प्रायश्चित्तीयोपाख्यान : क्या अपनों के वध का पाप कभी धुल सकता है?
कर्म और काल का न्याय
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 33 · पृष्ठ 227–234
925 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 8 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
युधिष्ठिर की आत्मग्लानि और व्यास के उपदेश की कथा
वैशम्पायनजी कहते हैं—हे जनमेजय! उस समय युधिष्ठिर के वचनों को सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन महर्षि व्यास ने अपनी बुद्धि द्वारा उस विषय पर विचार किया और उन पाण्डुपुत्र से बोले।
हताः पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातरः पितरस्तथा ।
श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाश्च पितामहाः ॥
क्षत्रियाश्च महात्मानः सम्बन्धिसुहृदस्तथा ।
वयस्या भागिनेयाश्च ज्ञातयश्च पितामह ॥
बहवश्च मनुष्येन्द्रा नानादेशसमागताः ।
घातिता राज्यलुब्धेन मयैकेन पितामह ॥
युधिष्ठिर बोले- पितामह! अकेले मैंने ही राज्यके लोभमें आकर पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ताऊ, श्वशुर, गुरु, मामा, बाबा, भानजे, सगे- सम्बन्धी, सुहृद्, मित्र तथा भाई- बन्धु आदि नाना देशोंसे आये हुए बहुसंख्यक क्षत्रियनरेशोंको मरवा डाला ।
युधिष्ठिर अत्यन्त व्याकुल थे, उनके स्वर में आत्मग्लानि की गहरी वेदना थी। उन्होंने कहा—"पितामह! अकेले मैंने ही राज्य के लोभ में आकर पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ताऊ, श्वशुर, गुरु, मामा, बाबा, भानजे और अपने सगे-सम्बन्धियों सहित अनेक देशों से आए हुए बहुसङ्ख्यक क्षत्रिय नरेशों को मरवा डाला। वे वीर भूपाल जो अनेक बार सोमरस का पान कर चुके थे और सदा धर्म में ही तत्पर रहते थे, उनका वध करके मैं कौन-सा फल पाऊँगा? पितामह! बारम्बार इसी चिन्ता से मैं आज भी निरन्तर जल रहा हूँ। उन श्रीसम्पन्न राजसिंहों से हीन हुई इस पृथ्वी को, भाई-बन्धुओं के भयङ्कर वध और करोड़ों अन्य मानवों के संहार को देखकर मैं सर्वथा सन्तप्त हो रहा हूँ।"
तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान् महीक्षितः ।
असकृत् सोमपान् वीरान् किं प्राप्स्यामि तपोधन ॥
तपोधन! जो अनेक बार सोमरसका पान कर चुके थे और सदा धर्ममें ही तत्पर रहते थे, वैसे वीर भूपालोंका वध करके मैं कौन -सा फल पाऊँगा?
युधिष्ठिर की आँखों में भविष्य का भयावह दृश्य था। वे बोले—"उन सुन्दरी स्त्रियों की आज क्या दशा होगी जो अपने पतियों और भाइयों से सदा के लिए बिछड़ गयी हैं? वे घोर विनाशकारी पाण्डवों और वृष्णिवंशियों को कोसती हुई दीन-दुर्बल अबलाएँ पृथ्वी पर पछाड़ खा-खाकर गिरेंगी। अपने पिता, भाई, पति और पुत्रों को न देखकर वे सारी युवती स्त्रियाँ प्राण त्याग देंगी और यमलोक में चली जाएँगी। वे अपने सगे-सम्बन्धियों के प्रति वात्सल्य रखने के कारण अवश्य ऐसा ही करेंगी, इसमें मुझे संशय नहीं है। धर्म की गति सूक्ष्म है, निश्चय ही हमें नारीहत्या के पाप का भागी होना पड़ेगा। हमने सुहृदों का वध करके ऐसा पाप कर लिया है जिसका प्रायश्चित्त सम्भव नहीं है; अतः हमें नीचे सिर करके निस्सन्देह नरक में ही गिरना पड़ेगा। सन्त-श्रेष्ठ पितामह! हम घोर तपस्या करके अपने शरीर का परित्याग कर देंगे। आप इसके लिए कोई विशेष आश्रम बताइये।"
अस्मानन्तकरान् घोरान् पाण्डवान् वृष्णिसंहतान् ।
आक्रोशन्त्यः कृशा दीनाः प्रपतिष्यन्ति भूतले ॥
