कैकेयोपाख्यान : राजा को अपनी धर्मनिष्ठा कैसे सिद्ध करनी चाहिए?
धर्मनिष्ठ शासन और सुरक्षा
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 77 · पृष्ठ 522–528
861 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 7 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
राजधर्म और ब्राह्मणों की रक्षा के महत्व को समझाने हेतु
भीष्मजी ने कहा— राजन्! ब्राह्मण के सिवा अन्य सभी वर्णों के धन का स्वामी राजा होता है, यह वैदिक मत है। ब्राह्मणों में भी जो कोई अपने वर्ण के विपरीत कर्म करते हों, उनके धन पर भी राजा का ही अधिकार है। अपने वर्ण के विपरीत कर्मों में लगे हुए ब्राह्मणों की राजा को किसी प्रकार उपेक्षा नहीं करनी चाहिए; उन्हें दण्ड देकर सही राह पर लाना राजा का कर्तव्य है। साधु पुरुष इसी को राजाओं का प्राचीन काल से चला आता हुआ बर्ताव या धर्म कहते हैं। नरेश्वर! जिस राजा के राज्य में कोई ब्राह्मण चोरी करने लग जाता है, वह राजा अपराधी माना जाता है। विचारवान् पुरुष इसे राजा का ही अपराध और पाप समझते हैं; ब्राह्मण में उक्त दोष आ जाए तो उससे राजा अपने आपको कलङ्कित मानता है। इसीलिए सभी राजर्षियों ने ब्राह्मणों की सदा ही रक्षा की है। इस विषय में जानकार लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें राक्षस के द्वारा अपहृत होते समय केकयराज के प्रकट किए हुए उद्गार का वर्णन है।
विकर्मस्थाश्च नोपेक्ष्या विप्रा राज्ञा कथञ्चन ।
इति राज्ञां पुरावृत्तमभिजल्पन्ति साधवः ॥
अपने वर्णके विपरीत कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मणोंकी राजाको किसी प्रकार उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ( क्योंकि उन्हें दण्ड देकर भी राहपर लाना राजाका कर्तव्य है ) । साधुपुरुष इसीको राजाओंका प्राचीनकालसे चला आता हुआ बर्ताव या धर्म कहते हैं ।
एक समय की बात है, केकयराज वन में रहकर कठोर व्रत का पालन और स्वाध्याय किया करते थे। एकाएक, उन्हें एक भयङ्कर राक्षस ने पकड़ लिया। राजा के शरीर पर सङ्कट देखकर उन्होंने उस राक्षस से प्रश्न किया— "मेरे राज्य में एक भी चोर, कञ्जूस, शराबी अथवा अग्निहोत्र और यज्ञ का त्याग करने वाला नहीं है, तो भी तुम्हारा मेरे शरीर में प्रवेश कैसे हो गया? मेरे राज्य में एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं है जो विद्वान्, उत्तम व्रत का पालन करने वाला, यज्ञ में सोमरस पीने वाला, अग्निहोत्री और यज्ञकर्ता न हो; तो भी तुमने मेरे भीतर कैसे प्रवेश किया? मेरे राज्य में समस्त द्विज नाना प्रकार की उत्तम दक्षिणाओं से युक्त यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किए बिना वेदों का अध्ययन नहीं करता। मेरे राज्य के ब्राह्मण पढ़ते-पढ़ाते, यज्ञ करते-कराते, दान देते और लेते हैं; वे अपने-अपने कर्मों में तत्पर, कोमल स्वभाव वाले तथा सत्यवादी हैं। उन सबको मेरे राज्य से वृत्ति मिलती है और वे मेरे द्वारा पूजित होते हैं, तो भी तुम्हारा प्रवेश कैसे सम्भव हुआ?"
न च मे ब्राह्मणोऽविद्वान्नाव्रती नाप्यसोमपः ।
नानाहिताग्निर्नायज्वा मामकान्तरमाविशः ॥
मेरे राज्यमें एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं है जो विद्वान्, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, यज्ञमें सोमरस पीनेवाला, अग्निहोत्री और यज्ञकर्ता न हो तो भी तुमने मेरे भीतर कैसे प्रवेश किया?
