे समझाया कि जो मनुष्य सदा भौंहें टेढी किये रहता है और किसी से कुछ बातचीत नहीं करता, वह शान्तभाव को न अपनाने के कारण सब लोगों के द्वेष का पात्र हो जाता है। इसके विपरीत, जो सभी को देखकर पहले ही बात करता है और सबसे मुसकराकर ही बोलता है, उस पर सब लोग प्रसन्न रहते हैं। बृहस्पतिजी ने एक उदाहरण देते हुए कहा — "जैसे बिना व्यञ्जन का भोजन मनुष्य को सन्तुष्ट नहीं कर सकता, उसी प्रकार मधुर वचन बोले बिना दिया हुआ दान भी प्राणियों को प्रसन्न नहीं कर पाता है।"

"शक्र! मधुर वचन बोलनेवाला मनुष्य लोगों की कोई वस्तु लेकर भी अपनी मधुर वाणी द्वारा इस सम्पूर्ण जगत् को वश में कर लेता है। अतः किसी को दण्ड देने की इच्छा रखनेवाले राजा को भी उससे सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोलना चाहिये। ऐसा करके वह अपना प्रयोजन तो सिद्ध कर ही लेता है और उससे कोई मनुष्य उद्विग्न भी नहीं होता है। यदि अच्छी तरह से सान्त्वनापूर्ण, मधुर एवं स्नेहयुक्त वचन बोला जाय और सदा सब प्रकार से उसी का सेवन किया जाय, तो उसके समान वशीकरण का साधन इस जगत् में निःसन्देह दूसरा कोई नहीं है।"

तस्मात् सान्त्वं प्रयोक्तव्यं दण्डमाधित्सतोऽपि हि ।
फलं च जनयत्येवं न चास्योद्विजते जनः ॥

अतः किसीको दण्ड देनेकी इच्छा रखनेवाले राजाको भी उससे सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोलना चाहिये । ऐसा करके वह अपना प्रयोजन तो सिद्ध कर ही लेता है और उससे कोई मनुष्य उद्विग्न भी नहीं होता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 9पृष्ठ 577

भीष्मजी कहते हैं — कुन्तीनन्दन! अपने पुरोहित बृहस्पतिके ऐसा कहने पर इन्द्र ने सब कुछ उसी तरह किया। इसी प्रकार तुम भी इस सान्त्वनापूर्ण वचन को भलीभाँति आचरण में लाओ।

भीष्म उवाच

इत्युक्तः कृतवान् सर्वं यथा शक्रः पुरोधसा ।
तथा त्वमपि कौन्तेय सम्यगेतत् समाचर ॥

भीष्मजी कहते हैं – कुन्तीनन्दन! अपने पुरोहित बृहस्पतिके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सब कुछ उसी तरह किया । इसी प्रकार तुम भी इस सान्त्वनापूर्ण वचनको भलीभाँति आचरणमें लाओ ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 84 · श्लोक 11पृष्ठ 577

In English

The Importance of Sweet Speech

Bhishma tells Yudhishthira about a dialogue between Indra and Brihaspati. Brihaspati explains that using sweet and comforting words makes a person loved by all, whereas being silent or unfriendly causes others to dislike them.

This page answers

  • What did brihaspati tell indra about sweet speech?
  • How can a person become loved by everyone according to brihaspati?
  • Why is sweet speech important when giving gifts or punishments?
  • What happens to a person who does not speak kindly to others?

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