मुचुकुन्दोपाख्यान : राजा को अपनी शक्ति और पद की रक्षा कैसे करनी चाहिए?
बाहुबल और आत्म-सम्मान
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 74 · पृष्ठ 509–513
493 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
राजकीय योगक्षेम और धर्म के महत्व को समझाने हेतु
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा— राजन्! राष्ट्र का योगक्षेम राजा के अधीन होता है, परन्तु राजा का योगक्षेम उसके पुरोहित के अधीन है। जहाँ ब्राह्मण अपने तेज से प्रजा के अदृष्ट भय का निवारण करता है और राजा अपने बाहुबल से दृष्ट भय को दूर करता है, वह राज्य सुख से उन्नति करता है। इस विषय में विद्वान पुरुष मुचुकुन्द और राजा कुबेर के संवाद का एक प्राचीन इतिहास देते हैं।
मुचुकुन्दो विजित्येमां पृथिवी पृथिवीपतिः ।
जिज्ञासमानः स्वबलमभ्ययादलकाधिपम् ॥
कहते हैं, पृथ्वीपति राजा मुचुकुन्दने इस पृथ्वीको जीतकर अपने बलकी परीक्षा लेनेके लिये अलकापति कुबेरपर चढ़ाई की ।
पृथ्वीपति राजा मुचुकुन्द ने अपनी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए अलकापति कुबेर पर चढ़ाई कर दी। कुबेर ने उनका सामना करने के लिए राक्षसों की सेना भेजी, जिसने मुचुकुन्द की सेनाओं को कुचलना आरम्भ कर दिया। जब मुचुकुन्द ने अपनी सेना को इस प्रकार मरते देखा, तो वे क्रोधित होकर अपने विद्वान् पुरोहित वसिष्ठ को उलाहना देने लगे। तब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ ने घोर तपस्या की और उन राक्षसों का विनाश कर राजा के लिए विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
अपनी सेना को मरते देखकर कुबेर स्वयं प्रकट हुए और मुचुकुन्द से बोले— "राजन्! पहले भी तुम्हारे समान बलवान् राजा हुए हैं, जिन्हें पुरोहितों की सहायता प्राप्त थी, परन्तु मेरे साथ यहाँ तुम जैसा बर्ताव किसी ने नहीं किया। वे भूपाल अस्त्रविद्या के ज्ञाता थे और मुझे सुख-दुःख देने में समर्थ ईश्वर मानकर मेरी उपासना करते थे। महाराज! यदि तुम्हारी भुजाओं में कुछ बल है तो उसे दिखाओ; ब्राह्मण के बल पर इतना घमण्ड क्यों कर रहे हो?"
यद्यस्ति बाहुवीर्यं ते तद् दर्शयितुमर्हसि ।
किं ब्राह्मणबलेन त्वमतिमात्रं प्रवर्तसे ॥
महाराज! यदि तुम्हारी भुजाओंमें कुछ बल है तो उसे दिखाओ । ब्राह्मणके बलपर इतना घमण्ड क्यों कर रहे हो?
यह सुनकर मुचुकुन्द कुपित हो उठे। उन्होंने धनाध्यक्ष कुबेर को शान्त और न्याययुक्त स्वर में कहा— "राजराज! ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों की उत्पत्ति का स्थान एक ही है। दोनों को स्वयम्भू ब्रह्माजी ने ही पैदा किया है। यदि उनका बल और प्रयत्न अलग-अलग हो जाए, तो वे संसार की रक्षा नहीं कर सकते। ब्राह्मणों में सदा तप और मन्त्र का बल होता है और क्षत्रियों में अस्त्र तथा भुजाओं का। अतः अलकापते! ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों को एक साथ मिलकर ही प्रजा का पालन करना चाहिए। मैं भी इसी नीति के अनुसार कार्य कर रहा हूँ; फिर आप मेरी निन्दा क्यों करते हैं?"
तब कुबेर ने पुरोहित सहित मुचुकुन्द से कहा— "पृथ्वीपते! मैं ईश्वर की आज्ञा के बिना न तो किसी को राज्य देता हूँ और न ही भगवान की अनुमति के बिना दूसरे का राज्य छीनता हूँ। यद्यपि ऐसी बात है, फिर भी आज मैं तुम्हें इस सारी पृथ्वी का राज्य दे रहा हूँ। तुम मेरी दी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन करो।"
ततोऽब्रवीद् वैश्रवणो राजानं सपुरोहितम् ।
नाहं राज्यमनिर्दिष्टं कस्मैचिद् विदधाम्युत ॥
नाच्छिन्दे चाप्यनिर्दिष्टमिति जानीहि पार्थिव ।
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां मद्दत्तामखिलामिमाम् ।
एवमुक्तः प्रत्युवाच मुचुकुन्दो महीपतिः ॥
तब कुबेरने पुरोहितसहित राजा मुचुकुन्दसे कहा – ' पृथ्वीपते! मैं ईश्वरकी आज्ञाके बिना न तो किसीको राज्य देता हूँ और न भगवान्की अनुमतिके बिना दूसरेका राज्य छीनता ही हूँ। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो । यद्यपि ऐसी ही बात है तो भी आज मैं तुम्हें इस सारी पृथ्वीका राज्य दे रहा हूँ । तुम मेरी दी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करो ’ । उनके ऐसा कहनेपर राजा मुचुकुन्दने इस प्रकार उत्तर दिया ।
मुचुकुन्द ने उत्तर दिया— "राजाधिराज! मैं आपके दिए हुए राज्य को नहीं भोगना चाहता। मेरी तो यही इच्छा है कि मैं अपने बाहुबल से उपार्जित राज्य का उपभोग करूँ।"
कुबेर को देखकर बड़ा विस्मय हुआ कि मुचुकुन्द बिना किसी घबराहट के क्षत्रिय धर्म में स्थित हैं। तदनन्तर, क्षत्रिय धर्म का ठीक-ठीक पालन करने वाले राजा मुचुकुन्द ने अपने बाहुबल से प्राप्त की हुई इस वसुधा का शासन किया। जो राजा पहले ब्राह्मण का आश्रय लेकर कार्य में प्रवृत्त होता है, वह बिना जीती हुई पृथ्वी को जीतकर भी महान यश का भागी बनता है।
नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव ।
बाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीयामिति कामये ॥
मुचुकुन्द बोले- राजाधिराज! मैं आपके दिये हुए राज्यको नहीं भोगना चाहता । मेरी तो यही इच्छा है कि मैं अपने बाहुबलसे उपार्जित राज्यका उपभोग करूँ ।
In English
The Dialogue of King Muchukunda and Kubera
King Muchukunda attacks the realm of Kubera, leading to a conflict where Muchukunda's priest Vashistha intervenes to aid him. After a debate about the roles of kings and priests, Kubera offers Muchukunda the entire earth, but Muchukunda declines the gift to rule through his own strength.
This page answers
- How did vashistha help king muchukunda?
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Also written: Muchukundopakhyana, Muchukunda, Vasishtha, Bhishma, Yudhishthira, Kubera, मुचुकुन्दोपाख्यान