राजा ने अपनी धर्मनिष्ठा सिद्ध करते हुए आगे कहा— "मेरे राज्य के क्षत्रिय अपने वर्णोचित कर्मों में लगे रहते हैं; वे वेदों का अध्ययन तो करते हैं, परन्तु अध्यापन नहीं करते; यज्ञ करते हैं, परन्तु कराते नहीं हैं तथा दान देते हैं, किन्तु स्वयं लेते नहीं हैं। वे ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं और युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाते। मेरे राज्य के वैश्य भी छल-कपट छोड़कर खेती, गोरक्षा और व्यापार से जीविका चलाते हैं। वे उत्तम व्रतों का पालन करने वाले और सत्यवादी हैं; अतिथियों को देकर खाते हैं और इन्द्रियों को संयम में रखते हैं। यहाँ के शूद्र भी तीनों वर्णों की यथावत् सेवा से जीवन निर्वाह करते हैं और परदोषदर्शन से दूर रहते हैं। मैं दीन, अनाथ, वृद्ध, दुर्बल, रोगी तथा स्त्रियों को अन्न, वस्त्र तथा औषध जैसी आवश्यक वस्तुएँ देता रहता हूँ। मैं अपने सुविख्यात कुल-धर्म, देश-धर्म तथा जाति-धर्म की परम्परा का विधिपूर्वक पालन करता हूँ। मैं देवता, पितर तथा अतिथि आदि का भाग अर्पण किए बिना कभी भोजन नहीं करता। परायी स्त्री से कभी सम्पर्क नहीं रखता और न ही स्वच्छन्द होकर क्रीडा करता हूँ। मैं विद्वानों, वृद्धों तथा तपस्वी जनों का तिरस्कार नहीं करता; जब सारा राष्ट्र सोता है, तब भी मैं उसकी रक्षा के लिए जागता रहता हूँ। मेरे राज्य में कोई स्त्री विधवा नहीं है और न ही कोई ब्राह्मण अधम, धूर्त या चोर है; फिर भी तुम मेरे भीतर कैसे घुस आए?"
अब्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् ।
ब्राह्मणानां च ये केचिद् विकर्मस्था भवन्त्युत ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! ब्राह्मणके सिवा अन्य सभी वर्णोंके धनका स्वामी राजा होता है, यह वैदिक मत है । ब्राह्मणोंमें भी जो कोई अपने वर्णके विपरीत कर्म करते हों, उनके धनपर भी राजाका ही अधिकार है ।
राजा ने अन्तिम प्रश्न करते हुए कहा— "मेरे शरीर में दो अङ्गुल भी ऐसा स्थान नहीं है जो धर्म के लिए युद्ध करते समय अस्त्र-शस्त्रों से घायल न हुआ हो। मेरे राज्य के लोग गौओं, ब्राह्मणों तथा यज्ञों के लिए सदा मङ्गल कामना करते हैं; तो भी तुम्हारा प्रवेश कैसे हुआ?"
गोब्राह्मणेभ्यो यज्ञेभ्यो नित्यं स्वस्त्ययनं मम ।
आशासते जना राष्ट्रे मामकान्तरमाविशः ॥
मेरे राज्यमें रहनेवाले लोग गौओं, ब्राह्मणों तथा यज्ञोंके लिये सदा मङ्गल- कामना करते रहते हैं, तो भी तुम मेरे शरीरके भीतर कैसे घुस आये?