हम घोर विनाशकारी पाण्डवों और वृष्णिवंशियोंको कोसती हुई वे दीन- दुर्बल अबलाएँ पृथ्वीपर पछाड़ खा- खाकर गिरेंगी ।
यह सुनकर महर्षि व्यास ने युधिष्ठिर को धैर्य बँधाया। व्यासजी बोले—"राजन्! क्षत्रियशिरोमणे! तुम क्षत्रियधर्म का स्मरण करते हुए विषाद न करो; क्योंकि ये सभी क्षत्रिय अपने धर्म के अनुसार मारे गये हैं। वे सम्पूर्ण राजलक्ष्मी और महान यश को प्राप्त करना चाहते थे, परन्तु यमराज के विधान से प्रेरित होकर वे काल के गाल में चले गये हैं। न तुम, न भीमसेन, न अर्जुन और न नकुल-सहदेव ही उनका वध करने वाले हो। काल ने बारी-बारी से आकर अपने नियम के अनुसार उन सभी देहधारियों के प्राण लिये हैं। काल के माता-पिता नहीं होते और उसका किसी पर अनुग्रह नहीं होता। वह प्रजावर्ग के कर्म का साक्षी है और उसी ने तुम्हारे शत्रुओं का संहार किया है। भरतश्रेष्ठ! काल ने इस युद्ध को केवल निमित्त बनाया है। जो प्राणियों द्वारा ही प्राणियों का वध करता है, वही उसका ईश्वरीय रूप है।"
न त्वं हन्ता न भीमोऽयं नार्जुनो न यमावपि ।
कालः पर्यायधर्मेण प्राणानादत्त देहिनाम् ॥
न तुम, न भीमसेन, न अर्जुन और न नकुल सहदेव ही उनका वध करनेवाले हैं । कालने बारी - बारीसे आकर अपने नियमके अनुसार उन सभी देहधारियोंके प्राण लिये हैं ।
व्यासजी ने आगे समझाया—"राजन्! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि काल जीव के पाप और पुण्य कर्मों का साक्षी है। वह कर्म की डोरी का सहारा लेकर भविष्य में होने वाले सुख-दुःख का उत्पादक होता है। उन क्षत्रियों के विनाश के पीछे उनके अपने ही कर्म थे। तुम अपने आचार-व्यवहार पर भी ध्यान दो; तुम सदा उत्तम व्रत के पालन में लगे रहते थे, तो भी विधाता ने तुम्हें अपने अधीन करके ऐसा निष्ठुर कर्म करवा लिया। जैसे लोहार या बढ़ई का बनाया यन्त्र चालक के अधीन रहता है, वैसे ही यह जगत् काल के वश में है। प्राणी किसी व्यक्त कारण के बिना दैवात् उत्पन्न होता है और दैवेच्छा से उसका विनाश हो जाता है; इसलिए शोक और हर्ष करना व्यर्थ है।"
कांक्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद्यशः ।
कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः ॥
वे सम्पूर्ण राजलक्ष्मी और भूमण्डलव्यापी महान् यशको प्राप्त करना चाहते थे; परंतु यमराजके विधानसे प्रेरित हो कालके गालमें चले गये हैं ।
व्यासजी ने युधिष्ठिर को मार्ग दिखाते हुए कहा—"राजन्! तुम्हारे चित्त में जो यह पीड़ा है, उसकी निवृत्ति के लिए प्रायश्चित्त करना उचित है। पूर्वकाल में देवासुर सङ्ग्राम में बड़े भाई असुर और छोटे भाई देवता आपस में लड़ पड़े थे। देवताओं ने खून से भीगी पृथ्वी को जीतकर दैत्यों का संहार किया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। इसी प्रकार, देवताओं ने उन अट्ठासी हजार ब्राह्मणों का भी वध किया जो अभिमानवश दानवों की सहायता के लिए जा मिले थे। जो धर्म का विनाश चाहते हुए अधर्म के प्रवर्तक हो रहे हों, उनका वध करना उचित है। कभी-कभी धर्म ही अधर्म रूप हो जाता है और अधर्म रूपी कर्म ही धर्म बन जाता है; इसलिए विद्वान को इसका रहस्य समझ लेना चाहिए। तुम वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हो, अपने हृदय को स्थिर करो। तुमने तो उसी मार्ग का अनुसरण किया है जिस पर देवतुल्य लोग पहले चल चुके हैं। तुम्हारे जैसे लोग नरक में नहीं गिरेंगे क्योंकि तुम शत्रुओं के अपराध से इस कार्य में पड़े थे और निरन्तर पश्चात्ताप कर रहे हो।"
अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप ।
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥
नरेश्वर! किसी समय धर्म ही अधर्मरूप हो जाता है और कहीं अधर्मरूप दीखनेवाला कर्म ही धर्म बन जाता है; इसलिये विद्वान् पुरुषको धर्म और अधर्मका रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ।
व्यासजी ने प्रायश्चित्त का विधान बताते हुए कहा—"इसके लिए महान यज्ञ 'अश्वमेध' ही एकमात्र मार्ग है। महाराज! तुम इस यज्ञ का अनुष्ठान करो, इससे तुम पापरहित हो जाओगे। पूर्वकाल में विजयी इन्द्र ने भी सौ बार अश्वमेध यज्ञ किया था, जिससे वे 'शतक्रतु' कहलाए और उनके सारे पाप धुल गये। उन्होंने स्वर्ग पर विजय पाई और मरुद्गणों के साथ शोभा पाने लगे। अनघ! तुमने इस वसुन्धरा को अपने पराक्रम से प्राप्त किया है। अब तुम अपने सुहृदों के परिवारों के पास जाओ। उनके भाइयों, पुत्रों या पौत्रों को अपने राज्य पर अभिषिक्त करो। जिनके उत्तराधिकारी बालक हों, उनकी प्रजा को सान्त्वना देकर शान्त करो और पृथ्वी का पालन करो। जिन राजाओं के पुत्र नहीं हैं, उनकी कन्याओं को राज्य सौंप दो; इससे उनकी स्त्रियों की मनोकामना पूर्ण होगी और वे शोक त्याग देंगी। इस प्रकार शान्ति स्थापित करके तुम अश्वमेध यज्ञ करो।"
अश्वमेधो महायज्ञः प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि ॥
इसके लिये महान् यज्ञ अश्वमेध ही प्रायश्चित्त बताया गया है । महाराज! तुम इस यज्ञका अनुष्ठान करो । ऐसा करनेसे तुम पापरहित हो जाओगे ।
व्यासजी ने उपदेश समाप्त करते हुए कहा—"क्षत्रियशिरोमणे! जो युद्ध में मारे गये, वे शोक के योग्य नहीं हैं क्योंकि वे काल की शक्ति से मोहित होकर अपने ही कर्मों से नष्ट हुए। कुन्तीकुमार! तुमने क्षत्रियधर्म का पालन किया है और तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है; अब तुम उसी धर्म की रक्षा करो जो मृत्यु के पश्चात् सबका कल्याण करने वाला है।"
अवाप्तः क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकण्टकम् ।
रक्षस्व धर्मं कौन्तेय श्रेयान् यः प्रेत्य भारत ॥
कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रियधर्मका पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है; अतः अब तुम उस धर्मकी ही रक्षा करो, जो मृत्युके पश्चात् सबका कल्याण करनेवाला है ।
In English
Yudhisthira's Grief and Vyasa's Counsel
Yudhisthira expresses deep guilt to Rishi Vyasa for the deaths of his many relatives and warriors in battle. Vyasa comforts him by explaining that Time (Kala) governs all destruction and that the fallen fought according to their own karma. Vyasa advises Yudhisthira to perform the Ashvamedha यज्ञ to purify himself and instructs him to care for the widows and heirs of the fallen kings.
This page answers
- Why is yudhisthira feeling guilty?
- What did vyasa say about time and death?
- How can yudhisthira perform atonement for the war?
- What should yudhisthira do for the families of fallen kings?
Also written: Prayashchittiyopakhyana, Prayashchittiya, Yudhishthira, Vyasa, Kala, Indra, Pandava, प्रायश्चित्तीयोपाख्यान