राक्षस ने राजा की परीक्षा लेने के उपरान्त कहा— "जहाँ ब्राह्मण संयमपूर्वक जीवन बिता रहे हों, वहाँ यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा असुरों का भय नहीं होता। जहाँ अन्याय और व्यभिचार होता है, वहीं प्रजा को भय मिलता है।" फिर राक्षस ने स्वीकार किया कि केकयराज धर्म पर ही दृष्टि रखते हैं। उसने आशीर्वाद देते हुए कहा— "केकय नरेश! तुम सभी अवस्थाओं में धर्म पर ही दृष्टि रखते हो, इसलिए कुशलपूर्वक घर जाओ। तुम्हारा कल्याण हो!" यह कहकर राक्षस चला गया।
नाध्यापयन्त्यधीयन्ते यजन्ते याजयन्ति न ॥
ब्राह्मणान् परिरक्षन्ति संग्रामेष्वपलायिनः ।
क्षत्रिया मे स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ॥
मेरे राज्यमें जो क्षत्रिय हैं, वे अपने वर्णोचित कर्मोंमें लगे रहते हैं, वे वेदोंका अध्ययन तो करते हैं, परंतु अध्यापन नहीं करते; यज्ञ करते हैं, परंतु कराते नहीं हैं तथा दान देते हैं, किंतु स्वयं लेते नहीं हैं । मेरे राज्यके क्षत्रिय याचना नहीं करते; स्वयं ही याचकोंको मुँहमाँगी वस्तुएँ देते हैं । सत्यभाषी तथा धर्मसम्पादनमें कुशल हैं । वे ब्राह्मणोंकी रक्षा करते हैं और युद्धमें कभी पीठ नहीं दिखाते हैं तो भी तुम मेरे शरीरके भीतर कैसे प्रविष्ट हो गये?
राजा ने अपनी धर्मनिष्ठा सिद्ध कर दी थी और राक्षस ने उन्हें आशीर्वाद देकर वापस जाने को कहा। राजा ने देखा कि उनका राज्य सुरक्षित है। जिस राजा के आगे-आगे ब्राह्मण चलते हैं, जिनका सबसे बड़ा बल ब्राह्मण ही हैं, तथा जिनके राज्य के नागरिक अतिथि सत्कार के प्रेमी हैं, वे नरेश निश्चय ही स्वर्गलोक पर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।
येषां पुरोगमा विप्रा येषां ब्रह्म परं बलम् ।
अतिथिप्रियास्तथा पौरास्ते वै स्वर्गजितो नृपाः ॥
जिनके आगे - आगे ब्राह्मण चलते हैं, जिनका सबसे बड़ा बल ब्राह्मण ही हैं, तथा जिनके राज्यके नागरिक अतिथि सत्कारके प्रेमी हैं, वे नरेश निश्चय ही स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! इसलिए ब्राह्मणों की सदा रक्षा करनी चाहिए। सुरक्षित रहने पर वे राजाओं की रक्षा करते हैं। ठीक-ठीक बर्ताव करने वाले राजाओं को ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अतः राजाओं को चाहिए कि वे विपरीत कर्म करने वाले ब्राह्मणों को उन पर अनुग्रह करने के लिये ही नियन्त्रण में रखें और उनकी आवश्यकता की वस्तुएँ उन्हें देते रहें। जो राजा अपने नगर और राष्ट्र की प्रजा के साथ ऐसा धर्मपूर्ण बर्ताव करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अन्त में इन्द्रलोक प्राप्त कर लेता है।
तस्माद् द्विजातीन् रक्षेत ते हि रक्षन्ति रक्षिताः ।
आशीरेषां भवेद् राजन् राज्ञां सम्यक्प्रवर्तताम् ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इसलिये ब्राह्मणोंकी सदा रक्षा करनी चाहिये । सुरक्षित रहनेपर वे राजाओंकी रक्षा करते हैं । ठीक- ठीक बर्ताव करनेवाले राजाओंको ब्राह्मणोंका आशीर्वाद प्राप्त होता है ।
In English
The King of Kekaya and the Demon
Bhishma explains that a king must protect all Brahmins, even those who act against their caste. He tells a story about the King of Kekaya, who was attacked by a demon despite ruling a righteous kingdom where all citizens followed their duties. After questioning the king's virtue, the demon blessed him and departed.
This page answers
- What is the duty of a king regarding brahmins?
- How did the demon enter the body of the king of kekaya?
- Why did the demon bless the king of kekaya?
- What are the characteristics of a righteous kingdom according to the text?
Also written: Kaikeyopakhyana, Kaikeya, Yudhishthira, Bhishma, Kekayaraja, कैकेयोपाख्यान